zihaad by munshi premchand
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धर्मदास ने वहीं जमीन पर बैठते हुए कहा – हां श्यामा, मैं अभागा धर्मदास ही हूं। साल-भर से मारा-मारा फिर रहा हूं। मुझे खोज निकालने के लिए इनाम रख दिया गया है। सारा प्रान्त मेरे पीछे पड़ा हुआ है। इस जीवन से अब ऊब उठा हूं पर मौत भी नहीं आती।

धर्मदास एक क्षण के लिए चुप हो गया। फिर बोला – क्यों श्यामा, क्या अभी तुम्हारा हृदय मेरी तरफ से साफ नहीं हुआ। तुमने मेरा अपराध क्षमा नहीं किया?

श्यामा ने उदासीन भाव से कहा – मैं तुम्हारा मतलब नहीं समझी।

मैं अब भी हिंदू हूं। मैंने इस्लाम नहीं कबूल किया है।

जानती हूं।

यह जानकर भी तुम्हें मुझ पर दया नहीं आती।

श्यामा ने कठोर नेत्रों से देखा और उत्तेजित होकर बोली – तुम्हें अपने मुंह से ऐसी बातें निकालते शर्म नहीं आती। मैं उस धर्मवीर की ब्याहता हूं जिसने हिंदू-जाति का मुख उज्ज्वल किया। तुम समझते हो कि वह मर गया! यह तुम्हारा भ्रम है। वह अमर है। मैं इस समय भी उसे स्वर्ग में बैठा देख रही हूं। तुमने हिंदू-जाति को कलंकित किया है। मेरे सामने से दूर हो जाओ।

धर्मदास ने कुछ जवाब न दिया! चुपके से उठा, एक लम्बी सांस ली और एक तरफ चल दिया।

प्रातःकाल श्यामा पानी भरने जा रही थी, तब उसने रास्ते में एक लाश पड़ी हुई देखी। दो-चार गिद्ध उस पर मंडरा रहे थे। उसका हृदय धड़कने लगा। समीप जाकर देखा और पहचान गई। यह धर्मदास की लाश थी।