Laanchan by Munshi Premchand
Laanchan by Munshi Premchand

श्याम किशोर ने फिर गरज कर पूछा – ‘बोलती क्यों नहीं, तुझे किसने खिलौने दिए?’ शारदा रोने लगी। तब श्याम किशोर ने उसे फुसलाकर कहा – ‘रो मत, हम तुझे मारेंगे नहीं। तुझसे इतना ही पूछते हैं, तूने ऐसे सुंदर खिलौने कहां पाए?’

इस तरह दो-चार बार दिलासा देने से शारदा को कुछ धैर्य बंधा। उसने सारी कथा कह सुनाई। हा अनर्थ! इससे कहीं अच्छा होता कि शारदा मौन ही रहती। उसका गूंगी हो जाना भी इससे अच्छा था। देवी कोई बहाना करके बला सिर से टाल देती, पर होनहार को कौन टाल सकता है? श्याम किशोर के रोम-रोम से ज्वाला निकलने लगी। खिलौने वहीं छोड़कर वह धम्म-धम्म करते हुए ऊपर गए और देवी के कंधे दोनों हाथों से झिंझोड़ कर बोले – ‘तुम्हें इस घर में रहना है या नहीं। साफ-साफ कह दो।’

देवी अभी तक खड़ी सिसकियां ले रही थी। यह निर्मम प्रश्न सुनकर उसके आंसू गायब हो गए। किसी भारी विपत्ति की आशंका ने इस हलके-से आघात को भुला दिया, जैसे घातक की तलवार देखकर कोई प्राणी रोग-शय्या से उठकर भागे। श्याम किशोर की ओर भयातुर नेत्रों से देखा पर मुंह से कुछ न बोली। उसका एक-एक रोम मौन भाषा में पूछ रहा था – ‘इस प्रश्न का क्या मतलब है?’

श्याम किशोर ने फिर कहा – ‘तुम्हारी जो इच्छा हो, साफ-साफ कह दो। अगर मेरे साथ रहते-रहते तुम्हारा जी ऊब गया हो, तो तुम्हें अख्तियार है। मैं तुम्हें कैद करके नहीं रखना चाहता। मेरे साथ तुम्हें छल-कपट करने की जरूरत नहीं। मैं सहर्ष तुम्हें विदा करने को तैयार हूं। जब तुमने मन में एक बात निश्चय कर ली, तो मैंने भी निश्चय कर लिया है। तुम इस घर में अब नहीं रह सकती, रहने योग्य नहीं हो।’

देवी ने आवाज को संभालकर कहा – ‘तुम्हें आजकल क्या हो गया है, जो हर वक्त जहर उगलते रहते हो? अगर मुझसे जी ऊब गया है, तो जहर दे दो, जला-जलाकर क्यों जान मारते हो? मेहतर से बातें करना तो ऐसा अपराध न था। जब उसने आकर पुकारा, तो मैंने आकर द्वार खोल दिया। अगर मैं जानती कि जरा-सी बात का बतंगड़ हो जायेगा, तो उसे दूर ही से दुत्कार देती।’

श्याम – ‘जी चाहता है, तालू से जबान खींच लूं। बातें होने लगी, इशारे होने लगे, तोहफे आने लगे। अब बाकी क्या रहा?’

देवी – ‘क्यों नाहक घाव पर नमक छिड़कते हो? एक अबला की जान लेकर कुछ न पाओगे?’

श्याम – ‘मैं झूठ कहता हूं?’

देवी – ‘हां, झूठ कहते हो।’

श्याम – ‘ये खिलौने कहां से आए?’

देवी का कलेजा धक-से हो गया। काटो तो बदन में लहू नहीं। समझ गई, इस वक्त ग्रह बिगड़े हुए हैं, सर्वनाश के सभी संयोग मिलते जाते हैं। ये निगोड़े खिलौने न जाने किस बुरी साइत में आए। मैंने लिये ही क्यों, उसी वक्त लौटा क्यों न दिए। बात बनाकर बोली – ‘आग लगे, यही खिलौने तोहफे हो गए। बच्चे को कोई कैसे रोके, किसी की मानते हैं। कहती रही, मत ले, मगर न मानी, तो मैं क्या करती। हां, यह जानती कि इन खिलौनों पर मेरी जान मारी जायेगी तो जबरदस्ती छीनकर फेंक देती।’

श्याम – ‘इनके साथ और कौन-कौन सी चीजें आयी हैं, भला चाहती हो तो अभी लाओ।’

देवी – ‘जो कुछ आया होगा, इसी घर ही में होगा। देख क्यों नहीं लेते। इतना बड़ा घर भी नहीं है कि दो-चार दिन देखते लग जाय?’

