Hindi Kahani: रवि के वंश में राजा त्रिधन्वा तथा ययाति के बाद चन्द्रवरा का वर्णन इस प्रकार है-राजा त्रिधन्वा ने अपने एक सहस्र अश्वमेध यज्ञों के फल से समस्त देवों का पूज्य होकर परम दृढ़ पद प्राप्त किया। उनका महान् बलवान पुत्र सत्यव्रत का विवाह विदर्भ कन्या से हुआ। उसके इस आचरण से राजा ने उसे त्याग दिया। यह पूछे जाने पर कि मैं कहा जाऊं-उसे बताया गया कि मेहतरों के साथ रहो।
ऐसा सुन कर वह नगर छोड़कर मेहतरों के बीच रहने लगा। पिता के वन-गमन के पश्चात् यही वीर्यवान बालक त्रिशंकु कहलाया। महर्षि विश्वामित्र से वरदान पाकर यह अनेक यज्ञों के फल से सशरीर स्वर्ग का अधिकारी हुआ। इसी राजा सत्यव्रत के यहां सत्यवादी हरिश्चन्द्र ने जन्म लिया। हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित के हरित, के धुन्धहारी हुए। इसके यहां विजल और सुकेजा नाम के दो पुत्र हुए। विजल के पुत्र रुचक बड़े पराक्रम और धार्मिक राजा के रूप में विख्यात हुए। रुचक के वृक और वृक से बाहु और बाहु से सगर का जन्म हुआ।
राजा चन्द्रवश की कथा
