Hindi Katha: एक बार नारदजी भ्रमण करते हुए वैकुण्ठ-लोक में पहुँचे। उस समय भगवान् विष्णु देवी लक्ष्मी के साथ क्रीड़ा कर रहे थे। नारद को वहाँ देखकर देवी लक्ष्मी लज्जावश वहाँ से उठकर चली गईं। लक्ष्मीजी को वहाँ से जाते देख देवर्षि नारद -“”!बोले ‘भगवन् ! मुझे देखकर माता उठकर क्यों चली गई हैं? प्रभु मैं तो एक तपस्वी हूँ। इन्द्रियाँ मेरे वश में रहती हैं। क्रोध पर मैंने विजय पा ली है। माया का मुझ पर कभी वश नहीं चलता । फिर भला माता ने ऐसा आचरण क्यों किया?”
देवर्षि के मुख से अभिमानयुक्त शब्द सुनकर भगवान् विष्णु बोले – “बेटे नारद ! स्त्री का यह धर्म है कि परपुरुष के सामने पति से प्रेमालाप न करे। तुम बिना संकेत किए आ गए, इसलिए वे लजाकर चली गई हैं। देवी लक्ष्मी ने धर्म का पालन किया है। हे मुनिश्रेष्ठ ! आपने अभी कहा है कि आपने माया पर विजय प्राप्त कर ली है, यह बात किसी के सामने कदापि नहीं कहनी चाहिए। जब सनकादि मुनि भी माया को जीतने में असफल रहे, तब तुम तथा दूसरे किसी देवता की क्या गणना की जाए? जिन्होंने अनेक शास्त्रों का गहन अध्ययन किया, जो बिना कुछ खाए-पीए निरंतर तपस्या में लगे रहते हों तथा इन्द्रियाँ सदा जिनके वश में रहती हों, उन तपस्वियों के लिए भी माया अजेय है। वेद के ज्ञाता, योगसाधन में निपुण, सर्वज्ञ एवं जितेन्द्रिय पुरुष के लिए भी माया पर विजय प्राप्त करना सम्भव नहीं होता। माया देवी निराकार रहकर विद्वान, मूर्ख अथवा मध्यम श्रेणी के सभी प्राणियों को अपने वश में रखती हैं। उनके प्रभाव से कोई नहीं बच सकता ।
माया के विषय में गूढ़ तथ्य जानकर देवर्षि नारद बोले – “हे प्रभु! आपकी बात सुनकर माया के विषय में मेरे मन में असंख्य प्रश्न उत्पन्न हो गए हैं। जैसे माया का रूप कैसा है? उसकी आकृति कैसी है? उसमें कितनी शक्ति है? वह कहाँ निवास करती है? मैं उस माया को देखना और जानना चाहता हूँ, प्रभु । आप उसे दिखा और समझाकर मुझ पर कृपा करें। “
भगवान् विष्णु बोले – ” हे नारद! जगत् को धारण करने की शक्ति रखने वाली वह माया सर्वज्ञा, अजेया और अनेकरूपा है । जगत् में वह व्यापक रूप में निवास करती है। हे नारद ! यदि उसे देखने की इच्छा है तो तुम मेरे साथ अभी पृथ्वी लोक चलो। मैं तुम्हें उस माया के प्रत्यक्ष दर्शन करवाऊँगा। उसे अनुभव करके तुम्हारे मन में माया से संबंधित सभी भ्रांतियों का अंत हो जाएगा। ‘
देवर्षि नारद पहले ही माया को जानने को बहुत उत्सुक थे। वे भगवान् विष्णु के साथ भूलोक चलने के लिए तैयार हो गए। उनकी उत्सुकता शांत करने के लिए भगवान् विष्णु नारद सहित गरुड़ पर सवार हुए और पृथ्वी लोक की ओर चल पड़े। वायु के समान तीव्र गति से उड़ते हुए गरुड़ कुछ ही पलों में पृथ्वी लोक के निकट पहुँच गया। पृथ्वी लोक पर देवर्षि नारद को अनेक सुंदर वन, सरोवर, नदियाँ, गाँव, मुनियों के आश्रम, पर्वत, पशु आदि दिखाई देने लगे।
