हमारी नई-नई शादी हुई थी। एक रात सोने में ज्यादा देर हो गई। सुबह नींद खुली तो देखा, धूप चढ़ गई थी। मेरे पति संजय ने मुझे कहा कि तुम पहले बाहर जाओ मैं थोड़ी देर बाद आता हूं। मैं सकुचाते हुए कमरे से बाहर आई और ब्रश वगैरा करके रसोई में जाकर सासू मां का हाथ बंटाने लगी। मैं मारे संकोच के उनसे आंख भी नहीं मिला पा रही थी। थोड़ी ही देर में ससुरजी की आवाज आई, ‘अरे रात में बुखार आ गया, बताया क्यों नहीं? सुनकर मैं अपना इंप्रेशन जमाने दौड़ी-दौड़ी ड्राइंगरूम में आई और बोली, ‘पापा जी, किसकी तबियत खराब है घर में? पापा जी जो शायद हमारी स्थिति भांप गए थे, आंखों पर चश्मा चढ़ाकर पेपर में आंखें गड़ाते हुए बोले, ‘अरे तुमको नहीं पता? संजय बता रहा था कि तुमको रात में हरारत सी लग रही थी, तुम दोनों को सोने में देर हुई, इसीलिए उठने में देर हो गई। मैंने घबराकर इनकी ओर देखा, इनकी गुस्से से लाल आंखें मुझे घूर रही थी, जैसे कह रही हो, ‘चुप नहीं रह सकती थी, पूरे किए पर पानी फेर दिया। वहां बैठा देवर मुस्कुराते हुए बोला, ‘क्या भाभी, आप तो बिल्कुल बिलोरन हो, भैया के किए-धरे पर पानी फेर दिया। फिर मेरी समझ में आया कि मेरे पति ने हमारे देर से उठने का कारण मुझे हरारत होना बताया था। मैं बिन कुछ कहे, शर्म से चेहरा झुकाए किचन की ओर भाग गई।
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