भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
कमरे में घुसते ही उसने अपना जंफर उतारने के लिए उसके पल्लों को पकड़कर उलटना शुरू ही किया था कि मैंने उसे टोका, “अभी रहने दो, थोड़ी देर बैठो।”
उसके हाथ जहाँ थे, वहीं रूक गये। न उससे जंफर के पल्ले छूटे और न ही सामान्य अवस्था में लौटे। वह बड़े आश्चर्य के साथ मेरी ओर देख रही थी, एकटक। किसी स्टिल फोटो की तरह चेहरे पर टंगा अप्रत्याशित आश्चर्य। शायद सोच रही होगी कि यह पुरुष है या कोई घन-चक्कर।
“प्लीज”, मैंने फिर से कहा, “आप थोड़ी देर बैठिए तो सही।” मेरे स्वर में हार्दिक अनुरोध था, तरल अनुरोध। अनुरोध ने उसे छुआ। उसके हाथ सामान्य अवस्था में लौट आये, पर चेहरे पर अभी भी आश्चर्य टंगा हुआ था। अब वह तेज हवा में फड़फड़ाते हुए किसी क्लेंडर के पन्ने की तरह वहाँ टंगा था, मगर बेआवाज!
कमरा बहत छोटा-सा था। बिलकल साधारण, कोई सजावट नहीं। पीछे की ओर एक खिड़की खुलती थी। उस पर पुराना मटमैला पर्दा टंगा हुआ था। छत से एक छोटा-सा पंखा लटक रहा था, पर सर्दी होने की वजह से उसे चलाने की जरूरत नहीं थी। दीवार के साथ सटी थी एक छोटी-सी चारपाई जिस पर एक दरी और चादर बिछी हुई थी। चादर भी मैली-सी। दीवार में दो-तीन कीलें गड़ी थीं, संभवतः कपड़े टांगने के लिए।
वह उस चारपाई के पायताने बैठ गयी थी, अधूरी-सी। गर्दन उसकी झुकी हुई थी।
“मैंने तो सुना था कि औरतें पुरुष के बार-बार आग्रह करने पर ही अपने कपड़े उतारती हैं और तुम हो कि कमरे में घुसते ही…।” मैंने जान बूझकर अपना वाक्य अधूरा छोड़ दिया था और नजरें उसके चेहरे पर टिका दीं।
मेरी बात सुनकर वह एक बार असहज-सी हुई। इसी दौरान उसने अपना पहलू बदला। चेहरे पर थोड़ी देर पहले टंगे आश्चर्य की जगह क्षणभर के लिए एक काली बदली-सी लहरायी जो उसके होंठों के खुलते ही कहीं लुप्त हो गयी, “रंडियां औरत नहीं होती, बाबू।”
एक अपमानित आत्मा का तीखा दर्द उसके होंठों से सीधे मेरे कानों की राह से भीतर घुसकर तुरंत दिल तक जा पहुंचा। “रंडियां औरत नहीं होती तो और क्या होती हैं?” जैसे मैंने खुद से ही पूछा, बहुत धीमे से। परंतु उसके कानों ने माइक्रोफोन की तरह उस ध्वनि को ग्रहण कर ही लिया था।
“रंडियां दुकान होती हैं बाबू, दुकान… जहाँ कोई ग्राहक खरीददारी के लिए आ सकता है… दुकान में कोई पर्दा नहीं होता… यहाँ तो जो भी आता है, आते ही कपड़े उतारने के लिए कहता है… एकाध ग्राहक तो कपड़े उतारने की फुरसत तक देने को तैयार नहीं होता… ग्राहक की खुशी में हमारी रोटी छिपी होती है…बस, अब तो आदत-सी हो गयी है कि ज्योंही ग्राहक इस कमरे में घुसता है, मैं कपड़े उतारने लगती हूँ… अरे, मैं भी क्या पचड़ा ले बैठी… कहिए बाबू, कैसे सेवा करूं आपकी?” मेरे प्रश्न ने शायद उसे आंदोलित कर दिया था, तभी वह इतना एक साथ बोल गयी थी। वरना नजरें तो अब भी उसकी अपने पांवों की अंगुलियों पर टिकी थीं… और अंगुलियां थीं कि बड़ी बेचैनी से रह-रहकर फर्श को कुरेद रही थीं, किसी कुलीन और सुशील कन्या की तरह सलज्ज, व्याकुल, आशंकित।
उसकी आंखें झुकी होने के कारण, मैं बिना किसी झिझक के उसके चेहरे को ध्यान से देख रहा था। मित्र ने जैसा बताया था, ठीक वैसा ही था उसका रंगरूप। मुझे लगा कि उसने जो कुछ बताया था, उससे कहीं ज्यादा सुंदर और सौम्य लग रही थी वह, किसी देवी की भांति। रंडी और देवी। हमेशा ही बहुत भावुक रहा हूँ मैं। हो सकता है, उस समय भी मेरी भावुकता प्रबल हो उठी हो और उसे मैं देवी की तरह देखने लगा होऊं। असली देवी मूर्त रूप में किसने देखी है? जिसने भी देखी है, सिर्फ कलाकारों द्वारा बनाये गये चित्रों में ही देखी है। कलाकार की कला भी तो उसकी भावुकता का मूर्त रूप ही जो होता है न। समझ लीजिए, उस असहज और गलत जगह पर बैठी वह लड़की मुझे देवी जैसी लग रही थी।
मैं यदि उसका परंपरागत शैली में सौंदर्य वर्णन करने लगूं तो आप अवश्य ही मेरा मजाक उड़ायेंगे। उड़ा लें, आपको हक है ऐसा करने का। मैं तो इतना ही कह सकता हूँ कि उसका स्वर मुझे पूजा की घंटी जितना पवित्र और मधुर लगा… बड़ी-बड़ी सलज्ज आंखे… दूध जैसा रंग, सचमुच, उसके बदन में से कच्चे दूध की-सी गंध आ रही थी (हालांकि बाद में पूछने पर मालूम हुआ कि उसने कभी भी किसी सेंट का उपयोग नहीं किया था), पतले-पतले हल्की अरूणाई लिए अधर…लंबी-छरहरी देह…स्त्रीयोचित आकर्षक-आदर्श उभार… घने काले, अध गुंथे, कटि का स्पर्श करते केश… कच्चे अनार के दानों जैसे उज्जवल धवल दांत…।