इस प्रकार अनेक सुंदर दृश्यों का अवलोकन करते हुए वे कान्यकुब्ज नामक स्थान पर पहुँचे। वहाँ उन्हें एक दिव्य सरोवर दिखाई दिया। कमल के रंग-बिरंगे पुष्प उस सरोवर की शोभा बढ़ा रहे थे। हंस और सारस वहाँ कलरव कर रहे थे ।
“उस सरोवर को देखकर भगवान् विष्णु बोले ‘नारद ! हंस और सारसों की मधुर बोली से शोभा पाने वाले इस सरोवर को देखो। इसमें चारों ओर सुंदर कमल खिले हुए हैं। भौंरों की गुंजन से यहाँ का वातावरण गूँज रहा है। सरोवर निर्मल जल से परिपूर्ण है। यहाँ का वातावरण मन को उल्लासित कर रहा है। हम कुछ पल यहीं विश्राम करते हैं । “
यह कहकर भगवान् विष्णु ने देवर्षि नारद का हाथ पकड़ा और सरोवर की प्रशंसा करते हुए उन्हें तट पर ले आए। सुंदर पुष्पों वाले अनेक वृक्ष उस सरोवर के तट की शोभा बढ़ा रहे थे। तब श्रीहरि ने मंद स्वर में नारद से कहा ‘नारद ! इस सरोवर का जल तपस्वियों के मन की तरह निर्मल और स्वच्छ है । कमलों के पराग से इसका जल सुवासित हो गया है । तुम इस स्वच्छ जल में स्नान करो तो मन को बहुत शांति मिलेगी।”
मायावश नारद मुनि के मन में भी सरोवर के स्वच्छ जल में स्नान करने की इच्छा उत्पन्न हो गई। उन्होंने अपनी वीणा और मृगचर्म भगवान् विष्णु के निकट रखे और स्नान करने के लिए सरोवर में उतर गए। जैसे ही नारद मुनि ने जल में डुबकी लगाई, वैसे ही उनकी पुरुषाकृति विलुप्त हो गई और वे एक सुंदर युवती में बदल गए। उनकी पूर्व स्मृति नष्ट हो गई और उनके मन में पूर्णत: अज्ञान छा गया। उसी क्षण भगवान् विष्णु उनकी वीणा और मृगचर्म लेकर अदृश्य हो गए।
स्त्री रूप में परिवर्तित होकर देवर्षि नारद तट पर आए। उस समय वे सुंदर आभूषणों और वस्त्रों से सुशोभित थे । वे वहीं बैठकर अपने बारे में विचार करने लगे। तभी कान्यकुब्ज के राजा तालध्वज शिकार खेलते हुए वहाँ पहुँचे। उनके साथ हाथी, घोड़े, रथ और अनेक सैनिक थे। उनकी सुंदरता देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो साक्षात् कामदेव वहाँ उपस्थित हो गए हों । देवर्षि नारद भी स्वर्ग की अप्सरा के समान सुंदर युवती थे। उनके अंगों से दिव्य प्रकाश निकल रहा था। आभूषण और दिव्य वस्त्र उनके सौंदर्य में चार चाँद लगा रहे थे।
राजा तालध्वज की दृष्टि उस सुंदर नारी पर पड़ी। उन्हें देखकर तालध्वज की आश्चर्य की सीमा न रही। वे मधुर स्वर में उनसे बोले – ” हे सुंदरी ! कौन हो तुम? इस वन में अकेली क्यों भटक रही हो? कमलनयनी ! इस सरोवर के तट पर तुम क्या रही हो? कृपया अपना परिचय देने का कष्ट करो। तुम्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो देव-लोक की कोई अप्सरा पृथ्वी पर उतर आई है। देवी ! मैं यहाँ का राजा तालध्वज हूँ। तुम निःसंकोच अपने बारे में बताओ । यदि तुम कुँवारी हो तो मैं तुमसे विवाह करके स्वयं को धन्य करना चाहता हूँ।
