eeshvareey nyaay by Munshi Premchand
eeshvareey nyaay by Munshi Premchand

रात के दस बज गए। मुंशी सत्यनारायण कुंजियों का एक गुच्छा कमर में दबाए घर से बाहर निकले। द्वार पर थोड़ा-सा पुआल रखा हुआ था। उसे देखते ही वे चौंक पड़े। मारे डर के छाती धड़कने लगी। जान पड़ा कि कोई छिपा बैठा है। कदम ठिठक गए। पुआल की तरफ ध्यान से देखा। उसमें बिलकुल हरकत न हुई। तब हिम्मत बांधी, आगे बढ़े और मन को समझाने लगे – मैं कैसा बौखल हूं।

अपने द्वार पर किसका डर और सड़क पर भी मुझे किसका डर है? मैं अपनी राह जाता हूं। कोई मेरी तरफ तिरछी आंख से नहीं देख सकता। हां, जब मुझे सेंध लगाते देख ले – नहीं, पकड़ ले – तब अलबत्ता डरने की बात है। जिस पर भी बचाव की युक्ति निकल सकती

अकस्मात् उन्होंने भानुकुंवरि के एक चपरासी को आते हुए देखा। कलेजा धड़क उठा। लपक कर एक अंधेरी गली में घुस गए। बड़ी देर तक वहां खड़े रहे। जब वह सिपाही आंखों से ओझल हो गया, तब फिर सड़क पर आये। वह सिपाही आज सुबह तक इनका गुलाम था, उसे उन्होंने कितनी ही बार गालियां दी थी, लातें भी मारी थी, पर आज उसे देखकर उनके प्राण सूख गए।

उन्होंने फिर तर्क की शरण ली। मैं मानो भांग खाकर आया हूं। इस चपरासी से इतना डरा, मानो कि वह मुझे देख लेता, पर मेरा कर क्या सकता था? हजारों आदमी रास्ता चल रहे हैं। उन्हीं में मैं भी एक हूं। क्या वह अंतर्यामी है। सबके हृदय का हाल जानता है? मुझे देखकर वह अदब से सलाम करता और वहां का कुछ हाल भी कहता, पर मैं उससे ऐसा डरा कि सूरत तक न दिखाई। इस तरह मन को समझाकर वे आगे बढ़े। सच है, पाप के पंजों में फंसा हुआ मन पतझड़ का पत्ता है, जो हवा के जरा-से झोंके से गिर पड़ता है।

मुंशीजी बाजार पहुंचे। अधिकतर दुकानें बंद हो चुकी थी। उनमें सांड़ और गायें बैठी हुई जुगाली कर रही थी। केवल हलवाईयों की दुकानें खुली थी और कहीं-कहीं गजरे वाले हार की हांक लगाते फिरते थे। सब हलवाई मुंशीजी को पहचानते थे, अतएव मुंशीजी ने सिर झुका लिया। कुछ चाल बदली और लपकते हुए चले। एकाएक उन्हें एक बग्घी आती दिखाई दी। यह सेठ बल्लभदास वकील की बग्घी थी। इसमें बैठकर हजारों बार सेठजी के साथ कचहरी गए थे पर आज वह बग्घी कालदेव के समान भयंकर मालूम हुई। फौरन एक खाली दुकान पर चढ़ गए। वहां विश्राम करने वाले सांड़ ने समझा, वे मुझे पदच्युत करने आये हैं। माथा झुकाए फुंकारता हुआ उठ बैठा पर इसी बीच में बग्घी निकल गई और मुंशीजी की जान-में-जान आई। अबकी उन्होंने तर्क का आश्रय न लिया। समझ गए कि इस समय इससे कोई लाभ नहीं, खैरियत यह हुई कि वकील ने देखा नहीं। वह एक घाघ है। मेरे चेहरे से ताड़ जाता।

