इस पर चारों सवार चिल्ला उठे – नहीं-नहीं, हम तुम्हें न जाने देंगे, यह आखिरी मौका है।
मना कहते ही पहले सवार ने बंदूक तान ली और नली धर्मदास की छाती की ओर करके बोला – बस बोलो, क्या मंजूर है?
धर्मदास सिर से पैर तक कांप कर बोला – अगर मैं इस्लाम कबूल कर लूं तो मेरे साथियों को तो कोई तकलीफ न दी जायेगी।
दूसरा – हां, अगर तुम जमानत करो कि वे भी इस्लाम कबूल कर लेंगे। तुम अपनी कहो, क्या चाहते हो? हां या नहीं?
धर्मदास ने जहर का घूंट पीकर कहा – मैं खुदा पर ईमान लाता हूं।
पांचों ने एक स्वर से कहा – ‘अलहमद व लिल्लाह’ और बारी-बारी से धर्मदास को गले लगाया।
श्यामा हृदय को दोनों हाथों से थामे यह दृश्य देख रही थी। वह मन में पछता रही थी कि मैंने क्यों इन्हें पानी लाने भेजा! अगर मालूम होता कि विधि यों धोखा देगा, तो मैं प्यासी मर जाती, पर इन्हें न जाने देती। श्यामा से कुछ दूर खजांचन्द भी खड़ा था। श्यामा ने उसकी ओर क्षुब्ध नेत्रों से देखकर कहा – अब इनकी जान बचती नहीं मालूम होती।
खजांचन्द – बंदूक भी हाथ से छूट पड़ी है।
श्यामा – न जाने क्या बातें हो रही हैं। अरे गजब! दुष्ट ने उनकी ओर बंदूक तानी है।
खजांचन्द – जरा और समीप आ जायें, तो मैं बंदूक चलाऊं, इतनी दूर की मार इसमें नहीं है।
श्यामा – अरे! देखो, वे सब धर्मदास को गले लगा रहे हैं। यह माजरा क्या है?
खजांचन्द – कुछ समझ में नहीं आता।
श्यामा – कहीं इसने कलमा तो नहीं पढ़ लिया?
खजांचन्द – नहीं, ऐसा क्या होगा, धर्मदास से मुझे ऐसी आशा नहीं है।
श्यामा – मैं समझ गई। ठीक यही बात है। बंदूक चलाओ।
धर्मदास – बीच में है। कहीं उन्हें न लग जाय।
श्यामा – कोई हर्ज नहीं। मैं चाहती हूं पहला निशाना धर्मदास ही पर पड़े। कायर!निर्लज्ज प्राणों के लिए धर्म त्याग किया। ऐसी बेहयाई की जिंदगी से मर जाना कहीं अच्छा है। क्या सोचते हो? क्या तुम्हारा भी हाथ-पांव फूल गया? लाओ, बंदूक मुझे दे दो। मैं इस कायर को अपने हाथों से मारूंगी।
खजांचन्द – मुझे तो विश्वास नहीं होता कि धर्मदास…
श्यामा – तुम्हें कभी विश्वास न आएगा। लाओ, बंदूक मुझे दो। खड़े ताकते हो! क्या जब वे सिर पर आ जायेंगे, तब बन्दूक चलाओगे क्या तुम्हें भी यह मंजूर है कि मुसलमान होकर जान बचाओ? अच्छी बात है, जाओ। श्यामा अपनी रक्षा आप कर सकती है, मगर उसे अब मुंह न दिखाना।
खजांचन्द ने बंदूक चलाई। एक सवार की पगड़ी को उड़ाती हुई निकल गई। जिहादियों ने फिर ‘अल्लाहो-अकबर!’ की हांक लगाई। दूसरी गोली चली और घोड़े की छाती पर बैठी। घोड़ा वहीं गिर पड़ा! जिहादियों ने फिर ‘अल्लाह-अकबर!’ की सदा लगाई और आगे बढ़े, तीसरी गोली आई। एक पठान लेट गया पर इसके पहले कि चौथी गोली छूटे, पठान खजांचन्द के सिर पर पहुंच गए और बंदूक उसके हाथ से छीन ली।
एक सवार ने खजांचन्द की ओर बंदूक तानकर कहा – उड़ा दूं सिर मरदूद का? इससे खून का बदला लेना है।
दूसरे सवार ने, जो इनका सरदार मालूम होता था, कहा – नहीं-नहीं, यह दिलेर आदमी है। खजांचन्द तुम्हारे ऊपर दया, खून और कुफ्र, ये तीनों इल्जाम हैं और तुम्हें कत्ल कर देना ऐन सवाल है, लेकिन हम तुम्हें एक मौका और देते हैं। अगर तुम अब भी खुदा और रसूल पर ईमान लाओ, तो हम तुम्हें सीने से लगाने को तैयार हैं। इसके सिवा तुम्हारे गुनाहों का और कोई कफारा (प्रायश्चित) नहीं है। यह हमारा आखिरी फैसला है। बोलो, क्या मंजूर है।
चारों पठानों ने कमर से तलवारें निकाली, और उन्हें खजांचन्द के सिर पर तान दिया, मानो नहीं का शब्द मुंह से निकलते ही चारों तलवारें उसकी गर्दन पर चल जाएंगी।
खजांचन्द का मुख मंडल विलक्षण तेज से आलोकित हो उठा। उसकी दोनों आंखें स्वर्गीय ज्योति से चमकने लगीं। दृढ़ता से बोला – तुम एक हिन्दू से यह प्रश्न कर रहो हो? क्या तुम समझते हो कि जान के खौफ से वह अपना ईमान बेच डालेगा? हिंदू को अपने ईश्वर तक पहुंचने के लिए किसी नवी या वली या पैगम्बर की जरूरत नहीं।
चारों पठानों ने कहा – काफिर! काफिर!