“राजा तालध्वज के प्रश्न पूछने पर स्त्री बने नारद बोले – ” राजन ! मुझे अपने बारे में कुछ याद नहीं आ रहा कि मैं किसकी कन्या हूँ ? मेरे माता-पिता कौन हैं ? मुझे यहाँ कौन लाया? हे राजेन्द्र ! मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरा कोई आश्रय नहीं है। आप धर्मशील पुरुष हैं। आपकी जो इच्छा हो, वो करें। मैं आपके अधीन हूँ।’
स्त्री बने नारद की बात सुनकर तालध्वज ने अपने सेवकों से सोने से निर्मित एक सुंदर पालकी की व्यवस्था करने को कहा। सेवक अतिशीघ्र रत्न – आभूषणों से जड़ी एक दिव्य पालकी ले आए। तालध्वज के आग्रह पर स्त्री बने नारद उस पालकी में बैठ गए। राजा तालध्वज ससम्मान उन्हें अपने महल में ले आए। महल में उनके लिए भोग-विलास की भाँति-भाँति की वस्तुएँ उपस्थित की गईं। अनेक सेविकाएँ सदा उनकी सेवा में तत्पर रहने लगीं।
कुछ समय के बाद एक शुभ मुहूर्त में तालध्वज ने उनके साथ विवाह कर लिया। इस अवसर पर एक विशाल उत्सव का आयोजन किया गया, , जिसमें अनेक राजाओं को आमंत्रित किया गया। निर्धनों को धन, अन्न और वस्त्र वितरित किए गए। विवाह के बाद राजा तालध्वज ने स्त्री बने नारद का नाम ‘सौभाग्यसुंदरी’ रख दिया और उन्हें अपनी पटरानी बना लिया।
राजा तालध्वज उन्हें अपने प्राणों से अधिक प्रेम करने लगे थे। उनका समय सौभाग्यसुंदरी के साथ क्रीड़ा करते हुए बीतने लगा।
भोग-विलास में लिप्त होकर स्त्री बने नारद की विवेक शक्ति नष्ट हो गई। ‘पहले उनका शरीर पुरुष का था और मुनिकुल में उनकी उत्पत्ति हुई थी’ – इस बात का उन्हें थोड़ा-सा भी ज्ञान नहीं था । ‘ तालध्वज उनके पति हैं, वे उनकी पत्नी हैं। अनेक स्त्रियों की अपेक्षा वे उन्हें अधिक प्रिय हैं। उन्हें पटरानी होने का सौभाग्य प्राप्त है। वे सती साध्वी हैं । ‘ – केवल इस प्रकार के विचार दिन-रात उनके मन में उत्पन्न होते थे। तालध्वज के अधीन भोग-विलास में डूबे रहना ही उनका स्वभाव बन गया था। उनके मन में प्रबल मोह उत्पन्न हो जाने के कारण वे ब्रह्म-संबंधी सनातन ज्ञान-विज्ञान एवं धर्म – शास्त्र के रहस्य से पूरी तरह अनजान हो गए थे।
अनेक वर्ष बीत गए। लीलावश स्त्री बने नारदजी ने गर्भ धारण कर लिया था। उचित समय आने पर उन्होंने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। राजमहल में एक बड़े समारोह के साथ पुत्रोत्सव मनाया गया। इसके दो वर्ष पश्चात् नारदजी ने एक और पुत्र को जन्म दिया। ब्राह्मणों की आज्ञा से बड़े का नाम वीर वर्मा और छोटे का सुधन्वा रखा गया।
इस प्रकार स्त्री बने देवर्षि नारद ने एक-एक करके बारह पुत्रों को जन्म दिया। माया के प्रभाव के कारण मोहवश वे उन बच्चों के लालन-पालन में प्रेमपूर्वक लगे रहे। पुत्रों के युवा होने पर तालध्वज ने उनके विवाह कर दिए। घर बहुओं से भर गया। बहुएँ सदैव अपनी सास सौभाग्य सुंदरी की सेवा में तत्पर रहती थीं।
