डॉक्टर साहब बगीचे में पहुंचे तो उन्होंने प्रेमशंकर को क्यारियों में पानी देते हुए पाया। कुएं पर एक मनुष्य खड़ा पम्प से पानी निकाल रहा था। मेहरा ने उसे तुरन्त ही पहचान लिया। वह दुर्गा माली था। डॉक्टर साहब के मन में उस समय दुर्गा के प्रति एक विचित्र ईर्ष्या का भाव उत्पन्न हुआ। जिस नराधम को उन्होंने दंड देकर अपने यहां से अलग कर दिया था, उसे नौकरी क्यों मिल गयी? यदि दुर्गा इस वक्त फटेहाल रोनी सूरत बनाए दिखाई देता तो डॉक्टर साहब को उस पर दया आ जाती। वे संभवतः उसे कुछ इनाम देते और प्रेमशंकर से उसकी प्रशंसा भी कर देते। उनकी प्रकृति में दया थी और अपने नौकरों पर उनकी कृपादृष्टि रहती थी। परन्तु उनकी इस कृपा और दया में लेशमात्र भी भेद न था, जो अपने कुत्तों और घोड़ों से थी। इस कृपा का आधार न्याय नहीं, दीन-पालन है। दुर्गा ने उन्हें देखा, कुएं पर खड़े-खड़े सलाम किया और फिर अपने काम में लग गया। उसका यह अभिमान डॉक्टर साहब के हृदय में भाले की भांति चुभ गया। उन्हें यह विचार कर अत्यंत क्रोध आया कि मेरे यहां से निकलना इसके लिए हितकर हो गया। उन्हें अपनी सहृदयता पर जो घमंड था, उसे बड़ा आघात लगा। प्रेमशंकर ज्यों ही उनसे हाथ मिलाकर उन्हें क्यारियों की सैर कराने लगे, त्यों ही डॉक्टर साहब ने उनसे पूछा – यह आदमी आपके यहां कितने दिनों से हैं?
प्रेमशंकर – यही 6 या 7 महीने होंगे।
डॉक्टर – कुछ नोंच-खसोट तो नहीं करता? यह मेरे यहां माली था। इसके हथलपाकेपन से तंग आकर मैंने इसे निकाल दिया था। कभी फल तोड़कर बेच आता, कभी पौधे उठा ले जाता, और फलों का कहना ही क्या? वे इसके मारे बचते ही न थे। एक बार मैंने मित्रों की दावत दी थी। मलीहाबादी सुफेदे में खूब फल लगे हुए थे। जब सब आकर बैठ गए और मैं उन्हें फल दिखाने के लिए ले गया तो सारे फल गायब! कुछ न पूछिए! उस घड़ी कितनी भद्द हुई! मैंने उसी क्षण इन महाशय को दुत्कार बतायी। बड़ा ही दगाबाज आदमी है और ऐसा चतुर है कि इसको पकड़ना मुश्किल है। कोई वकीलों ही जैसा काइयां आदमी हो तो इसे पकड़ सकता है। ऐसी सफाई और ढिठाई से बचता है कि इसका मुंह देखते रह जाइए। आपको भी तो कभी चरका नहीं दिया?
प्रेमशंकर – जी नहीं, कभी नहीं। मुझे इसने शिकायत का कोई अवसर नहीं दिया। यहां तो खूब मेहनत करता है, यहां तक कि दोपहर की छुट्टी में भी आराम नहीं करता। मुझे तो इस पर इतना भरोसा हो गया कि सारा बगीचा इस पर छोड़ रखा है। दिन भर में जो कुछ आमदनी होती है, वह शाम को मुझे दे देता है और कभी एक पाई का भी अंतर कहीं पड़ता।
डॉक्टर – यही तो इसका कौशल है कि आपके उलटे छुर्रे मूड़े और आपको खबर भी नहीं। आप इसे वेतन क्या देते हैं?
प्रेमशंकर – यहां किसी को वेतन नहीं दिया जाता। सब लोग लाभ में बराबर के साझेदार हैं। महीने भर में आवश्यक व्यय के पश्चात् जो कुछ बचता है, उनमें से 10 रु प्रति सैकड़ा धर्मखाते में डाल दिया जाता है, शेष रुपये समाज भागों में बांट दिए जाते हैं। पिछले महीने 140 रु की आमदनी हुई थी। मुझे मिलाकर यहां सात आदमी है। 20 रु हिस्से पड़े। अबकी नारंगियां खूब हुई हैं, सेम की फलियां, गन्ने, गोभी आदि से अच्छी आमदनी हो रही है। 40 से कम न पड़ेंगे।
डॉक्टर मेहरा ने आश्चर्य से पूछा – इतने में आपका काम चल जाता है?
