श्रीकृष्ण अवतार भगवान विष्णु का पूर्णावतार है। ये रूप जहां धर्म और न्याय का सूचक है वहीं इसमें अपार प्रेम भी है। श्रीकृष्ण अवतार से जुड़ी हर घटना और उनकी हर लीला निराली है। श्रीकृष्ण के मोहक रूप का वर्णक कई धार्मिेक ग्रंथों में किया गया है। सिर पर मुकुट, मुकुट में मोर पंख, पीतांबर, बांसुरी और वैजयंती की माला। ऐसे अद्भूत रूप को जो एकबार देख लेता था, वो उसी का दास बनकर रह जाता था प्रेम और दया के प्रतीक श्रीकृष्ण सारे देवताओं में सबसे ज्यादा श्रृंगार प्रिय भगवान हैं। कृष्ण को हमेशा उनके भक्त नए कपड़ों और आभूषणों से लादे रखते हैं। कृष्ण का नाम जुंबा पर आते ही हमारे मन में सबसे पहले जो छवि उभर कर सामने आती है वो आभूषण पहन रखे और मस्तक पर मोर पंख धारण किए हुए युवा कृष्ण की आती है। भगवान श्रीकृष्ण एक ओर जहां प्रेम और दया के प्रतीक हैं वहीं दूसरी ओर वह अपने रौद्र रूप में शत्रुओं का नाश करने वाले भी हैं। सिर पर मुकुट, मुकुट में मोर पंख, पीतांबर, बांसुरी और वैजयंती की माला। ऐसे अद्भूत रूप को जो एकबार देख लेता था। वो उसी का दास बनकर रह जाता था। भगवान श्रीकृष्ण को दूध, दही और माखन बहुत प्रिय था लेकिन इसके अलावा भी कुछ चीजें उनकी बेहद खास थीं, जो सदैव उनके पास रहती थीं यां फिर वो उनका खासतौर से खास मौकों पर इस्तेमाल किया करते थे। आइए जानते हैं कान्हा की मनभावन वस्तुओं के बारे में।

 

वैजयंती माला

भगवान कृष्ण के गले में जो माला है उसे वैजयंती माला कहा जाता है। भगवान के गले की माला में शोभा, सौन्दर्य और माधुर्य की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मीजी छिपी रहती हैं। वैजयंती माला की शास्त्रों में बड़ी महिमा है। ये श्री कृष्ण भक्ति प्रदान करने वाली मानी गयी है। इससे श्री कृष्ण मंत्रो का जप किया जाता है। इसे गले में धारण करना शुभ माना गया है। विद्वानों के अनुसार ये भगवान श्रीकृष्ण को उतनी ही प्रिय है जितना मोर पंख और माखन मिश्री। यह माला भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय चीजों में शामिल है।

 

मोर मुकुट 

भगवान श्रीकृष्ण मोर पंख को अपने मुकुट में लगाते हैं। कहते हैं कि महारास लीला के समय राधा ने देखा कि एक मोर का पंख उनके आंगन में गिरा है तो उन्होंने यह पंख उठाकर श्रीकृष्ण के सिर पर बांध दिया था। कहते हैं कि मथुरा जाने से पहले श्रीकृष्ण ने राधा को वह बांसुरी भेंट कर दी थी और राधा ने भी निशानी के तौर पर उन्हें अपने आंगन में गिरा मोर पंख उनके सिर पर बांध दिया था।

 

 पाञ्चजन्य शंख 

महाभारत में लगभग सभी योद्धाओं के पास शंख होते थे। उनमें से कुछ योद्धाओं के पास तो चमत्कारिक शंख होते थे, जैसे भगवान कृष्ण के पास पाञ्चजन्य शंख था जिसकी ध्वनि कई किलोमीटर तक पहुंच जाती थी। यह शंख उन्हें तब मिला था जब वे अपने गुरु सांदिपनी के पुत्र पुनरदत्त को ढूंढने के लिए समुद्र के भीतर दैत्यनगरी चले गए थे। वहां उन्होंने देखा कि एक शंख में दैत्य सोया है। उन्होंने दैत्य को मारकर शंख को अपने पास रखा और फिर जब उन्हें पता चला कि उनका गुरु पुत्र तो यमपुरी चला गया है तो वे भी यमपुरी चले गए। वहां यमदूतों ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया तब उन्होंने शंख का नाद किया जिसके चलते यमलोक हिलने लगा। तब यमराज ने खुद आकर उन्हें पुरदत्त की आत्मा को सौंप दिया था। यह शंख गुलाबी रंग का था।

