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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

धीमी गति से चलने वाली ठंडी हवा भी उस दिन लू के थपेड़े-सी जान पड़ती थी। ऐसा महसूस होता जैसे इस तपन से उनका सारा शरीर ही पिघल जायेगा। धीमी हवा से हिलते पेड़ों के पत्ते भी कभी-कभी उन्हें अपने शरीर के कम्पन जैसे हिलते दिखाई पड़ते। सारा वातावरण गमगीन और बोझिल मालूम होता। आस-पास के लोग उन्हें संदिग्ध निगाह से देखते, ऐसा लगता है जैसे कोई बहुत बड़ा अपराधी अभी-अभी जेल से बाहर निकला हो। उनकी रिपोर्ट आनी अभी बाकी थी इसलिए अस्पताल में उनका कोई काम नहीं था। रिपोर्ट पॉजिटिव आने की संभावनाएँ अधिक थी। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करें? उनके साथ पिछले कुछ दिनों का परिचय मुझे जन्म-जन्मान्तर का सा लगता। दो गज की दूरी भी हमारे बीच दूरी नहीं रख सकी थी। मुझे ऐसा लगने लगा जैसे उनके जीवन की खुली किताब के एक-एक पन्ने के एक-एक शब्द से मैं वाकिफ हूँ। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि दिलासा देने के लिए उनके और अपने बीच की दूरी खत्म कर दूँ या अपने साथ जुड़ी अन्य जिंदगियों को सुरक्षित करूँ।

आज के वातावरण में मानवीयता की परिभाषा बदल गयी है। एक व्यक्ति को सांत्वना देने के बदले कई जिंदगियों को सुरक्षित करना ज्यादा जरुरी हो गया है। उनके देखने के अंदाज से मुझे लगता कि उनकी निगाहें मुझसे कह रही हैं, क्या तुम भी मुझे अपराधबोध की दृष्टि से देखती हो। उनकी दृष्टि के उलहाने को मैं बर्दाश्त न कर सकी। मैंने मन ही मन निश्चय किया जो होगा देखा जायेगा। उनके पास जाने के लिए खुद को उठाने में मुझे इतना जोर लगाना पड़ा जितना किसी भारी चीज को उठाने में लगाना पड़ता है। मुझे इस तरह उठते हुए देखकर वो पूरा जोर लगाकर चिल्लाई नहींऽऽऽ…। जैसे मेरे इस प्रयास से वो समझ गयी कि मैं उनके नजदीक जाना चाहती है। मैंने दर रहकर ही पछा-क्या हआ. आप ठीक तो हैं? उनका स्वर टूट रहा था। बिलखते हुए रुंधे कंठ से बोली, जिसका संसार उजड़ गया हो वो क्या ठीक हो सकती है, उसके ठीक होने न होने से क्या होता है? ऐसा मत कहिये कहते हुए जैसे ही मैंने एक कदम आगे बढ़ाया वो कुछ कदम पीछे हटते हुए बोली, मुझसे जरा भी प्यार है तो मेरे नजदीक नहीं आना। मेरी कशमकश और बढ़ गई अब नजदीक जाने का प्रश्न ही नहीं था। दिमाग जैसे एकदम सुन्न हो गया इसीलिए धीरे-धीरे अपनी ओर बढ़ती हुई आकृति को पहचानना भी मुश्किल हो रहा था। तुम अभी तक घर नहीं गयी बहन? कहते हुए वो उनके थोड़ा नजदीक जाकर खड़े हो गए। कौन रामदास? कहाँ जाऊँ भाई? उनकी सिसकियों का बांध टूट गया। खुद को संभालो अपने घर जाओ। अब यहाँ तुम्हारा कुछ नहीं बहन।

ऐसा मत कहो जिनके साथ यहाँ आई उन्हें घर वापस लिए बिना कैसे जाऊँ? 45 साल… पूरे 45 साल सुख-दु:ख के हर क्षण में हमने एक-दूसरे का साथ दिया। विश्वास नहीं होता वो मुझ पर दु:ख का पहाड़ तोड़कर मझधार में अकेला छोड़कर कैसे जा सकते हैं। उनकी नम आँखें सूख नहीं पा रही थीं। तसल्ली रखो बहन, तसल्ली रखो। पिछले चार महीनों से मैं लोगों पर दु:ख के पहाड़ टूटते हुए देख रहा हूँ। अपनी छोटी-सी दुनिया में सिमट कर रहने वाले बड़े शहर के लोग क्या जाने इस दुनिया में लोगों को क्या-क्या सहना पड़ता है?