छोड़िए मेरी बात, मित्र ने उसे भोगा था और उसके रंगरूप का ब्यौरा बड़े अश्लील ढंग से प्रस्तुत करते हुए कहा था, “बहुत-सी औरतों को भोगा हैं मैंने, मन चाहे तरीकों से… पर आज जो मजा उस लड़की को भोगने में आया, ऐसा न कभी आया है न कभी आयेगा… जिस आदर्श सौंदर्य की बात तू किया करता है न… देखना हो तो चकलाघर में जाकर देख लो… फिर मत कहना कि बताया नहीं।”
मैंने नाराज होते हए उसे टोका था. ‘तने पैसे के बल पर बहत पाप किए है मित्र… किसी की मजबूरी का लाभ उठाना, चाहे उसके लिए कितनी ही कीमत क्यों न दी गयी हो, मेरी दृष्टि में तो महापाप है… और अब मुझ जैसे आदमी को भी चकलाघर जाने के लिए प्रेरित कर रहा है जिसने औरत को भोग्या न मानकर जीवन का आधार माना है.. पवित्र एवं पूज्य… छी:-छी:! ठीक है कभी हमने आपसी बातचीत में अपने-अपने आदर्शों की बात करते हुए… अपनी कल्पना से आदर्श औरत के विषय में एक-दूसरे को बताया होगा… पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि तुम मुझे भी किसी रंडी के पास जाने के लायक समझो।’
वह रंडी नहीं है, हालांकि वह देह बेचती है… मेरा कहने का मतलब यह है कि मुझे वह रंडी नहीं लगी… मैंने उससे बातचीत करनी चाही तो वह लगभग चुप ही रही… पर उसके हाव-भाव, रंग-रूप, कुछ भी तो रंडी जैसा नहीं लगा… किसी भी रंडी को भोगने के बाद ऐसा लगता रहा है जैसे कि अखद खा लिया हो… खुद में से एक तरह की दुर्गंध-सी आने लगा करती हैं… मैंने तो बहुत-सी रडिया देखी हैं… आगे तुम्हारी मजी।’ वह तो इतना कहकर चला गया था। परंतु उसके जाने के बाद उसके ये शब्द मेरे मन-मस्तिष्क में गूंजते रहे, ‘वह रंडी नहीं है।’
‘कमाल की बात है, वह रंडी होते हुए भी रंडी नहीं है… तो और क्या है? मन-ही-मन मैंने सोचा था। मन की इस टोका-टाकी के बीच आखिर अगले दिन मैंने चकलाघर जाने का निर्णय कर ही लिया, उस लड़की को एक बार देखने के लिए। चकलाघर पहुंचने तक जाने कितनी बार मैं वापस लौटा होऊंगा… दो कदम आगे, दो कदम पीछे, फिर चार कदम आगे, तीन कदम पीछे… एक पागल की तरह, पसीने से तर-ब-तर बदन लिए, मैं किसी तरह घुस गया था उस चकलाघर में… और मित्र के बताये अनुसार किसी तरह हकलाते हुए इस लड़की को मांग ही लिया चकलाघर चलाने वाली ताई से… हां, मित्र ने ही उसे ‘ताई’ कहकर संबोधित करने को कहा था, क्योंकि दूसरे सभी लोग भी उसे ‘ताई’ कहकर ही पुकारते थे… मेरी चाहत को देखकर ताई ने मुझ से दोगुने पैसे मांगे थे, एक घंटा साथ रहने के लिए पूरे चार सौ… जबकि मित्र ने उसे सिर्फ दो सौ दिये थे… और मैं चार सौ देकर उसके सामने बैठा था, उसकी ओर एकटक देखता हुआ।
मुझे नहीं मालूम, मैं कितनी देर बैठा रहा था वहां। उसकी ओर देखते हुए चुपचाप… कुछ सोचता हुआ-सा, अपने आप में डूबा… घर से चला था तो सोचा था कि यह पूछूगा, वह पूछूगा, फिर उस पर कहानी लिखूगा. एक ऐसी कहानी जिसका हर शब्द अपने आप कहानी कहता प्रतीत होगा… वह कहानी मेरी सबसे बढ़िया कहानी होगी… तभी मेरे कानों में मिसरी घोलती आवाज सुनायी पड़ी, “बाबू, आप मुझे सिर्फ देखने के लिए ही आये थे क्या?”
“नहीं तो।” मैंने हड़बड़ाकर अपने आप में लौटते हुए कहा था।
“ताई ने तो मुझे आपके पास सिर्फ एक घंटे के लिए भेजा है… और घंटा होने ही वाला है… लगता है मैं आपको अच्छी नहीं लगी… या फिर पाप-पुण्य के चक्कर में उलझे बैठे हैं आप यहाँ.. नहीं तो यहाँ आने वाले पुरुष कमरे में घुसते ही किसी भुक्खड़ की तरह मुझ पर टूट पड़ते हैं… मानो एक बार में ही मुझे किसी शिकारी कुत्ते की तरह नोच खायेंगे… खैर, ध्यान से सुन लो, यदि ताई से आप अपने पैसे वापस मांगना चाहेंगे तो वे नहीं देंगी… अपना नफा-नुकसान सोच लें… मुझे दोष मत देना।” उसके स्वर में पश्चाताप जैसा कुछ था।
इससे पूर्व मैं उसकी बात का कोई उत्तर दे पाता कि ताई के द्वारा भेजे गये दल्ले ने कमरे का दरवाजा खटखटा दिया। लड़की ने उठकर दरवाजा खोल दिया। उसने पलभर के लिए सहानुभूतिपूर्वक मेरी ओर देखा, कुछ कहने को हुई… फिर बिना कुछ कहे जरा-सी मुस्कुराई, जैसे कि अबोध बच्चे को देखकर कोई मुस्कराये और बाहर चली गयी।
अपने कमरे पर लौटकर कुछ देर के लिए मैं पश्चाताप की आग में झुलसता रहा। अपने आपसे पूछता रहा, ‘क्या जरूरत थी चकलाघर जाने की? जब तुम्हें कुछ करना ही नहीं था तो क्यों उस पाप की दुनिया में जा घुसा? यदि तुम्हारे पास लुटाने के लिए पैसे थे ही तो क्या जरूरी था कि उन्हें वहीं लुटाता? किसी भिखारी को दान देने या किसी निर्धन जरूरतमंद को देने से तुम्हें आशीष तो मिलती, वहाँ क्या मिला? क्या वह लड़की दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की है? क्या इसी तरह जिंदगी-भर पागलों जैसे काम करते रहोगे?”
