ramayan ka naam
अयोध्या में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा उत्खनन में प्राप्त प्राचीन अवशेष

वाल्मीकि कृत रामायण को मौलिक ग्रंथ माना जाता है। इतिहासकारों और विद्वानों वाल्मीकि जी के जीवन काल पर एक मत नहीं है। अनेक विद्वान उन्हें रामायण कालीन स्वीकार करते हैं तो अनेक वाल्मीकि जी का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते। मतांतर से मुक्त हो कर हम अपना अध्ययन महर्षि वाल्मीकि और रामायण ग्रंथ पर करेंगे। वाल्मीकि जी ने अपने इस ग्रंथ का नाम रामायण क्यों रखा? यह विचारणीय प्रश्न है क्योंकि रामायण में राम के अतिरिक्त अन्य पात्रों और भौगोलिक स्थिति का विस्तार से वर्णन है।

रामायण का अर्थ

रामायण का शब्द का संधि विच्छेद करने पर ज्ञात होता है – ‘राम’ + ‘अयन’। यहां ‘अयन’ का अर्थ है ‘यात्रा’। राम की यात्रा। अतः रामायण का अर्थ हुआ – ‘राम की यात्रा’। वाल्मीकि जी ने राम के उपनयन संस्कार से लेकर रावण वध के उपरांत अयोध्या वापस आने तक की संपूर्ण यात्रा का विस्तार से वर्णन किया है। राम की यात्रा का उल्लेख इस पुस्तक के पहले अध्याय में किया जा चुका है।

राम की यात्रा के अतिरिक्त वाल्मीकि जी ने हनुमान के सीता की खोज में भेजते समय जिस प्रकार से भौगौलिक स्थिति का वर्णन किया है वह भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त हनुमान का हिमालय से ‘संजीवनी’ बूटी लाने के प्रसंग में भी यात्रा मार्ग का वर्णन किया है। राम को केंद्रीय पात्र मानकर उन्होंने अपने ग्रंथ का नाम रखा – रामायण।

वेद जिस परमतत्त्व का वर्णन करते हैं, वही श्रीमन्नारायण तत्त्व श्रीमद्रामायण में राम रूप से निरूपित है। वेदवेद्य परम पुरुषोत्तम के दशरथ नन्दन राम के रूप में अवतीर्ण है होने पर साक्षात् वेद ही श्रीवाल्मीकि के मुख से श्रीरामायण है रूप में प्रकट हुए। ऐसी आस्तिकों की चिरकाल से मान्यता इसलिए श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण की वेदतुल्य ही प्रतिष्ठा है। वैसे भी महर्षि वाल्मीकि आदिकवि हैं। अतः विश्व के समस्त कवियों के गुरु हैं। उनका ‘आदिकाव्य’ श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण भूतल का प्रथम काव्य है। वह सभी के लिये पूज्य है। भारत के लिये तो वह परम गौरव की वस्तु है और देश की सच्ची बहुमूल्य राष्ट्रीय निधि है। इस नाते भी वह सबके लिये संग्रह, पठन, मनन एवं श्रवण करने की वस्तु है। इसका एक-एक अक्षर महापातक का नाश करने वाला है।

पुराणों में रामायण का माहात्म्य गाया है। यह भी प्रसिद्ध है कि व्यास जी ने युधिष्ठिर के अनुरोध से एक व्याख्या वाल्मीकि रामायण पर लिखी थी और उसकी एक हस्तलिखित प्रति अब भी प्राप्य है। एक जिज्ञासु सुश्री रामायणतात्पर्यदीपिका की है। जिसके बारे में कहा जाता है कि यह युधिष्ठिर के अनुरोध पर व्यास द्वारा रामायण के अर्थ की व्याख्या थी। इसका उल्लेख दीवान बहादुर रामशास्त्री ने अपनी पुस्तक ‘स्टडीज इन रामायण’ के द्वितीय खण्ड में किया है।

द्रोणपर्व के 143/66-67 श्लोकों में महर्षि वाल्मीकि के युद्धकाण्ड के 81/28 श्लोक का उल्लेख दिया गया है। ‘अग्निपुराण’ के 5-13 तक के अध्यायों में ‘वाल्मीकि’ के नामोल्लेखपूर्वक रामायण सार का वर्णन है। गरुड़ पुराण, पूर्वखण्ड के 143वें अध्याय में भी ठीक इन्हीं श्लोकों में रामायण सार कथन है। इसी प्रकार हरिवंश (विष्णुपर्व 93/6-33) में भी यदुवंशियों द्वारा वाल्मीकि रामायण के नाटक खेलने का उल्लेख है।

व्यास जी ने वाल्मीकि की जीवनी भी बड़ी श्रद्धा से ‘स्कन्दपुराण’ वैष्णवखण्ड, वैशाखमाहात्म्य 17-20 अध्यायों तक आवन्त्यखण्ड अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्य के 24वें अध्याय में, प्रभासखण्ड के 278वें अध्याय में तथा अध्यात्मरामायण के अयोध्याकाण्ड में (6/64/92) वर्णन किया है। आदिकवि वाल्मीकि उस समय कुश, समिधा आदि लेने निकले थे। व्याधके द्वारा मारे गये क्रौञ्चको देखकर उन्हें बड़ा शोक हुआ और वही श्लोक रूप में परिणत हो गया।

रामायण में भौगौलिक स्थिति

‘रामायण’ का विश्लेषित रूप ‘राम का अयन’ है जिसका अर्थ है ‘राम का यात्रा पथ’। अयन यात्रा पथ वाची शब्द है। इसका अर्थ इस तथ्य में अंतर्निहित है कि राम की दो विजय यात्राएं की। जिसमें प्रथम यात्रा प्रेम-संयोग, हास-परिहास तथा आनंद-उल्लास से परिपूर्ण है। तो दूसरी क्लेश, क्लांति, वियोग, व्याकुलता, विवशता और वेदना से आवृत्त। विश्व के अधिकतर विद्वान दूसरी यात्रा को ही रामकथा का मूल आधार मानते हैं। एक श्लोक रामायण में राम वन गमन से रावण वध तक की कथा ही रुपायित हुई है।

जीवन के यथार्थ को रुपायित करने वाली राम कथा में सीता का अपहरण और उनकी खोज अत्यधिक रोमांचक है। वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड के चालीस से तेतालीस अध्यायों के बीच इसका विस्तृत वर्ण हुआ है जो ‘दिग्वर्णन’ के नाम से विख्यात है।

कपिराज सुग्रीव ने पूर्व दिशा में जाने वाले दूतों के सात राज्यों से सुशोभित यवद्वीप (जावा), सुवर्ण द्वीप (सुमात्रा) तथा रुप्यक द्वीप में यत्नपूर्वक जनकसुता को तलाशने का आदेश दिया था। इसी क्रम में यह भी कहा गया था कि यव द्वीप के आगे शिशिर नामक पर्वत है जिसका शिखर स्वर्ग को स्पर्श करता है और जिसके ऊपर देवता तथा दानव निवास करते हैं।