कुछ विद्वानों का कथन है कि मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति पाप की ओर होती है, पर वह कोरा अनुमान-ही-अनुमान है, अनुभव-सिद्ध बात नहीं। सच बात तो यह है कि मनुष्य स्वभावतः पाप-भीरु होता है और हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि पाप से उसे कैसी घृणा होती है। एक र्फ्लांग आगे चलकर मुंशीजी को एक गली मिली। यह भानुकुंवरि के घर का एक रास्ता था। धुंधली-सी लालटेन जल रही थी। जैसा मुंशीजी ने अनुमान किया था, पहरेदार का पता न था। अस्तबल में चमारों के यहां नाच हो रहा था। कई चमारिने बनाव-सिंगार करके नाच रही थी। चमार मृदंग बजा-बजाकर गाते थे –

‘नाही घरे श्याम, घेरि आए बदरा।

सोवत रहेउं सपन एक देखेउं रामा।

खुली गई नींद, ढरक गए कजरा।

नहीं घरे श्याम, घेरि आए बदरा।’

दोनों पहरेदार वहीं तमाशा देख रहे थे। मुंशीजी दबे-पांव लालटेन के पास गये और जिस तरह बिल्ली चूहे पर झपटती है, उसी तरह उन्होंने लपक कर लालटेन को बुझा दिया। एक पड़ाव पूरा हो गया, पर वह उस कार्य को जितना दुष्कर समझते थे, उतना न जान पड़ा। हृदय कुछ मजबूत हुआ। दफ्तर के बरामदे में पहुंचे और खूब कान लगाकर आहट ली। चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। केवल चमारों का कोलाहल सुनाई देता था। इस समय मुंशीजी के दिल में धड़कन थी, पर सिर धमधम कर रहा था, हाथ-पांव कांप रहे थे, सांस बड़े वेग से चल रही थी। शरीर का एक-एक रोम आंख और कान बना हुआ था – वे सजीवता की मूर्ति हो रहे थे। उनमें जितना पौरुष, जितनी चपलता, जितना साहस, जितनी चेतना, जितनी बुद्धि, जितना औसान था, वे सब इस वक्त सजग और सचेत होकर इच्छा-शक्ति की सहायता कर रहे थे।

दफ्तर के दरवाजे पर वही पुराना ताला लगा हुआ था। इसकी कुंजी आज बहुत तलाश करके वे बाजार से लाए थे। ताला खुल गया, किवाड़ों ने बहुत दबी जबान से प्रतिरोध किया। इस पर किसी ने ध्यान न दिया। मुंशीजी दफ्तर में दाखिल हुए। भीतर चिराग जल रहा था। मुंशीजी को देखकर उसने एक दफे सिर हिलाया, मानों उन्हें भीतर जाने से रोका।

मुंशीजी ने पैर थर-थर कांप रहे थे। एड़ियां जमीन से उछली पड़ती थीं। पाप का बोझ उन्हें असह्य था।

पल भर में मुंशीजी ने बहियों को उलटा-पुल्टा, लिखावट उनकी आंखों में तैर रही थी। इतना अवकाश कहां था कि जरूरी कागजात छांट लेते। उन्होंने सारी बहियों को समेटकर एक गट्ठर बनाया और सिर पर रखकर तीर के समान कमरे के बाहर निकल आए। उस पाप की गठरी को लादे हुए वह अंधेरी गली से गायब हो गए।

तंग, अंधेरी, दुर्गंधपूर्ण कीचड़ से भरी हुई गलियों में वे नंगे पांव, स्वार्थ लोभ और कपट का बोझ लिये चले जाते थे। आगे पापमय आत्मा नरक की नालियों में बही चली जाती थी। बहुत दूर तक भटकने के बाद वे गंगा के किनारे पहुंचे। जिस तरह कलुषित हृदय में कहीं-कहीं धर्म का धुंधला प्रकाश रहता है, उसी तरह नदी की काली सतह पर तारे झिलमिला रहे थे। तट पर कई साधु धूनी जमाए पड़े थे। ज्ञान की ज्वाला मन की जगह बाहर दहक रही थी। मुंशीजी ने अपना गट्ठर उतारा और चादर से खूब मज़बूत बांधकर बलपूर्वक नदी में फेंक दिया। सोती हुई लहरों में कुछ हलचल हई और फिर सन्नाटा हो गया।