बड़ी मुश्किल से नींद आयी उस दिन। परंतु अगले दिन मैं स्वयं को वहाँ ले जाने से नहीं रोक पाया, मानो मैं कोई कठपुतली होऊं और कोई अदृश्य शक्ति मुझे वहाँ खींचकर लिए जा रही हो। क्यों? भीतर-ही-भीतर कोई कह रहा था कि वह लड़की साधारण लड़की नहीं है… हवस की आग बुझाने के लिए उसने देह बेचना शरू नहीं किया है… वह किसी दष्चक्र की शिकार है… उसके बारे में सब-कुछ जानना है ताकि तुम एक उत्कृष्ट कहानी लिख सको… भोगे हुए यथार्थ की सच्ची कहानी… संभव हो तो उसे चकलाघर से मुक्ति भी दिलानी है… इससे बड़ा पुण्य और क्या होगा।
वहाँ घुसते ही ठीक सामने ताई को बैठे पाया। मुझे देखते ही आंख मार कर बोली, ‘आ गये बाबू, लगता है रात भी मुश्किल से कटी है तुम्हारी… कहो तो स्वाद बदलने के लिए कोई और छोकरी भेजूं? एक से बढ़कर एक छोकरियां हैं मेरे पास… ही…ही…ही…।
उसको हँसते देखकर लगा कि जैसे दीवार से ईंटें गिर रही हों धड़ाधड़। कल शायद मैं चकलाघर में घुसते समय इतना शर्मिंदा था कि ताई के हाव-भावों को ध्यान से नहीं देख पाया था। गर्दन झुकाये हुए ही लड़की का हलिया बता कर अपनी इच्छा प्रकट कर दी थी। पर आज उसे देखकर बचपन में सुना एक अश्लील शब्द मस्तिष्क में किसी बड़े घंटे की तरह टनटना उठा-लुच्ची। लुच्ची ही नहीं महालुच्ची। लुच्चेपन का जिंदा इश्तिहार। लगातार पान चबाते रहने से पीक से रंगे-होंठ व दांत… होंठ इस तरह चल रहे थे, मानो कोई भैंस जुगाली कर रही हो.. थुलथुल देह… अंजन से अंटी आंखें… बुढ़ापे में भी तराशी हुई भौंहें… बात-बात में भौंहों का प्रयोग, मतलब बात-बात में आंख मारने की आदत… उसकी हंसी में भी छिपी थी अश्लीलता की दुर्गंध.. चेहरा पाउडर और रूज से लिथड़ा हुआ।
मैंने उसी लड़की के विषय में कहा तो हंसते हुए बोली, “लड़की नहीं पटाखा है बाबू, पटाखा… चार सौ दो और जाकर मौज करो… भेजती हूँ उसे तुम्हारे पास।”
जाने क्यों उसे ताई में से एक अजीब-सी दुर्गन्ध आती महसूस हो रही थी। उससे छुटकारा पाने की नीयत से जल्दी से उसी कमरे में पहुंच गया। वहाँ पड़ी कुर्सी पर बैठकर कुछ सोच ही रहा था कि वह कमरे में घुसी। मुझे देखकर एक बार चौंकी। दरवाजा बंद करके उसके हाथ एक बार फिर अपने जंफर तक पंहुचे पर तुरंत सामान्य अवस्था में लौट भी आये। वह चुपचाप चारपाई के पायताने बैठ गयी। बोली कुछ भी नहीं। मैं भी चुप ही रहा पर एकटक उसकी ओर देखता हुआ। वहाँ जितनी वेश्याएं थीं, सभी ज्यादा-से-ज्यादा मेकअप किए हुए थीं। मैंने उन्हें ताई के पीछे बैठे देखा था, हालांकि आज वह उनके बीच नहीं थी। हो सकता है तब वह विश्राम कर रही हो कहीं भीतर। लेकिन वह बिना मेकअप के थी, दूसरे दिन भी। लगता था, मानो कुदरत ने उसे मेकअप कर के भेजा है। मेकअप करती तो शायद सुंदर कम, असुंदर ज्यादा लगती। संभवतः उसे भी इस बात का ज्ञान था, तभी वह…।
“बाबू, आप चाहें तो मैं चली जाऊं?” चारपाई से उठते हुए उसने मुझ से पूछा था। स्वर में विनम्रता अवश्य थी। उसे जमुहाई आ रही थी, मुँह पर हाथ रखकर उसने उसे रोका। शायद वह ऊब चुकी थी। मैंने घड़ी देखी। मुझे वहाँ बैठे आधे घंटे से ऊपर हो चुका था। मैं समझ गया, मेरा उस तरह से चुपचाप बैठकर देखते रहना उसको परेशान कर रहा था। मैं जानता था कि यदि एक दम से उससे कुछ पूछंगा, वह नहीं बतायेगी। इसलिए चुप रहकर उसे देखने का तरीका अपनाया था। सच कहूंगा, उसे देखना मुझे बहुत अच्छा लग रहा था।
“अभी थोड़ा समय और है, बैठिये। मैं आपको परेशान तो नहीं कर रहा हूँ?” बहुत ही प्यार से मैंने कहा।
“आप पूरे चार सौ रूपये देकर आए हैं, आपने मुझे छूआ तक नहीं, बोल भी नहीं रहे हैं… मुझे यह सब बेचैन किए हुए है… लगता है मैं कोई पाप कर रही हूं।” उसने कहा और फिर से वहीं बैठ गयी।