तभी रामदास-रामदास कानों को चीरती हुई आवाज आई। कहाँ मर गया सालाऽऽऽ… कामचोर। एक वार्ड बॉय ऐसे चिल्लाता हुआ आ रहा था जैसे वो उस बूढ़े रामदास का साथी नहीं बल्कि मालिक हो। यहाँ खड़ा-खड़ा क्या कर रहा है, देखता नहीं लाशों के ढेर पड़े हैं उन्हें कौन ठिकाने लगवाएगा? थोड़ी देर बाद 70 वर्षीय रामदास अपने 45 वर्षीय बेटे के साथ मुँह पर मास्क, हाथों में ग्लव्स और बड़े-बड़े बूट पहने स्ट्रेचर पर लाशों के ढेर को लिए शव वाहन की ओर चला जा रहा था।

एकटक सड़क की ओर निहारती हुई गीता देवी को देख रामदास बोला, किसका रास्ता देख रही हो बहन? घर से कोई नहीं आया न, कोई आएगा भी। पिछले कुछ अर्से से यही देख रहा हूँ, न कोई जिंदा को लेने आता है न मुर्दा को। आओ गाड़ी क्वॉरनटाइन सेंटर के सामने से ही गुजरेगी तुम्हें वहाँ छोड़ देंगे। रामदास की बात ने जैसे उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। वो कुछ होश में आई। बेटे का रास्ता देखते-देखते पूरा दिन बीत गया था। उसके आने की कोई उम्मीद भी नहीं थी। अपने सामान को उठाकर जैसे उन्होंने गाड़ी में बैठने की सहमति दे दी। सुबकियां भरती हुई वो आगे बढ़ीं। रामदास ने गाड़ी के आगे के हिस्से का दरवाजा खोलते हुए ड्राइवर से कहा-इन्हें क्वॉरनटाइन में छोड़ना है। बैठो बहन कहकर वो पीछे जाकर अपने लिए लाशों के ढेर के बीच जगह बनाने लगा। उमड़ते हुए सैलाब को रोकना किसी के बस की बात नहीं। फिर भी वो आँसुओं को थामने का प्रयास कर रही थी। गाड़ी का गेट बंद कर खिड़की से जिस तरह उन्होंने मुझे देखा। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ। इतना ही कह सकी-कि अपना ध्यान रखियेगा मैं फोन करूँगी। देखते ही देखते गाड़ी आँखों से ओझल हो गयी और शेष बचे दोनों की आखों में आँसुओं का सैलाब।

अगले दिन लाशों के ढेर से लदी गाड़ी श्मशान जाने के लिए तैयार थी। मुझे देखकर रामदास ने दूर से ही कहा- तुम्हारे साथ वाली बहन जी के पति की रिपोर्ट पॉजिटिव आ गई है। इस ढेर में उनकी लाश भी है। मैं कुछ कह न सकी थोड़ी देर बैठे रहने के बाद परिचिता होने का धर्म निभाने के लिए श्मशान पहुंच गयी। लम्बी कतार मे चिताएँ जलाई जा रही थीं। उस तपन भरे वातावरण में वहाँ खड़े रहना मुश्किल था। मुझे देखकर रामदास ने इशारे से बताया- उनके बेटे-बहू उधर खड़े हैं। मैंने उस ओर का रुख किया। कुछ दिनों के गहरे संबंधों के कारण मुझे पहचानने में जरा भी समय न लगा कि कौन-सा उनका बड़ा बेटा है और कौन-सा छोटा।

