नासिरूद्दीन गुलाम वंश का अत्यन्त सच्चरित्र और धर्मनिष्ठ बादशाह था। बादशाह होने पर भी निजी खर्च के लिए राजकोष से पैसा लेना उसे मंजूर न था। अपने जीवन-यापन के लिए वह अपनी हस्तलिखित पुस्तकों का व्यापार करता था।
नासिरूद्दीन की बेगम भी अपने पति के समान ही सरल एवं नेक चरित्र महिला थी। घरेलू कार्यों के अलावा रसोई भी वह स्वयं बनाती थी। एक बार रसोई बनाते समय उसका हाथ जल गया तो उसने नासिरूद्दीन से कहा, “ऐ मेरे सरताज! क्यों न हम रसोई बनाने के लिए एक नौकरानी रख लें?” “नहीं, यह सम्भव नहीं। मेरी आमदनी उतनी नहीं है कि हम नौकरानी रख सकें।” नासिरूद्दीन ने सहज ही उत्तर दिया।
11 जुड़िया
“आप बादशाह हैं, और राजकोष के स्वामी।” आपको…।
“देखो बेगम!” नासिरूद्दीन ने बात काट कर कहा, “मेरा राजकोष प्रजा की धरोहर है। निजी कार्यों के लिए उसका उपयोग अमानत में ख्यानत है। हम राजकोष पर निर्भर न करके स्वावलम्बी रहेंगे, तभी प्रजा भी अपने काम को अबादत मानेगी। जब तक तुम्हारा हाथ ठीक नहीं होता, तब तक तुम चाहो तो मैं रसोई बना दूँगा।”
नासिरूद्दीन के इस उत्तर से उसकी बेगम बेहद प्रभावित हुई और चुपचाप रसोई में जाकर काम करने लगी।
ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–Anmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)
