कोदई ने लाल-लाल आंखों से दरोगा की ओर देखा और जहर की तरह गुस्से को पी गए। आज अगर उनके सिर गृहस्थी का बखेड़ा न होता, लेना-देना न होता तो वह भी इसका मुंहतोड़ जवाब देते। जिस गृहस्थी पर उन्होंने अपने जीवन के पचास साल होम कर दिये थे, वह इस समय विषैले सर्प की भांति उनकी आत्मा में लिपटी हुई थी।
कोदई ने अभी कोई जवाब न दिया था कि नोहरी पीछे से आकर बोली – क्या लाल पगड़ी बांधकर तुम्हारी जीभ ऐंठ गई है? कोदई क्या तुम्हारे गुलाम हैं कि कोदहया-कोदइया कर रहे हो? हमारा ही पैसा खाते हो और हमीं को आंखें दिखाते हो? तुम्हें लाज नहीं आती।
नोहरी इस वक्त दोपहरी की धूप की तरह कांप रही थी। दरोगा एक क्षण के लिए सन्नाटे में आ गया। फिर कुछ सोचकर और औरत के मुंह लगना अपनी शान के खिलाफ समझकर कोदई से बोला – यह कौन शैतान की खाला है, कोदई! खुदा का खौफ न होता तो इसकी जबान तालू से खींच लेता।
बुढ़िया लाठी टेककर दरोगा की ओर घूमती हुई बोली – क्यों खुदा की दुहाई देकर खुदा को बदनाम करते हो। तुम्हारे खुदा तो तुम्हारे अफसर हैं, जिनकी तुम जूतियां चाटते हो। तुम्हें तो चाहिए था कि डूब मरते चुल्लू भर पानी में! जानते हो, यह लोग जो यहां आए हैं, कौन हैं? यह वह लोग हैं, जो हम गरीबों के लिए अपनी जान तक होम करने को तैयार हैं। तुम उन्हें बदमाश कहते हो! तुम जो घूस के रुपये खाते हो, जुआ खेलते हो, चोरियां करवाते हो, डाके डलवाते हो, भले आदमियों को फंसाकर मुट्ठियां गरम करते हो और अपने देवताओं की जूतियों पर नाक रगड़ते हो, तुम इन्हें बदमाश कहते हो।
नोहरी की तीक्ष्ण बातें सुनकर बहुत से लोग जो इधर-उधर दुबक गए थे, फिर जमा हो गए। दरोगा ने देखा, भीड़ बढ़ती जाती है तो अपना हंटर लेकर उन पर पिल पड़े। लोग फिर तितर-बितर हो गए। एक हंटर नोहरी पर भी पड़ा। उसे ऐसा मालूम हुआ कि कोई चिनगारी सारी पीठ पर दौड़ गई। उसकी आंखों तले अंधेरा छा गया, पर अपनी बची हुई शक्ति को एकत्र करके ऊंचे स्वर में बोली – लड़कों, क्यों भागते हो? क्या यहां न्यौता खाने आए थे, या कोई नाच-तमाशा हो रहा था? तुम्हारे इसी लेंड़ीपन ने इन सबों को शेर बना रखा है। कब तक यह मार-धाड़, गाली-गुप्ता सहते रहोगे?
एक सिपाही ने बुढ़िया की गर्दन पकड़कर जोर से धक्का दिया। बुढ़िया दो-तीन कदम पर औंधे मुंह गिरा चाहती थी कि कोदई ने लपक कर उसे संभाल लिया और बोला – क्या एक दुखिया पर गुस्सा दिखाते हो यारों? क्या गुलामी ने तुम्हें नामर्द बना दिया है? औरत पर, बूढ़ों पर, निहत्थों पर वार करते हो, यह मर्दों का काम नहीं है।
नोहरी ने जमीन पर पड़े-पड़े कहा – मर्द होते, तो गुलाम ही क्यों होते! भगवान् आदमी इतना निर्दयी भी हो सकता है? भला, अंग्रेज इस तरह बेदर्दी करे तो एक बात है। उसका राज है। तुम तो उसके चाकर हो, तुम्हें राज तो न मिलेगा, मगर रांड-मांड में ही खुश! इन्हें कोई तलब देता जाय, दूसरों की गर्दन भी काटने में संकोच नहीं।
अब दारोगा ने नायक को डांटना शुरू किया – तुम किसके हुक्म से इस गांव में आए? नायक ने शांत भाव से कहा – खुदा के हुक्म से।
दारोगा – तुम रिआया के अमन में खलल डालते हो?
