Hindi Kahani
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Hindi Kahani: “सोमा हम आज ही यहां से चले जाएंगे। तुम सामान पैक कर लो और बच्चों को भी बता दो अब वो यहां इस घर में नहीं आएं। मुझसे अब और जिल्लत बर्दास्त नहीं होती।”

अमन के दोनों बेटे दूसरे शहर में रहकर पढ़ाई कर रहें हैं और वो अपनी पत्नी सोमा के साथ अपने संयुक्त परिवार में रहता हैं। 

“क्या हुआ अमन जी ऐसा क्यों कह रहें हैं ? किसी ने कुछ कहा है क्या ?”

” और  क्या सुनना बांकी रह गया है। जिन भाईयों और उनके बच्चों के लिए मैंने क्या कुछ नहीं किया वही मुझे अपना दुश्मन समझते हैं।”

“नहीं अमन जी वो आपके अपने भाई हैं वो आपको अपना दुश्मन क्यों समझेंगे। आपको कोई गलतफहमी हुई होगी।”

“सोमा अब तक तो मैं गलतफहमी का ही शिकार रहा हूं। आज मेरी आंखें खुली हैं। जानती हो जब तक मैं उनपर अपने पैसे लुटाता रहा तब तक ही वो मुझे अपना समझते थे। अब जब मैं अपने बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करने के कारण पहले की तरह उतने पैसे नहीं दे पा रहा हूं तो वो मुझे निठल्ला मुफ्तखोर और ना जाने किस किस नाम से पुकारते हैं। मेरा अंतर्मन छलनी हो रहा है। आज मैंने भाई के मुंह से सुना कि उस निठल्ले मुफ्त खोर को मारकर भगाना ही पड़ेगा। वो और उसकी पत्नी मुफ्त की रोटियां तोड़ रहें हैं। उसके कमरे को हम किराए पर लगा देंगे तो किराया भी तो आएगा।”

“क्या भईया ने ऐसा आपसे कहा?”

“नहीं वो भाभी से बात कर रहे थे। वैसे भी उनका बर्ताव मेरे प्रति पहले जैसा नहीं रहा। कितना प्यार करते थे वो मुझे और अब मेरे बारे में ऐसा सोचते हैं। क्या ग़लती हो गई हमसे सोमा जो अब वो हमें हमारे ही घर से निकालना चाह रहें हैं। पिताजी के इस मकान पर जितना उनका हक है उतना ही तो मेरा भी है फिर भी वह यह बात वो मुझसे डायरेक्ट बोलते तो मैं यहां से कब का चला जाता। मुझे  सबसे बुरा लग रहा है कि मां भी तो वहीं बैठी सब सुन रहीं थीं। वो भाई को कुछ नहीं बोली। मां भी नहीं चाहतीं कि मैं यहां रहूं।”

अमन सोमा की गोद में सिर रख रो पड़ा।

यह वही सोमा उसकी पत्नी है जिसे वो कभी फूटी आंख नहीं सुहाती थी। हमेशा उससे दूर रहने के बहाने खोजा करता था। उसके हर काम में मीन मेख निकालता था। 

सोमा को अमन के वो शब्द अभी भी कान में गूंज रहे थे।

‘कैसा खाना बनाया है? तुम्हारा ध्यान कहां रहता है? खाने में बाल है। ले जाओ मुझे नहीं खाना।

कपड़े भी जगह पर नहीं रख सकती। घर कितना गंदा है। तुमसे बदबू आती है। जाओ दूसरे कमरे में सो जाओ मुझे किसी के साथ बिस्तर शेयर नहीं करना।’

 अमन की इस तरह की बहुत सी बातों से सोमा का दिल आहत होता था।

वैसे भी अमन को अपने जीवन में ठोकर ही मिलती आई थी जिसका बदला वो सोमा से ही लेता था। फिर भी सोमा अपना पत्नी धर्म निभाती रही। अपनी हर पूजा व्रत त्यौहार में अमन की लंबी आयु और खुशियों की प्रार्थना करती रही। 

बारहवीं पास करके आंखों में सपने लिए वो अपने छोटे से शहर सहरसा से  दिल्ली महानगर में आगे की पढ़ाई के लिए चला गया। वहां उसी  कॉलेज की एक लड़की को दिल दे बैठा। घर परिवार से दूर निशा ही तो उसे अपनी सी लगती थी। कॉलेज के तीन साल वो साथ रहे और अमन तो उसी में अपना भविष्य देखता था पर फेयरवेल वाले दिन उसने कुछ ऐसा देखा कि उसे प्यार के नाम से ही नफरत हो गई। निशा उसके जीवन में अंधेरी रात करके किसी दूसरे की बांहों में समाई थी। 

