Kusum by Munshi Premchand
Kusum by Munshi Premchand

‘जैसा मुझे विश्वास था, आपने मेरे पिछले पत्र का भी उत्तर न दिया। इसका खुला हुआ अर्थ यह है कि आपने मुझे परित्याग करने का संकल्प कर लिया है। जैसी आपकी इच्छा। पुरूष के लिए स्त्री पाँव की जूती है, स्त्री के लिए तो पुरूष देव तुल्य है, बल्कि देवता से भी बढ़कर। विवेक का उदय होते ही वह पति की कल्पना करने लगती है। मैंने भी वही किया। जिस समय मैं गुड़िया खेलती थी, उसी समय आपने गुड्डे के रूप में मनोदेश में प्रवेश किया। मैंने आपके चरणों को पखारा, माला-फूल और नैवेद्य से आपका सत्कार किया। कुछ दिनों बाद कहानियाँ सुनने और पढ़ने की चाट पड़ी, तब आप कथाओं के नायक के रूप में मेरे घर आए। मैंने आपको हृदय में स्थान दिया। बाल्यकाल ही से आप किसी-न-किसी रूप में मेरे जीवन में घुसे हुए थे। वे भावनाएँ मेरे अनंतकाल की गहराइयों तक पहुँच गई हैं। मेरे अस्तित्व का एक-एक अणु उन भावनाओं से गुंथा हुआ है। उन्हें दिल से निकाल डालना सहज नहीं है। उसके साथ मेरे जीवन के परमाणु भी बिखर जाय, लेकिन आपकी यही इच्छा है तो यही सही। मैं आपकी सेवा में सब कुछ करने को तैयार थी। अभाव और विपन्नता का तो कहना ही क्या, मैं तो अपने को मिटा देने को भी राजी थी। आपकी सेवा में मिट जाना ही मेरे जीवन का ध्येय था। मैंने लज्जा और संकोच का परित्याग किया, आत्म-सम्मान को पैरों से कुचला, लेकिन आप मुझे स्वीकार नहीं करना चाहते। मजबूर हूँ। आपका कोई दोष नहीं। अवश्य मुझसे कोई ऐसी बात हो गई है, जिसने आपको इतना कठोर बना दिया है। आप उसे जबान पर लाना भी उचित नहीं समझते। मैं इस निष्ठुरता के सिवा और हर एक सजा झेलने को तैयार थी। आपके हाथ से जहर का प्याला लेकर पी जाने में मुझे विलम्ब न होता, किंतु विधि की गति निराली है। मुझे पहले इस सत्य को स्वीकार करने में बाधा थी कि स्त्री पुरूष की दासी है। मैं उसे पुरूष की सहचरी, अर्द्धांगिनी समझती थी, पर अब मेरी आंखें खुल गईं। मैंने कई दिन हुए, एक पुस्तक में पढ़ा था कि आदिकाल में स्त्री पुरूष की उसी तरह सम्पत्ति जैसे गाय-बैल या खेती-बारी। पुरूष को अधिकार था, स्त्री को बेचे, गिरवी रखे या मार डाले। विवाह की प्रथा उस समय केवल यह थी कि वर- पक्ष अपने सूर-सामन्तों को लेकर सशस्त्र आता था और कन्या को उठा ले जाता था। कन्या के साथ कन्या के घर में रुपया-पैसा, अनाज या पशु, जो कुछ उसके हाथ में लग जाता था, उसे भी उठा ले जाता था। वह स्त्री को अपने घर ले जाकर, उसके पैरों में बेड़ियां डालकर घर के अंदर बंद कर देता था। उसके आत्म-सम्मान के भावों को मिटाने के लिए यह उपदेश दिया जाता था कि पुरुष ही उसका देवता है, सुहाग स्त्री की सबसे बड़ी विभूति है। आज कई हजार वर्षों के बीतने पर भी पुरूष के उस मनोभाव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। पुरानी सभी प्रथाएँ कुछ विकृत या संस्कृति के रूप में मौजूद हैं। आज मुझे मालूम हुआ कि उस लेखक ने स्त्री- समाज की दशा का कितना सुंदर निरूपण किया था।

