Subha ki bhuli
Subha ki bhuli

Hindi Social Story: “कब लौटोगी ,कहाँ जा रही हो इतना तो बता दो, प्रशान्त ने संयत स्वर में पूछा।”
जहन्नुम में… प्रिया ने दाँत पीसकर कहा और बैग में अपना सामान लगभग ठूँसते हुए कैब करके निकल गयी।
काश तुमनें जल्दबाजी की बजाय सोच -समझकर निर्णय लेना सीखा होता ,उसके होंठ हताशा में इतना बुदबुदाकर चुप हो गये।
और कुछ घण्टों बाद प्रिया अपनी बचपन की सहेली शिवानी के सामने खड़ी थी,लेकिन उसे देखकर तो वह एकदम हक्की-बक्की ही रह गयी,आँखे अचरज से घुमाती हुई बोली….
“अरे शिवानी! तुम कैसे और कब से  इतनी आस्तिक हो गईं ,भाई कॉलेज में तो पूजापाठ के नाम से भी दूर भागती थीं”,प्रिया ने गेट से ही उसे छेड़ते हुए कहा।
इतनी व्यस्तता कि सहेलियों की  कोई चिंता ही नहीं।
ऐसा नहीं है ,बस किसी के होने का असर इतना ज्यादा हो गया है ,शिवानी ने लम्बी साँस लेकर दार्शनिक अन्दाज़ में कहा।
और दोनों सहेलियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं,
कॉलेज पूरा होने के बाद जहाँ प्रिया की शादी जानीमाने व्यावसायी  परिवार में हुई ,प्रशान्त का बड़ा नाम था अच्छे कारोबारियों में।
वहीं शिवानी का विवाह हुआ भारतीय थल सेना में कार्यरत  कर्नल सचिन से।
अरसे के बाद दोनों सखियाँ मिली तो जाने कितने स्मृतियों के पिटारे खुले।
शिवानी बार-बार यह महसूस कर रही थी ,कि प्रिया ने पिछले दो दिनों में अपने पति से बस ली दी सी बात की थी,और बच्चों  का नम्बर तो काली सूची में डाल रखा था।
रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखने वाली प्रिया दहेज़ में अपने साथ अहम और ऐंठ भी लाई थी उसने अपनी अलग सत्ता बना रखी थी।
बिना उसकी मर्जी के घर में पत्ता भी न खड़कता था,इधर शिवानी की बात ,दिन में दस बार सुनिए जी बिना पूरी न होती।
प्रिया उसमें आये बदलावों पर बुरी तरह  से हैरान थी,पर ख़ुद से तुलना पर उसे अपने से बेहतर ही पा रही थी।
शिवानी-अच्छा प्रिया तू आज भी वैसी ही है जैसे पहले थी ,शादी के इतने सालों बाद भी तुझमें कोई बदलाव नहीं आया ।
अच्छी चीजें कभी नहीं बदलतीं और तू तो पूरी की पूरी  बदल गयी गिरगिट कहीं की ,प्रिया ने उलाहना देते हुए कहा।
कॉलेज में बड़ी-बड़ी नारीवादी बातें करने वाली आखिर पति की कठपुतली बन ही गयी ।जैसे नचा रहा तुम नाच रहीं।
,जिस प्रिया को मैं जानती थी उसकी तो तू परछाईं भी नज़र नहीं आ रही है,प्रिया ने उपेक्षा से नाक चढ़ाकर कहा।
कौन कहेगा कि हमें लोग कभी  हिटलर वन और टू के नाम से पुकाराते थे..