श्याम – ‘मुझे इतनी फुरसत नहीं है। खैरियत इसी में है कि जो चीजें आयी हों, लाकर मेरे सामने रख दो। यह तो हो नहीं सकता कि लड़की के लिए खिलौने आयें और तुम्हारे लिए कोई सौगात न आये। तुम भरी गंगा में कसम खाओ, तो तुझे विश्वास न आएगा।’

देवी – ‘तो घर में देख क्यों नहीं लेते?’

श्याम किशोर ने ऐसा ताना मारकर कहा – ‘कह दिया, मुझे फुरसत नहीं है। सीधे से सारी चीजें लाकर रख दो, नहीं तो इसी दम गला दबाकर मार डालूंगा।’

देवी – ‘मारना हो, तो मार डालो, जो चीजें आई ही नहीं, उन्हें में दिखा कहां से दूं?’ श्याम किशोर ने क्रोध से उन्मत्त होकर देवी को इतनी जोर से धक्का दिया कि वह चारों खाने चित्त जमीन पर गिर पड़ी। तब उसके गले पर हाथ रखकर बोले – ‘दबा दूं गला! न दिखाएगी तू उन चीजों को?’

देवी – ‘जो अरमान हो, पूरे कर लो।’

श्याम – ‘खून पी जाऊंगा? तूने समझा क्या है?’

देवी – ‘अगर दिल की प्यास बुझती हो, तो पी जाओ।’

श्याम – ‘फिर तो उस मेहतर से बातें न करोगी? अगर अब कभी मुन्नू या उस शोहदे को द्वार पर देखा, तो उसका गला काट लूंगा।’

यह कहकर बाबूजी ने देवी को छोड़ दिया, और बाहर चले गये, लेकिन देवी उसी दशा में बड़ी देर तक पड़ी रही। उसके मन में इस समय पति-प्रेम की मर्यादा-रक्षा का लेश भी न था। उसका अन्तःकरण प्रतिकार के लिए विकल हो रहा था। इस वक्त अगर वह सुनती कि श्याम किशोर को किसी ने बाजार में जूतों से पीटा, तो कदाचित् वह खुश होती। कई दिनों तक पानी से भीगने के बाद, आज यह झोंका पाकर प्रेम की दीवार भूमि पर गिर पड़ी, और मन की रक्षा करने वाली कोई साधना न रही। आज केवल संकोच और लोक-लाज की हलकी-सी रस्सी रह गई है, जो एक झटके में टूट सकती है।

श्याम किशोर बाहर चले गये, तो शारदा भी अपने खिलौने लिये हुए घर से बाहर निकली। बाबूजी खिलौनों को देखकर कुछ बोले नहीं, तो अब उसे किसकी चिंता और किसका भय! अब वह क्यों न अपनी सहेलियों को खिलौने दिखाए। सड़क के उस पार एक हलवाई का मकान था। हलवाई की लड़की अपने द्वार पर खड़ी थी। शारदा उसे खिलौने दिखाने चली। बीच में सड़क थी, सवारी-गाड़ियों और मोटरों का तांता बंधा हुआ। शारदा को अपनी धुन में किसी बात का ध्यान न रहा। बालोचित उत्सुकता से भरी हुई वह खिलौने लिये दौड़ी। वह क्या जानती थी कि मृत्यु भी उसी तरह प्राणों का खिलौना खेलने के लिए दौड़ी आ रही है। सामने एक मोटर आती हुई दिखाई दी। दूसरी ओर से एक बग्घी आ रही थी। शारदा ने चाहा, दौड़कर उस पार निकल जाय। मोटर ने बिगुल बजाया, शारदा ने जोर मारा कि सामने से निकल जाय, पर होनहार को कौन टालता। मोटर बालिका को रौंदती हुई चली गई। सड़क पर एक मांस की लोथ पड़ी रह गई। खिलौने ज्यों-के-त्यों थे। उनमें से एक भी न टूटा था। खिलौने रह गए। खेलने वाला चला गया। दोनों में कौन स्थायी है और कौन अस्थायी, इसका फैसला कौन करे। चारों ओर से लोग दौड़ पड़े। अरे! यह तो बाबूजी की लड़की है, जो ऊपर वाले मकान में रहते है। लोथ कौन उठाए? एक आदमी ने लपक कर द्वार पर पुकारा – ‘बाबूजी! आपकी लड़की तो सड़क पर नहीं खेल रही थी। जरा नीचे तो आ जाइए।’