मुंशी सत्यनारायण लाल के घर में दो स्त्रियां थी – माता और पत्नी। वे दोनों अशिक्षित थीं। तिस पर भी मुंशीजी को गंगा में डूब मरने या कहीं भाग जाने की जरूरत न होती थी। न वे बॉडी पहनती थी, न मोजे-जूते, न हारमोनियम पर गा सकती थीं। यहां तक कि उन्हें साबुन लगाना भी न आता था। हेयरपिन, ब्रूचेव, जाकेट आदि परमावश्यक चीजों का तो उन्होंने नाम ही नहीं सुना था। बहू में आत्म-सम्मान जरा भी नहीं था, न सास में आत्म-गौरव का जोश। बहू अब तक सास की घुड़कियां भीगी बिल्ली की तरह सह लेती थी – हा मूर्खे सास को नहलाने-धुलाने, यहां तक कि घर में झाडू देने से घृणा न थी। हां ज्ञानांधे बहू स्त्री क्या थी, मिट्टी का लौंदा थी। एक पैसे की जरूरत होती तो सास से मांगती। सारांश यह है कि दोनों स्त्रियां अपने अधिकारों से बेखबर, अंधकार में पड़ी हुई पशुवत् जीवन व्यतीत करती थी। ऐसी फूहड़ थीं कि रोटियां भी अपने हाथों से बना लेती थीं। कंजूसी के मारे दालमोट, समोसे कभी बाजार से न मगांती। आगरे वाले की दुकान की चीजें खायी होती तो उनका मजा जानती। बुढ़िया खूसट दवा-दरपन भी जानती थी। बैठी-बैठी घास-पात कूटा करती।

मुंशीजी ने मां के पास जाकर कहा – ‘अम्मा! अब क्या होगा? भानुकुंवरि ने मुझे जवाब दे दिया।’

माता ने घबराकर पूछा – ‘जवाब दे दिया?’

मुंशी – ‘हां, बिलकुल बेकसूर!’

आता – ‘क्या बात हुई? भानुकुंवरि का मिज़ाज तो ऐसा न था।’

मुंशी – ‘बात कुछ न थी। मैंने अपने नाम से जो गांव लिया था, उसे मैंने अपने अधिकार में कर लिया। कल मुझसे और उनसे साफ-साफ बातें हुई। मैंने कह दिया कि गांव मेरा है। मैंने अपने नाम से लिया है, उसमें तुम्हारा कोई इजारा नहीं। बस, बिगड़ गई, जो मुंह में आया, बकती रही। उसी वक्त मुझे निकाल दिया और धमकाकर कहा – मैं तुमसे लड़कर अपना गांव ले लूंगी। अब आज ही उनकी तरफ से मेरे ऊपर मुकदमा दायर होगा, मगर इससे होता क्या है? गांव मेरा है उस पर मेरा कब्जा है। एक नहीं, हजार मुकदमें चलाएं, डिग्री मेरी होगी।’

माता ने बहू की तरफ मर्मांतक दृष्टि से देखा और बोली – ‘क्यों भैया, वह गांव लिया तो था तुमने उन्हीं के रुपये से और उन्हीं के वास्ते?’

मुंशी ‘लिया था, तब लिया था। अब मुझसे आबाद और मालदार गांव नहीं छोड़ा जाता। वह मेरा कुछ नहीं कर सकतीं। मुझसे अपना रुपया भी नहीं ले सकतीं। डेढ़ सौ गांव तो हैं। तब भी हवस नहीं मानती।’

माता – ‘बेटा, किसी के धन ज्यादा होता है, तो वह उसे फेंक थोड़े ही देता है? तुमने अपनी नियत बिगाड़ी, यह अच्छा काम नहीं किया। दुनिया तुम्हें क्या कहेगी? और दुनिया चाहे कहे-न-कहे, तुमको भला ऐसा चाहिए कि जिसकी गोद में इतने दिन पले, जिसका इतने दिनों तक नमक खाया, अब उसी से दगा करो? नारायण ने तुम्हें क्या नहीं दिया? मजे से खाते हो, पहनते हो, घर में नारायण का दिया चार पैसा है, बाल-बच्चे हैं, और क्या चाहिए? मेरा कहना मानो, इस कलंक का टीका अपने माथे न लगाओ। यह अपजस मत लो। बरकत अपनी कमाई में होती है। हराम की कौड़ी कभी नहीं फलती।’