दक्षिण-पूर्व एशिया के इतिहास का आरंभ इसी साक्ष्य से होता है। इंडोनेशिया के बोर्नियो द्वीप में तीसरी शताब्दी को उत्तरार्ध से ही भारतीय संस्कृति की विद्यमानता के पुख्ता सबूत मिलते हैं। बोर्नियों द्वीप के एक संस्कृत शिलालेख में किसी मूलवर्मा नामक व्यक्ति की प्रशस्ति उत्कीर्ण है। संभवतः यह स्थापित शासक रहा होगा। इस शिलालेख में मूलवर्मा के पिता अश्ववर्मा तथा पितामह कुंडग का उल्लेख है। बोर्नियों में भारतीय संस्कृति और संस्कृत भाषा के स्थापित होने में भी काफी समय लगा होगा। तात्पर्य यह कि भारतवासी मूलवर्मा के राजत्वकाल से बहुत पहले उस क्षेत्र में पहुंच गये थे।

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण के किष्किन्धाकाण्ड के 40वें सर्ग में भौगौलिक स्थिति का विस्तृत वर्णन है। यह वर्णन सुग्रीव द्वारा वानरों को सीता की खोज के संदर्भ में दिया गया व्याख्यान है। यहां हनुमान के नेतृत्व में वानरों की यात्रा है।

विश्व की भौगोलिक स्थिति

जावा द्वीप (वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, 40/30 एवं 36) और उसके निकटवर्ती क्षेत्र के वर्णन के बाद द्रुतगामी शोणनद तथा कालेमेघ के समान दिलाई दिखाई देने वाले समुद्र का उल्लेख हुआ है। यहां सदैव भारी गर्जना होती रहती है। इसी समुद्र के तट पर गरुड़ की निवास भूमि (वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, 40/40) शल्मलीक द्वीप है। यहां भयंकर मानदेह नामक राक्षस रहते हैं। जो सुरा समुद्र के मध्यवर्ती शैल शिखरों पर लटके रहते है। सुरा समुद्र के आगे घृत और दधि (वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, 40/41) के समुद्र हैं। श्वेत आभा वाले क्षीर समुद्र के दर्शन होते हैं। उस समुद्र के मध्य ॠषभ नामक श्वेत पर्वत है। जिसके ऊपर सुदर्शन नामक सरोवर है। क्षीर समुद्र (वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, 40/43) के बाद स्वादिष्ट जल वाला एक भयावह समुद्र है। जिसके बीच एक विशाल घोड़े का मुख है जिससे आग निकलती रहती है।

सागर में जहां वह अग्नि विसर्जित हुई। घोड़े की मुखाकृति बन गयी और उससे लपटें निकलने लगीं। इसी कारण उसका नाम वड़वानल (वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, 40/48-49) पड़ा। आधुनिक शोधकर्ताओं और समीक्षकों की मान्यता है कि इससे प्रशांत महासागर क्षेत्र में किसी ज्वालामुखी का संकेत मिलता है। वह स्थल मलस्क्का से फिलिप्पींस जाने वाले जलमार्ग के बीच हो सकता है। इंडोनेशिया से फिलिप्पींस द्वीप समूहों के बीच अक्सर ज्वालामुखी के विस्फोट होते रहते हैं। जिसके अनेक ऐतिहासिक प्रमाण हैं। दधि, धृत और सुरा समुद्र का संबंध श्वेत आभा वाले क्षीर सागर की तरह जल के रंगों के संकेतक प्रतीत होते हैं।

बड़वामुख से तेरह योजना (वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, 40/50-54) उत्तर जातरूप नामक सोने का पहाड़ है। जहां पृथ्वी को धारण करने वाले शेष नाग बैठे दिखाई पड़ते हैं। उस पर्वत के ऊपर ताड़ के चिन्हों वाला सुवर्ण ध्वज फहराता रहता है। यही ताल ध्वज पूर्व दिशा की सीमा है। उसके बाद सुवर्णमय उदय पर्वत है। जिसके शिखर का नाम सौमनस (वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, 40/57-59) है। सूर्य उत्तर से घूमकर जम्बू द्वीप की परिक्रमा करते हुए जब सौमनस पर स्थित होते हैं। तब इस क्षेत्र में स्पष्टता से उनके दर्शन होते हैं। सौमनस सूर्य के समान प्रकाशमान दृष्टिगत होते हैं। उस पर्वत के आगे का क्षेत्र अज्ञात है।

जातरूप का अर्थ सोना होता है। ऐसा अनुमान किया जाता है कि जातरूप पर्वत का संबंध प्रशांत महासागर के पार मैक्सिको के स्वर्ण-उत्पादक पर्वतों से हो सकता है। मक्षिका का अर्थ सोना होता है। मैक्सिको शब्द मक्षिका से ही विकसित माना गया है। यह भी संभव है कि मैक्सिको की उत्पत्ति सोने के खान में काम करने वाली आदिम जाति मैक्सिका से हुई है। मैक्सिको में एशियाई संस्कृति के प्राचीन अवशेष मिलने से इस अवधारणा से पुष्टि होती है।

बालखिल्य (वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, 40/60-61) ॠषियों का उल्लेख विष्णु पुराण और रघुवंश में हुआ है। जहां उनकी संख्या साठ हजार बताई गई है। उसकी आकृति अँगूठे से भी छोटी बतायी गई है। ऐसा कहा गया है कि वह सभी सूर्य के रथ के घोड़े हैं। इससे अनुमान किया जाता है कि यहां सूर्य की असंख्य किरणों का ही मानवीकरण हुआ है। उदय पर्वत (वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, 40/62-64) का सौमनस नामक सुवर्णमय शिखर और प्रकाशपुंज के रुप में बालखिल्य ॠषियों के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि इस स्थल पर प्रशांत महासागर में सूर्योदय के भव्य दृश्य का ही भावमय एवं अतिरंजित चित्रण हुआ है। यह भी संभव है कि अतिप्राचीन काल में यहां महर्षि एवं ऋषियों ने सूर्य और उसकी गतिविधियों पर शोध कार्य किया हो।

सुग्रीव द्वारा भौगोलिक स्थिति का वर्णन

शग्रीव द्वारा सीता के अपहरण के बाद हनुमान को सीता को खोजने का दायित्व सौंपा गया। राम के मित्र सुग्रीव ने हनुमान एवं उनके सहयोगियों को चारों दिशाओं की भौगोलिक स्थिति का ज्ञान दिया। सभी दिशा में पर्वत, घाटी, नदी, झरने, वन, समुद्र, जाति, फल-फूल, शासक, महल, इत्यादि क्या-क्या हैं? इसकी विस्तृत जानकारी दी।