“मैं जानता हूँ कि कोई भी लड़की अपनी खुशी से चकलाघर की शोभा नहीं बनती। कुछ मजबूरियां होती हैं उसकी। मैं जानना चाहता हूँ कि आप जैसी सुंदर, सुशील लड़की यहाँ क्यों आयी? किस तरह से आयी? आप मुझ पर विश्वास कर सकती हैं… मैं यह सब जानना चाहता हूं।” मैंने साफ शब्दों में अपना उद्देश्य प्रकट कर दिया था।
“देखिये बाबू, यदि आप यह सब जानने के लिए ही अपने पैसे खर्च कर रहे हैं तो साफ-साफ सुन लीजिए.. मैं कुछ भी नहीं बताऊंगी आपको… जो भी आता है, एक घंटे के समय में मेरी देह से खेलकर साथ में यह सब भी जानना चाहता है… क्यों? आपको सलाह दूंगी कि अपने पैसे किसी अच्छे काम में खर्च करें… अपनी बीवी-बच्चों पर खर्च करें। मैं रंडी हूँ, मुझसे रंडी वाला काम लीजिए… मैं कोई एतराज नहीं करूंगी… मैं जा रही हूँ, मुझे माफ करना।” कडुवाहट भरे स्वर में उसने कहा।
वह उठी और मेरी ओर देखे बिना बाहर निकल गयी। ‘कछ नहीं बताऊंगी’ कहकर उसने मुझे एक तरह से चुनौती दी थी। कम-से-कम मुझे तो ऐसा ही लगा। मैं क्या लगता था उसका? वह मुझे क्यों चुनौती देती? पर अपने मन का क्या करता जो मुझे उसके कहे को चुनौती मानने को विवश कर रहा था। फलस्वरूप अगले दिन भी पहुंच गया वहाँ-मतलब तीसरा दिन। उस दिन वह शायद निश्चय करके ही आयी थी, इसलिए चुप बैठी रही। थोड़ा समय बीतने पर उसने पीठ भी घुमा ली थी, मानो जान बूझकर मेरी अवहेलना कर रही हो… मैंने बात शुरू करनी चाही तो उसने कोई उत्तर नहीं दिया। चालीस मिनट बैठकर खुद ही उठकर चला आया। फिर चौथा, पांचवां, छठा, सातवां और आठवां दिन भी यूं ही निकल गया। कभी चुपचाप उठने की पहल वह करती. कभी मैं। मेरा निश्चय डगमगाने लगा था… और साथ ही पास की पूंजी भी समाप्त होने लगी थी। मेरा अहं, मेरा पुरुषत्व पराजित हो रहा था।
मैं नौवें दिन यही सोचकर वहाँ पहुंचा था कि आज का दिन आखिरी दिन. ..यदि आज भी बात नहीं हुई तो फिर कभी नहीं जाऊंगा… आखिर अपने को क्या समझती है यह। सुंदर हो तो रहे। स्वाभिमानी है तो मुझ पर क्या एहसान। दुनिया में न तो सुंदर औरतों की कमी है और न ही स्वाभिमानियों की।
यह सब सोचता हुआ मैं वहाँ बैठा था कि किसी चमत्कार की तरह उसकी आवाज सुनायी दी, “आप कौन हैं? क्यों मेरे पीछे पड़े हैं? आप मेरे पीछे खुद को बरबाद करने पर क्यों तुले हैं? मैंने जान बूझकर आपसे बोलना बंद किया, आपकी अनदेखी की ताकि आप नाराज होकर यहाँ आना छोड़ दें… पर आप नहीं माने.. मैं आपके सामने हाथ जोड़ती हूँ… मेहरबानी करके अपने घर जाइए…. और बेकार में खुद को लुटाने के लिए यहाँ फिर से न आयें।” उसने सचमुच में ही हाथ जोड़ते हुए कहा था। उसका स्वर सहानुभूति से छलछला रहा था। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें सीधे मेरी आंखों में घुसकर मुझे सम्मोहित कर रही थीं।
“मैं एक कहानीकार हूँ… मैंने जिंदगी में एक सुंदर संपूर्ण औरत की कल्पना की थी कभी… इतनी सुंदर, इतनी निर्दोष की ढूंढने पर भी कोई दोष नजर न आये… आप मुझे वैसी ही लगीं, मेरी कल्पना की औरत की तरह … मैं आपकी जिंदगी पर कहानी लिखना चाहता हूं।”
उसने मेरी बात बीच में ही काटते हुए कुछ हर्ष मिश्रित स्वर में कहा, “अच्छा तो आप प्रेमचन्द जैसे कहानीकार हो… मैंने उनकी कहानियां कोर्स की किताबों में पढ़ी थी, लाइब्रेरी से लेकर। उनका उपन्यास ‘निर्मला’ भी पढ़ा था… टी. वी. पर भी देखा था उसे धारावाहिक के रूप में… लेखकों के लिए मेरे मन में बहुत इज्जत है-लेखक तो देवता जैसे होते हैं… लेकिन लोग आपके विषय में भी बुरा ही सोचेंगे शायद… मैं तो पहले से ही नंगी हो चुकी हूँ… इस नंगई को दुनिया के सामने लाने से क्या फायदा?”