“निशा तुम तो मुझसे प्यार करती हो।”

“प्यार तुमसे… टाइम पास हो तुम मेरा। तुम जैसे गरीब देहाती लड़के के साथ मैं अपनी पूरी जिंदगी बिताऊंगी ऐसा सपने में भी कैसे सोच लिया तुमने।”

सबके सामने निशा ने उसका बहुत ही अपमान किया और वो अपमान के घूंट पीकर वहां से लौट आया। 

 दिल टूटा… निशा के साथ देखा सपना टूटा… पर फिर भी वो अपने पिता का सपना जो उन्होंने उसके लिए देखा था कि उनका बेटा अमन आई एस ऑफिसर बने उसे पूरा करने के लिए सिविल सर्विस की तैयारी में  जी जान से जुट गया पर परीक्षा से कुछ दिन पहले ही उसे खबर मिली कि उसके पिता का देहांत हो गया है। वो तुरंत अपने शहर आ गया। पिता को दुनिया छोड़े हुए तो तीन महीने से ज्यादा हो गए थे। यह पता चलते ही वो अंदर से बुरी तरह टूट गया। उसे खबर दी गई तब जब  उनकी नौकरी  उनकी पत्नी या बच्चों में से कोई नहीं लेता तो वो अवसर उनके परिवार के हाथों से निकल जाता। मां पढ़ी लिखी नहीं थी और उसके बड़े भाई पहले ही सरकारी नौकरी में थे और छोटा भाई तब स्कूल में ही पढ़ता था। बस उम्मीद सिर्फ अमन से ही थी।

टूटा हुआ दिल और टूटे हुए सपने लेकर उसने अपने परिवार के लिए फिर से जीना शुरू किया।

वो अपने भाईयों पर आंख बंद करके विश्वास करता था।  वो जो कहते वही करता। अपना पूरा वेतन उनके हाथों में देता।भाईयों ने ही उसकी शादी एक ऐसी लड़की से करवा दी जो उसे बिल्कुल पसन्द नहीं थी। निशा ने उसके दिलो-दिमाग पर कब्जा कर रखा था। वो उसे भूल नहीं पा रहा था। सोमा का काला रंग और उसकी बदसूरती उसके जीवन में और उदासीनता भर रही थी। 

 आंसू सोमा की आंखों से भी बहने लगे। शादी के पच्चीस साल हो गए और बहुत कुछ सहती आई थी वो पर उसने कभी भनक तक ना लगने दी अपने पति को कि वो  उसके और परिवार वालों  के व्यवहार से कितना आहत होती है। उसके भाई भाभी अमन के बारे में भी कैसे विचार रखते हैं। उसके सामने तो सब यही जताते हैं कि अमन बहुत अच्छा है पर उसके पीठ पीछे हमेशा उसकी बुराई करते हैं। सोमा अमन को परिवार से दूर नहीं करना चाहती थी इसलिए उसने कभी ऐसी कोई बात बताई ही नहीं जिससे अमन परिवार से दूर हो जाए। 

“सुनो जी इस तरह हिम्मत मत हारिए। उठिए कुछ खा लीजिए।”

“नहीं सोमा अब इस घर में एक घूंट पानी भी नहीं पीऊंगा।”

अमन ने सोमा के आंचल से अपना आंसू पोंछा और उठकर अपने कमरे से बाहर आ गया। सोमा भी उसका हाथ थामें थी।

जिसे वो जीवन भर ठोकर मारता रहा वही उसकी हिम्मत और हौसला बनी। उसकी जीवन संगिनी उसके साथ है तो वो जीवन की हर परेशानी का सामना कर पाएगा।

“मुझे माफ कर दो सोमा। मैंने हमेशा तुम्हारा अपमान किया और बुरा व्यवहार करता रहा फिर भी तुम मेरा साथ निभाती रही। जिन्हें अपना समझा उन्होंने ही ठोकर मारी।”

“जो बीत गया उसे भूल जाते हैं और अपने जीवन की नई शुरुआत करते हैं।”

“एक बार फिर सोच लो यह घर छोड़ने से पहले। कहीं बाद में पछताना ना पड़े।” अमन ने भाई और मां के पैर छुए और सोमा के साथ जीवन के नए सफर पर चल पड़ा।