‘अब आपसे मेरा सविनय अनुरोध है और यहीं अन्तिम अनुरोध है कि आप मेरे पत्रों को लौटा दें। आपके दिए हुए गहने और कपड़े अब मेरे किसी काम के नहीं। इन्हें अपने पास रखने का कोई अधिकार नहीं। आप जिस समय चाहें वापस मँगवा लें। मैंने इन्हें एक पिटारी में बंद करके अलग रख दिया है। उसकी सूची भी वहीं रखी हुई है, मिला लीजिएगा। आज से आप मेरी जबान या कलम से कोई शिकायत न सुनेंगे। इस भ्रम को भूलकर भी दिल में स्थान न दीजिएगा कि मैं आपसे बेवफाई या विश्वासघात करूंगी। मैं इसी घर में कुढ़-कुढ़ कर मर जाऊंगी, पर आपकी ओर से मेरा मन कभी मैला न होगा। मैं जिस जलवायु में पली हूँ उसका मूल तत्त्व है-पति में श्रद्धा । ईर्ष्या या जलन भी उस भावना को मेरे दिल से नहीं निकाल सकती। मैं आपकी कुल-मर्यादा की रक्षिका हूँ। उस अमानत में जीते-जी खयानत न करूंगी। अगर मेरे बस में होता, तो मैं उसे भी वापस कर देती, लेकिन यहां में भी मजबूर हूँ और आप भी मजबूर हैं। मेरी ईश्वर से यही विनती है कि आप जहाँ रहें, कुशल से रहें। जीवन में मुझे सबसे कटु अनुभव जो हुआ, वह यही है कि नारी-जीवन अधम है-अपने लिए, अपने माता- पिता के लिए, अपने पति के लिए। उसकी कद्र न माता के घर में है, न पति के घर में। मेरा घर शोकागार बना हुआ है। अम्मा रो रही हैं, दादा रो रहे हैं, कुटुम्ब के लोग रो रहें हैं, एक मेरी जात से लोगों को कितनी मानसिक वेदना हो रही है। कदाचित वे सोचते होंगे, कुल में न आती यह कन्या मर गई होता तो अच्छा होता। मगर सारी दुनिया एक तरफ हो जाए, आपका प्यार मैं नहीं पा सकती। आप मेरे प्रभु हैं। आपका फैसला अटल है। उसकी कही अपील नहीं, कही फरियाद कहीं। खैर, आज से यह काण्ड समाप्त हुआ। अब मैं हूँ और मेरा दलित, भग्न-हृदय। हसरत यही है कि आपकी कुछ सेवा न कर सकी।

अभागिनी,

कुसुम

मालूम नहीं, मैं कितनी देर तक मूक-वेदना की दशा में बैठा रहा कि महाशय नवीन बोले- ‘आपने इन पत्रों को पढ़कर क्या निश्चय किया?’

मैंने रोते हुए हृदय से कहा- ‘अगर इन पत्रों ने उस नर-पिशाच के दिल पर कोई असर न किया, तो मेरा पत्र भला क्या असर करेगा? इससे अधिक करुणा और वेदना मेरी शक्ति के बाहर है। ऐसा कौन-सा धार्मिक भाव है, जिसे इन पत्रों में स्पर्श न किया गया हो। दया, लज्जा, तिरस्कार, न्याय, मेरे विचार में तो कुसुम ने कोई पहलू नहीं छोड़ा। मेरे लिए अब यही अन्तिम उपाय है कि उस शैतान के सिर पर सवार हो जाऊँ और उससे मुँह-दर-मुँह बातें करके इस समस्या की तह तक पहुँचने की चेष्टा करूँ। अगर उसने मुझे कोई संतोषप्रद उत्तर न दिया, तो मैं उसका और अपना खून एक कर दूंगा। या तो मुझी को फांसी होगी, या वही काले पानी जाएगा। कुसुम ने जिस धैर्य और साहस से काम लिया है, वह सराहनीय है। आप उसे सांत्वना दीजिएगा। मैं आज रात की गाड़ी से मुरादाबाद जाऊंगा और परसों तक जैसी कुछ परिस्थिति होगी, उसकी आपको सूचना दूंगा। मुझे तो यह कोई चरित्रहीन और बुद्धिहीन युवक मालूम होता है।