प्रेमशंकर – जी हां, बड़ी सुगमता से। मैं इन्हीं आदमियों के-से कपड़े पहनता हूं। इन्हीं का सा खाना खाता हूं और मुझे कोई दूसरा व्यसन नहीं है। यहां 20 रु मासिक उन औषधियों का खर्च है, जो गरीबों को दी जाती हैं। ये रुपये संयुक्त आय से अलग कर लिये जाते हैं, किसी को कोई आपत्ति नहीं होती। यह साइकिल जो आप देखते है। संयुक्त आय से ही ली गयी है। जिसे जरूरत होती है। इस पर सवार होता है। मुझे ये सब अधिक कार्य कुशल समझते है और मुझ पर पूरा विश्वास रखते हैं। बस मैं इनका मुखिया हूं। जो कुछ सलाह देता हूं उसे सब मानते हैं। कोई भी यह नहीं समझता कि मैं किसी का नौकर हूं। सब-के-सब अपने को साझेदार समझते हैं और जी तोड़कर मेहनत करते है। जहां कोई मालिक होता है और दूसरा उनका नौकर तो उन दोनों में तुरन्त द्वेष पैदा हो जाता है। मालिक चाहता है कि इससे जितना काम लेते बने, लेना चाहिए। नौकर चाहता है कि मैं कम-से-कम काम करूं। उनमें स्नेह या सहानुभूति का नाम तक नहीं होता। दोनों यथार्थ में एक दूसरे के शत्रु होते हैं। इस प्रतिद्वंद्विता का दुष्परिणाम हम और आप देख ही रहे हैं। मोटे और पतले आदमियों के पृथक-पृथक दल बन गए है और उनमें घोर संग्राम हो रहा है। काल चिह्नों से ज्ञात होता है कि यह प्रतिद्वंद्विता अब कुछ दिनों की मेहमान है। इसकी जगह अब सहकारिता का आगमन होने वाला है। मैंने अन्य देशों में घातक संग्राम के दृश्य देखे हैं और मुझे घृणा हो गयी है। सहकारिता ही हमें इस संकट से मुक्त कर सकती है।
डॉक्टर – तो यह कहिए कि आप ‘सोशलिस्ट’ हैं।
प्रेम शंकर – जी नहीं, मैं ‘सोशलिस्ट’ या ‘डिमोक्रेट’ कुछ नहीं हूं। मैं केवल न्याय और धर्म का दीन सेवक हूं। मैं निस्वार्थ सेवा को विद्या से श्रेष्ठ समझता हूं। मैं अपनी आत्मिक और मानसिक-शक्तियों को, बुद्धि-सामर्थ्य को, धन और वैभव का गुलाम नहीं बनाना चाहता। मुझे वर्तमान शिक्षा और सभ्यता पर विश्वास नहीं। विद्या का धर्म है – आत्मिक उन्नति का फल, उदारता, त्याग, सदिच्छा, सहानुभूति, न्यायप्रियता और दयाशीलता। जो शिक्षा हमें निर्बलों को सताने के लिए तैयार करे, जो हमें दूसरों का रक्त पीकर मोटा होने का इच्छुक बनाये, वह शिक्षा नहीं है। अगर मूर्ख, लोभ और मोह के पंजे में फंस जाएं तो वे क्षम्य हैं, परंतु विद्या और सभ्यता के उपासकों की स्वार्थांधता अत्यन्त लज्जाजनक है। हमने विद्या और बुद्धि-बल को विभूति शिखर पर चढ़ने का मार्ग बना लिया। वास्तव में यह सेवा और प्रेम का साधन था। कितनी विचित्र दशा है जो जितना ही बड़ा विद्वान है, वह उतना ही बड़ा स्वार्थ सेवी है। बस, हमारी सारी विद्या और बुद्धि, हमारा सारा उत्साह और अनुराग, धनलिप्सा में ग्रसित है। हमारे प्रोफेसर साहब एक हजार से कम वेतन पाये तो उनका मुंह ही नहीं सीधा होता। हमारे दीवान और माल के अधिकारी लोग हजार मासिक पाने पर भी अपने भाग्य को रोया करते हैं। हमारे डॉक्टर साहब चाहते हैं कि मरीज मरे या जिये, मेरी फीस में बाधा न पड़े और हमारे वकील साहब (क्षमा कीजिएगा) ईश्वर से मनाया करते हैं कि ईर्ष्या और द्वेष का प्रकोप हो और सोने की दीवार खड़ी कर लूं। ‘समय धन है’ इसी वाक्य में हम ईश्वर-वाक्य समझ रहे हैं। इन महान पुरुषों में से प्रत्येक व्यक्ति सैकड़ों नहीं हजारों-लाखों की जीविका हड़प जाता है और फिर भी उन्हें जाति का भक्त बनने का दावा है। वह अपने स्वजातीय-प्रेम का डंका बजाता फिरता है। पैदा दूसरे करें, पसीना दूसरे बहाये, खाना और मूछों पर ताव देना इनका काम है। मैं समस्त शिक्षित समुदाय को केवल निकम्मा ही नहीं, वरन् अनर्थकारी भी समझता हूं।
डॉक्टर साहब ने बहुत धैर्य से काम ले कर पूछा – तो क्या आप चाहते हैं कि हम सब-के-सब मजूरी करें?
