Swamini by Munshi Premchand
Swamini by Munshi Premchand

जोखू और प्यारी में ठनी हुई थी।

प्यारी ने कहा- मैं कहती हूँ धान रोपने की कोई जरूरत नहीं। झड़ी लग जाये, तो खेत डूब जायें । बरखा बंद हो जाये, तो खेत सूख जावें। जुआर बाजरा, सन, अरहर सब तो हैं, धान न सही।

जोखू ने अपने विशाल कंधे पर फावड़ा रखते हुए कहा- जो सबका होगा, तो मेरा भी होगा। सबका डूब जायेगा, तो मेरा भी डूब जायेगा। मैं क्यों किसी से पीछे रहूँ? बाबा के जमाने में पाँच बीघा से कम नहीं रोपा जाता था, बिरजू भैया ने उसमें एक-दो जीने और बढ़ा दिये। मथुरा ने भी थोड़ा-बहुत हर साल रोपा, तो मैं क्या सबसे गया बीता हूँ? मैं पाँच बीघे से कम न लगाऊंगा।

‘तब घर में दो जवान काम करने वाले थे।’

‘मैं अकेला उन दोनों के बराबर खाता हूँ। दोनों के बराबर काम क्यों न करूँगा?’

‘चल, झूठा कहीं का। कहते थे, दो सेर खाता हूं, चार सेर खाता हूँ। आधा सेर में रह गये।’

‘एक दिन तौलो तब मालूम हो।’

तौला है। बड़े खाने वाले! मैं कहे देती हूँ धान न रोपो । मजूर मिलेंगे नहीं, अकेले हलकान होना पड़ेगा।’

‘तुम्हारी बला से, मैं ही हलकान हूंगा न? यह देह किस दिन काम आयेगी।’ प्यारी ने उसके कंधे पर से फावड़ा ले लिया और बोली- तुम पहर रात से पहर रात तक ताल में रहोगे, अकेले मेरा जी ऊबेगा।

जोखू को जी ऊबने का अनुभव न था। कोई काम न हो, तो आदमी पड़कर सो रहे। जी क्यों ऊबे? बोला- जी ऊबे तो सो रहना। मैं घर रहूँगा, तब तो और जी ऊबेगा। मैं खाली बैठता हूँ तो बार -बार खाने की सूझती है। बातों में देर हो रही है और बादल घिरे आते हैं।

प्यारी ने हारकर कहा- अच्छा, कल से जाना, आज बैठो।

जोखू ने मानो बंधन में पड़कर कहा- अच्छा, बैठ गया। कहो क्या कहती हो?

प्यारी ने विनोद करते हुए कहा- कहना क्या है, मैं तुमसे पूछती हूँ अपनी सगाई क्यों नहीं कर लेते? अकेले मरते हो। तब एक से दो हो जाओगे।

जोखू शर्माते हुआ बोला- तुमने फिर यही बेबात की बात छेड़ दी, मालकिन? किससे सगाई कर लूँ यहाँ? ऐसी मेहरिया लेकर क्या करूंगा, जो गहनों के लिए मेरी जान खाती रहे।

प्यारी- यह तो तुमने बड़ी कड़ी शर्त लगायी। ऐसी औरत कहीं मिलेगी, जो गहने भी न चाहे?

जोखू मैं थोड़े ही कहता हूँ कि वह गहने न चाहे, हां, मेरी जान न खाये। तुमने तो कभी गहनों के लिए हठ न किया; बल्कि अपने सारे गहने दूसरों के ऊपर लगा दिये।

प्यारी के कपोलों पर हल्का-सा रंग आ गया। बोली- अच्छा, और क्या चाहते हो? जोखू- मैं कहने लगूँगा, तो बिगड़ जाओगी।

प्यारी की आँखों में लज्जा की एक रेखा नजर आयी, बोली-बिगड़ने की बात कहोगे, तो जरूर बिगडूंगी।

जोखू- मैं न कहूँगा।

प्यारी ने उसे पीछे की ओर ढकेलते हुए कहा- कहोगे कैसे नहीं, मैं कहला के छोडूँगी।

जोखू- मैं चाहता हूँ कि वह तुम्हारी तरह हो, ऐसी गंभीर हो, ऐसी ही बातचीत में चतुर हो, ऐसा ही अच्छा खाना पकाती हो, ऐसी ही किफ़ायती हो, ऐसी ही हँसमुख हो। बस, ऐसी औरत मिलेगी, तो करूँगा, नहीं इसी तरह पड़ा रहूँगा। प्यारी का मुख लज्जा से आरक्त हो गया।

उसने पीछे हटकर कहा- तुम बड़े नटखट हो हंसी-हंसी में सब कुछ कह गये।