taavan by munshi premchand
taavan by munshi premchand

छकौड़ी बोला- ‘उस वक्त मुझे इसकी याद न थी।’

‘यह प्रधानजी ने कहा है, या तुम अपनी तरफ से मिला रहे हो।’

‘नहीं, उन्होंने खुद कहा, मैं अपनी तरफ से क्यों मिलाता?’

‘बात तो उन्होंने ठीक ही कही।’

‘हम तो मिट जायेंगे।’

‘हम तो यों ही मिटे हुए हैं।’

‘रुपये कहां से आवेंगे?’ भोजन के लिए तो ठिकाना ही नहीं, दण्ड कहां से दें?’

‘और कुछ नहीं है, घर तो है। इसे रेहन रख दो और अब विलायती कपड़े भूलकर भी न बेचना। सड़ जाये कोई परवाह नहीं। तुमने सील तोड़कर यह आफत सिर ली। मेरी दवा-दारू की चिन्ता न करो। ईश्वर की जो इच्छा होगी, वही होगा। बाल-बच्चे भूखों मरते हैं, मरने दो। देश में करोड़ों आदमी ऐसे हैं, जिनकी दशा हमारी दशा से भी खराब है। हम न रहेंगे, देश तो सुखी होगा।’

छकौड़ी जानता था, अम्बा जो कहती है, वह करके रहती है, कोई उज्र नहीं सुनती। वह सिर झुकाए, अम्बा पर झुँझलाता हुआ घर से निकलकर महाजन के घर की ओर चला।