 

मणि 

स्यमंतक मणि के कारण भगवान श्रीकृष्ण को चोरी का आरोप झेलना पड़ा था। कहते हैं कि वह मणि जामवंतजी के पास थी। जामवंती जी से लाकर उन्होंने अक्रूरजी को दे दी थी। हालांकि श्रीकृष्ण के मुकुट में कई मणियां जड़ी होती थीं। भगवान विष्णु कौस्तुभ मणि धारण करते हैं। लेकिन श्रीकृष्ण इन सभी मणियों को छोड़कर दूसरी ही मणि धारण करते थे।

 

शारंग धनुष 

भगवान श्रीकृष्ण सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर भी थे। श्रीकृष्ण के धनुष का नाम शारंग था। कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण का यह धनुष सींग से बना हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि यह वही सारंग है जिसे कण्व की तपस्यास्थली के बांस से बनाया गया था। कुछ मानते हैं कि यह धनुष उन्हें खांडव.दहन के दौरान वरुणदेव ने दिया था।

 

 

पीतांबर वस्त्र 

भगवान श्रीकृष्ण को पीतांबरधारी भी कहा जाता है क्योंकि वह पीतांबर वस्त्र पहनते हैं। पीतांबर अर्थात पीले रंग का वस्त्र। उन्हें यह वस्त्र पसंद थे इसीलिए वे यह वस्त्र पहनते थे। वस्त्र व आभूषणों में धौति, उत्तरीय, कमरबंध, बाजूबंध, मणिबंध आदि धारण करते थे।

 

सुदर्शन चक्र 

भगवान श्रीकृष्ण को चक्रधारी भी कहते हैं। महाभारत काल में मात्र उन्हीं के पास चक्र था जिसे सुदर्शन चक्र कहते हैं। कहते हैं कि यह चक्र उन्हें भगवान परशुराम से मिला था। हालांकि वे तो स्वयंव विष्णु ही है।

 

चंदन 

चंदन मुख्यत कई प्रकार के होते हैं। हरि चंदन, गोपी चंदन, सफेद चंदन, लाल चंदन, गोमती और गोकुल चंदन। श्रीकृष्ण माथे पर सदैव चंदन का तिलक धारण करते थे।

 

सुसज्जित बांसुरी

श्रीकृष्ण को उनकी बांसुरी अत्यंत प्रिय है। एक छंद में तो राधा ने श्रीकृष्ण की बांसुरी के भाग्य को अपने भाग्य से कहीं श्रेष्ठ बताया है क्योंकि वो उनके अधरों को छूती है। श्रीकृष्ण की बांसुरी की मीठी धुन सुनकर सारी गोपियां, ग्वाल.बाल, गायें, जीव.जंतु, पेड़.लता थम से जाते थे। बांसुरी सरलता और मीठास का प्रतीक हैण् जन्माष्टमी के मौके पर श्रीकृष्ण की मूर्ति सजाते समय बांसुरी रखना न भूलें।

 

मोरपंख

भगवान श्रीकृष्ण अपने मुकुट में मोरपंख धारण करते हैं। मोर पंख सम्मोहन और भव्यता का प्रतीक है। ये दुखों को दूर कर जीवन में खुशहाली का सूचक है। कान्हा के मुकुट की सजावट मोर पंख के बिना अधूरी है।

 

मिश्री की मीठास

कृष्ण को माखन मिश्री बहुत ही प्रिय है। मिश्री मीठास का प्रतीक है। जीवन में मीठास का होना बेहद जरूरी है। श्रीकृष्ण ने सदैव प्रेम करने की सीख दी। प्रेम हर उस चीज से जो हमारे इर्द.गिर्द मौजूद है।

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