सुग्रीव ने उदयांचल की घाटियों, झरनों और गुफाओं में यत्र-तत्र घूमकर विदेह कुमारी सीता सहित रावण का अन्वेषण करने का दिशा-निर्देश देते हुए कहा- “इससे आगे पूर्व दिशा अगम्य है। उधर देवता रहते हैं। उस ओर चन्द्रमा और सूर्य का प्रकाश न होने से वहां की भूमि अन्धकार से आच्छन्न एवं अदृश्य है। उदयाचल के आस-पास के जो समस्त पर्वत, कन्दराएँ तथा नदियाँ हैं। उनमें तथा जिन स्थानों का मैंने निर्देश नहीं किया है। उनमें भी तुम्हें जानकी की खोज करनी चाहिये।

वाल्मीकि ने अपने ग्रंथ रामायण में पूर्व दिशा में जाने वाले दूतों के दिशा-निर्देश की भांति दक्षिण, पश्चिम और उत्तर दिशा में जाने वाले दूतों को भी मार्ग का निर्देश दिया गया है। इसी क्रम में उत्तर में ध्रुव प्रदेश, दक्षिण में लंका और उसके दक्षिण के हिंद महासागरीय क्षेत्र और पश्चिम में अटलांटिक तक की भू-आकृतियों का काव्यमय चित्रण हुआ है। जिससे समकालीन भूगोल की जानकारी मिलती है।

महर्षि वाल्मीकि ने दक्षिण दिशा का विभाग किष्किन्धा से न करके आर्यावर्त से किया गया है। पूर्व समुद्र से पश्चिम समुद्र और हिमालय से विन्ध्य के भाग को आर्यावर्त कहते हैं।

सुग्रीव ने दक्षिण दिशा के जिन स्थानों का परिचय दिया है, उनकी सङ्गति आर्यावर्त से ही दिशा का विभाजन करने पर लगती है। सुग्रीव बोले – “वानरो! तुम लोग भांति-भांति के वृक्षों और लताओं से सुशोभित सहस्रों शिखरों वाले विन्ध्य पर्वत, बड़े-बड़े नागों से सेवित रमणीय नर्मदा नदी, सुरम्य गोदावरी, महानदी, कृष्णवेणी तथा बड़े- बड़े नागों से सेवित महाभागा वरदा आदि नदियों के तटों पर और मेखल (मेकल), उत्कल एवं दशार्ण देश के नगरों में तथा आब्रवन्ती और अवन्तीपुरी में भी सब जगह सीता की खोज करो।”

उन्होंने समझाते हुए आगे कहा – “इसी प्रकार विदर्भ, ॠष्टिक, रम्य माहिषक देश, वङ्ग, कलिङ्ग तथा कौशिक आदि देशों में सब ओर देखभाल करके पर्वत, नदी और गुफाओं सहित समूचे दण्डकारण्य में छानबीन करना। वहां जो गोदावरी नदी है, उसमें सब ओर बारंबार देखना। इसी प्रकार आन्ध्र, पुण्ड्र, चोल, पाण्ड्य तथा केरल आदि देशों में भी ढूँढ़ना। तदनन्तर अनेक धातुओं से अलंकृत अयोमुख पर्वत पर भी जाना, उसके शिखर बड़े विचित्र हैं। वह शोभाशाली पर्वत फूले हुए विचित्र काननों से युक्त है। उसके सभी स्थानों में सुन्दर चन्दन के वन हैं। उस महापर्वत मलय पर सीता की अच्छी तरह खोज करना। तत्पश्चात् स्वच्छ जल वाली दिव्य नदी कावेरी को देखना, जहां अप्सराएँ विहार करती हैं। उस प्रसिद्ध मलय यानि पर्वत के शिखर पर बैठे हुए सूर्य के समान महान् तेज से सम्पन्न मुनि श्रेष्ठ अगस्त्य का दर्शन करना। इसके बाद उन प्रसन्नचित्त महात्मा से आज्ञा लेकर ग्राहों से सेवित महानदी ताम्रपर्णी को पार करना।”

हनुमान एवं उनके सहयोगियों ध्यानपूर्वक सुग्रीव की बातें सुन रहे थे। सुग्रीव ने कहा – “वानरो! वहाँ से आगे बढ़ने पर तुम लोग पाण्ड्य वंशी राजाओं के नगर द्वार पर लगे हुए सुवर्णमय कपाट का दर्शन करोगे, जो मुक्तामणियों से विभूषित एवं दिव्य है। आधुनिक तंजौर ही प्राचीन पाण्ड्य वंशी नरेशों का नगर है। इस नगर में भी छानबीन करने के लिये सुग्रीव वानरों को आदेश दे रहे हैं। तत्पश्चात् समुद्र के तट पर जाकर उसे पार करने के सम्बन्ध में अपने कर्तव्यका भली-भांति निश्चय करके उसका पालन करना। महर्षि अगस्त्य ने समुद्र के भीतर एक सुन्दर सुवर्णमय पर्वत को स्थापित किया है। जो महेन्द्रगिरि के नाम से विख्यात है। उसके शिखर तथा वहां के वृक्ष विचित्र शोभा से सम्पन्न हैं। वह शोभाशाली पर्वत श्रेष्ठ समुद्र के भीतर गहराई तक घुसा हुआ है।”

यह क्षेत्र में नाना प्रकार के वृक्ष और लताएं उस पर्वत की शोभा बढ़ाते हैं। देवता, ऋषि, श्रेष्ठ यक्ष और अप्सराओं की उपस्थिति से उसकी शोभा और भी बढ़ जाती है। सिद्धों और चारणों के समुदाय वहां सब ओर फैले रहते हैं। इन सबके कारण महेन्द्रपर्वत अत्यन्त मनोरम जान पड़ता है। सहस्र नेत्रधारी इन्द्र प्रत्येक पर्वके दिन उस पर्वत पर पदार्पण करते हैं। इस क्षेत्र का मनोरम विवरण देते हुए सुग्रीव ने कहा – “उस समुद्र के उस पार एक द्वीप है। जिसका विस्तार सौ योजन है। वहां मनुष्यों की पहुँच नहीं है। वह जो दीप्तिशाली द्वीप है, उसमें चारों ओर पूरा प्रयत्न करके तुम्हें सीता की विशेष रूप से खोज करनी चाहिए। वही देश इन्द्र के समान तेजस्वी दुरात्मा राक्षसराज रावण का, जो हमारा वध्य है, निवासस्थान है। दक्षिण समुद्र के बीच में अङ्गार का नाम से प्रसिद्ध एक राक्षसी रहती है, जो छाया पकड़ कर ही प्राणियों को खींच लेती और उन्हें खा जाती है। उस लंका द्वीप में जो संदिग्ध स्थान हैं। उन सब में इस तरह खोज करके जब तुम उन्हें संदेह रहित समझ लो और तुम्हारे मन का संशय निकल जाय, तब तुम लंका द्वीप को भी लाँघ कर आगे बढ़ जाना और अमित तेजस्वी महाराज राम की पत्नी का अन्वेषण करना।”