प्रेमशंकर – जी नहीं, हालांकि ऐसा हो तो मनुष्य-जाति का बहुत उपकार हो। मुझे जो आपत्ति है, यह केवल दशाओं में इस अन्याय-पूर्ण समता से है। यदि एक मजूर 5 रुपया में अपना निर्वाह कर सकता है, तो एक मानसिक काम करने वाले प्राणी के लिए इससे दुगुनी-तिगुनी आय काफी होनी चाहिए और वह अधिकता इसलिए कि उसे कुछ उत्तम भोजन-वस्त्र तथा सुख की आवश्यकता होती है। मगर पांच और पांच हजार, पचास और पचास हजार का अस्वाभाविक अंतर क्यों हो? इतना ही नहीं, हमारा समाज पांच और पांच लाख के अंतर का भी तिरस्कार नहीं करता, वरन् उसकी और भी प्रशंसा करता है। शासन-प्रबंध, वकालत, चिकित्सा, चित्र-रचना, शिक्षा, दलाली, व्यापार, संगीत और इसी प्रकार की सैकड़ों कलाएं शिक्षित समुदाय की जीवन-वृत्ति बनी हुई हैं। पर इनमें से एक भी धनोपार्जन नहीं करती। इनका आधार दूसरों की कमाई पर है। मेरी समझ में नहीं आता कि वह उद्योग धंधे जो जीवन की सामग्रियां पैदा करते हैं, जिन पर जीवन का अवलंबन है, क्यों उन पेशों से नीचे समझे जाएं, जिनका काम केवल मनोरंजन या अधिक-से-अधिक धनोपार्जन में सहायता करना है। आज सारे दलाल स्वर्ग को सिधारे, जुलाहे कपड़े बुनेंगे, बढ़ई, लोहार, राज, चर्मकार सब-के-सब पूर्ववत् अपना-अपना काम करते रहेंगे। उनकी पंचायतें उनके झगड़ों का निबटारा करेंगी। लेकिन यदि किसान न हों तो संसार सुधा-पीड़ा से व्याकुल हो जाये। परन्तु किसान के लिए 5 रु. बहुत समझा जाता है और वकील साहब या डॉक्टर साहब को पांच हजार भी काफी नहीं।
डॉक्टर – आप अर्थ-शास्त्र के उस महत्त्वपूर्ण सिद्धांत को भूले जाते हैं जिसे श्रम-विभाजन (Division of Labour) कहते हैं। प्रकृति ने प्राणियों को भिन्न-भिन्न शक्तियां प्रदान की हैं और उनके विकास के लिए भिन्न-भिन्न दशाओं की आवश्यकता है।
प्रेमशंकर – मैं यह कब कहता हूं कि प्रत्येक मनुष्य मजूरी करने पर मजबूर किया जाये। नहीं, जिसे परमात्मा ने विचार की शक्ति दी है, वह शास्त्रों की विवेचना करे। जो भावुक हो, वह काव्य की रचना करे। जो अन्याय से घृणा करता हो, वह वकालत करे। मेरा कथन केवल यह है कि विभिन्न कार्यों की हैसियत में इतना अंतर न रहना चाहिए। मानसिक और औद्योगिक कामों में इतना फर्क न्याय के विरुद्ध है। यह प्रकृति के नियमों के प्रतिकूल ज्ञात होता है कि आवश्यकता और अनिवार्य कार्यों पर अनावश्यक और अनिवार्य कार्यों की प्रधानता हो। कतिपय सज्जनों का मत है कि इस साम्य से गुणी लोगों का अनादर होगा और संसार को उनके सुविचारों और सत्कार्यों से लाभ न पहुंच सकेगा। किंतु वे भूल जाते है। संसार के बड़े-से-बड़े पंडित, बड़े-से-बड़े आविष्कारक, बड़े-से-बड़े शिक्षक धन और प्रभुता के लोभ से मुक्त थे। हमारे अस्वाभाविक जीवन का एक कुपरिणाम यह भी है कि हम बलात् कवि और शिक्षक बन जाते हैं कि संसार में आज अनगिनत लेखक और कवि, वकील और शिक्षक उपस्थित हैं। वे सब-के-सब पृथ्वी पर भार-रूप हो रहे हैं। जब उन्हें मालूम होगा कि इन दिव्य कलाओं में कुछ लाभ नहीं है तो वही लोग कवि होंगे, जिन्हें कवि होना चाहिए। संक्षेप में कहना यही है कि धन की प्रधानता ने हमारे समस्त समाज को उलट-पलट दिया है।’