नायक – अगर उन्हें उनकी हालत बताना उनके अमन में खलल डालना है तो बेशक हम उनके अमन में खलल डाल रहे हैं।
भागने वालों के कदम एक बार फिर रुक गए। कोदई ने उनकी ओर निराश आंखों से देखकर कांपते हुए स्वर में कहा – भाइयों, इस वक्त कई गांवों के आदमी जमा हैं? दरोगा ने हमारी जैसी बेआबरु की है, क्या उसे सहकर तुम आराम की नींद सो सकते हो? इसकी फरियाद कौन सुनेगा? हाकिम लोग क्या हमारी फरियाद सुनेंगे? कभी नहीं। आज अगर हम लोग मार डाले जायें, तो भी कुछ न होगा। यह है हमारी इज्जत और आबरू। थू है इस जिंदगी पर।
समूह स्थिर भाव से खड़ा हो गया, जैसे बहता हुआ पानी मेंड़ से रुक जाये। भय का धुंआ जो लोगों के हृदय पर छा गया था, एकाएक हट गया। उनके चेहरे कठोर हो गये। दरोगा ने उनके तेवर देखे, तो तुरंत घोड़े पर सवार हो गया और कोदई को गिरफ्तार करने का हुक्म दिया। दो सिपाहियों ने बढ़कर कोदई की बांह पकड़ ली। कोदई ने कहा – घबराते क्यों हो, मैं कहीं भागूंगा नहीं। चलो, कहां चलते हो?
ज्यों ही कोदई दोनों सिपाहियों के साथ चला, उसके दोनों जवान बेटे कई आदमियों के साथ सिपाहियों की ओर लपके कि कोदई को उनके हाथों से छीन लें। सभी आदमी आवेश में आकर पुलिस वालों के चारों ओर जमा हो गए।
दरोगा ने कहा – तुम लोग हट जाओ, वरना मैं फायर कर दूंगा।
समूह ने इस धमकी का जवाब ‘भारत माता की जय!’ दिया और एकाएक दो-दो कदम और आगे खिसक आए।
दरोगा ने देखा, अब जान बचती नहीं नजर आती है। नम्रता से बोला – नायक साहब, यह लोग फसाद पर आमादा है। इसका नतीजा अच्छा नहीं होगा।
नायक ने कहा – नहीं, जब तक हममें एक आदमी भी यहां रहेगा, आपके ऊपर कोई हाथ न उठा सकेगा। आपसे हमारी कोई दुश्मनी नहीं है। हम और आप दोनों एक ही पैरों के तले दबे हुए हैं। यह हमारी बदनसीबी है कि हम आप दो विरोधी दलों में खड़े हैं।
यह कहते हुए नायक ने गांव वालों को समझाया – भाइयों, मैं आपसे कह चुका हूं यह न्याय और धर्म की लड़ाई है और हमें न्याय और धर्म के हथियार से ही लड़ना है। हमें अपने भाइयों से नहीं लड़ना है। हमें तो किसी से भी लड़ना नहीं है। दरोगा ने कोदई चौधरी को गिरफ्तार किया है। मैं इसे चौधरी का सौभाग्य समझता हूं। धन्य हैं वे लोग, जो आजादी की लड़ाई में सजा पाएं। यह बिगड़ने या घबराने की बात नहीं है। आप लोग हट जायें और पुलिस को जाने दें।
दरोगा और सिपाही कोदई को लेकर चले। लोगों ने जय ध्वनि की – ‘भारत जाता की जय!’
