मिलने पर बेटा खीज उठा, गुस्सा करने लगा। पहले तो इस क्रूर होते जाते समय में उसके अंदर कहीं एक सुप्त इच्छा अँखुवाई कि वह यूँ ही मुँह फेरकर चल दे वापस। फिर याद आया, एक बार पिताजी कँधे पर लादकर मीलों दूर मेला ले गए थे। वहाँ वह गुम हो गया था। वर्षों बाद मिला था, तब भी कँधे पर लादकर घर वापसी।

वह दौड़कर उनके गले से जा लिपटा। रिश्तों के खोने की कीमत अब समझ में आ गई थी।

 सड़क के किनारे से दो आग उगलती आँखें!… उसे परवाह न थी।

यह भी पढ़ें –कब तक? – गृहलक्ष्मी लघुकथा

-आपको यह लघुकथा कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही आप अपनी लघुकथा भी हमें ई-मेल कर सकते हैं-Editor@grehlakshmi.com

-डायमंड पॉकेट बुक्स की अन्य रोचक कहानियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://bit.ly/39Vn1ji