Hindi Story: गर्मी की तपन तन-मन को जलाती तो झूंझलाहट आना तय था। प्यास के कारण हलक सूख गया था। आसपास नजर दौड़ाई तो पास ही छप्पर की बनी प्याऊ दिखाई दी। ठंडा पानी मिलेगा यही सोचकर उधर रूख किया। हमउम्र महिला ने मुस्कुराते हुए पानी पिलाया। मेरे बाद लगातार पानी पीने के लिए आते हुए लोगों की भीड़ दिख रही थी, उसके हाथ एक पल को भी नहीं थम रहे थे फिर भी उसकी मुस्कान इंच भर भी कम नहीं हुई। यह देख मै आश्चर्यचकित थी। मेरे आस-पास पढ़े-लिखे संभ्रात लोगों की भीड़ थी। आज नौकरी का पहला दिवस था। साथ ही बस का भी पहला सफर था।
“दीदी आप नौकरी करती हैं।”- उसकी मधुर आवाज से मेरी तंद्रा भंग हुई। मैंने हां की मुद्रा में सिर हिला कर जवाब दिया। वह मुस्करा दी। जाने स्नेह का कौनसा तार जुडा था कि मैं उससे अपनापन महसूस करने लगी।
आज फिर स्मृति तंत्र में हलचल हो रही है। कुछ चलचित्र आंखों के सामने तैरने लगे। आकाश के सफेद बादलों की तरह अंकित कुछ रूई जैसे लम्हे विचरण करने लगे। बाईस वे बसंत की वह सखी आज भी बहुत याद आती है। स्त्रियों के संसार में सहेली का दर्जा बहुत ऊंचा है, बाकी रिश्ते दुनिया की नजर में दिखावा और औपचारिकता भरे है, किंतु स्त्रियों के लिए यह आत्मिक जुडाव का धागा है, जिसे वह बड़े जतन से संभालती है। पानी पिलाने वाली वो सखी माथे पर सफेद चंदन का टीका, एक लंबी काली मोटी चोटी, हाथों में एक-एक पीतल की चूड़ियां और सीधे पल्ले की साड़ी में किसी तेजस्विनी से कम नहीं लगती थी।
अब तो मेरा रोज का क्रम बन गया था। बस से उतरने-चढ़ने से पहले उसकी प्याऊ पर जाकर पानी पीना। चाहे प्यास लगी हो न लगी हो मगर सखी से मिलने का बहाना चाहिए था। वह मेरी प्यारी सखी बन चुकी थी। हम दोनों कभी-कभी बातें भी कर लिया करते थे और कभी-कभी हंसी मजाक भी। एक दिन उसने दो कच्ची इमली मेरे हाथ पर रखकर कहा- “पीछे वाले पेड से तोड़कर लायी हूं। दीदी आपके लिए, इसकी चटनी बनाकर खाना। जीवन में नया स्वाद आ जायेगा।” मै उसकी मासूमियत पर फिदा हो गयी। एक साधारण सी महिला न जाने कितने लोगों की प्यास को तृप्त करती है। आते-जाते उसकी मुस्कुराहट देखती तो उम्मीद बनी रहती कि दुनिया में कुछ अच्छा हो रहा है। उसकी मुस्कान मेरे थकावट दूर कर देती।
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अभी तक ना जाने कितने ही यात्री इधर-उधर आते-जाते दिखाई देते। हजारो की तादाद में बस में चढते और उतरते। हजारो लोगो को काम करते हुए देखती लेकिन सखी जितनी तल्लीनता मैने किसी में अभी तक नही देखी। अजनबी लोगों के बीच में वह अकेली स्त्री हजारों लोगों का सामना हर रोज करती थी। कभी कोई झल्लाता, कभी कोई गुस्सा करता बमुश्किल कभी कोई प्यार से ही बोलता होगा। इसके बावजूद भी उसके माथे पर कोई शिकन तक दिखाई नहीं देती। सबसे बेखबर अपनी दुनिया में मगन वह बड़ी ही शिद्दत से अपने कार्य को अंजाम देती और संतुष्टि के भाव रखती। इसी में ही जीवन की सार्थकता मान लेना मुझे साहस का ही काम लगता है।
उस दिन मैंने उसे बातों बातों में यूं ही कह दिया था- “एक दिन मैं अपनी कार खरीदुंगी। बस से आने जाने से मुक्ति मिल जाएगी।” वो बोल पड़ी-“जिस दिन खुद की गाड़ी ख़रीदो तो मुझे जरूर बताना, मैं दुआ सलामती के लिए नारियल मंदिर में चढ़ाऊंगी।”
“मेरे गाड़ी खरीदने पर तुम्हें इतनी खुशी होगी, क्यों?” -मैने उसके चेहरे पर नजर टिका दी।
“हां दीदी, बचपन का सपना रहा है कि एक दिन कार चलाना सीखूं और घूमने जाऊं। अब मैं तो यह सपना पूरा नहीं कर सकती। आपके अंदर मुझे खुद की खुशी दिखाई देती है। आप यह ख्वाहिश पूरा कर दीजिए। आप और मैं अलग थोडे ना है।”
“वादा है तुमसे, मेरी कार में सबसे पहले तुझे सैर करवाऊंगी।”- मैंने उसके हाथों में अपना हाथ रख दिया।
सच में कभी कभी किसी अजनबी से कितना प्रेम हो जाता है। हजारों लोगों की तृषा बुझाते हुए जिंदगी ढल जाती है।
दस वर्ष गुजर गये। मेरा तबादला हो गया। इतने वर्षों में मेरी शादी फिर बच्चे और घर नौकरी की जिम्मेदारी में व्यस्त हो गई। मै लगभग उसे भूल गयी थी मुझे उसकी याद तब भी नहीं आयी जब मैने अपनी कार खरीदी। किया हुआ वादा तो खैर मुझे क्या याद रहता।
घर पहुंच कर देखा एक खत मेरा इंतजार कर रहा था। मां ने लिखा- “बुआ बनने की लख-लख बधाई, जलवा पूजन बुआ के बगैर संभव नहीं, कुछ दिन की छुट्टी लेकर नैहर आ जाओ।” रिश्तों के मोह में बंधा जीवन कहां कुछ सोचता विचारता है। पतिदेव ने चलने में आनाकानी की तो खुद ही अपना बैग पैक करके अपनी कार से निकल पड़ी। गंतव्य पर पहुंच कर जब कार ने विराम लिया, बचपन की सरजमीं को देख कर मन पुलक उठा। सामने बस स्टॉप देखा तो कदम अनायास ही उधर ही मुड गये। सीधे प्याऊ पर पहुंच कर राहत की सांस ली। एक चिर परिचित मुस्कान मेरे होंठों पर बिखर गयी। छप्पर वाली प्याऊ अब टीशेड में बदल चुकी थी। पचास-पचपन साल के एक सज्जन वहां बैठे पानी पिला रहे थे। मन में ख्याल आया आया इतने वर्षों में उसने भी तो अपना पता बदल लिया होगा, फिर भी उत्सुकतावश पूछ बैठी- “सखी कहां है?”
