vajrapaat by munshi premchand
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मन्त्री सोचता हुआ चला कि यह समस्या क्यों कर हल करूँ? बादशाह के दीवानखाने में पहुँचा तो देखा, बादशाह उसी हीरे को हाथ में लिए चिन्ता में मग्न बैठे हुए हैं।

बादशाह को इस वक्त इसी हीरे की फिक्र थी। लुटे हुए पथिक की भांति वह अपनी यह लकड़ी हाथ से न देना चाहता था। वह जानता था कि नादिर को इस हीरे की खबर है। वह यह भी जानता था कि खजाने में इसे न पाकर उसके क्रोध की सीमा न रहेगी। लेकिन सब कुछ जानते हुए भी, वह हीरे को हाथ से न जाने देना चाहता था। अंत में उसने निश्चय किया, मैं इसे न दूँगा, चाहे मेरी जान ही पर क्यों न बन जाये। रोगी की इस अन्तिम साँस को न निकलने दूँगा। हाय, कहां छिपाऊं इतना बड़ा मकान है कि उसमें एक नगर समा सकता है, पर इस नन्हीं-सी चीज के लिए कहीं जगह नहीं, जैसे किसी सुरक्षित स्थान में रखकर क्यों न इसे किसी ऐसी जगह रख दूँ जहाँ किसी का खयाल ही न पहुँचे। कौन अनुभव कर सकता है कि मैंने हीरे को अपनी सुराही में रखा होगा? अच्छा, हुक्के की फर्शी में क्यों न डाल दूँ? फरिश्तों को खबर भी न होगी।

यह निश्चय करके उसने हीरे को फर्शी में डाल दिया। पर तुरन्त ही शंका हुई कि ऐसे बहुमूल्य रत्न को इस जगह रखना उचित नहीं। कौन जाने, जालिम को मेरी यह गुड़गुड़ी ही पसंद आ जाए। उसने तुरन्त गुड़गुड़ी का पानी तश्तरी में उड़ेल दिया और हीरे को निकाल लिया। पानी की दुर्गंध उड़ी पर इतनी हिम्मत न पड़ती थी कि खिदमतगार बुलाकर पानी फिकवा दे। भय होता था, कहीं वह ताड़ न जाए।

वह इसी दुविधा में पड़ा हुआ था कि मन्त्री ने आकर बंदगीं की। बादशाह को उस पर पूरा विश्वास था, किंतु उसे अपनी क्षुद्रता पर इतनी लज्जा आती कि वह इस रहस्य को उस पर भी प्रकट कर न सका। गुमसुम होकर उसकी ओर ताकने लगा।

मन्त्री ने बात छेड़ी- आज खजाने में हीरा न मिला, तो नादिर बहुत झल्लाया। कहने लगा, तुमने मेरे साथ दगा की है, मैं शहर लुटवा लूँगा, कत्लेआम कर दूँगा, सारे शहर को खाक सियाह कर डालूँगा। मैंने कहा, जनाबे-आली को अख्तियार है, जो चाहें करें। पर हमने खजाने की सब कुंजियाँ आपके सिपहसालार को दे दी हैं। वह कुछ साफ-साफ तो कहता न था, बस कनायों में बातें कर रहा था और भूखे गीदड़ की तरह इधर-उधर बौखलाया फिरता था कि किसे पाए और नोंच खाए।

मुहम्मदशाह- मुझे तो उसके सामने बैठते हुए ऐसा खौफ मालूम होता है, गोया किसी शेर का सामना हो, जालिम की आंखें कितनी तुंद और गजबनाक हैं। आदमी क्या है, शैतान है। खैर, मैं भी उधेड़बुन में पड़ा हुआ हूँ कि इसे क्यों कर छिपाऊँ। सलतनत जाय गम नहीं पर इस हीरे को उस वक्त तक न दूंगा, जब तक कोई मेरी गर्दन पर सवार होकर इसे छीन न ले।

वजीर-खुदा न करे कि हुजूर के दुश्मनों को यह जिल्लत करनी पड़े। मैं एक तरकीब बतलाऊँ। हुजूर इसे अपने अमामे (पगड़ी) में रख लें। वहाँ तक उसके रिश्तों का भी खयाल न पहुँचेगा।

मुहम्मदशाह- (उछलकर) वल्लाह, तुमने खूब सोचा, वाकई तुम्हें खूब सूझी। हजरत इधर-उधर टटोलने के बाद अपना-सा मुँह लेकर रह जाएंगे। मेरे अमामे को कौन देखेगा? इसी से तो मैंने तुम्हें लुकमान का खिताब दिया है। बस, यही तय रहा। कहीं तुम जरा देर पहले आ जाते, तो मुझे इतना दर्द-सर न उठाना पड़ता।

