‘अरे, तो मैं मना थोड़े ही करती हूँ। मुझे क्या गरज पड़ी है कि मुफ्त में अपने ऊपर पाप लूँ, कुछ मेरे सिर तो जायेगी नहीं।’
‘अब आपको विश्वास ही न आये तो कोई क्या करे?’
‘मुझे पागल समझती हो, यह हवा पी-पीकर ऐसी हो रही है?’
‘भगवान जाने अम्मा मुझे तो आप ही आश्चर्य होता है।’
बहू ने बहुत निर्दोषिता जताई, किन्तु वृद्धा सास को विश्वास न आया। उसने समझा, यह शंका को विरुद्ध समझती है, मानो मुझे इस बच्ची से कोई बैर है। उसके मन में यह भाव अंकुरित होने लगा कि इसे कुछ हो जाये, तब यह समझे कि मैं झूठ नहीं कहती थी। यह जिन प्राणियों को अपने प्राणों से भी प्रिय समझती थी, उन्हीं लोगों की अमंगल कामना करने लगी, केवल इसलिए कि मेरी शंकाएँ सत्य हो जायें। वह यह तो नहीं चाहती थी कि कोई मर जाये, पर इतना अवश्य चाहती थी कि किसी बहाने से मैं चेता दूँ कि देखा, तुमने मेरा कहा न माना, यह उसी का फल है।
उधर सास की ओर से ज्यों-ज्यों यह द्वेष-भाव प्रकट होता था, बहू का कन्या के प्रति स्नेह बढ़ता था। ईश्वर से मनाती रहती थी कि किसी भांति एक साल कुशल से कट जाता तो इनसे पूछती। कुछ लड़की का भोला-भाला चेहरा, कुछ अपने पति का प्रेम-वात्सल्य देखकर भी उसे प्रोत्साहन मिलता था। विचित्र दशा हो रही थी, न दिल खोलकर प्यार ही कर सकती थी, न सम्पूर्ण रीति से निर्दय होते ही बनता था। न हंसते बनता था, न रोते।
इस भांति दो महीने और गुजर गए और कोई अनिष्ट न हुआ। तब तो वृद्धा सारा के पेट में चूहे दौड़ने लगे। बहू को दो-चार दिन ज्वर भी नहीं आ जाता कि मेरी शंका की मर्यादा रह जाये, पुत्र भी किसी दिन पैर-गाड़ी पर से नहीं गिर पड़ता, न बहू के मैके ही से किसी के स्वर्गवास की सुनावनी आती है। एक दिन दामोदर दत्त ने खुले तौर पर कह ही दिया कि अम्मा, यह सब ढकोसला है, तेंतर लड़कियाँ क्या दुनिया में होती ही नहीं, तो सबके माँ-बाप मर ही जाते हैं? अन्त में उसने अपनी शंकाओं को यथार्थ सिद्ध करने की एक तरकीब सोच निकाली। एक दिन दामोदर दत्त स्कूल से आये, तो देखा कि अम्मा जी खाट पर अचेत पड़ी हुई हैं, स्त्री अँगीठी में आग रखे उनकी छाती सेंक रही है और कोठरी के द्वार और खिड़कियाँ बन्द हैं। घबराकर कहा- अम्मा, क्या हुआ है?
स्त्री- दोपहर ही से कलेजे में एक शूल उठ रहा है, बेचारी बहुत तड़प रही है।
दामोदर- मैं जाकर डॉक्टर साहब को बुला लाऊँ? देर करने से शायद रोग बढ़ जाये। अम्मा जी, कैसी तबीयत है?
