taavan by munshi premchand
taavan by munshi premchand

‘तो खड़े-खड़े ये गालियाँ सुनते रहोगे?’

‘तुम्हारे कहने से कहो, चला जाऊं, मगर वहां ठिठोली के सिवा और कुछ न होगा।’

‘हां, मेरे कहने से जाओ। जब कोई न सुनेगा, तो हम भी कोई और राह निकालेंगे।’

छकौड़ी ने मुँह लटकाए कुर्ता पहना और इस तरह कांग्रेस-दफ्तर चला, जैसे कोई मरणासन्न रोगी को देखने के लिए वैद्य को बुलाने जाता है।

कांग्रेस-कमेटी के प्रधान ने परिचय के बाद पूछा- ‘तुम्हारे ही ऊपर तो बायकाट- कमेटी ने 101 रु. का तावान लगाया है?’

‘जी हां।’

‘तो रुपया कब दोगे?’

‘मुझमें तावान देने की सामर्थ्य नहीं है। आपसे मैं सत्य कहता हूँ मेरे घर में दो दिन से चूहा नहीं जला। घर की जो जमा-पूंजी थी, वह सब बेचकर खा गया। अब आपने तावान लगा दिया, दुकान बन्द करनी पड़ी। घर पर कुछ माल बेचने लगा। वहाँ स्यापा बैठ गया। अगर आपकी यही इच्छा हो कि हम सब दाने बगैर मर जायें तो मार डालिए और मुझे कुछ नहीं कहना है।’

छकौड़ी जो बात कहने घर से चला था, वह उसके मुँह से न निकली। उसने देख लिया, यहाँ कोई उस पर विचार करने वाला नहीं है।

प्रधानजी ने गम्भीर-भाव से कहा- ‘तावान तो देना ही पड़ेगा। अगर तुम्हें छोड़ दूँ तो इसी तरह और लोग भी करेंगे। फिर विलायती कपड़े की रोक-थाम कैसे होगी?’

‘मैं आपसे जो कह रहा हूँ उस पर आपको विश्वास नहीं आता?’

‘मैं जानता हूँ तुम मालदार आदमी हो।’

‘मेरे घर की तलाशी ले लीजिए।’

‘मैं इन चकमों में नहीं आता।’

छकौड़ी ने उद्दंड होकर कहा- ‘तो यह कहिए कि आप सेवा नहीं कर रहे हैं, गरीबों का खून चूस रहे हैं। पुलिस वाले कानूनी पहलू से लेते हैं, आप गैरकानूनी पहलू से लेते हैं। नतीजा एक है। आप भी अपमान करते हैं, वह भी अपमान करते हैं। मैं कसम खा रहा हूँ कि मेरे घर में खाने के लिए दाना नहीं है, मेरी स्त्री खाट पर पड़ी-पड़ी मर रही है फिर भी आपको विश्वास नहीं आता। आप मुझे कांग्रेस का काम करने के लिए नौकर रख लीजिए। 25 रु. महीने दीजिएगा। इससे ज्यादा अपनी गरीबी का क्या प्रमाण दूँ? अगर मेरा काम संतोष के लायक न हो, तो एक महीने के बाद मुझे निकाल दीजिएगा। यह समझ लीजिए कि जब मैं आपकी गुलामी करने को तैयार हुआ हूँ तो इसीलिए कि मुझे दूसरा कोई आधार नहीं है। हम व्यापारी लोग, अपना बस चलते, किसी की चाकरी नहीं करते। जमाना बिगड़ा हुआ है, नहीं 101 रु. के लिए इतना हाथ-पाँव न जोड़ता।’

प्रधानजी हंसकर बोले- ‘यह तो तुमने नयी चाल चली।’

‘चाल नहीं चल रहा हूँ अपनी विपत्ति-कथा कह रहा हूँ।’

कांग्रेस के पास इतने रुपये नहीं हैं कि वह मोटों को खिलाती फिरे।’

‘अब भी आप मुझे मोटा कहे जायेंगे?’

‘तुम मोटे ही हो।’

‘मुझ पर जरा भी दया न कीजिएगा?’