खजांचन्द – अगर तुम मुझे काफिर समझे हो तो समझो। मैं अपने को तुमसे ज्यादा खुदा-परस्त समझता हूं। मैं उस धर्म को मानता हूं जिसकी बुनियाद अक्ल पर है। आदमी में अक्ल ही खुदा का नूर (प्रकाश) है और हमारा ईमान हमारी अक्ल –
चारों पठानों के मुंह से निकला ‘काफिर, काफिर’ और चारों तलवारें एक साथ खजांचन्द की गर्दन पर गिर पड़ी। लाश जमीन पर फड़कने लगी। धर्मदास सिर झुकाए खड़ा रहा। वह दिल में खुश था कि अब खजांचन्द की सारी सम्पत्ति उसके हाथ लगेगी और वह श्यामा के साथ सुख से रहेगा, पर विधाता को कुछ और ही मंजूर था। श्यामा अब तक मर्माहत-सी खड़ी यह दृश्य देख रही थी। ज्यों ही खजांचन्द की लाश जमीन पर गिरी, वह झपटकर लाश के पास आयी और उसे गोद में लेकर आंचल से रक्त-प्रवाह को रोकने की चेष्टा करने लगी। उसके सारे कपड़े खून से तर हो गए। उसने बड़ी सुंदर बेल-बूटे वाली साड़ियां पहनी थी, पर इस रक्त रंजित साड़ी की शोभा अतुलनीय थी। बेल-बूटों वाली साड़ियां रूप की शोभा बढ़ाती थी, यह रक्त-रंजित साड़ी आत्मा की छवि दिखा रही थी।
ऐसा जान पड़ा मानो, खजांचन्द की बुझती आंखें एक अलौकिक ज्योति से प्रकाशमान हो गई है। उन नेत्रों में कितना संतोष, कितनी तृप्ति, कितनी उत्कंठा भरी हुई थी। जीवन में जिसने प्रेम की भिक्षा भी न पाई, वह मरने पर उत्सर्ग जैसे स्वर्गीय रत्न का स्वामी बना हुआ था।
धर्मदास ने श्यामा का हाथ पकड़कर कहा – श्यामा, होश में आओ, तुम्हारे सारे कपड़े खून से तर हो गए हैं। अब रोने से क्या हासिल होगा? ये लोग हमारे मित्र हैं, हमें कोई कष्ट न देंगे। हम फिर अपने घर चलेंगे और जीवन के सुख भोगेंगे।
श्यामा ने तिरस्कार-पूर्ण नेत्रों से देखकर कहा – तुम्हें अपना घर बहुत प्यारा है, तो जाओ। मेरी चिंता मत करो, मैं अब न जाऊंगी। हां, अगर अब भी मुझसे कुछ प्रेम हो, तो इन लोगों की इन्हीं तलवारों से मेरा भी अंत करा दो।
धर्मदास करुणा-कातर स्वर में बोला – श्यामा, यह तुम क्या कहती हो, तुम भूल गई कि हमसे-तुमसे क्या बातें हुई थीं? मुझे खुद खजांचन्द के मारे जाने का शोक है, पर भावी को कौन टाल सकता है?