“पहली बात तो यह कि लेखक देवता नहीं, एक साधारण इंसान होता है। उसमें भी वही गुण-अवगुण होते हैं जो किसी भी साधारण आदमी में होते हैं… फर्क इतना-सा होता है कि वह अपने दर्द से दूसरों के दर्द को शब्दों का चोला पहना सकता है… रही बात बदनामी की, आपकी कहानी लिखने से मैं जरा-सा भी बदनाम नहीं हूंगा… लिखना तो मेरा धर्म है… और हां, आप बातचीत में खुद को रंडी कहकर अपनी ही नजरों में गिरा रही हो, ऐसा न करो… आप रंडी नहीं हैं… मैं जानता हूँ आप यह सब मजबूरी में कर रही हैं…. मजबूरियां इंसान से कुछ भी करा सकती हैं… अब मेहरबानी करके मुझे बताओ कि आप यहाँ कैसे पहुंची?” मैंने उसे खलने, बोलने को प्रेरित किया।
कुछ समय तक वह चुप बैठी रही। तब उसकी आंखें बंद थी। संभवतः भीतर मची खलबलाहट पर काबू पाने की कोशिश कर रही थी। किसी भी अजनबी के सामने स्वयं को कपड़े के थान की तरह खोलना आसान नहीं होता। फिर अचानक धीमे से बोल उठी, “प्रेम के बेलगाम घोड़े पर सवार होकर मैं यहाँ तक आ पहुंची…।
“प्रेम के बेलगाम घोड़े पर! मैं समझा नहीं।” मैंने किसी नासमझ की तरह अचानक पूछा।
“मैं घरवालों के व्यवहार से बहुत परेशान थी… वे मेरी शादी दो बच्चों के बाप से करना चाहते थे… मैं अभी पढ़ना चाहती थी… अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए मैं अपने आस-पड़ोस के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी.. घरवालों से पढ़ाई के लिए मैंने कभी पैसे की मांग नहीं की थी… पर उन्हें मेरा पढ़ना फूटी आंख नहीं सुहा रहा था… बी.ए. पार्ट फर्स्ट में पढ़ने के लिए मैं गाँव से तीन-चार किलोमीटर दूर स्थित कस्बे के कॉलेज में जाया करती… कुछ दिनों के बाद मैंने ध्यान दिया कि एक लड़का हर रोज राह में खड़ा रहता है और मेरी ओर एकटक देखता रहता है.. पाँच-छः महीनों तक ऐसा ही चलता रहा… मैं उसकी अनदेखी करती रही… जब मेरी शादी की बात पक्की होने लगी तो मैंने एक दिन उसकी ओर मुस्कुराकर देख लिया… अगले दिन वह साहस करके मेरे हाथ में एक पत्र थमा गया… जिसमें कहा गया था कि वह देवी के समान मेरी पूजा करता है और यदि मैं उसे नहीं मिली तो वह आत्महत्या कर लेगा… बस, उसे मैं अपना दिल दे बैठी।”
अचानक बोलते-बोलते वह रूक गयी थी, मानो थक जाने के कारण कछ देर विश्राम करना चाहती हो। सर्दी की ऋत होते हए भी उसके माथे से पसीने की बूंदें झिलमिलाने लगी थीं।
“आगे क्या हुआ?” मैं अपनी उत्सुकता दबा नहीं पाया था।
“जिस दिन दो बच्चों का बाप मुझे चुन्नी डालकर ले जाने के लिए आने वाला था, उससे पहले दिन मैं उस लड़के के साथ घर से भाग खड़ी हुई… लड़का मुझे एक बड़े शहर में ले गया… वहाँ एक सस्ते से होटल के एक कमरे में रूक गये… उसके तीन और साथी भी वहीं आ गये… उन सबने मिलकर जबरदस्ती मुझे अपनी हवस का शिकार बना डाला… जब मेरे मुँह में ठुसा कपड़ा निकाला गया तो मैंने कह दिया कि मैं तुम सब को छोडूंगी नहीं… वे डर गये… उन्होंने मुझे मार डालने की अपेक्षा चाय में जाने क्या मिलाकर पिला दिया कि मैं बेहोश हो गयी… होश आया तो खुद को ताई के चंगुल में फंसा पाया… मालूम हुआ कि बीस हजार रूपये में बेच गये थे वे मुझे यहाँ… फिर ताई के अत्याचारों के आगे मैं टूट गयी… मैं आत्महत्या करना चाह रही थी… वह भी नहीं करने दी और मैं बन गयी रंडी. दसरों के घर उजाडने वाली रंडी… इस प्रकार प्रेम का इंद्रध नुष फांसी का फंदा बन गया मेरे लिए… एक ऐसी फांसी जो मुझे न तो जीने दे रही है और न मरने दे रही है?” इतना कहते ही वह फूट-फूट कर रोने लगी।
मैंने उसे रोने दिया ताकि उसके भीतर पक रहे दर्द के फोड़े का मवाद आंसुओं के साथ बहकर निकल जाये… परंतु उसकी रूलाई इतनी करूण थी कि वह मेरे भीतर भी उथल-पुथल मचाने लगी तो मैंने धीमें से उसके सिर पर अपना हाथ रख दिया… हाथ का स्पर्श पाकर उसका रोना एक बार कुछ और बढ़ा…मन में आया कि उसके आंसू पौंछ दूं अपने हाथों से… किसी के आंसू पौंछना पाप थोड़े ही होता है… मेरा हाथ अभी आगे बढ़ा ही था कि तभी दरवाजे की खटखटाहट के साथ दल्ले का स्वर सुनायी दिया, “एक घंटे से ऊपर दस मिनट हो चुके हैं, बाहर निकलो।”
उसने झट से अपने आंसू पौंछे और उठकर दरवाजे की ओर बढ़ गयी। किवाड़ खोलने से पहले पीछे मुड़ी और मरियल से स्वर में पूछ बैठी, “कल भी आयेंगे न आप?”