लंका का विवरण देते हुए सुग्रीव ने लंका से आगे बढ़ने पर सौ योजन विस्तृत समुद्र में एक पुष्पि तक नामका पर्वत की जानकारी दी।

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए सुग्रीव ने हनुमान को बताया – “वानरो! तुम लोग मस्तक झुकाकर उस पर्वत को प्रणाम करना और वहाँ सब ओर सीता को ढूंढ़ना। उस दुर्धर्ष पर्वत को लाँघ कर आगे बढ़ने पर सूर्यवान् नामक पर्वत मिलेगा। वहां जाने का मार्ग बड़ा दुर्गम है और वह पुष्पितक से चौदह योजन दूर है। सूर्यवान् को लाँघ कर जब तुम लोग आगे जाओगे, तब तुम्हें ‘वैद्युत’ नामक पर्वत मिलेगा। वहां कुञ्जर नामक पर्वत दिखायी देगा। उसके ऊपर विश्वकर्मा का बनाया हुआ महर्षि अगस्त्यका एक सुन्दर भवन है। कुञ्जर पर्वत पर बना हुआ अगस्त्य का वह दिव्य भवन सुवर्णमय तथा नाना प्रकार के रत्नों से विभूषित है। उसका विस्तार एक योजन का और ऊँचाई दस योजन की है।”

सुग्रीव हनुमान एवं उनके सहयोगियों की सुरक्षा को लेकर भी सतर्क थे। अतः हनुमान को आगाह करते हुए सुग्रीव ने कहा – “उससे आगे अत्यन्त भयानक पितृलोक है। वहाँ तुम लोगों को नहीं जाना चाहिए। यह भूमि यमलोक की राजधानी है। जो कष्टप्रद अंधकारों से आच्छादित है।

श्रेष्ठ वानरो! सौराष्ट्र, बाह्रीक और चन्द्रचित्र आदि देशों, अन्य समृद्धिशाली एवं रमणीय जनपदों, बड़े-बड़े नगरों तथा पुन्नाग, बकुल और उद्दालक आदि वृक्षों से भरे हुए कुक्षि देश में एवं केवड़े के वनों में सीता की खोज करो।”

पश्चिम दिशा की जानकारी देते हुए सुग्रीव ने कहा – पश्चिम दिशा में ओर बहने वाली शीतल जल से सुशोभित कल्याणमयी नदियों, तपस्वी जनों के वनों तथा दुर्गम पर्वतों में भी विदेह कुमारी का पता लगाओ। पश्चिम दिशा में प्रायः मरुभूमि है। अत्यन्त ऊँची और ठंढी शिलाएँ हैं तथा पर्वत मालाओं से घिरे हुए बहुत-से दुर्गम प्रदेश हैं। उन सभी स्थानों में सीता की खोज करते हुए क्रमशः आगे बढ़कर पश्चिम समुद्र तक जाना और वहां के प्रत्येक स्थान का निरीक्षण करना। वानरो! समुद्र का जल तिमि नामक मत्स्यों तथा बड़े-बड़े ग्राहों से भरा हुआ है। वहाँ सब ओर देख-भाल करना।”

वहां से आगे का उल्लेख करते हुए सुग्रीव ने बताया – “समुद्र के बीच में पारियात्र पर्वत का सुवर्णमय शिखर दिखायी देगा। जो सौ योजन विस्तृत है। वानरो! उसका दर्शन दूसरों के लिये अत्यन्त कठिन है। वहां जाकर तुम्हें सीता की खोज करनी चाहिये। पारियात्र पर्वत के शिखर पर इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, भयंकर, अग्नितुल्य तेजस्वी तथा वेगशाली चौबीस करोड़ गन्धर्व निवास करते हैं। वह सब-के-सब अग्नि की ज्वाला के समान प्रकाशमान हैं और सब ओर से आकर उस पर्वत पर एकत्र हुए हैं। वहाँ भी जानकी की खोज करनी चाहिए।”

पारियात्र पर्वत के समीप समुद्र में वज्रनाम नामक ऊँचा पर्वत है। यह विभिन्न प्रकार के वृक्षों और लताओं से आच्छादित वन क्षेत्र है। वह वज्रगिरि वैदूर्यमणिके समान नील वर्ण का है। समुद्र के चतुर्थ भाग में चक्रवान् नामक पर्वत है। वहीं विश्वकर्मा ने सहस्रार चक्र का निर्माण किया था। वहीं से पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु पञ्चजन और हयग्रीव नामक दानवों का वध करके पाञ्चजन्य शंख तथा वह सहस्रार सुदर्शन चक्र लाये थे। चक्रवान् पर्वत के रमणीय शिखरों और विशाल गुफाओं में भी इधर-उधर वैदेही सहित रावण का पता लगाना चाहिये।

सुग्रीव ने समुद्र की अगाध जलराशि में सुवर्णमय शिखरों वाले वराह नामक पर्वत का वर्णन करते हुए कहा – “इसका विस्तार चौंसठ योजन है। वहीं प्राग्ज्योतिष नामक सुवर्णमय नगर है। जिसमें दुष्टात्मा नरक नामक दानव निवास करता है। उस पर्वत के रमणीय शिखरों पर तथा वहां की विशाल गुफाओं में सीता सहित रावण की तलाश करनी चाहिए।” सुग्रीव ने बताया – “मध्य भाग में पर्वतों का राजा गिरिश्रेष्ठ मेरु विराजमान है। जिसे पूर्वकाल में सूर्य देव ने प्रसन्न होकर वर दिया था। उन्होंने उस शैलराज से कहा था कि जो दिन-रात तुम्हारे आश्रय में रहेंगे। वे मेरी कृपा से सुवर्णमय हो जाएंगे तथा देवता, दानव, गन्धर्व जो भी तुम्हारे ऊपर निवास करेंगे। वह सुवर्ण के समान कान्तिमान् और मेरे भक्त हो जाएंगे। मेरु से अस्ताचल दस हजार योजन की दूरी पर है, किंतु सूर्यदेव आधे मुहूर्त में ही वहाँ पहुँच जाते हैं। मेरु और अस्ताचल के बीच एक स्वर्णमय ताड़ का वृक्ष है। जो बड़ा ही सुन्दर और बहुत ही ऊँचा है। उसके दस स्कन्ध (बड़ी शाखाएं) हैं। उसके नीचे की वेदी बड़ी विचित्र है। इस तरह वह वृक्ष बड़ी शोभा पाता है। मेरुगिरि पर धर्म के ज्ञाता महर्षि मेरुसावर्णि रहते हैं। जो अपनी तपस्या से ऊँची स्थिति को प्राप्त हुए हैं। वे प्रजापति के समान शक्तिशाली एवं विख्यात ऋषि है।”