मैं उस बहक में जाने क्या-क्या बकता रहा। इसके बाद हम दोनों भोजन करके स्टेशन चले। वह आगरे गए, मैंने मुरादाबाद का रास्ता लिया। उनके प्राण अब भी सूखे जाते थे कि क्रोध के आवेश में, मैं कोई पागलपन न कर बैठूं। मेरे बहुत समझाने पर उनका चित्त शांत हुआ।

मैं प्रातःकाल मुरादाबाद पहुँचा और जाँच शुरू कर दी। इस युवक के चरित्र के विषय में मुझे जो सन्देह था, यह गलत निकला। मुहल्ले में, कॉलेज में, इष्ट- मित्रों में, सभी उसके प्रशंसक थे। अँधेरा और गहरा होता हुआ जान पड़ा। संध्या समय मैं उसके घर जा पहुँचा। जिस निष्कपट भाव से वह दौड़कर मेरे पैरों पर झुका है, वह मैं नहीं भूल सकता। ऐसा वाक्-चतुर, ऐसा सुशील और विनीत युवक मैंने नहीं देखा। बाहर और भीतर में इतना आकाश-पाताल का अंतर मैंने कभी न देखा था। मैंने कुशल-क्षेम और शिष्टाचार के दो-चार वाक्यों के बाद पूछा- ‘तुमसे मिलकर चित्त प्रसन्न हुआ, लेकिन आखिर कुसुम ने क्या अपराध किया है, जिसका तुम उसे इतना कठोर दण्ड दे रहे हो? उसने तुम्हारे पास कई पत्र लिखे, तुमने एक का उत्तर न दिया। वह दो-तीन बार यहाँ भी आई, पर तुम उससे बोले तक नहीं। क्या उस निर्दोष बालिका के साथ तुम्हारा यह अन्याय नहीं है?’

युवक ने लज्जित भाव से कहा- ‘बहुत अच्छा होता कि आपने इस प्रश्न को न उठाया होता। उसका जवाब देना मेरे लिए मुश्किल है। मैंने तो इसे आप लोगों के अनुमान पर छोड़ दिया था, लेकिन इस गलतफहमी को दूर करने के लिए मुझे विवश होकर कहना पड़ेगा।’

यह कहते-कहते वह चुप हो गया। बिजली की बत्ती पर भांति-भांति के कीट- पतंगे जमा हो गए थे। कई झींगुर उछल-उछलकर मुँह पर आ जाते थे और जैसे मनुष्य पर अपनी विजय का परिचय देकर उड़ जाते थे। एक बड़ा-सा अंखफोड़ भी मेज़ पर बैठा था और शायद जस्त मारने के लिए अपनी देह तौल रहा था। युवक ने एक पंखा लाकर मेज़ पर रख दिया, जिसने विजयी कीट-पतंगों को दिखा दिया कि मनुष्य इतना निर्बल नहीं है, जितना वे समझ रहे थे। एक क्षण में मैदान साफ हो गया और हमारी बातों में दखल देने वाला कोई न रहा।