देवी ने छज्जे पर खड़े होकर सड़क की ओर देखा, तो शारदा की लोथ पड़ी हुई थी। चीख मारकर बेतहाशा नीचे दौड़ी और सड़क पर आकर बालिका की गोद में उठा लिया। उसके पैर थर-थर कांपने लगे। इस वज्रपात ने उसे स्तम्भित कर दिया। रोना भी न आया।

मुहल्ले के कई आदमी पूछने लगे – ‘बाबूजी कहां गये हैं? उनको कैसे बुलाया जाय?’ देवी क्या जवाब देती? वह तो संज्ञाहीन हो गई थी। लड़की की लाश को गोद में लिये, उसके रक्त से अपने वस्त्रों को भिगोती, आकाश की ओर ताक रही थी, मानों देवता से पूछ रही हो – ‘क्या सारी विपत्तियां मुझी पर?’

अंधेरा होता जाता था पर बाबूजी कुछ पता नहीं। कुछ मालूम भी नहीं, वह कहां गये है। धीरे-धीरे नौ बजे। पर अब तक बाबूजी न लौटे। इतनी देर तक बाहर न रहते। क्या आज ही उन्हें भी गायब होना था? दस बज गए। अब देवी रोने लगी। उसे लड़की की मृत्यु का इतना दुःख न था, जितना अपनी असमर्थता का। वह कैसे शव की दाह-क्रिया करेगी? कौन उसके साथ जायेगा? क्या इतनी रात गए, कोई उसके साथ चलने पर तैयार होगा? अगर कोई न गया, तो उसे अकेले जाना पड़ेगा क्या रात भर लोथ पड़ी रहेगी?

ज्यों-ज्यों सन्नाटा होता जाता था, देवी को भय होता था। वह पछता रही थी कि शाम ही को क्यों न इसे लेकर चली गई।

ग्यारह बजे थे। सहसा किसी ने द्वार खोला। देवी उठकर खड़ी हो गई। समझी बाबूजी आ गए। उसका हृदय उमड़ आया और वह रोती हुई बाहर आई, पर यह बाबूजी न थे, पुलिस के आदमी थे, जो इस मामले की तहकीकात करने आए थे। पांच बजे की घटना थी। तहकीकात होने लगी ग्यारह बजे। आखिर थानेदार भी तो आदमी है वह भी संध्या-समय घूमने-फिरने जाता ही है।

घंटे भर तक तहकीकात होती रही। देवी ने देखा, अब संकोच से काम न चलेगा। थानेदार ने उससे जो कुछ पूछा, उसका उत्तर उसने निःसंकोच भाव से दिया। जरा भी न शरमाई, जरा भी न झिझकी। थानेदार भी दंग रह गया।

जब सबके बयान लिखकर दारोगाजी चलने लगे, तो देवी ने कहा – ‘आप उस मोटर का पता लगाएंगे।’

दरोगा – ‘अब तो शायद ही उसका पता लगे।’

देवी – ‘तो उसकी कुछ सजा न होगी?’

दरोगा – ‘मजबूरी है। किसी को नम्बर भी तो मालूम नहीं।’

देवी – ‘सरकार इसका कुछ इंतजाम नहीं करती? गरीबों के बच्चे इसी तरह कुचले जाते रहेंगे?’

दरोगा – ‘इसका क्या इंतजाम हो सकता है? मोटरें तो बंद नहीं हो सकती?’