pisanahaaree ka kuaan by munshi premchand
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चौधरी ने घबरा कर पूछा-क्या हुआ, क्या ? तुम्हें चक्कर तो नहीं आ गया ?

स्त्री ने ताक की ओर भयातुर नेत्रों से देख कर कहा -चुड़ैल वहाँ खड़ी है ?

चौधरी ने ताक की ओर देख कर कहा -कौन चुड़ैल ? मुझे तो कोई नहीं दीखता।

स्त्री – मेरा तो कलेजा धक्-धक् कर रहा है। ऐसा मालूम हुआ, जैसे उस बुढ़िया ने मेरा हाथ पकड़ लिया है।

चौधरी – यह सब भ्रम है। बुढ़िया को मरे पाँच साल हो गये, अब तक वह यहाँ बैठी है ?

स्त्री – मैंने साफ देखा, वही थी। बच्चा भी कहते थे कि उन्होंने रात को थैलियों पर हाथ रखे देखा था !

चौधरी – वह रात को मेरी कोठरी में कब आया ?

स्त्री – तुमसे कुछ रुपयों के विषय ही में कहने आया था। उसे देखते ही भागा।

चौधरी – अच्छा; फिर तो अंदर जाओ, मैं देख रहा हूँ।

स्त्री ने कान पर हाथ रख कर कहा -न बाबा, अब मैं उस कमरे में कदम न रखूँगी।

चौधरी – अच्छा, मैं जा कर देखता हूँ।

चौधरी ने कोठरी में जा कर दोनों थैलियाँ ताक पर से उठा लीं। किसी प्रकार की शंका न हुई। गोमती की छाया का कहीं नाम भी न था। स्त्री द्वार पर खड़ी झाँक रही थी। चौधरी ने आ कर गर्व से कहा -मुझे तो कहीं

कुछ न दिखायी दिया। वहाँ होती, तो कहाँ चली जाती ?

स्त्री – क्या जाने, तुम्हें क्यों नहीं दिखायी दी ? तुमसे उसे स्नेह था, इसी से हट गयी होगी।

चौधरी – तुम्हें भ्रम था, और कुछ नहीं।

स्त्री – बच्चा को बुला कर पुछाये देती हूँ।

चौधरी – खड़ा तो हूँ, आ कर देख क्यों नहीं लेतीं ?

स्त्री को कुछ आश्वासन हुआ। उसने ताक के पास जा कर डरते-डरते हाथ बढ़ाया – जोर से चिल्ला कर भागी और आँगन में आ कर दम लिया।

चौधरी भी उसके साथ आँगन में आ गया और विस्मय से बोला – क्या था, क्या ? व्यर्थ में भागी चली आयी। मुझे तो कुछ न दिखायी दिया।

स्त्री ने हाँफते हुए तिरस्कारपूर्ण स्वर में कहा -चलो हटो, अब तक तो तुमने मेरी जान ही ले ली थी। न-जाने तुम्हारी आँखों को क्या हो गया है। खड़ी तो है वह डायन !

इतने में हरनाथ भी वहाँ आ गया। माता को आँगन में खड़े देख कर बोला – क्या है अम्माँ, कैसा जी है ?

स्त्री – वह चुड़ैल आज दो बार दिखायी दी, बेटा। मैंने कहा -लाओ, तुम्हें रुपये दे दूँ। फिर जब हाथ में जा जाएँगे, तो कुआँ बनवा दिया जायगा। लेकिन ज्यों ही थैलियों पर हाथ रखा, उस चुड़ैल ने मेरा हाथ पकड़ लिया। प्राण-से निकल गये।

हरनाथ ने कहा -किसी अच्छे ओझा को बुलाना चाहिए, जो इसे मार भगाये।

चौधरी – क्या रात को तुम्हें भी दिखाई दी थी ?

हरनाथ – हाँ, मैं तुम्हारे पास एक मामले में सलाह करने आया था। ज्यों ही अंदर कदम रखा, वह चुड़ैल ताक के पास खड़ी दिखायी दी, मैं बदहवास हो कर भागा।

चौधरी – अच्छा, फिर तो जाओ।

स्त्री – कौन, अब तो मैं न जाने दूँ, चाहे कोई लाख रुपये ही क्यों न दे।

हरनाथ – मैं आप न जाऊँगा।

चौधरी – मगर मुझे कुछ दिखायी नहीं देता। यह बात क्या है ?

हरनाथ – क्या जाने, आपसे डरती होगी। आज किसी ओझा को बुलाना चाहिए।

चौधरी – कुछ समझ में नहीं आता, क्या माजरा है। क्या हुआ बैजू पांडे की डिग्री का ?

हरनाथ इन दिनों चौधरी से इतना जलता था कि अपनी दूकान के विषय की कोई बात उनसे न कहता था। आँगन की तरफ ताकता हुआ मानो हवा से बोला – जो होना होगा, वह होगा, मेरी जान के सिवा और कोई क्या ले लेगा ? जो खा गया हूँ, वह तो उगल नहीं सकता।

चौधरी – कहीं उसने डिग्री जारी कर दी तो ?

हरनाथ – तो क्या ? दूकान में चार-पाँच सौ का माल है, वह नीलाम हो जायगा।

चौधरी – कारोबार तो सब चौपट हो जायगा ?

हरनाथ – अब कारोबार के नाम को कहाँ तक रोऊँ। अगर पहले से मालूम होता कि कुआँ बनवाने की इतनी जल्दी है, तो यह काम छेड़ता ही क्यों ? रोटी-दाल तो पहले भी मिल जाती थी। बहुत होगा, तो-चार महीने हवालात में रहना पड़ेगा। इसके सिवा और क्या हो सकता है ?

माता ने कहा -जो तुम्हें हवालात में ले जाए, उसका मुँह झुलस दूँ ! हमारे जीते-जी तुम हवालात में जाओगे !

हरनाथ ने दार्शनिक बन कर कहा -माँ-बाप जन्म के साथी होते हैं, किसी के कर्म के साथी नहीं होते।

चौधरी को पुत्र से प्रगाढ़ प्रेम था। उन्हें शंका हो गयी थी कि हरनाथ रुपये हजम करने के लिए टाल-मटोल कर रहा है। इसलिए उन्होंने आग्रह करके रुपये वसूल कर लिये थे। अब उन्हें अनुभव हुआ कि हरनाथ के प्राण सचमुच संकट में हैं। सोचा – अगर लड़के को हवालात हो गयी, या दूकान पर कुर्की आ गयी; तो कुल-मर्यादा धूल में मिल जायगी। क्या हरज है, अगर गोमती के रुपये दे दूँ। आखिर दूकान चलती ही है, कभी न कभी तो रुपये हाथ में आ ही जाएँगे।

एकाएक किसी ने बाहर से पुकारा – ‘हरनाथसिंह !’ हरनाथ के मुख पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। चौधरी ने पूछा-कौन है ?

‘कुर्क अमीन।’

‘क्या दूकान कुर्क कराने आया है ?’

‘हाँ, मालूम तो होता है।’