प्रधान ज्यादा गहराई से बोले- ‘छकौड़ी लाल जी, मुझे पहले तो इसका विश्वास नहीं आता कि आपकी हालत इतनी खराब है, और अगर विश्वास आ भी जाये, तो मैं कुछ नहीं कर सकता। इतने महान आंदोलन में कितने ही घर तबाह हुए और होंगे। हम लोग सभी तबाह हो रहे हैं। आप समझते हैं, हमारे सिर कितनी बड़ी जिम्मेदारी है? आपका तावान माफ कर दिया जाय, तो कल ही आपके बीसियों भाई अपनी मुहरें तोड़ डालेंगे और हम उन्हें किसी तरह कायल न कर सकेंगे। आप गरीब हैं, लेकिन सभी भाई तो गरीब नहीं हैं। तब तो सभी अपनी गरीबी के प्रमाण देने लगेंगे। मैं किस-किस की तलाशी लेता फिरूं। इसलिए जाइए, किसी तरह रुपये का प्रबंध कीजिए और दुकान खोलकर कारोबार कीजिए। ईश्वर चाहेगा, तो वह दिन भी आयेगा जब आपका नुकसान पूरा होगा।’

छकौड़ी घर पहुँचा, तो अँधेरा हो गया था। अभी तक उसके द्वार पर स्यापा हो रहा था। घर में जाकर स्त्री से बोला- ‘आखिर वही हुआ, जो मैं कहता था। प्रधानजी को मेरी बातों पर विश्वास नहीं आया।’

स्त्री का मुरझाया हुआ बदन उत्तेजित हो उठा। उठ खड़ी हुई और बोली- ‘अच्छी बात है, हम उन्हें विश्वास दिला देंगे। मैं अब कांग्रेस दफ्तर के सामने ही मरूंगी। मेरे बच्चे उसी दफ्तर के सामने भूख से विकल हो-होकर तड़पेंगे। कांग्रेस हमारे साथ सत्याग्रह करती है, तो हम भी उसके साथ सत्याग्रह करके दिखा दें। मैं इस मरी हुई दशा में भी कांग्रेस को तोड़ डालूँगी। जो अभी इतने निर्दयी हैं, वह कुछ अधिकार पा जाने पर क्या न्याय करेंगे? एक इक्का बुला लो, खाट की जरूरत नहीं। वहीं सड़क किनारे मेरी जान निकलेगी। जनता ही के बल पर तो वह कूद रहे हैं। मैं दिखा दूँगी, जनता तुम्हारे साथ नहीं, मेरे साथ है।

इस अग्निकुंड के सामने छकौड़ी की गर्मी शान्त हो गयी। कांग्रेस के साथ इस रूप में सत्याग्रह की कल्पना ही से वह काँप उठा। सारे शहर में हलचल मच जायेगी, हजारों आदमी आकर यह दशा देखेंगे। सम्भव है, कोई हंगामा ही हो जाय। ये सभी बातें इतनी भयंकर थी कि छकौड़ी का मन कातर हो गया। उसने स्त्री को शान्त करने की चेष्टा करते हुए कहा- ‘इस तरह चलना उचित नहीं है अम्बे। मैं एक बार प्रधानजी से मिलूँगा। अब रात हुई, स्यापा बंद हो जायेगा। कल देखी जायेगी। अभी तो तुमने पथ्य भी नहीं लिया। प्रधानजी बेचारे बड़े असमंजस में पड़े हुए हैं। कहते हैं, अगर आपके साथ रियायत कर दें, तो फिर कोई शासन ही न रह जायेगा। मोटे-मोटे आदमी भी मुहरें तोड़ डालेंगे और जब कुछ कहा जायेगा, तो आपकी नजीर पेश कर देंगे।’

अम्बा एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ी छकौड़ी का मुँह देखती रही, फिर धीरे से खाट पर बैठ गयी। उसकी उत्तेजना गहरे विचार में परिणत हो गयी। कांग्रेस की और अपनी जिम्मेदारी का खयाल आ गया। प्रधानजी के कथन कितने सत्य थे, यह उससे छिपा न रहा।

उसने छकौड़ी से कहा- ‘तुमने आकर यह बात न कही थी।’