Hindi Katha: सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्माजी ने सात पितृों की उत्पत्ति की। इनमें से चार मूर्तिमान थे और तीन तेज के रूप में। उन सातों पितृों के भोजन के लिए उन्होंने श्राद्ध और तर्पण में भेंट दिया हुआ पदार्थ निश्चित कर दिया।
तो भूख लेकिन जब ब्राह्मणों के श्राद्ध और तर्पण के भोजन पदार्थ पितृों को नहीं मिले से पीड़ित होकर वे ब्रह्माजी की शरण में गए और बोले – “हे ब्रह्मदेव ! आपने मनुष्यों के कल्याण के लिए हमारी उत्पत्ति की और श्राद्ध व तर्पण किया हुआ पदार्थ हमारे निश्चित किया। किंतु भगवन् ! उनके द्वारा अर्पित पदार्थ हमें उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। पूर्वकाल में जब देवताओं को यज्ञ आदि का भाग प्राप्त नहीं हो रहा था और वे निराहार होकर आपकी शरण में आए थे, तब आपने भगवती की कृपा से देवी स्वाहा की उत्पत्ति करके देवताओं का कल्याण किया था। इसलिए हे देव ! आप हमारे लिए भी कोई ऐसी ही व्यवस्था करने की कृपा करें, जिससे हमारी भूख शांत हो सके। “
पितृों की बात सुनकर ब्रह्माजी बोले – ” हे पुत्रो ! व्यथित मत होओ। जैसे देवताओं की सहायता के लिए मैंने भगवती जगदम्बा की कृपा से देवी स्वाहा को उत्पन्न किया था, ठीक उसी प्रकार तुम्हारे लिए भी मैं भगवती से प्रार्थना करूँगा। भगवती की कृपा से तुम्हारी समस्या अवश्य दूर हो जाएगी । “
पितृों को आश्वस्त करने के बाद ब्रह्माजी ने नेत्रों को बंद करके भगवती माता का ध्यान लगाया। तब भगवती ब्रह्माजी के मन से उनकी मानसी कन्या के रूप में प्रकट हुईं। वे देवी सैकड़ों चन्द्रमा की प्रभा के समान चमक रही थीं। भगवती जगदम्बा की अंशरूपा होने के कारण उन देवी में विद्या, गुण और बुद्धि समान रूप से विद्यमान थे। वे देवी दिव्य रत्नों और आभूषणों से अलंकृत थीं । भगवती महालक्ष्मी के समस्त गुण उनमें विद्यमान थे । ब्रह्माजी ने मनोकामनाएँ पूर्ण करने वाली उन कल्याणमयी देवी का नाम ‘ स्वधा’ रखा।
इसके बाद पितृों को संतुष्ट करने के लिए उन्होंने देवी स्वधा को उन्हें सौंप दिया और देवी स्वधा को वर देते हुए बोले – ” हे स्वधा ! तुम्हारी उत्पत्ति पितृों के कल्याण के लिए हुई है। अतः मैं तुम्हें पितृों को सौंपता हूँ। जो मनुष्य मंत्रों के अंत में स्वधा लगाकर उनका उच्चारण करके पितृों के लिए भोजन पदार्थ अर्पण करेगा, उसका दान सहर्ष स्वीकार होगा । उसकी समस्त इच्छाएँ पूर्ण होंगी। इस प्रकार तुम्हारे द्वारा पितृों की भूख शांत होगी । “
इसके बाद देवताओं, पितृों, ऋषियों, मुनियों और मनुष्यों ने अत्यंत श्रद्धापूर्वक भगवती स्वधा की स्तुति की। भगवती स्वधा ने प्रसन्न होकर उन्हें इच्छित वर प्रदान किए। उनके वर-प्रसाद से वे सभी परम संतुष्ट हो गए और उनकी समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण हो गईं।
इस प्रकार पितृों की तुष्टि के लिए स्वधा शब्द का उच्चारण श्रेष्ठ माना जाने लगा।