सुग्रीव यहीं नहीं रुके। उन्होंने बताया – “वानर शिरोमणियो! पश्चिम दिशा में इतनी ही दूरतक वानर जा सकते हैं। उसके आगे न तो सूर्य का प्रकाश है और न किसी देश आदि की सीमा ही। अतः वहाँ से आगे की। भूमि के विषय में मुझे कोई जानकारी नहीं है। अस्ताचल तक जाकर रावण के स्थान और सीता का पता लगाओ तथा एक मास पूर्ण होते ही यहाँ लौट आओ। एक महीने से अधिक न ठहरना। जो ठहरेगा, उसे मेरे हाथ से प्राणदंड मिलेगा। तुम सब लोग बुद्धि और पराक्रम के द्वारा इन अत्यन्त दुर्गम प्रदेशों, पर्वतों और नदियों के तटों पर जा-जाकर सीता की खोज करो।”

कुछ पल विश्राम करने के बाद सुग्रीव ने उत्तर दिशा में निवास करने वाले म्लेच्छ, पुलिन्द, शूरसेन, प्रस्थल, भरत (इन्द्रप्रस्थ और हस्तिनापुर के आस-पास के प्रान्त), कुरु (दक्षिण कुरु-कुरुक्षेत्र के आस-पास की भूमि), मद्र, काम्बोज, यवन, शकों के देशों एवं नगरों के विषय में जानकारी दी।

सुग्रीव बोले- “रोंगटे खड़े कर देने वाले उस दुर्गम प्रान्त को शीघ्रतापूर्वक लाँघ जाने पर तुम्हें श्वेतवर्ण का कैलास पर्वत मिलेगा। वहाँ पहुँचने पर तुम सब लोग हर्ष से खिल उठोगे। वहीं विश्वकर्मा का बनाया हुआ कुबेर का रमणीय भवन है। जो श्वेत बादलों के समान प्रतीत होता है। उस भवन को जाम्बूनद नामक सुवर्ण से विभूषित किया गया है। उसके पास ही एक बहुत बड़ा सरोवर है। जिसमें कमल और उत्पल प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। उसमें हंस और कारण्डव आदि जलपक्षी भरे रहते हैं तथा अप्सराएँ उसमें जल-क्रीड़ा करती हैं। वहां यक्षों के स्वामी विश्रवा कुमार श्रीमान राजा कुबेर जो समस्त विश्व के लिये वन्दनीय और धन देने वाले हैं। गुह्यकों के साथ विहार करते हैं। उस कैलास के चन्द्रमा की भाँति उज्ज्वल शाखा पर्वतों पर तथा उनकी गुफाओं में सब ओर घूम फिर कर तुम्हें सीता सहित रावण का अनुसंधान करना चाहिए। इसके बाद क्रौञ्चगिरि पर जाकर वहां की अत्यन्त दुर्गम विवररूप गुफा में (जो स्कन्द की शक्ति से पर्वतके विदीर्ण होने के कारण बन गयी है) तुम्हें सावधानी के साथ प्रवेश करना चाहिये क्योंकि उसके भीतर प्रवेश करना अत्यन्त कठिन माना गया है। उस गुफा में सूर्य के समान तेजस्वी महात्मा निवास करते हैं। उन देव स्वरूप महर्षियों की देवता लोग भी अभ्यर्थना करते हैं। क्रौंच पर्वत की और भी बहुत-सी गुफाएं हैं। अनेकानेक चोटियां, शिखर, कंदराएं तथा नितम्ब (ढालू प्रदेश) हैं। उन सबमें सब ओर घूम-फिरकर सीता और रावण का पता लगाना चाहिए।”

उत्तर दिशा के विषय में जानकारी लेते हुए हनुमान एवं उनके सहयोगियों अत्यंत प्रसन्न हो रहे थे। सुग्रीव ने आपनी बात जारी रखते हुए कहा- “वहां से आगे वृक्षों से रहित मानस नामक शिखर है। जहां शून्य होने के कारण कभी पक्षी तक नहीं जाते हैं। कामदेव की तपस्या का स्थान होने के कारण वह क्रौंच शिखर कामशैल के नाम से विख्यात है। वहाँ भूतों, देवताओं तथा राक्षसों का भी कभी जाना नहीं होता है। शिखरो, घाटियों और शास्त्रा पर्वतों सहित समूचे क्रौंच पर्वत की तुम लोग छानबीन करना। क्रौंच गिरि को लांघ कर आगे बढ़ने पर मैनाक पर्वत मिलेगा। वहाँ मयदानव का घर है। जिसे उसने स्वयं ही अपने लिये बनाया है। तुम लोगों को शिखरों, चौरस मैदानों और कन्दराओं सहित मैनाक पर्वत पर भली-भांति सीताजी की खोज करनी चाहिए।”

सुग्रीव ने समझाते हुए कहा – “उसमें सिद्ध, वैखानख तथा वालखिल्य नामक तपस्वी निवास करते हैं। तपस्या से उनके पाप धुल गये हैं। उन सिद्धों को तुम लोग प्रणाम करना और विनीत भाव से सीता का समाचार पूछना। उस आश्रम के पास ‘वैखानस सर’ के नाम से प्रसिद्ध एक सरोवर है। जिसका जल सुवर्णमय कमलों से आच्छादित रहता है। उसमें प्रातःकालिक सूर्य के समान सुनहरे एवं अरुणवर्ण वाले सुन्दर हंस विचरते रहते हैं।”