युवक ने सकुचाते हुए कहा- ‘सम्भव है, आप मुझे अत्यन्त लोभी, कमीना और स्वार्थी समझें, लेकिन यथार्थ यह है कि इस विवाह से मेरी वह अभिलाषा न पूरी हुई, जो मुझे प्राणों से भी प्रिय थी। मैं विवाह पर रजामंद न था, अपने पैरों में बेड़ियाँ न डालना चाहता था, किन्तु जब महाशय नवीन बहुत पीछे पड़ गए और उनकी बातों से मुझे यह आशा हुई कि वह सब प्रकार से मेरी सहायता करने को तैयार हैं, तब मैं राजी हो गया, पर विवाह होने के बाद उन्होंने मेरी बात भी न पूछी। मुझे एक पत्र भी न लिखा कि कब तक वह मुझे विलायत भेजने का प्रबंध कर सकेंगे। हालांकि मैंने अपनी इच्छा उन पर पहले ही प्रकट कर दी थी, पर उन्होंने मुझे निराश करना ही उचित समझा। उनकी इस अकृपा ने मेरे सारे मनसूबे धूल में मिला दिए। मेरे लिए अब इसके सिवा और क्या रह गया है कि एल. एल. बी. पास कर लूँ और कचहरी में जूती फटकारता फिरूं।’ मैंने पूछा- ‘तो आखिर तुम नवीन जी से क्या चाहते हो? लेन-देन में तो उन्होंने शिकायत का कोई अवसर नहीं दिया। तुम्हें विलायत भेजने का खर्च तो शायद उनके काबू से बाहर हो।’

युवक ने सिर झुकाकर कहा- ‘तो यह उन्हें पहले ही मुझसे कह देना चाहिए था। फिर मैं विवाह ही क्यों करता? उन्होंने चाहे कितना ही खर्च कर डाला हो, पर इससे मेरा क्या उपकार हुआ? दोनों तरफ से दस-बारह हजार रुपये खाक में मिल गए और उनके साथ मेरी अभिलाषाएँ भी खाक में मिल गई। पिताजी पर तो कई हजार का ऋण हो गया है। वह अब मुझे इंग्लैण्ड नहीं भेज सकते। क्या पूज्य नवीन जी चाहते तो मुझे इंग्लैण्ड न भेज देते? उनके लिए दस-पाँच हजार की कोई हकीकत नहीं।’

मैं सन्नाटे में आ गया। मेरे मुँह से अनायास निकल गया- ‘छिः वाह री दुनिया! और वाह रे हिन्दू-समाज। तेरे यहाँ ऐसे-ऐसे स्वार्थ के दास पड़े हुए हैं, जो एक अबला का जीवन संकट में डालकर, उसके पिता पर ऐसा अत्याचार पूर्ण दबाव डालकर ऊंचा पद प्राप्त करना चाहते हैं। विद्यार्जन के लिए विदेश जाना बुरा नहीं। ईश्वर सामर्थ्य दे तो शौक से जाओ, किन्तु पत्नी का परित्याग करके ससुर पर इसका भार रखना निर्लज्जता की पराकाष्ठा है। तारीफ की बात तो तब थी कि तुम अपने पुरुषार्थ से जाते। इस तरह किसी की गर्दन पर सवार होकर, अपना आत्मसम्मान बेचकर गए, तो क्या गए? इस पामर की दृष्टि में कुसुम का कोई मूल्य ही नहीं। वह केवल उसकी स्वार्थसिद्धि का साधन मात्र है। ऐसे नीच प्रकृति के आदमी से कुछ तर्क करना व्यर्थ था। परिस्थिति ने हमारी चुटिया उसके हाथ में दे रखी थी और हमें उसके चरणों पर सिर झुकाने के सिवाय और कोई उपाय न था।

दूसरी गाड़ी से मैं आगरे जा पहुँचा और नवीन जी से यह वृत्तान्त कहा। उन बेचारे को क्या मालूम था कि यहाँ सारी जिम्मेदारी उन्हीं के सिर डाल दी गई है। यद्यपि इस मंदी ने उनकी वकालत भी ठण्डी कर रखी है और वह दस-पाँच हजार का खर्च सुगमता से नहीं उठा सकते, लेकिन इस युवक ने उनसे इसका संकेत भी किया होता, तो वह अवश्य कोई-न-कोई उपाय करते। कुसुम के सिवा दूसरा उनका कौन बैठा हुआ है? उन बेचारे को तो इस बात का ज्ञान ही न था। अतएव मैंने ज्यों ही उनसे यह समाचार कहा, तो वह बोल उठे- ‘छि! इस जरा- सी बात को इस भले आदमी ने इतना तूल दे दिया। आप आज ही उसे लिख दें कि वह जिस वक्त जहाँ पढ़ने के लिए जाना चाहे, शौक से जा सकता है। मैं उसका सारा भार स्वीकार करता हूँ। साल-भर तक निर्दयी ने कुसुम को रुला- रुलाकर मार डाला।’