मैंने गर्दन हिलाकर ‘हां’ का संकेत किया।
उस रात चारपाई पर लेटकर मैंने उस लड़की को वहां से मुक्ति दिलाने का निर्णय लिया था। मुक्ति दिलाने की योजना भी तैयार कर ली थी। उस निर्णय के बाद लगा कि सिर से कोई बोझ उतर गया है और मैं कई दिन के बाद गहरी नींद सो पाया था।
अगला दिन दसवां दिन था। मैं मन-ही-मन उससे मिलने को व्याकुल था। अन्य दिनों की अपेक्षा मैं वहाँ कुछ जल्दी पहुंच गया। देखते ही ताई ने आंख मारते हुए कहा था, “लगता है, लड़की ने तुझ पर जादू कर दिया है, तभी तेरा दिल घर में नहीं लगता… इतना कह देती हूँ कि मेरी भोली-भाली बेटी को भगाने की कोशिश न करना… वरना तेरा तथा तेरे परिवार का खून पी जाऊंगी मैं।”
ऐसा कहकर एक वीभत्स हँसी-हँसी थी वह। मैं चार सौ रूपये चुका कर चुपचाप ऊपर चला आया था।
वह आयी। आज पहली बार उसके चेहरे पर खुशी की चमक थी। इस वजह से वह और ज्यादा सुंदर लग रही थी। हँसते हुए बोली, “आपकी संगति पाकर मैं भी सती-सावित्री बन गयी हूँ पूरी तरह से… आज पूरे दस दिन हो गये हैं, मैंने किसी भी पुरुष को अपना शरीर छूने नहीं दिया है।”
“सती-सावित्री तो आप हमेशा से ही थीं… जिस तरह कपड़ों पर कीचड़ डाल दे कोई जबरदस्ती… उससे मन और आत्मा थोड़े ही मैली होती हैं…. जिस तरह कीचड़ धो देने से कपड़े साफ हो जाते हैं, उसी तरह आप निर्मल हो गयी हैं… वैसे इन दस दिनों में आपने ग्राहकों से खुद को कैसे बचाया? क्या किसी भी ग्राहक ने तम्हारे साथ जाना नहीं चाहा?” मैंने आश्चर्यचकित होते हुए पूछा था।
“आठ लड़कियां हैं हम यहां। मेरे लिए तो आप हर रोज चार सौ रूपये दे ही रहे हैं पूरे सुख के लिए। ताई दूसरी लड़कियों से भी तो काम लेती है। कभी-कभी आधे सुख के ग्राहक ने मेरी चाहना की थी तो मैंने ताई से तबियत खराब होने का बहाना करके किसी और के पास भेज देने की प्रार्थना कर ली थी।”
मेरे मन में जिज्ञासा ने जोर मारा तो मैंने उसकी बात को बीच में ही काटते हुए पूछा, “आज तक थोड़ा सुख, ज्यादा सुख जैसी बातें तो सुनी थी। पर यह आधा सुख और पूरा सुख क्या है?”
“कैसे बताऊं आपको? शर्म आती है कहते हुए… चकलाघर में वेश्या की देह को दो भागों में बांटा जाता है, कमर के नीचे और कमर से ऊपर… दोनों भागों का उपयोग करने वाला ग्राहक पूरे सुख के पैसे देता है, सिर्फ कमर से नीचे या ऊपर वाले भाग का उपयोग करने वाले से आधे सुख के पैसे लिये जाते हैं… सिर्फ हाथ से सुख चाहने वालों से एक चौथाई सुख के… ठीक वैसे ही जैसे शराब की पूरी बोतल, अद्धे या पव्वे का रेट अलग से होता है।” उसने यह सब बताया तो सुनकर मन जाने कैसा हो आया… न वह आंखें मिलाने का साहस कर पा रही थी और न ही मैं।
“और सनो” उसने बात को आगे बढाया. “कई दिन से ताई मेरे पीछे पड़ी है कि मैं आपको इस तरह से अपने जाल में फंसाऊं कि आप अपने घर-परिवार का मोह छोड़कर अपना सारा धन मुझ पर लुटा दें… कहा कि ऐसा ग्राहक जो बार-बार आने लगे, उसे आम की तरह जी लगाकर चूसो, आखिरी बंद तक उसका रस होंठों और दांतों की सहायता से निचोडो, जब उसके पास देने को कुछ न रहे, उसे आम की गुठली की तरह ठोकर मारकर दूर फेंक दो… ताई ने कुछ ऐसे तरीके भी मुझे बताए कि जिन्हें अपनाने पर आदमी औरत का खरीदा हआ गुलाम बनकर कत्ते की तरह उसके पीछे लगा रहता है… परंतु मैंने देखा कि आप तो देवता आदमी हैं… इसीलिए जान बूझकर आपसे बोलना बंद किया ताकि आप यहाँ आना बंद करके अपना घर उजड़ने से बचा लें…वैसे भी रंडियों वाले तरीके अपनाना मुझे कभी अच्छा नहीं लगा।”
“मैं भी निराश होकर सचमुच में ही जिस दिन से आपके पास आना बंद करने वाला था… उसी दिन मतलब कल ही आपने बोलना शुरू कर दिया…खैर छोड़ो, समय थोड़ा है…मैं आपको इस नरक से हमेशा के लिए बाहर निकालना चाहता हूँ…सोचकर बताओ कि कौन-सा तरीका अपनाया जाये जिससे सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे,” मैने कहा।
“कोई तरीका नहीं है, बाबू। कई कुत्ते पाले हुए हैं ताई ने जो दिन-रात यहाँ पहरा देते रहते हैं… जरा-सा संदेह होने पर मार-मारकर टांग-बांह तोड़ दी जाती है… कई-कई दिन तक भूखा रखा जाता है… और सभी पालतू कुत्तों (पुरुषों) को उस अकेली लड़की की कोमल देह को नोंचने के लिए एकसाथ छोड़ दिया जाता है… पुलिस को अलग से महीना दिया जाता है… बीच-बीच में बहुत से पुलिस वाले अपने तन-मन की गंदगी लड़कियों की देह पर उगल जाते हैं यहाँ आकर।”