उस क्षेत्र से आगे की स्थिति बताते सुग्रीव बोले – “उस प्रदेश को लाँघ कर आगे बढ़ने पर ‘शैलोदा’ नाम वाली नदी का दर्शन होगा। उसके दोनों तटों पर कीचक (वंशीकी-सी ध्वनि करने वाले) बाँस हैं। यह बात प्रसिद्ध है। वह बाँस ही (साधन बनकर) सिद्ध पुरुषों को शैलोदा के उस पार ले जाते और वहाँ से इस पार ले आते हैं। जहाँ केवल पुण्यात्मा पुरुषों का वास है। वह उत्तर कुरुदेश शैलोदा के तट पर ही है। उत्तर कुरुदेश में नील वैदूर्यमणि के समान हरे-हरे कमलों के पत्तों से सुशोभित सहस्रों नदियाँ बहती हैं। जिनके जल सुवर्णमय पद्मों से अलंकृत अनेकानेक पुष्करिणियों से मिले हुए हैं। वहाँ के जलाशय लाल और सुनहरे कमल समूहों से मण्डित होकर प्रातःकाल उदित हुए सूर्य के समान शोभा पाते हैं। बहुमूल्य मणियों के समान पत्तों और सुवर्ण के समान कान्तिमान् केसरों वाले विचित्र-विचित्र नील कमलोंके द्वारा वहाँ का प्रदेश सब ओर से सुशोभित होता है। वहाँ की नदियों के तट गोल-गोल मोतियों, बहुमूल्य मणियों और सुवर्णों से सम्पत्र हैं। इतना ही नहीं उन नदियों के किनारे सम्पूर्ण रत्नोंसे युक्त विचित्र-विचित्र पर्वत भी विद्यमान हैं। जो उनके जल के भीतर तक घुसे हुए हैं। उन पर्वतों में से कितने ही सुवर्णमय हैं। जिनसे अग्नि के समान प्रकाश फैलता रहता है। वहाँ के वृक्षों में सदा ही फल-फूल लगे रहते हैं और उन पर पक्षी चहकते रहते हैं। वे वृक्ष दिव्य गन्ध, दिव्य रस और दिव्य स्पर्श प्रदान करते हैं तथा प्राणियों की सारी मनचाही वस्तुओं की वर्षा करते रहते हैं। इनके सिवा दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ वृक्ष फलों के रूपमें नाना प्रकार के वस्त्र, मोती और वैदूर्यमणि से जटित आभूषण देते हैं। जो स्त्रियों तथा पुरुषों के भी उपयोग में आने योग्य होते हैं। दूसरे उत्तम वृक्ष सभी ऋतुओं में सुखपूर्वक सेवन करने योग्य अच्छे-अच्छे फल देते हैं। अन्यान्य सुन्दर वृक्ष बहुमूल्य मणियों के समान विचित्र फल उत्पन्न करते हैं। कितने ही अन्य वृक्ष विचित्र बिछौनों से युक्त शय्याओं को ही फलों के रूप में प्रकट करते हैं। मन को प्रिय लगने वाली सुन्दर मालाएँ भी प्रस्तुत करते हैं। बहुमूल्य पेय पदार्थ और भाँति-भाँति के भोजन भी देते हैं तथा रूप और यौवन से प्रकाशित होने वाली सद्गुणवती युवतियों को भी जन्म देते हैं।

उस देश को लाँघ कर आगे जाने पर उत्तरदिग्वर्ती समुद्र उपलब्ध होगा। उस समुद्र के मध्य भाग में सोमगिरि नामक एक बहुत ऊँचा सुवर्णमय पर्वत हैं। जो लोग स्वर्गलोक में गये हैं। वे तथा इन्द्रलोक और ब्रह्मलोक में रहने वाले देवता उस गिरिराज सोमगिरि का दर्शन करते हैं।

नाज ट्यूनीच गुफा

महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण के किष्किन्धाकाण्ड के सर्ग 51 में एक श्लोक है- मयो नाम महातेजा मायावी वानरर्षभ। तेनेवं निर्मितं सर्वं मायया काञ्चनं वनम्। सीता की खोज में निकले हनुमान और उनके साथी भूख और प्यास बुझाने के लिए एक गुफा में प्रवेश करते हैं तो उन्हें ज्ञात होता है कि वह स्वरणमयी गुफा लोकप्रसिद्ध वास्तुशिल्पी मय की व्यक्तिगत संपत्ति है। उसके विषय में महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में इसका विस्तार से वर्णन किया है। यह गुफा तत्कालीन आर्यावर्त में न होकर हिंदुस्तान से बाहर है। सारा प्रकरण समझने से पहले यह जानना आवश्यक है कि मय दानव का पुत्र था। महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण के अनुसार मय और उसके समर्थक लोग गुफाओं का प्रयोग अधिक करते थे। ऐसा उल्लेख मिलता है कि बालि से पराजित होकर मायावी भी एक गुफा में ही जा छिपा था। बालि ने उस गुफा में प्रवेश करके वहीं उसका वध किया। पुत्रों के अलावा मय की एक पुत्री भी थी मन्दोदरी, जिसका विवाह रावण के साथ हुआ था। रामायण के किष्किंधा काण्ड में ही गुफा वाले प्रकरण में मय के जीवन-वृत्त तथा भवन निर्माण के उसके कौशल का अच्छा वर्णन किया गया है। सीता की खोज में गये वानरों के भूख-प्यास से व्यथित होकर एक गुफा में प्रवेश और उस गुफा में स्वयंप्रभा नाम की तपस्विनी से हुई उनकी भेंट की कथा विदित ही है। हुनुमान जी के पूछने पर तपस्विनी स्वयंप्रभा ने बतलाया था कि वानर श्रेष्ठ! माया-विशारद महातेजस्वी मय का नाम तुमने सुना होगा। उसी ने अपनी माया के प्रभाव से इस समूचे स्वर्णमय वन का निर्माण किया था। यह विवरण महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण में वर्णित है। मय संस्कृति के यह अवशेष न केवल अमेरिकी महाद्वीपों की प्राचीनता के प्रतीक हैं अपितु हिन्दू संस्कृति के विश्वव्यापी प्रभाव को भी भली-भाँति स्पष्ट करते हैं।

यह गुफा ग्वाटेमाला में पाई गई है। यह मध्य अमेरिका में सबसे अधिक आबादी वाला शहरी क्षेत्र है। ग्वाटेमाला में पॉपटुन से लगभग 35 किलोमीटर पूर्व में ला कॉम्पुएर्टा गांव के बाहर पूर्व-कोलंबियाई युग की प्राकृतिक गुफाओं की एक श्रृंखला है। यहां एक अतिप्राचीन गुफा मिली है। पुरातत्वविदों ने इसे नाम दिया है नाज ट्यूनिच। नाज ट्यूनिक का सामान्य अर्थ है – पत्थर का घर, गुफा। ऐसा माना जाता है कि एक स्थानीय कृषक वर्नावे पोप अपने पिता ऐमीलिओ के साथ शिकार हेतु जंगल में भटकते हुए इस अद्भुत गुफा तक पहुंच गया था। यह घटना सन् 1979 ईस्वी के मध्य की है। उस क्षेत्र में रहने वाले एक अमेरिकी माइक डिवाइन को इसके अस्तित्व के बारे में बताया। इसके बाद डिवाइन ने कुछ लोगों को साइट पर मार्गदर्शन किया। कालांतर में स्थलाकृतिक सर्वेक्षण जेम्स ब्रैडी द्वारा पूरा किया गया। ग्वाटेमाला सरकार ने इस गुफा क्षेत्र को अपने संरक्षण में ले लिया ताकि पुरातात्त्विक महत्त्व के अवशेष नष्ट न हो जाए। ग्वाटेमाला सरकार से अनुमति लेकर पुरातत्त्ववेत्ता जार्ज ई स्टुअर्ट अपने तीन साथियों तथा वर्नावे पोप के साथ गुफा के पुरातात्त्विक अध्ययन के लिए पहुंचे। वहां पुरातत्त्ववेत्ता ने देखा कि सामने चूने के पत्थर की बनी एक शैल्फ के नीचे एक लम्बा छिद्र है। जिससे झाँकने पर नीचे केवल घना अन्धकार था।