श्यामा – अगर वह भावी थी, तो यह भी भावी है कि मैं अपना अधम जीवन उस पवित्र आत्मा के शोक में काटूं, जिसका मैंने सदैव निरादर किया। यह कहते-कहते श्यामा का शोकोद्गार, जो अब तक क्रोध और घृणा के नीचे दबा हुआ था, उबल पड़ा और खजांचन्द के निस्पंद हाथों को अपने गले में डालकर रोने लगी।
चारों पठान यह अलौकिक अनुराग और आत्मसमर्पण देखकर करुणार्द्र हो गए। सरदार ने धर्मदास से कहा – तुम इस पाकीजा खास से कहो, हमारे साथ चले। हमारी जाति से इसे कोई तकलीफ न होगी। हम इसकी दिल से इज्जत करेंगे।
धर्मदास के हृदय में ईर्ष्या की आग धधक रही थी। वह रमणी, जिसे वह अपनी समझे बैठा था, इस वक्त उसका मुंह भी नहीं देखना चाहती थी। बोला – श्यामा, तुम चाहे इस लाश पर आंसुओं की नदी बहा दो, पर यह जिंदा न होगी। यहां से चलने की तैयारी करो। मैं साथ के और लोगों को भी जाकर समझाता हूं। खान लोग हमारी रक्षा का जिम्मा ले रहे हैं। हमारी जायदाद, जमीन, दौलत सब हमको मिल जाएगी। खजांचन्द की दौलत के भी हमीं मालिक होंगे। अब देर न करो। रोने-धोने से अब कुछ हासिल नहीं।
श्यामा ने धर्मदास को आग्नेय नेत्रों से देखकर कहा – और इस वापसी की कीमत क्या देनी होगी? वहीं, जो तुमने दी है?
धर्मदास यह व्यंग्य न समझ सका। बोला – मैंने तो कोई कीमत नहीं दी। मेरे पास था ही क्या?
श्यामा – ऐसा न कहो। तुम्हारे पास वह खजाना था, जो तुम्हें आज कई लाख वर्ष हुए, ऋषियों ने प्रदान किया था, जिसकी रक्षा रघु और मनु, राम और कृष्ण, बुद्ध और शंकर, शिवजी और गोविंद सिंह ने की थी। उस अमूल्य भंडार को आज तुमने तुच्छ प्राणों के लिए खो दिया। इन पांवों पर लोटना तुम्हें मुबारक हो। तुम शौक से जाओ। जिन तलवारों ने वीर खजांचन्द के जीवन का अन्त किया, उन्होंने मेरे प्रेम का भी फैसला कर दिया। जीवन में इस वीरात्मा का मैंने जो निरादर और अपमान किया, इसके साथ जो उदासीनता दिखलाई, उसका अब मरने के बाद प्रायश्चित्त करूंगी। यह धर्म पर मरने वाला वीर था, धर्म को बेचने वाला कायर नहीं! अगर तुममें अब भी कुछ शर्म और हया है, तो इसका क्रिया कर्म करने में मेरी मदद करो और यदि तुम्हारे स्वामियों को यह भी पसंद न हो, तो रहने दो, मैं सब कुछ कर लूंगी।
पठानों के हृदय दर्द से तड़प उठे। धर्मान्धता का प्रकोप शांत हो गया। देखते-देखते वहां लकड़ियों का ढेर लग गया। धर्मदास ग्लानि से सिर झुकाए बैठा था और चारों पठान लकड़ियाँ काट रहे थे। चिता तैयार हुई और जिन निर्दय हाथों ने खजांचन्द की जान ली थी, उन्हीं ने उसके शव को चिता पर रखा। ज्वाला प्रचण्ड हुई। अग्निदेव अपने अग्निमुख से उस धर्मवीर का यश गा रहे थे।
पठानों ने खजांचन्द की सारी जमा-सम्पत्ति लाकर श्यामा को दे दी। श्यामा ने वहीं पर एक छोटा–सा मकान बनवाया और वीर खजांचन्द की उपासना में जीवन के दिन काटने लगी। उसकी वृद्धा बुआ तो उसके साथ रह गई, और सब लोग पठानों के साथ लौट गए, क्योंकि अब मुसलमान होने की शर्त न थी। खजांचन्द के बलिदान ने धर्म के भूत को परास्त कर दिया। मगर धर्मदास को पठानों ने इस्लाम की दीक्षा लेने पर मजबूर किया। एक दिन नियत किया गया। मस्जिद में मुल्लाओं का मेला लगा, और लोग धर्मदास को उसके घर से बुलाने आये, पर उसका वहां पता न था। चारों तरफ तलाश हुई। कहीं निशान न मिला।
साल-भर गुजर गया। संध्या का समय था। श्यामा अपने झोंपड़े के सामने बैठी भविष्य की मधुर कल्पनाओं में मग्न थी। अतीत उसके लिए दुःख से भरा हुआ था। वर्तमान केवल एक निराशामय स्वप्न था। सारी अभिलाषाएं भविष्य पर अवलम्बित थी। और भविष्य भी वह, जिसका इस जीवन से कोई संबंध न था। आकाश पर लालिमा छाई हुई थी। सामने की पर्वतमाला स्वर्णमयी शांति के आवरण से ढकी हुई थी। वृक्षों की कांपती हुई पत्तियों से सरसराहट की आवाज निकल रही थी, मानो कोई वियोगी आत्मा पत्तियों पर बैठी हुई सिसकियां भर रही हो।
उसी वक्त एक भिखारी फटे हुए कपड़े पहने झोपड़ी के सामने खड़ा हो गया। कुत्ता जोर से भौंक उठा। श्यामा ने निकलकर देखा और चिल्ला उठी – धर्मदास?