प्रिया समय और रिश्ते दोनों ही परिवर्तनशील होते हैं अगर हम आगे बढ़ना ही चाहें तो पिछड़ जाते हैं ,भई तब कॉलेज गर्ल थी अब किसी की पत्नी हूँ और माँ भी तो बदलाव आयेगा ही।
गृहस्थी की बागडोर इन्होंने ने भी ,मुझे दे रखी है,तो निर्णय भले मेरा हो पर बात करना तो ज़रूरी है न ,आख़िर घर तो उनका भी है।
इन्होंने पहली मुलाकात में ही कहा था, ,”स्वीटहार्ट हमें एकसाथ बूढ़ा होना है ,अब मेरी जीवन नैया तुम्हारे हाथ में है चाहे इसे टाइटैनिक बनाइये या आई●एन●एस●विराट।
ये सब तो  छूट तो प्रशान्त भी मुझे दिये हुए हैं इसमें इतना फ़िदा होने वाली क्या बात है डियर ?प्रिया ने बदले में सवाल दाग दिया
शिवानी -मैं चकित तो हुई पर जब कुछ ख़ुद ब खुद मिल जाय तो किससे लड़ती और क्यों? मायके में तो मैंने सभी स्त्रियों को पति की मर्ज़ी पर निर्भर ही पाया पर इन्होंने कभी कोई रोकटोक लगाई ही नहीं।
जब भी मैं नाराज़ हुई तो  इन्होंने ही मनाने की पहल की ,मैं तो पहले अकड़ में भी रहा करती थी।
इनके प्रेम की फ़ुहार ने हमेशा मेरे गुस्से को ठण्डा कर दिया सच कहूँ तो इन्होंने ही मुझे स्वाभिमान और अभिमान के बीच का फ़र्क़ समझाया।
पहले मैं  भी छोटी-मोटी लड़ाई में घर छोड़ने की ज़िद ठान बैठती थी एक दिन,ये भी अपने इष्टदेव की तरह मेरे सामने आकर लेट गये।
और शर्त रख दी गुस्से में घर छोड़कर जाना है तो कभी न लौटने के लिये जाना, घर जाना चाहती हो तो जाओ पर नाराज़ होकर नहीं।
प्रिया की आँखों के आगे प्रशान्त की उदास आँखे घूम गयीं,घर में बस उसी की आवाज़ गूँजती थी,तुम्हें किसी की सुनना कब पसन्द रहा प्रिया,प्रशान्त की थकी आवाज़ उसके कानों में गूँज गयी।
शिवानी का छोटा सा चहकता हुआ सर्विस क्वार्टर ,उसके पौधे,किताबों के आगे उसे सर्व सुविधा सम्पन्न अपना बंगला शोकग्रस्त नज़र आ रहा था।
“पता है प्रिया ! एक बार मैंने अकड़ में इनसे महीनों बात नहीं की पर इन्होंने उफ़्फ़ भी नहीं की।मेरी नादानियों और बेबकूफी को शान्त होकर सह गये।
“जब मैं ही गुस्से से  फ़ट पड़ी, कि आप में कोई आत्मसम्मान और स्वाभिमान है भी कि नहीं जोरू के ग़ुलाम की  तरह  सब सहे जा रहे हो ।”
प्रशान्त भी ऐसा ही है,तभी तो मैं अपनी ज़िन्दग़ी अपनी शर्तों पर जी रही हूँ।,प्रिया ने थोड़े गर्व के पुट में कहा।

“डियर इन्होंने उस दिन उत्तर दिया ,” हमारे भोलेनाथ कहते हैं कि अपने आधे अँग का  पूरा ध्यान रखना चाहिये,जब वो पत्नी की प्रतिष्ठा का  ध्यान रख सकते हैं,शोक में रो सकते हैं।
तो मैं अपनी गृहस्थी के लिये इतना धीरज रख ही सकता हूँ,और कोई देवता है उनके जैसा तुम्हारी नज़र में तो बताओ मुझे?
माता ने भी उनके अपमान पर मायके में आत्मदाह कर लिया था,ये बस प्रेम था धौंस से घर नहीं चलता।
इनके धैर्य मिले प्रेम ने ऐसा असर छोड़ा कि मेरी ऐंठ की सभी गिरहें धीरे-धीरे खुलने लगीं नतीज़ा तुम देख ही रही हो।
अपनी रौ में बोलती शिवानी के बोलने की गति रोने की जगह रुलाने में विश्वास रखने वाली प्रिया की सिसकियों से रुकी।
क्या हुआ?उसने घबराकर कहा।
शिबू तू वक़्त के समझदार हुई और मैं उतनी ही नासमझ रही ,इसीलिये न गृहस्थी सम्भाल पा रही न परिवार उकताकर भागती रहती हूँ।
डियर शिव परिवार इसलिये परिवार हैं क्योंकि ये रूठे ,बेटे और पत्नी सभी को प्रेम से मनाना जानते हैं और हर गृहस्थ के मैनेजमेंट गुरु भी।
प्रशान्त की कॉल आई और ,प्रिया ने प्रशान्त से कहा,सुबह की भूली अगर शाम को घर लौट आये तो उसे क्या कहोगे?
प्रिया..और गीली मुस्कान ने मौसम ख़ुशनुमा कर दिया।