यह स्थल मय अनुष्ठान तीर्थ स्थल था। कलाकृतियों से पता चलता है कि गुफा अतिप्राचीन है। जार्ज ई स्टुअर्ट अपने साथियों के साथ छोटे छिद्र से होकर रेंगते सब लोग गुफा के अन्दर काफी नीचे उतरने के बाद एक समतल भूमि पर आ गये। यहाँ छन-छन कर आते हुए मध्यम प्रकाश में इन्हें आगे दूर पर एक ढाल दिखाई दिया। जो बड़े-बड़े पत्थरों को बिछाकर तथा किनारों पर पत्थरों की दीवाल बनाकर निर्मित किया गया था। ढाल के नीचे उतरने पर कलात्मक ढंग से रंगे हुए मिट्टी के टूटे बर्तनों का ढेर मिला। आगे बढ़ने पर एक अंधेरी सुरंग और उस सुरंग के दूसरे छोर पर कुछ गीली भूमि तथा अत्यन्त स्वच्छ जल से भरा हुआ एक जलाशय मिला। इसके फिसलन भरे किनारे पर चलते हुए सामने एक चौड़ा मार्ग दिखायी पड़ा। कुछ दूर बाद यह चौड़ा मार्ग सँकरा होते-होते दो भागों में विभाजित हो गया। बायीं ओर चलने पर कई घुमावदार मोड़ पार करने के बाद एक ऐसी जगह पहुँचे जहाँ कूँची की सहायता से अत्यन्त सुन्दर चित्र-लिपि में कुछ लिखा गया था। दो पंक्तिओं आलेख में एक तिथि अंकित थी। जिसे लिपि विशेषज्ञ डेविड ने अंग्रेजी कलेण्डर में परिवर्त्तित करके 30 जून सन् 741 ईस्वी निश्चित किया। एक अन्य कक्ष में चित्रलिपि में 67 शब्द अंकित मिले हैं। इसको ‘बालम का हॉल’ नाम दिया। इसी कक्ष के एक बड़े छिद्र से दूसरे कक्ष में जाने का रास्ता है। जहाँ पीले पत्थर के बड़े-बड़े पर्दों पर और अधिक लिखावट थी। जिनका नाम ‘क्रस्टल कालम’ रखा है। इससे आगे एक तंग मार्ग की दीवारों पर मानव आकृतियाँ बनायी गयी थीं। एक कोने में शंख के सामने ध्यान मुद्रा में बैठे हुए एक व्यक्ति तथा कुछ बौनों के चित्र हैं। मायावी शक्तियों को प्राप्त करने तथा तान्त्रिक अनुष्ठानों के लिए मय लोग इन गुफाओं का प्रयोग किया करते थे। चित्रात्मक कला का यह प्रतिनिधित्व मय संस्कृति में अपनी तरह का अनूठा है। गुफा के अन्य स्थानों को भी देख कर उन्हें अनुमान के आधार पर ‘पैसेज आफ राइट’ तथा ‘बिअरर आफ फायर’ कक्ष नाम दिया। ‘पैसेज आफ राइट’ में एक विशेष बात यह थी कि यहां योनि सम्बन्धी चित्र भी थे। अन्यत्र मय चित्रकला में बहुधा ऐसे चित्रों का अभाव रहता है। ‘बिअरर आफ फायर’ कक्ष में आग ले जाते हुए एक व्यक्ति का चित्र है। ग्वाटेमाला के घने जंगलों में ऐसी ही अन्य गुफाएँ भी मिली हैं। इस स्थल का पहला अकादमिक दौरा सन् 1980 में पियरे वेंटूर द्वारा किया गया था। पुरातात्विक अन्वेषण सन् 1981 में शुरू हुआ था। खोजकर्ताओं में मानव विज्ञान और इतिहास संस्थान और सन् 1981 में नेशनल ज्योग्राफिक सोसाइटी की टीमें शामिल थीं। सन् 1988 में एंड्रिया जॉयस स्टोन द्वारा एक फोटोग्राफिक अध्ययन पूरा किया गया था। स्टोन के अनुसार सन् 1986 तक गुफा में कई बार तोड़फोड़ की गई थी और सन् 1989 में अधिक गंभीर बर्बरता हुई थी। ऐसा माना जाता है कि सन् 1989 में अज्ञात व्यक्तियों ने 20 से अधिक रेखाचित्रों को खरोंच कर खराब कर दिया था। सन् 2012 में गुफाओं को संभावित यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में अस्थायी सूची में जोड़ा गया था। यह पहले से ही ग्वाटेमाला के एक राष्ट्रीय स्मारक थे। अकादमिक सर्वेक्षण के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि गुफा के कई कमरों और घुमावदार शाखाओं के भीतर एक जादुई दुनिया बन गई है। इसमें लगभग 90 रेखाचित्र खोजे गए हैं।

जिनमें मानव रूपी चरित्र, जानवर, देवता, संगीत वाद्ययंत्र आदि रेखाचित्र हैं। नाज ट्यूनिच गुफा को उत्तर-दक्षिण दिशा में बताया गया है। पुरातत्वविदों ने इसमें दो कक्ष, दो चैंबर निर्धारित किए हैं। गुफा की लंबाई 19 मीटर है। इसका सबसे चौड़ा भाग 2.5 मीटर बताया गया है। गुफा में पीले, पारदर्शी रंग के क्रिस्टलीय स्टैलेग्माइट्स और स्टैलेक्टाइट्स भी थे। यह सभी पर्यावरण में परिवर्तन और मानवीय कारणों से नष्ट हो गए हैं। जल का प्रयोग अनुष्ठानों में किया जाता था। नाज ट्यूनीच गुफा के दो अन्य क्षेत्र पानी के समीप हैं। पानी का एक प्राकृतिक सरोवर है। यह सुरंग प्रणाली से लगभग 40 मीटर की दूरी पर स्थित है। मय ने सरोवर के उत्तर में एक मिट्टी का छोटा मंच बनाया था। चैंबर एक के दूसरे खंड के समीप एक कुंआ है। जो गुफा के प्रवेश द्वार से सबसे दूर सुरंग के समीप स्थित है। इस कुएं का व्यास पांच मीटर और लंबा है। यह कीचड़युक्त शाफ्ट बताया गया है। कुएं के आसपास प्राचीन मय के पैरों के निशान पाए गए हैं। अनेक शोध एवं अनुसंधान से यह ज्ञात हुआ है कि मय ने ब्रह्मांड विज्ञान के अनुसार पवित्र अनुष्ठान शक्ति से ओत-प्रोत होने के रूप में नाज ट्यूनिच पर ध्यान केंद्रित किया। नाज ट्यूनीच ब्रह्मांडीय केंद्र और चार तिमाहियों को परिभाषित करता है। इतिहासकारों पुरातत्त्व वेत्ताओं एवं शोधकर्ताओं के लिए यह एक आश्चर्य का विषय बना हुआ है कि हजारों वर्षों से निरन्तर विकसित होने वाली मय संस्कृति एकाएक कैसे विलुप्त हो गई? यह है रामायणकालीन वास्तुशिल्प।