“कोई बात नहीं, यहाँ से आपको निकालना मेरी जिम्मेदारी रही…आप सिर्फ हां कर दें… बाकी सब मैं संभाल लूंगा… चंडीगढ़ में बैठने वाला एक डिप्टी इंस्पैक्टर जनरल (पुलिस) मुझे जानता है… वह खुद लेखक है… उसे कहूंगा तो वह स्वयं विश्वसनीय पुलिस वालों को साथ लेकर आपको यहाँ से निकाल ले जायेगा… फिर तुम आजाद होकर मन चाही जिंदगी जी सकोगी…।” मैं पूरे जोश में था। पहली बार कोई बहुत बढ़िया काम करने का अवसर मिला था, वह भी अपनी कल्पना की साकार मूर्ति को निकृष्टतम नरक से मुक्ति दिलाने का।
“मान लो, आपने मुझे यहाँ से मुक्त करा भी दिया तो मैं जाऊंगी कहाँ? घर से भागी, बलात्कार की शिकार, अपनी देह बेचने वाली रंडी को कौन शरण देगा जहाँ वह निर्भय होकर अपना जीवन बिता सके? नहीं बाबू, मैं यहीं ठीक हूँ… मैं तो इसी नरक के लायक हूँ… आप मेरी मुक्ति का ख्याल ही छोड़ दें।”
मेरे जोश के विपरीत उसने बहुत ही ठंडे स्वर से कहा। वह यथार्थ की कठोर जमीन पर चल रही थी जबकि मैं आदर्शों को थोथी हवाई पटरी पर दौड़ लगाना चाह रहा था… हवा में गुब्बारे तो तैर सकते हैं, जीते जागते इंसान नहीं।
परंतु मैंने अभी आशा नहीं छोड़ी थी। जल्दी से बोला, “आपको मैं आपके माता-पिता के पास छोड़ आऊंगा। वे तो आपके लिए तड़प रहे होंगे… आखिर अपनी बेटी को कोई भुला थोड़े ही सकता है, चाहे वह कितनी ही बुरी क्यों न हो.. अब तो वे आपकी गलती को भुलाकर अपनी गलती के लिए पछता रहे होंगे।”
“नहीं, मैं वहाँ कभी नहीं जाऊंगी।” इस बार उसका स्वर कडुवाहट से परिपूर्ण था, “वे मेरे लिए मर चुके हैं और मैं उनके लिए… मैं बताना नहीं चाहती थी, पर अब तो बताकर ही रहूंगी.. मेरा बाप इंसान नहीं सुअर है… शराबी सुअर। सुना है सुअरी के अपने जाये, माँ का नाता भूलकर उसे भोगने के लिए उसकी पीठ पर सवार हो जाते है… मेरा बाप भी शराब के नशे में मुझे दूसरी नजरों से देखा करता था… कई बार जब मैं सोयी होती… वह दारू पीकर आता और मेरी चारपाई पर मेरे पास लेट जाता.. मुझे अपनी बांहों में जकड़ने की कोशिश करता. .. जब मैं माँ से इस बात की शिकायत करती तो वे कहतीं कि वे तो अपनी बेटी से लाड करते हैं… नशे में कुछ ज्यादा ही लाड आता है… पर मेरी छातियों पर छिपकली की तरह रेंगते उनके हाथ… मुझे अपने से चिपटाना… मेरा मन उल्टी करने को हो आता… आक थू।” वह उठ खड़ी हुई और खिड़की का पर्दा हटाकर सचमुच में ही उसने थूक दिया। स्वयं मेरा मन भी ऐसा ही हो आया था, मानो आंखों देखते कोई मक्खी निगल ली हो.. लगा कि कहीं उल्टी न हो जाये।
तब तक वह बोल पड़ी, “मेरा बाप मुझे दो बच्चों के बाप को बेच रहा था.. नकद पैसा लेकर ताकि वह दारू पी सके… शादी तो एक बहाना था.. स्वयं मैंने अपने कानों से सुना था, जब वे माँ को बता रहे थे कि वह दो बच्चों का बाप जरूर है… पर धनी है.. विवाह करने के लिए वह हमें पैसे देगा नकद.. वहाँ वह सुखी रहेगी… उस दिन भी मेरे बाप की जेब में नये-नकोर दस हजार रूपयों की गड्डी थी, मैंने उनकी कमीज धोते हुए देखा था… वे रूपये वहीं से आये थे।”
“कोई बात नहीं, मैं तुम्हें कुछ समय के लिए नारी निकेतन में रखवा दूंगा। तुम पढ़ी-लिखी हो, बाद में तुम्हें नौकरी मिल जायेगी। नौकरी के लिए मैं स्वयं प्रयत्न करूंगा। अब शीघ्रता से हां कह दो। हां के सिवाय मैं कुछ भी सुनना नहीं चाहता।” मैं भी पराजय स्वीकार करने को तैयार नहीं था, इसलिए तुरंत दूसरा प्रस्ताव उसके सामने रख दिया।
वैसे भी मेरे पास जमा पूंजी के रूप में कुल चार हजार रूप में थे जो आ
ज समाप्त हो चुके थे। इसलिए अब मैं प्रतिदिन वहाँ आने की अपेक्षा उसी दिन आना चाहता था जिस दिन वह बुलाये। अगले मास वेतन मिलने पर ही नकद रूपये आने वाले थे। उस दिन मैं यह बात भी उसे बताने वाला था।
“क्या आप मुझे सचमुच में ही मुक्ति दिलाना चाहते हैं?” इस बार वह सीधे मेरी आंखों में देख रही थी।
“इसमें भी कोई संदेह है क्या, पगली कसम ले लो चाहे।” उत्साहपूर्वक कहा मैंने।
“आप शादीशुदा हैं?” उसके स्वर में कुछ झिझक थी।
“नहीं तो।” तपाक से उत्तर दिया मैंने।।
“आप खुद कह चुके हैं मैं बहुत सुंदर हूँ… आपकी कल्पना की औरत हूँ… फिर आप मुझे अपनी पत्नी बनाकर क्यों नहीं रख लेते? सच, आपकी चरणों की दासी बनकर रहूंगी मैं…यदि मुक्ति दिलानी ही है तो फिर आपको ही मुझे अपने साथ रखना होगा।” वह उठकर कमरे के फर्श पर बैठ गयी और जब तक मैं संभल पाता, उसने अपना माथा मेरे चरणों पर टिका दिया था।
