बहुत पुरानी बात है। हिंदुओं का एक काफिला अपने धर्म की रक्षा के लिए पश्चिमोत्तर के पर्वत-प्रवेश से भागा चला आ रहा था! मुद्दतों से उस प्रांत में हिंदू और मुसलमान साथ-साथ रहते चले आये थे। धार्मिक द्वेष का नाम न था। पठानों के जिरगे हमेशा लड़ते रहते थे। उनकी तलवारों पर कभी जंग न लगने पाता था। बात-बात पर उनके दल संगठित हो जाते थे। शासन की कोई व्यवस्था न थी। हर एक जिरगे और कबीले की व्यवस्था अलग थी। आपस के झगड़ों को निपटाने का भी तलवार के सिवा और कोई साधन न था। जान का बदला जान था, खून का बदला खून इस नियम में कोई अपवाद न था। यही उनका धर्म था, यही ईमान, मगर उस भीषण रक्तपात में भी हिंदू परिवार शांति से जीवन व्यतीत करते थे। पर एक महीने से देश की हालत बदल गई है। एक मुल्ला ने न जाने कहां से आकर अनपढ़ धर्मशून्य पठानों में धर्म का भाव जाग्रत कर दिया? उसकी वाणी में कोई ऐसी मोहनी है कि बूढ़े, जवान, स्त्री-पुरुष खिंचे चले आते हैं। वह शेरों की तरह गरज कर कहता है – खुदा ने तुम्हें इसलिए पैदा किया है कि दुनिया को इस्लाम की रोशनी से रोशन कर दो, दुनिया से कुफ्र का निशान मिटा दो। एक काफिर के दिल को इस्लाम के उजाले से रोशन कर देने का सवाब सारी उम्र के रोज़े, नमाज और जकात से कहीं ज्यादा है। जन्नत की हुर्रें तुम्हारी बलाएं लेंगी और फरिश्ते तुम्हारे कदमों की खाक माथे पर रखेंगे, खुदा तुम्हारी पेशानी पर बोसे देगा और सारी जनता यह आवाज सुनकर मजहब के नारों से मतवाली हो जाती है।
उसी धार्मिक उत्तेजना ने कुफ्र और इस्लाम का भेद उत्पन्न कर दिया है। प्रत्येक पठान जन्नत का सुख भोगने के लिए अधीर हो उठा है। उन्हीं हिंदुओं पर, जो सदियों से शांति के साथ रहते थे, हमले होने लगे हैं। कहीं उनके मंदिर ढाए जाते हैं, कहीं उनके देवताओं को गालियां दी जाती हैं। कहीं उन्हें जबरदस्ती इस्लाम की दीक्षा दी जाती है। हिंदू संख्या में कम हैं, असंगठित हैं, बिखरे हुए है, इस नई परिस्थिति के लिए बिलकुल तैयार नहीं। उनके हाथ-पांव फूले हुए हैं, कितने तो अपनी जमा-जत्था छोड़कर भाग खड़े हुए हैं, कुछ इस आंधी के शांत हो जाने का अवसर देख रहे हैं। यह काफिला भी उन्हीं भागने वालों का था। दोपहर का समय था। आसमान से आग बरस रही थी। पहाड़ों से ज्वाला-सी निकल रही थी। वृक्ष का कहीं नाम न था। ये लोग राज-पथ से हटे हुए, पेचीदा औघट रास्तों से चले आ रहे थे। पग-पग पर पकड़ लिए जाने का खटका लगा हुआ था। यहां तक कि भूख, प्यास और ताप से विकल होकर अंत को लोग एक उभरी हुई शिला की छह में विश्राम करने लगे। सहसा कुछ दूर पर एक कुआं नजर आया। वहीं डेरे डाल दिए। भय लगा हुआ था कि जिहादियों का कोई दल पीछे से न आ रहा हो। दो युवकों ने बंदूक भरकर कंधे पर रखी और चारों तरफ गश्त करने लगे। बूढ़े कम्बल बिछाकर कमर सीधी करने लगे। स्त्रियां बालकों को गोद से उतारकर माथे का पसीना पोंछकर और बिखरे हुए केशों को संभालने लगी। सभी के चेहरे मुरझाए थे। सभी चिंता और भय से त्रस्त हो रहे थे यहां तक कि बच्चे जोर से न रोते थे।
दोनों युवकों में एक लम्बा, पतला, रूपवान है। उसकी आंखों से अभिमान की रेखाएँ-सी निकल रही हैं, मानो वह अपने सामने किसी की हकीकत नहीं समझता, मानो उसकी एक-एक गश्त पर आकाश से देवता जयघोष कर रहे हैं। दूसरा कद का दुबला-पतला, रूपहीन-सा आदमी है, जिसके चेहरे से दीनता झलक रही है, मानो उसके लिए संसार में कोई आशा नहीं, मानो वह दीपक की भांति रो-रोकर जीवन व्यतीत करने ही के लिए बनाया गया है। उसका नाम धर्मदास है, इसका खजांचन्द।
खजांचन्द ने बंदूक को जमीन पर टिका कर एक चट्टान पर बैठते हुए कहा – तुमने अपने लिए क्या सोचा? कोई लाख-सवा लाख की सम्पत्ति रही होगी तुम्हारी?
खजांचन्द ने उदासीन भाव से उत्तर दिया – लाख-सवा लाख की तो नहीं, हां पचास-साठ हजार तो नकद ही थे।
तो अब क्या करोगे।
जो कुछ सिर पर आएगा, झेलूंगा। रावलपिंडी में दो-चार सम्बन्धी हैं, शायद कुछ मदद करें। तुमने क्या सोचा है?