कोदई ने जवाब दिया – राम-राम भाइयों, राम-राम। डटे रहना मैदान में। घबराने की कोई बात नहीं है। भगवान सबका मालिक है।
दोनों लड़कों के आंखों में आंसू भरे आये, कातर स्वर में बोले – हमें क्या कहे जाते हो दादा।
कोदई वे उन्हें बढ़ावा देते हुए कहा – भगवान का भरोसा मत छोड़ना और वह करना जो मर्दों को करना चाहिए। भय सारी बुराइयों की जड़ है। इसे मन से निकाल डालो, फिर तुम्हारा कोई कुछ नहीं कर सकता। सत्य की कभी हार नहीं होती।
आज पुलिस के सिपाहियों के बीच में कोदई को निर्भयता का जैसा अनुभव हो रहा था, वैसा पहले कभी न हुआ था। जेल और फांसी उसके लिए आज भय की वस्तु नहीं, गौरव की वस्तु हो गयी थी। सत्य का प्रत्यक्ष रूप आज उसने पहली बार देखा, मानो वह कवच की भांति उसकी रक्षा कर रहा हो।
गांव वालों के लिए कोदई का पकड़ लिया जाना लज्जाजनक मालूम हो रहा था। उनकी आंखों के सामने उनके चौधरी इस तरह पकड़ लिए गए और वे कुछ न कर सके। अब वे मुंह कैसे दिखाए। हर एक मुख पर गहरी वेदना झलक रही थी, जैसे गांव लुट गया।
सहसा नोहरी ने चिल्लाकर कहा – अब सब जने खड़े क्यों पछता रहे हो! देख ली अपनी दुर्दशा, या अभी कुछ बाकी है। आज तुमने देख लिया न कि हमारे ऊपर कानून से नहीं, लाठी से राज हो रहा है। आज हम इतने बेशरम है कि इतनी दुर्दशा होने पर भी हम कुछ नहीं बोलते। हम इतने स्वार्थी, इतने कायर न होते, तो उनकी मजाल थी कि हमें कोड़ों से पीटते। जब तक तुम गुलाम बने रहोगे, उनकी सेवा-टहल करते रहोगे, तुम्हें भूसा-चोकर मिलता रहेगा लेकिन जिस दिन तुमने कंधा टेढ़ा किया, उसी दिन मार पड़ने लगेगी। कब तक इस तरह मार खाते रहोगे? कब तक मुर्दों की तरह पड़े गिद्ध से अपने को नोचवाते रहोगे? अब दिखा दो कि तुम भी जीते-जागते हो और तुम्हें भी अपने इज्जत-आबरू का कुछ खयाल है। जब इज्जत ही न रही, तो क्या करोगे खेती-बारी करके, धर्म कमाकर? जीकर ही क्या करोगे? क्या इसलिए जी रहे हो कि तुम्हारे बाल-बच्चे इसी तरह लातें खाए जायें, इसी तरह कुचले जायें? छोड़ो यह कायरता! आखिर एक दिन खाट पर पड़े-पड़े मर जाओगे। क्यों नहीं इस धरम की लड़ाई में आकर वीरों की तरह मरते। मैं तो बूढ़ी औरत हूं लेकिन और कुछ न कर सकूंगी, तो जहां यह लोग सोएंगे, वहां झाडू तो लगा दूंगी, इन्हें पंखा तो झलूंगी।
कोदई का बड़ा लड़का मैकू बोला – हमारे जीते-जी तुम जाओगी काकी, हमारे जीवन को धिक्कार है! अभी तो हम तुम्हारे बालक जीते ही हैं। मैं चलता हूं उधर! खेतीबारी गंगा देखेगा।
गंगा उसका छोटा भाई था। बोला – भैया, तुम यह अन्याय करते हो। मेरे रहते तुम नहीं जा सकते। तुम रहोगे, तो गिरस्ती संभालोगे। मुझसे तो कुछ न होगा। मुझे जाने दो। मैकू – इसे काकी पर छोड़ दो। इस तरह हमारी-तुम्हारी लड़ाई होगी। जिसे काकी का हुक्म हो, वह जाये।
नोहरी ने गर्व से मुस्कुराकर कहा – जो मुझे घूस देगा, उस को जिताऊंगी।
मैकू- – क्या तुम्हारी कचहरी में भी वही घूस चलेगी काकी? हमने तो समझा था, यहां ईमान का फैसला होगा।
नोहरी – चलो रहने दो। मरती दाई को राज मिला है तो कुछ कमा लूं।
गंगा हंसता हुआ बोला – मैं तुम्हें घूस दूंगा काकी। अबकी बाजार जाऊंगा, तो तुम्हारे लिए पूर्वी तमाकू का पत्ता लाऊंगा।
नोहरी – तो बस तेरी ही जीत है, तू ही जाना।
मैकू – काकी, तुम न्याय नहीं कर रही हो।
नोहरी – अदालत का फैसला कभी दोनों फरीक ने पसंद किया है कि तुम्हीं करोगे?
गंगा ने नोहरी के चरण हुए, फिर भाई से गले मिला और बोला – कल दादा को कहला भेजना, मैं जाता हूं।