शायद मुझे पहचान नहीं पाए, बोले- “प्याऊ मालिक दीनानाथ जी से पूछ लीजिए वह सामने खड़े हैं।” पता नहीं किस चाहत की तलाश में दीनानाथ जी के सामने पहुंच गई
“उस प्याऊ पर वह स्त्री जो पहले पानी पिलाती थी उसका कुछ नाम पता मिल सकता है।”
“नाम पता तो मै बता दूंगा लेकिन आपकी उनसे मुलाकात नहीं हो पाएगी।” दीनानाथ जी ने स्पष्ट स्वर में कहा।
“अच्छा, उनकी शादी हो गई है और ससुराल दुसरे शहर में है इसलिए ना…”-मैंने हंसकर कहा।
“नहीं! वो संसार से मुक्त होकर दुसरे जहां में चली गई है… ” दीनानाथ जी दुखी होकर बोले।
उनकी बात सुनकर मुझे झटका लगा। “कैसे….? उम्र में अभी छोटी ही थी।”
“हां, वो तो अपनी उम्र से भी बड़ा काम करके गयी है। एक दिन नगर निगम वाले इस प्याऊ को अतिक्रमण समझकर हटाने आये तो वह इसी से लिपट गई जब तक उसकी सांसें चलेगी एक ईट भी नहीं हिलने देगी। अन्न जल त्याग कर भूख हड़ताल पर बैठ गयी। सातवें दिन ईश्वर को प्यारी हो गयी। आठवें दिन इस प्याऊ को न हटाने का न्यायालय से आदेश आ गया।”
“उसकी रोजी-रोटी यही प्याऊ थी… दीनानाथ जी इसलिए अपनी जान पर खेल गई।”
“नहीं मैडम, कुछ और भी यहां से जुडा था एक इंतजार… ऐसा इंतजार जिसे कभी खत्म नहीं होना था।”
“इंतजार?” किसका इंतजार।”
“उसका जीवनसाथी उसे इसी प्याऊ पर यह कहकर ‘मै अभी आता हूं’ छोड़कर कर चला गया था फिर नहीं लौटा। सखी को उसी का इंतजार था…और”
“और?” मैंने अधीरता से उनकी बात काटते हुए पुछा।
“किसी ने कार में घुमाने का वादा किया था। मैडम वादे तोड़ने के लिए किए जाते हैं। वह मासूम कहा जानती थी कि उसका पति अब नहीं लौटेगा वह तो अब तक अपनी एक और दुनिया बसा चुका होगा और कार वाले जमीं पर चलने वालो को नजर भर नहीं देखते वो भला कार में क्या बैठायेगें।”
मन आत्मग्लानि से भर गया। “क्या नाम था उसका?” बस नाम जानने की इच्छा से आखिरी सवाल पूछ लिया।
“जाने दीजिए! आप उसे सखी कहती थी यही नाम रहने दीजिए।” दीनानाथ जी ने कहा।
“फिर भी…”
“इमली…” दीनानाथ जी ने विदा ली।
भारी मन से मै वहां से चली आई। दिल में एक कांटा सा चुभ गया। उस प्याऊ से मेरी हजारों यादे जूडी हुई थी। जिस मुस्कान के साथ मै वहां आयी वहां एक दर्द की लकीर खिंच गयी। बड़ी ही खामोशी से मै मायके आ गयी। एक लगाव जो उस साधिका के साथ था वो यही नहीं छूटेगा, ता उम्र साथ रहेगा। उस सखी का निर्मल मन हजारों लोगों की प्यास बुझा कर तृप्त हो चुका था। आज वह हमारे बीच नहीं हैं लेकिन स्मृति हमेशा जीवंत रहेगी जब भी यहां से गुजुरूगीं वो चेहरा मुझे हमेशा रूलायेगा और ताउम्र अफसोस रहेगा कि मैंने इमली से किया गया वादा नहीं निभाया। मुझे माफ कर देना प्यारी सखी मै तुम्हारे जीवन का स्वाद नहीं बदल सकी।