बड़ी मुश्किल से कुछ घण्टों की छुट्टी मिली है, मुझे अभी जाना होगा। तुम कल किसी पंडित से श्राद्ध का पूरा विधान करवा देना और हाँ यहाँ से अस्थियाँ ले जाने की जरूरत नहीं है। पता नहीं किन-किन हाथों से होकर तुम्हें मिले। फिर ये भी नहीं कह सकते कि जो अस्थियाँ हमें मिल रही हैं वो हमारे पिता की ही हैं या किसी और की। उनका बड़ा बेटा अपने छोटे भाई को समझा रहा था और छोटा बेटा सहमति में सिर हिला रहा था। एक बात और ध्यान रखना माँ की रिपोर्ट आने तक माँ को क्वॉरनटाइन में ही रखना घर लाने की कोई जरूरत नहीं है। अच्छा चलता हूँ कहते हुए वो गाड़ी में बैठकर रवाना हो गया। पता नहीं मुझे क्या सूझा जो सब कुछ जानते हुए भी यहाँ चली आई थी।

मैं गाड़ी में बैठकर अस्पताल वापस आ गयी। कुछ ही देर बाद पता चला कि रामदास का बेटा आज अचानक बेहोश हो गया। उसे साँस लेने में परेशानी होने लगी। बहुत ढूंढने पर भी रामदास का कहीं अता-पता नहीं था। मेरी चिंता बढ़ने लगी। रामदास के बेटे की कुछ खबर मिलने के इंतजार में मैं काफी देर इधर-उधर घूमती रही। लेकिन कुछ पता न चला थक-हारकर मैं बैठ गयी। लेकिन मन में रह-रहकर दो ही सवाल उठते। पहला रामदास का बेटा ठीक तो हो जायेगा ना और दूसरा घर परिवार से दूर क्वॉरनटाइन सेंटर में अकेली वो कैसी होंगी? समय उन्हें काटने को दौड़ता होगा। जब उन्हें अपनों की सबसे ज्यादा जरूरत है तो उनका साथ देने वाला कोई नहीं। न औलाद, न भाई, न बहन। हाय रे भाग्य विधाता क्या सोचकर लिखा है तुमने इनका भाग्य?

जाने कितनी शक्ति होती है गरीब में। एक महीने से रामदास का बेटा जिंदगी और मौत से लड़ रहा है। न बेटे का दम टूटता है न पिता की हिम्मत। कोई और होता तो कब का हार मान चुका होता। लेकिन रामदास है कि बिना नागा अपने काम में लगा रहता है। तभी सामने लगी टीवी स्क्रीन पर ब्रेकिंग न्यूज देखती हूँ।

  • कोरोना विजयी डॉक्टर माथुर को पुरस्कृत किया गया।
  • डॉक्टर माथुर ने अनेक जिंदगियाँ बचाई।
  • मरीजों की देखभाल की वजह से पिता का दाह संस्कार कर तुरंत लौटे थे डॉक्टर माथुर।

बड़ी खुशनसीब होती हैं डॉक्टर माथुर जैसे बेटों को जन्म देने वाली माँ।

गौरवान्वित डॉक्टर माथुर का गला मालाओं के बोझ से झुका जा रहा था। तभी स्ट्रेचर की आवाज मेरा ध्यान भंग करती है। रोज की तरह आज भी रामदास स्ट्रेचर पर एक साथ कई लाशों को लिए चला जा रहा है। मालूम होता कि जैसे महीनों से लोगों का दु:ख देखते-देखते और रोते-रोते उसकी आँखों का पानी सूख गया। स्ट्रेचर शव वाहन के पास जाकर रुक गया। लाशों को शव वाहन पर ढोया जाने लगा। शव वाहन पर ढोई जा रही लाशों के ढेर की अंतिम लाश को उठाते हुए उसके हाथ कांप रहे थे। वो साथ वाले से कह रहा था जरा सँभालकर भैया महीनों से मेरे साथ लाशें ढो रहा था। आज भी कई लाशों का बोझ ढोकर जा रहा है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’