स्त्री बने नारद का भरा-पूरा परिवार हो गया। पहले पुत्र हुए फिर उनके भी पुत्र हो गए। खेलने कूदने और भोगों में ही देवर्षि नारद का समय व्यतीत होता रहा। उनके मोह की निरंतर वृद्धि होती गई। कभी सुख और शांति होती और कभी पुत्र बीमार पड़ते अथवा उन्हें कष्ट भोगना पड़ता तो उनके हृदय में अशांति फैल जाती। वे सदैव इसी में उलझे रहते। मोह बढ़ने के कारण उनके मन में अहंकार भी बढ़ गया। वे सोचते – ‘ये उनके पराक्रमी पुत्र हैं और ये कुलीन घर में उत्पन्न होने वाली उनकी बहुएँ हैं। जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, उनमें वे सबसे सौभाग्यशाली हैं। ‘
एक बार की बात है – निकटवर्ती शत्रु राजा ने उनके राज्य पर आक्रमण कर दिया। कान्यकुब्ज को चारों ओर से शत्रु सेना ने घेर लिया। राजा तालध्वज अपने पुत्र और पौत्रों के साथ शत्रु का सामना करने लगे। दोनों राज्यों की सेनाओं में भीषण युद्ध छिड़ गया। दुर्भाग्यवश तालध्वज के सभी पुत्र-पौत्र शत्रु के हाथों मारे गए। उनकी मृत्यु से दुःखी होकर राजा तालध्वज युद्ध-स्थल से महल लौट आए। अपने – पौत्रों की मृत्यु का समाचार सुनकर स्त्री बने नारद व्यथित हो गए और उसी समय तालध्वज के साथ युद्ध-स्थल पर पहुँचे । युद्धभूमि में मरे हुए पुत्र और पौत्रों के पुत्र-शवों को देखकर वे ज़ोर-ज़ोर से विलाप करने लगे ।
उनका करुण क्रंदन सुनकर भगवान् विष्णु वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण कर वहाँ पधारे। वे स्त्री बने देवर्षि नारद के निकट गए और प्रेम से उनके कंधे पर हाथ “देवी ! तुम विलाप क्यों कर रही हो? युद्ध में ऐसी स्थिति आना स्वाभाविक है। । तुम अपने वास्तविक स्वरूप के बारे में विचार करो । सोचो, तुम कौन हो? ये कौन हैं? हे सुंदरी ! उठो । मृत स्वजन की मुक्ति के लिए तर्पण करो, तीर्थ स्नान करो। “
भगवान् विष्णु ने अनेक प्रकार से स्त्री बने नारद को समझाया और उन्हें अपने साथ तीर्थ-यात्रा पर चलने के लिए प्रेरित किया । वृद्ध ब्राह्मण बने विष्णु के ज़ोर देने पर नारद अपने पति राजा तालध्वज के साथ गंगा- तीर्थ के लिए चल पड़े। अनेक नाते-रिश्तेदार भी उनके साथ चले। गंगा- तीर्थ में एक सुंदर सरोवर था ।
वहाँ पहुँचकर श्रीविष्णु मधुर स्वर में बोले – “देवी ! यह सरोवर सभी सरोवरों में श्रेष्ठ है। तुम इस पवित्र तीर्थ में स्नान करके पुत्र – संबंधी निरर्थक शोक से मुक्ति पा लो । जन्म-जन्मांतर में तुम्हारे करोड़ों पिता, पति, पुत्र और भ्राता मर चुके हैं। उनमें से तुम किस-किसका शोक मनाओगी? ये सब मन का भ्रम है। यह भ्रम प्राणियों को केवल कष्ट देता है।
भगवान् विष्णु की प्रेरणा से स्त्री बने नारद और राजा तालध्वज सरोवर में स्नान करने उतरे। फिर सरोवर में डुबकी लगाते ही देवर्षि नारद अपने वास्तविक स्वरूप में आ गए।