दूसरे दिन दोनों बादशाहों में सुलह हो आई। वजीर नादिरशाह के कदमों पर गिर पड़ा और अर्ज की-अब इस डूबती हुई किश्ती को आप ही पार लगा सकते हैं, वरना इसका अल्लाह ही वली है! हिन्दुओं ने सिर उठाना शुरू कर दिया है। मराठे, राजपूत, सिख, सभी अपनी-अपनी ताकतों को मुकम्मिल कर रहे हैं। जिस दिन उनमें मेल-मिलाप हुआ, उसी दिन यह नाव भँवर में पड़ जाएगी और दो-चार चक्कर खाकर हमेशा के लिए नीचे बैठ जाएगी।

नादिरशाह को ईरान से चले अर्से हो गया था। वहाँ से रोजाना बागियों की बगावत की खबरें आ रही थीं। नादिरशाह जल्द वहाँ लौट जाना चाहता था। इस समय उसे दिल्ली में अपनी सल्लनत कायम करने का अवकाश न था, सुलह पर राजी हो गया। संधिपत्र पर दोनों बादशाहों ने हस्ताक्षर कर दिये।

दोनों बादशाहों ने एक ही साथ नमाज पढ़ी, एक ही दस्तरख्वान पर खाना खाया, एक ही हुक्का पिया और एक दूसरे से गले मिलकर अपने-अपने स्थान को चले।

मुहम्मदशाह खुश था। राज्य बच जाने की उतनी खुशी न थी, जितनी हीरे के बच जाने की।

मगर नादिरशाह हीरा न पाकर भी दुःखी न था। सबसे हँस-हँसकर बातें करता था, मानो शील और विनय का साक्षात अवतार हो।

प्रातःकाल है, दिल्ली में नौबतें बज रही हैं। खुशी की महफ़िल सजायी जा रही हैं। तीन दिन पहले यहाँ रक्त की नदी बही थी। आज आनन्द की लहरें उठ उठी हैं। आज नादिरशाह दिल्ली से रुख़सत हो रहा है।

अशर्फियों से लदे हुए ऊंटों की कतार शाही महल के सामने रवाना होने को तैयार खड़ी है। बहुमूल्य वस्तुएँ गाड़ियों में लदी हुई हैं। दोनों तरफ की फौजें गले मिल रही हैं। अभी कल दोनों पक्ष एक दूसरे के खून के प्यासे थे, आज भाई-भाई हो रहे हैं।

नादिरशाह तख्त पर बैठा हुआ है। मुहम्मदशाह भी उसी तख्त पर उसकी बगल में बैठे हुए हैं। यहाँ भी परस्पर प्रेम का व्यवहार है। नादिरशाह ने मुस्कुराकर कहा- खुदा करे, यह सुलह हमेशा कायम रहे और लोगों के दिलों से इन खूनी दिनों की याद मिट जाए।

मुहम्मदशाह- मेरी तरफ से ऐसी कोई बात न होगी, जो सुलह को खतरे में डाले। मैं खुदा से यह दोस्ती कायम रखने के लिए हमेशा दुआ करता रहूँगा।

नादिरशाह- सुलह की जितनी शर्तें थी, सब पूरी हो चुकी, सिर्फ एक बात बाकी है। मेरे यहाँ दस्तूर है कि सुलह के वक्त अमामे बदल दिये जाते हैं। इसके बगैर सुलह की कार्रवाई पूरी नहीं होती। आइए, हम लोग भी अपने-अपने अमामे बदल लें। लीजिए, यह मेरा अमामा हाजिर है।

यह कहकर नादिर ने अपना अमामा उतारकर मुहम्मदशाह की तरफ बढ़ाया। बादशाह के हाथों के तोते उड़ गए। समझ गया, मुझसे दगा की गई। दोनों तरफ के शूर-सामंत सामने खड़े थे। न कुछ कहते बनता था, न सुनते। बचने का कोई उपाय न था और न कोई उपाय सोच निकालने का अवसर ही। कोई जवाब न सूझा। इनकार की गुंजाइश न थी। मन मसोस कर रह गया। चुपके, से अमामा सिर से उतारा और नादिरशाह की तरफ बढ़ा दिया। हाथ काँप रहे थे, आँखों में क्रोध और विषाद के आंसू भरे हुए थे। मुख पर हलकी-सी मुस्कराहट झलक रही थी-वह मुस्कराहट, जो अश्रुपात से भी कहीं अधिक करुण और व्यथापूर्ण होती है। कदाचित् अपने प्राण निकालकर देने में भी उसे इससे अधिक पीड़ा न होती।