मुझे क्या गम! अपने दोनों हाथ अपने साथ है। वहां भी इन्हीं का सहारा था, आगे भी इन्हीं का सहारा है।
आज और कुशल से बीत जाये तो फिर कोई भय नहीं।
मैं तो मना रहा हूं कि एकाध शिकार मिल जाये। एक दर्जन भी आ जायें तो भून कर रख दूं।
इतने में चट्टानों के नीचे से एक युवती हाथ में लोटा और डोर लिए निकली और सामने कुंए की ओर चली। प्रभात की सुनहरी, मधुर अरुणिमा मूर्तिमान हो गई थी।
दोनों युवक उसकी ओर बढ़े, लेकिन खजांचन्द तो दो-चार कदम चलकर रुक गया, धर्मदास ने युवती के हाथ से लोटा-डोर ले लिया और खजांचन्द की ओर सगर्व नेत्रों से ताकता हुआ कुएं की ओर चला। खजांचन्द ने फिर बंदूक संभाली और अपनी झेंप मिटाने के लिए आकाश की ओर ताकने लगा। इसी तरह कितनी ही बार धर्मदास के हाथों पराजित हो चुका था। शायद उसे इसका अभ्यास हो गया था। अब इसमें लेश-मात्र भी संदेह न था कि श्यामा का प्रेमपात्र धर्मदास है। खजांचन्द की सारी सम्पत्ति धर्मदास के रूप-वैभव के आगे तुच्छ थी। परोक्ष ही नहीं, प्रत्यक्ष रूप से भी श्यामा कई बार खजांचन्द को हताश कर चुकी थी, पर वह अभागा निराश होकर भी न जाने क्यों उस पर प्राण देता था। तीनों एक ही बस्ती के रहने वाले थे।
श्यामा के आता-पिता पहले ही मर चुके थे। उसकी बुआ ने उसका पालन-पोषण किया था। अब भी वह बुआ ही के साथ रहती थी। उसकी अभिलाषा थी कि खजांचन्द उसका दामाद हो, श्यामा सुख से रहे और उसे भी जीवन के अन्तिम दिनों के लिए कुछ सहारा हो जाये, लेकिन श्यामा धर्मदास पर रीझी हुई थी। उसे क्या खबर थी कि जिस व्यक्ति को वह पैरों से ठुकरा रही है, वही उसका एकमात्र अवलंब है। खजांचन्द ही वृद्धा का मुनीम, खजांची, कारिंदा सब कुछ था और यह जानते हुए भी कि श्यामा उसे जीवन में नहीं मिल सकती। उसके धन का यह उपयोग न होता, तो वह शायद अब तक उसे लुटाकर फकीर हो जाता।
धर्मदास पानी लेकर लौट ही रहा था कि उसे पश्चिम की ओर से कई आदमी घोड़ों पर सवार आते दिखाई दिए। जरा और समीप आने पर मालूम हुआ कि कुल पांच आदमी है। उनकी बंदूक की नालियां धूप में साफ चमक रही थी। धर्मदास पानी लिए हुए दौड़ा कि कहीं रास्ते ही में सवार उसे न पकड़ लें, लेकिन कंधे पर बंदूक और एक हाथ में लोट-डोर लिए वह बहुत तेज न दौड़ सकता था। फासला दो सौ गज से कम न था। रास्ते में पत्थरों के ढेर टूटे-फूटे पड़े हुए थे। भय होता था कि कहीं ठोकर न लग जाये, कहीं पैर न फिसल जायें। इधर सवार प्रतिक्षण समीप होते जाते थे। अरबी घोड़ों से उसका मुकाबला ही क्या, उस पर मंजिलों का धावा हुआ। मुश्किल से पचास कदम गया होगा कि सवार उसके सिर पर आ पहुंचे और तुरन्त उसे घेर लिया। धर्मदास बड़ा साहसी था, पर मृत्यु को सामने खड़ी देखकर उसकी आंखों में अंधेरा छा गया, उसके हाथ से बंदूक छूटकर गिर पड़ी। पांचों उसी के गांव के महसूदी पठान थे। एक पठान ने कहा – उड़ा दो सिर मरदूद का। दगाबाज काफिर।
दूसरा – नहीं-नहीं, ठहरो अगर इस वक्त भी इस्लाम कबूल कर ले, तो हम इसे मुआफ कर सकते हैं। क्यों धर्मदास, तुम्हें इस दगा की क्या सजा दी जाये? हमने तुम्हें रात-भर का वक्त फैसला करने के लिए दिया था। वरना तुम इसी वक्त जहन्नुम पहुंचा दिये जाओगे, हम तुम्हें फिर मौका देते हैं। यह आखिरी मौका है। अगर अब भी इस्लाम न कबूल किया, तो तुम्हें दिन की रोशनी देखनी नसीब न होगी।
धर्मदास ने हिचकिचाते हुए कहा – जिस बात को अक्ल नहीं मानती, उसे कैसे…
पहले सवार ने आवेश में आकर कहा – मजहब का अक्ल से कोई वास्ता नहीं।
तीसरा – कुफ्र है! कुफ्र है!
पहला – उड़ा दो सिर मरदूद का, धुआं इस पार।
दूसरा – ठहरो-ठहरो, मार डालना मुश्किल नहीं, जिला लेना मुश्किल है। तुम्हारे और साथी कहां हैं धर्मदास?
धर्मदास – सब मेरे साथ ही हैं।
दूसरा – कलमे शरीफ की कसम, अगर तुम सब खुदा और उसके रसूल पर ईमान लाओ, तो कोई तुम्हें तेज निगाहों से देख भी न सकेगा।
धर्मदास – आप लोग सोचने के लिए और कुछ मौका न देंगे?