माता ने आँखें खोली और कराहते हुए बोली- बेटा, तुम आ गये? अब न बचूँगी, हाय भगवान, अब न बचूंगी। जैसे कोई कलेजे में बरछी चुभा रहा हो। ऐसी पीड़ा कभी न हुई थी। इतनी उम्र बीत गई, ऐसी पीड़ा नहीं हुई।
स्त्री- यह कलमुंही छोकरी न जाने किस मनहूस घड़ी में पैदा हुई।
सास- बेटा, सब भगवान करते हैं, वह बेचारी तो क्या जाने! देखो, मैं मर जाऊँ तो उसे कष्ट मत देना। अच्छा हुआ, मेरे सिर आयी। किसी के सिर तो जाती ही, मेरे ही सिर सही। हाय भगवान, अब न बचूंगी।
दामोदर- जाकर डॉक्टर बुला लाऊँ? अभी लौटा आता हूँ।
माताजी को केवल अपनी बात की मर्यादा निभानी थी, रुपये न खर्च कराने थे। बोली- नहीं बेटा, डॉक्टर के पास जाकर क्या करोगे? अरे, वह कोई ईश्वर है? डॉक्टर क्या अमृत पिला देगा, दस-बीस वह भी ले जायेगा। डॉक्टर- वैद्य से कुछ न होगा। बेटा, तुम कपड़े उतारो, मेरे पास बैठकर भागवत पढ़ो। अब न बचूँगी, हाय राम!
दामोदर- तेंतर बुरी चीज है। मैं समझता था कि ढकोसला-ही-ढकोसला है।
स्त्री- इसी से मैं उसे मुँह नहीं लगाती थी।
माता- बेटा, बच्चों को आराम से रखना, भगवान तुम लोगों को सुखी रखे। अच्छा हुआ, मेरे ही सिर गयी, तुम लोगों के सामने मेरा परलोक हो जायेगा। कहीं किसी दूसरे के सिर जाती, तो क्या होता राम। भगवान ने मेरी विनती सुन ली। हाथ! हाय!
दामोदर दत्त को निश्चय हो गया कि अब अम्मा न बचेंगी। बड़ा दुःख हुआ। उनके मन की बात होती, तो वह माँ के बदले तेंतर को न स्वीकार करते। जिस जननी ने जन्म दिया, नाना प्रकार के कष्ट झेलकर उनका पालन-पोषण किया, अकाल वैधव्य को प्राप्त होकर भी उनकी शिक्षा का प्रबंध किया, उसके सामने एक दुधमुंही बच्ची का क्या मूल्य था, जिसके हाथ का एक गिलास पानी भी वह न जानते थे। शोकातुर हो कपड़े उतारे और माँ के सिरहाने बैठकर भागवत की कथा सुनाने लगे।
रात को बहू भोजन बनाने चली, तो सास से बोली- अम्मा जी, तुम्हारे लिए थोड़ा-सा साबूदाना छोड़ दूँ?
माता ने व्यंग्य करके कहा- बेटी, अन्न बिना मारो, भला साबूदाना मुझसे खाया जायेगा, जाओ, थोड़ी पूरियाँ छान लो। पड़े-पड़े जो कुछ इच्छा होगी, खा लूँगी। कचौरियाँ भी बना लेना। मरती हूँ तो भोजन को तरस-तरस क्यों मरूँ? थोड़ी मलाई भी मँगवा लेना, चौक की हो। फिर थोड़ी खाने आऊंगी बेटी! थोड़े- से केले मँगवा लेना, कलेजे के दर्द में केले खाने से आराम होता है।
भोजन के समय पीड़ा शान्त हो गई, लेकिन आधे घण्टे बाद फिर जोर से होने लगी। आधी रात के समय कहीं जाकर उनकी आँख लगी। एक सप्ताह तक उनकी यही दशा रही, दिन-भर पड़ी कराह करती, बस भोजन के समय जरा वेदना कम हो जाती। दामोदर दत्त सिरहाने बैठे पंखा झलते और मातृ-वियोग के आगत शोक से रोते। घर की महरी ने मुहल्ले-भर में यह खबर फैली दी। पड़ोसिने देखने आयीं और सारा इल्जाम उसी बालिका के सिर गया।
एक ने कहा- यह तो कहो, बड़ी कुशल हुई कि बुढ़िया के सिर गई, नहीं तो तेंतर माँ-बाप, दो में से एक को लेकर तभी शान्त होती है। दैव न करे कि किसी के घर तेंतर का जन्म हो।
दूसरी बोली- मेरे तो तेंतर का नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। भगवान बाँझ रखे, पर तेंतर न दे।
एक सप्ताह के बाद वृद्धा का कष्ट निवारण हुआ, मरने में कोई कसर न थी, यह तो कहो, पुरुखों का पुण्य-प्रताप था। ब्राह्मणों को गो-दान दिया गया। दुर्गा- पाठ हुआ, तब कहीं जाके संकट कटा।
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