उनकी दृष्टि भगवान् विष्णु पर पड़ी। वे नारदजी की वीणा और मृगचर्म लेकर सरोवर के तट पर अपने वास्तविक रूप में विराजमान थे। उन्हें देखते ही नारद मुनि की स्मृति वापस आ गई। उन्हें अपने स्त्री – जन्म की बातें भी याद थीं। अत: वे अपनी पूर्व स्थिति पर विचार करने लगे । नारद को विचारमग्न देखकर भगवान् श्रीविष्णु ने उन्हें अपने पास बुलाया। उधर, नारद मुनि को देखकर राजा तालध्वज आश्चर्य में पड़े हुए थे कि उनकी पत्नी कहाँ चली गई और मुनिवर नारद कहाँ से आ गए? यह सोचकर वे विलाप करने लगे।
तब भगवान् श्रीहरि बोले – ” राजन ! इस प्रकार मोह मत करो। वह स्त्री तुम्हें एक सरोवर पर मिली थी और आज एक सरोवर पर ही तुमसे बिछड़ गई। तुम्हें उसके साथ जितना समय बिताना था, तुम बिता चुके । विधि को यही स्वीकार था। काल की गति को रोकना बहुत कठिन है और दुःख-सुख जीवन में लगे ही रहते है। अतः भोग-विलास में व्यर्थ समय न गँवाकर भगवती जगदम्बा में मन रमाओ । माता भगवती परम दयालु हैं। वे सबका कल्याण करती हैं। उनकी पूजा-आराधना से तुम्हारा दुःख निश्चित ही कम हो जाएगा।’
“इस प्रकार भगवान् श्रीहरि के समझाने पर तालध्वज उन्हें प्रणाम करके अपने महल लौट गए। ज्ञान प्राप्त होने से उनके मन में अद्भुत वैराग्य का भाव पैदा हो गया था। अत: अपना राजपाट एक पौत्र को सौंपकर वे तपस्या करने के लिए वन में चले गए। वहाँ उन्होंने अपना मन भगवती माता की आराधना में लीन कर लिया।
तालध्वज के वहाँ से जाने के बाद देवर्षि नारद हाथ जोड़कर भगवान् विष्णु से बोले – ” हे प्रभु ! माया की असीम शक्ति अब मेरी समझ में आ गई। अब मुझे आश्चर्य हो रहा है कि मेरा ज्ञान उस समय कहाँ विलीन हो गया था। स्त्री का शरीर पाकर मैं विषय-भोगों में फँसा रहा। मैं यह कभी नहीं जान सका कि मैं नारद हूँ। कृपा करके आप इसका कारण बताएँ ।
भगवान् विष्णु मुस्कराते हुए बोले – ” हे नारद ! यह सब महामाया भगवती की लीला थी। उन्हीं के प्रभाव से प्राणी के शरीर में अनेक प्रकार की दशाएँ आती- जाती रहती हैं। जैसे जीवधारियों में जागना, सोना और सपने देखना आदि दशाओं का क्रम निरंतर चलता रहता है, वैसे ही दूसरा शरीर प्राप्त होना भी एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसमें संदेह कैसा ? जिस प्रकार स्वप्न में कोई भी व्यक्ति यह नहीं जान पाता कि क्या असली है और क्या नकली, उसी प्रकार महामाया जगदम्बा की लीला समझ में आना अत्यंत कठिन है। तुम माया के प्रभाव को अनुभव कर चुके हो। अतः इसके विषय में कुछ और बताना आवश्यक नहीं है।
“इस प्रकार नारद मुनि को महामाया के विषय में ज्ञान देकर भगवान् विष्णु अदृश्य हो गए। नारद ने भी वीणा और मृगचर्म धारण किए और ‘नारायण-नारायण’ करते हुए भ्रमण के लिए निकल पड़े।