डॉक्टर मेहरा अधीर हो गये बोले – महाशय, समाज-संगठन का यह रूप देव-लोक के लिए चाहे उपयुक्त हो, पर भौतिक संसार के लिए और इस काल में वह कदापि उपयोगी नहीं हो सकता।
प्रेमशंकर – केवल इसी कारण से अभी तक धनवानों का, जमींदारों का और शिक्षित समुदाय का प्रभुत्व जमा हुआ हैं। पर इसके पहले भी, कई बार इस प्रभुत्व को धक्का लग चुका है और चिह्नों से ज्ञात होता है कि निकट भविष्य में फिर इसकी पराजय होने वाली है। कदाचित् यह हार निर्णयात्मक होगी। समाज का चक्र साम्य से आरंभ होकर फिर साम्य पर ही समाप्त होता है। एकाधिपत्य, रईसों का प्रभुत्व और वाणिज्य-प्राबल्य, उसकी मध्यवर्ती दशाएं है। वर्तमान चक्र ने मध्यवर्ती दशाओं को भोग लिया है और वह अपने अंतिम स्थान के विकट उगता जाता है। किन्तु हमारी आंखें अधिकार और प्रभुता के मद में ऐसी भरी हुई है कि हमें आगे-पीछे कुछ नहीं सूझता। चारों ओर जनतावाद का घोर वाद हमारे कानों में आ रहा है, पर हम ऐसे निश्चिंत हैं मानों वह साधारण मेघ की गरज है। हम अभी तक उन्हीं विद्याओं और कलाओं में लीन हैं जिनका आश्रय दूसरों की मेहनत है। हमारे विद्यालयों की संख्या बढ़ती जाती है, हमारे वकील खाने में पांव रखने की जगह बाकी नहीं, गली-गली फोटो स्टूडियो खुल रहे है, डॉक्टरों की संख्या मरीजों से भी अधिक हो गयी है, पर अब भी हमारी आंखें नहीं खुलती। हम इस अस्वाभाविक जीवन, इस सभ्यता के तिलस्म से बाहर निकलने की चेष्टा नहीं करते। हम शहरों में कारखाने खोलते फिरते हैं, इसलिए कि मजदूरों की मेहनत से मोटे हो जायें। 30 रु. और 40 रु. सैकड़े लाभ की कल्पना करके फूले नहीं समाते, पर ऐसा कहीं देखने में नहीं आता कि किसी शिक्षित सज्जन ने कपड़ा बुनना या जमीन जोतना शुरू किया हो। यदि कोई दुर्भाग्यवश ऐसा करे भी तो उसकी हंसी उड़ायी जाती है। हम उसी को मान-प्रतिष्ठ के योग्य समझते हैं, जो तकिया, गद्दी लगाये बैठा रहे, हाथ-पैर न हिलाए और लेन-देन पर, कूद-बल्ले पर लाखों के वारे-न्यारे करता हो… ।
यही बातें हो रही थी कि दुर्गा माली एक डाली में नारंगिया, गोभी के फूल, अमरूद, मटर की फलियां आदि सजाकर लाया और उसे डॉक्टर साहब के सामने रख दिया। उसके चेहरे पर एक प्रकार का गर्व था, मानों उसकी आत्मा जागृत हो गई है। वह डॉक्टर साहब के समीप एक मोटे मोड़ पर बैठ गया और बोला – हुजूर को कैसी कलमें चाहिए? आप बाबूजी को एक चिट पर उनके नाम लिखकर दे दीजिए। मैं कल आपके मकान पर पहुंचा दूंगा। आपके बाल-बच्चे तो अच्छी तरह हैं?
डॉक्टर साहब ने कुछ सकुचा कर कहा – हां, लड़के अच्छी तरह है, तुम यहां अच्छी तरह हो?
दुर्गा – जी हां, आपकी दया से बहुत आराम से हूं।
डॉक्टर साहब उठकर चले। प्रेमशंकर उन्हें विदा करने साथ-साथ फाटक तक आये। डॉक्टर साहब मोटर पर बैठे तो मुस्कुराकर प्रेमशंकर से बोले – मैं आपके सिद्धांतों का कायल नहीं हुआ, पर इसमें संदेह नहीं कि आपने एक पशु को मनुष्य बना दिया। यह आपके सत्संग का फल है। लेकिन क्षमा कीजिएगा, मैं फिर भी कहूंगा कि आप इससे होशियार रहिए। ‘यूजेनिक्स’ (सुप्रजनज-शास्त्र) अभी तक किसी ऐसे प्रयोग का आविष्कार नहीं कर सका है, जो जन्म के संस्कारों को मिटा दे।