मुझे काटो तो खून नहीं… ऐसी तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी… शादी ही करनी होती तो कभी की कर ली होती… माँ-बाप तथा बहुत से दूसरे लोग समझा कर हार चुके थे।
मैंने अपने चरण पीछे की तरफ खींचते हुए कहा, “माफ करना, मैंने शादी न करने की कसम खायी हुई है… अपनी पढ़ाई के दिनों में मैं भी एक लड़की से प्यार करने लगा था.. वह भी जी-जान से चाहती थी मुझे… कम-से-कम दिखावा तो अवश्य ऐसा ही करती थी.. दोनों ने कसम खायी थी कि यदि हम किसी कारणवश शादी न कर सके तो अपनी-अपनी जिंदगी कुंवारे रहकर बिता देंगे… बाद में ऐसा ही हुआ। हम दोनों के माँ-बाप सहमत नहीं हुए… लेकिन उस लड़की ने दो वर्ष बाद नौकरी लगते ही अपने माता-पिता के कहे अनुसार शादी कर ली..यह बहाना बनाकर कि शादी न करने से उसके माँ-बाप आत्महत्या कर लेते… अब वह दो बच्चों की माँ है… और मैं अपनी कसम पर कायम हूं।”
मैंने अपनी विवशता बतला दी, हालांकि बताते समय मुझे गर्व की अनुभूति हो रही थी।
“कसमें तो बाबू बनती ही टूटने के लिए हैं।” उसने निराश होकर कहा था।
“मुझे माफ कर दो!” मैं गिड़गिड़ाया। लगा कि मैं जीतकर भी हार रहा हूं।
“माफी तो मैं मांगती हूँ आपसे… बेकार में आपका धन खर्च करवाया… बहुत दु:खी किया।” स्वर ऐसा था मानो दिया बुझ रहा हो।
तभी किवाड़ों पर दल्ले की थपथपाहट और दस मिनट फालतू बिताने की सूचना एक साथ सुनायी दी। वह उठ खड़ी हुई और बिना कुछ कहे अपने कदमों को घसीटते हुए किवाड़ों की ओर बढ़ी। मैंने ही पूछ लिया, “कल आऊ क्या?” कहना चाहता था कि मेरी जमा पूंजी समाप्त हो चुकी है, पर कह नहीं पाया।
“आप कष्ट न करें…. वैसे भी शायद कल में आपसे मिल नहीं पाऊंगी।” पलभर के लिए रूकी वह।
“क्यों, कहीं जाना है क्या?” मैंने किसी मूर्ख की तरह प्रश्न किया। उसके लिए जाने को कोई जगह होती तो फिर बात ही क्या थी।
“जाना तो कहीं नहीं… तबियत ठीक नहीं है… कल का क्या भरोसा… आये न आये।” वह हंसी या रोयी, पता नहीं। होंठ हंसने का अभिनय कर रहे थे… पर आंखे रोती-सी लग रही थीं, हालांकि आंसू नहीं टपक रहे थे. .. पर उसकी आंसुओं से भीगी हंसी मेरे चेहरे से जरूर टकरायी थी.. और वह बाहर निकल गयी।
उस रात मैं पलभर भी नहीं सो सका… सारी रात उसका चेहरा मेरी आंखों के आगे नाचता रहा.. उसकी बातें रह-रहकर मन को मथती रहीं अनवरत… क्या करूं, क्या न करूं? क्या उसे मुक्ति दिलाने के लिए कसम तोड़ दूं? मेरी प्रेमिका भी तो कसम तोड़ कर मजे से जी रही है, अपने पति व बच्चों के साथ… और मैं? रेगिस्तान की तपती दोपहर-सा जीवन, जिसमें कहीं कोई छांव नहीं, अब गहरा, गुंजान, खुशबूदार बगीचा मिल रहा है तो कसम राह में दीवार बनकर खड़ी हो गयी… फिर उस लड़की के द्वारा कही गयी बात कि कसमें तो बनती ही टूटने के लिए हैं.. सचमुच यदि कसमें टूटने के लिए ही हैं तो फिर बनती ही क्यों हैं।
अगले दिन एक मित्र से चार सौ रूपये उधार लिए और पहुंच गया वहां। सोच रहा था कि आज से उसे कसम टूटने की सूचना देकर चौंका दूंगा और कल ही डी.आई.जी. से मिलकर उसे मुक्त कराने की योजना का कार्य रूप दे दूंगा। हां, वहाँ पहुंचने में थोड़ा विलंब अवश्य हो गया था अन्य दिनों की अपेक्षा। मित्र को ढूंढने में ही समय बीत गया था।
पर यह क्या? चकलाघर में घुसते ही देखा कि वहाँ सन्नाटा छाया हुआ है, मौत का सन्नाटा। क्या ताई गुजर गयी? कल तो वह अच्छी भली थी। परंतु मेरे वहाँ घुसते ही किसी कमरे से निकलकर ताई चीखी, “यह आ गया हत्यारा.. इसी ने की है चंपा की हत्या… हत्यारे, तुझे नहीं छोडूंगी मैं।” उसने मेरा गला पकड़ कर मुझे अपनी ओर खींच लिया था। दूसरे हाथ से मेरे बाल पकड़कर खींचते हए वह गालियां बकने लगी थी। वहाँ उपस्थित व्यक्तियों ने बड़ी मुश्किल से मुझे उसके हाथों की जकड़ से छुड़वाया। मुझे वहाँ से बाहर निकालते हुए दल्ले ने बताया कि उस लड़की ने उसी कमरे में थोड़ी देर पहले रस्सी का फंदा गले में डालकर आत्महत्या कर ली है। सही कहा था उसने कि कल आये न आये, पर मैं समझ नहीं पाया था इस बात का मर्म।
और आज पहली बार मालूम हुआ कि उसका नाम था-चंपा, जिसका हत्यारा अन्य कोई नहीं, मैं ही था।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