घर में इसकी चर्चा हुई। कुसुम ने भी माँ से सुना। मालूम हुआ, एक हजार का चेक उसके पति के नाम भेजा जा रहा है, पर इस तरह, जैसे किसी संकट का मोचन करने के लिए अनुष्ठान किया जा रहा हो।

कुसुम ने भृकुटी सिकोड़ कर माँ से कहा- ‘अम्मा दादा से कह दो, कहीं रुपये भेजने की जरूरत नहीं।’

माता ने विस्मित होकर बालिका की ओर देखा- ‘कैसे रुपये? अच्छा! वह! क्यों इसमें क्या हर्ज है? लड़के का मन है, तो विलायत जाकर पढ़े। हम क्यों रोकने लगे? यों भी उसी का है, वो भी उसी का है। हमें कौन छाती पर लादकर ले जाना है।’

‘नहीं, आप दादा से कह दीजिए, एक पाई न भेजें।’

‘आखिर इसमें क्या बुराई है?’

‘इसीलिए कि यह उसी तरह की डाकाजनी है, जैसे बदमाश लोग किया करते हैं। किसी आदमी को पकड़कर ले गए और उसके घरवालों से उसके मुक्तिधन के तौर पर अच्छी रकम ऐंठ ली।’

माता ने तिरस्कार की आँखों से देखा। ‘कैसी बातें करती हो बेटी? इतने दिनों के बाद तो जाके देवता सीधे हुए हैं, और तुम उन्हें फिर चिढ़ाए देती हो।’

कुसुम ने झल्लाकर कहा- ‘ऐसे देवता का रूठे रहना ही अच्छा है। जो आदमी इतना स्वार्थी, इतना दम्भी, इतना नीच है, उसके साथ मेरा निर्वाह न होगा। मैं कहे देती हूँ वहाँ रुपये गए, तो मैं जहर खा लूंगी। इसे दिल्लगी न समझना। मैं ऐसे आदमी का मुँह भी नहीं देखना चाहती। दादा से कह देना और अगर तुम्हें डर लगता हो, तो मैं खुद कह दूँ। मैंने स्वतन्त्र रहने का निश्चय कर लिया है।’ माँ ने देखा, लड़की का मुख-मण्डल आरक्त हो उठा है, मानो इस प्रश्न पर वह न कुछ कहना चाहती है, न सुनना।

दूसरे दिन नवीन जी ने यह हाल मुझसे कहा, तो मैं एक आत्मविस्मृति की दशा में दौड़ा हुआ गया और कुसुम को गले लगा लिया। मैं नारियों में ऐसा ही आत्माभिमान देखना चाहता हूँ। कुसुम ने वही कर दिखाया, जो मेरे मन में था और जिसे प्रकट करने का साहस मुझमें न था।

साल-भर हो गया है, कुसुम ने पति के पास एक पत्र भी नहीं लिखा और न उसका जिक्र ही करती है। नवीन जी ने कई बार जमाई को मना लाने की इच्छा प्रकट की, पर कुसुम उसका नाम भी सुनना नहीं चाहती। उसमें स्वावलम्बन की ऐसी दृढ़ता आ गई है कि आश्चर्य होता है। उसके मुख पर निराशा और वेदना के पीलेपन और तेजहीनता की जगह स्वाभिमान और स्वतन्त्रता की लाली और तेजस्विता भासित हो गई है।