उपर्युक्त वर्णन महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण से वर्णित प्रसंग से मेल खाता है। बैखानस सरोवर के आगे न तो सूर्य तथा न चंद्रमा दिखाई पड़ते हैं। उस प्रदेश के बाद शैलोदा नामक नदी है। इसके तट पर वंशी की ध्वनि करने वाले कीचक नामक बाँस मिलते हैं। उन्हीं बाँसों का बेरा बनाकर लोग शैलोदा को पारकर उत्तर-कुरु जाते है। जहां सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। उत्तर-कुरु के बाद समुद्र है। इसके मध्य भाग में सोमगिरि का सुवर्गमय शिखर दिखाई पड़ता है। वह क्षेत्र सूर्य से रहित है। वह सोमगिरि के प्रभा से सदा प्रभावित होता रहता है। ऐसा मालूम पड़ता है कि यहां उत्तरी ध्रुव का वर्णन हुआ है। यहां छह महीनों तक सूर्य दिखाई नहीं पड़ता और छह महीनों तक क्षितिज के छोड़ पर उसके दर्शन भी होते हैं। ऐसी स्थिति में सूर्य की प्रभा से उद्भासित सोमगिरि के हिमशिखर निश्चय ही सुवर्णमय दीखते होंगे। अंतत: यह भी यथार्थ है कि सूर्य से रहित होने पर भी उत्तर-ध्रुव पूरी तरह अंधकारमय नहीं है। राम कथा की विदेश-यात्रा के संदर्भ में वाल्मीकि रामायण का दिग्वर्णन इस अर्थ में प्रासंगिक है कि कालांतर में यह कथा उन स्थलों पर पहुँच ही नहीं गयी, बल्कि फलती-फूलती भी रही। बर्मा, थाईलैंड, कंपूचिया, लाओस, वियतनाम, मलयेशिया, इंडोनेशिया, फिलिपींस, तिब्बत, चीन, जापान, मंगोलिया, तुर्किस्तान, श्रीलंका और नेपाल की प्राचीन भाषाओं में राम कथा पर आधारित बहुत सारी साहित्यिक कृतियाँ है। अनेक देशों में यह कथा शिलाचित्रों की विशाल श्रृखलाओं में मौजूद हैं। इनके शिलालेखी प्रमाण भी मिलते है। अनेक देशों में प्राचीन काल से ही रामलीला का प्रचलन है। कुछ देशों में रामायण के घटना स्थलों का स्थानीकरण भी हुआ है।

महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में कितना सुंदर वर्णन भौगौलिक स्थिति का किया है। वह न केवल प्रशंसनीय है अपितु अनुकरणीय भी है। अनुकरणीय इसलिए क्योंकि आज कोई भी पुस्तक ऐसी नहीं है जिसमें किसी कथानक के साथ भौगौलिक स्थिति का का वर्णन हो। यही कारण है कि महर्षि वाल्मीकि कृत रामायण इतना महत्वपूर्ण ग्रंथ है। विद्वानों के एक वर्ग के अनुसार- “रामायण के लक्षणों के आधार पर दण्डी आदि ने काव्यों की परिभाषा तुलसीदास जी ने बतलायी।” त्र्यम्बकराज मखानी ने सुन्दरकाण्ड की व्याख्या में प्रायः सभी श्लोकों को अलंकार, रसादियुक्त मानकर काण्डनाम की सार्थकता दिखलायी है। वाल्मीकि ने रामायण में तत्कालीन राजनीति, मनोविज्ञान और सामाजिक परिवेश की पृष्ठभूमि अत्यंत उच्च कोटि की प्रस्तुत की है। विभीषण के आने पर राम सबसे सम्मति माँगते हैं। सुग्रीव कहते हैं- “यह शत्रु का ही भाई है। पता नहीं क्यों अब अकस्मात् हमारी सेना में प्रवेश पाना चाहता है? प्रकृति से राक्षस है, इसका क्या विश्वास?” अंगद ने भी प्रायः ऐसी ही बात कही। जाम्बवन्त ने कहा- “हमें भी इसको अदेश काल में आया देख बड़ी शंका हो रही है।” गुप्तचर छोड़ाने का सुझाव आया। प्रश्न-प्रतिप्रश्न किये जायं, जिसके उत्तर से भाव जान लिये जायंगे, ऐसा भी मत व्यक्त किया गया राम के समक्ष। इन सभी सुझावों और मतों पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हनुमान खण्डन करते हुए कहा – “प्रभो! आपके समक्ष बृहस्पति का भाषण भी तुच्छ है, पर आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। मैं विवाद, तर्क, स्पर्धा आदि के कारण नहीं, कार्य की गुरुता के कारण कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।

आपके मन्त्रियों में से कुछ ने विभीषण के पीछे गुप्तचर लगाने कि राय दी है। गुप्तचर तो दूर रहने वाले तथा ‘अदृष्ट अज्ञातवृत्त’ व्यक्ति के पीछे लगाया जाता है। यह तो प्रत्यक्ष ही सामने है। अपना नाम काम भी स्वयं ही कह रहा है। यहां गुप्तचर का क्या उपयोग? कुछ लोगों ने कहा है कि ‘यह अदेश काल में आया है किंतु मुझे तो लगता है कि यही इसके आने का देशकाल है। आपके द्वारा बाली को मारा गया और सुग्रीव को अभिषिक्त सुनकर आपके परम शत्रु तथा बाली के मित्र रावण के संहार के लिये ही आया है। इससे प्रश्न करने की बात भी दोषयुक्त दीखती है क्योंकि उससे इसके मैत्री भाव में बाधा पहुँचेगी और यह मित्र दूषित करने का कार्य हो जायगा। यों तो आप कुछ भी बात करते समय इसके स्वर भेद, आकार, मुखविक्रिया आदि से इसकी मनःस्थिति भाँप ही लेंगे। मैंने अपनी तुच्छ बुद्धि के अनुसार यह कुछ निवेदन किया, प्रमाण तो स्वयं आप ही हैं।” राम की नीति, उत्तम विचार, दिव्य दृष्टिकोण, तथ्यों को आत्मसात करने की क्षमता, साधुता, सद्गुण सम्पन्नता सर्वश्रेष्ठ है। इस विलक्षणता में लक्ष्मण भी कम नहीं हैं। वस्तुत: महर्षि वाल्मीकि ने तत्कालीन विचार शक्ति के अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।