मुंशी – ‘उंह ऐसी बातें बहुत सुन चुका हूं। दुनिया उन पर चलने लगे, तो सारे काम बंद हो जायें। मैंने इतने दिनों इनकी सेवा की, मेरी ही बदौलत ऐसे-ऐसे चार-पांच गांव बढ़ गए। जब तक पंडितजी थे, मेरी नियत का मान था। मुझे आंख में धूल डालने की जरूरत न थी, वे आप ही मेरी खातिर कर दिया करते थे। उन्हें मरे आठ साल हो गए, मगर मुसम्मात के एक बीड़े पान की कसम खाता हूं, मेरी जात से उनकी हजारों रुपये मासिक की बचत होती थी। क्या उनको इतनी भी समझ न थी कि यह बेचारा, जो इतनी ईमानदारी से काम करता है, इस नफे में कुछ उसे भी मिलना चाहिए? यह कहकर न दो, इनाम कहकर दो, किसी तरह दो तो, अगर वे तो समझती थीं कि मैंने इसे बीस रुपये महीने पर मोल ले लिया है। मैंने आठ साल तक सब्र किया, अब क्या इसी बीस रुपये में गुलामी करता रहूं और अपने बच्चों को दूसरों का मुंह ताकने के लिए छोड़ जाऊं? अब मुझे यह अवसर मिला है। इसे क्यों छोड़ूं? जमींदारों की लालसा लिये हुए क्यों मरूं, जब तक जीऊंगा, खुद खाऊंगा, मेरे पीछे मेरे बच्चे चैन उड़ाए।’

माता की आंखों में आंसू भर आए बोली – ‘बेटा, मैंने तुम्हारे मुंह से ऐसी बातें कभी नहीं सुनी थीं, तुम्हें क्या हो गया है? तुम्हारे आगे बाल-बच्चे हैं। आग में हाथ न डालो।’

बहू ने सास की ओर देखकर कहा – ‘हमको ऐसा धन न चाहिए, हम अपनी दाल-रोटी में मग्न है।’

मुंशी – ‘अच्छी बात है, तुम लोग रोटी-दाल खाना, गाढ़ा पहनना। मुझे अब हलुवा-पूरी की इच्छा है।’

माता – ‘यह अधर्म मुझसे न देखा जायेगा। मैं गंगा में डूब मरूंगी।’

पत्नी – ‘तुम्हें यह सब कांटा बोना है, तो मुझे मायके पहुंचा दो, मैं अपने बच्चों को लेकर इस घर में न रहूंगी।’

मुंशी ने झुंझलाकर कहा – ‘तुम लोगों की बुद्धि तो भांग खा गई है। लाखों सरकारी नौकर रात-दिन दूसरों का गला दबा-दबाकर रिश्वत लेते हैं और चैन करते हैं। न उनके बाल-बच्चों ही को कुछ होता है, व उनको हैजा पकड़ता है। अधर्म उनको क्यों नहीं खा जाता, जो मुझ को खा जायेगा? मैंने तो सत्यवादियों को सदा दुःख झेलते ही देखा है। मैंने जो कुछ किया है, उसका सुख लूटूंगा। तुम्हारे मन जो आए करो।’

प्रातःकाल दफ्तर खुला तो कागजात सब गायब थे। मुंशी छक्कनलाल बौखलाए से घर में गए और मालकिन से पूछा – ‘कागजात आपने उठा लिए हैं?’

भानुकुंवरि – ‘मुझे क्या खबर, जहां आपने रखे होंगे, वहीं होंगे।’

फिर सारे घर में खलबली पड़ गई। पहरेदारों पर मार पड़ने लगी। भानुकुंवरि को तुरंत मुंशी सत्यनारायण पर संदेह हुआ, मगर उनकी समझ में छक्कनलाल की सहायता के बिना यह काम होना असम्भव था। पुलिस में रपट हुई। एक ओझा नाम निकालने के लिए बुलाया गया है। मौलवी साहब ने तुर्रा फेंका। ओझा ने बताया, ‘यह किसी पुराने बैरी का काम है।’ मौलवी साहब ने फरमाया, किसी घर के भेदिया ने यह हरकत की है। शाम तक यह दौड़-धूप रही। फिर सलाह होने लगी कि इन कागजात के बगैर मुकदमा कैसे चले। पक्ष तो पहले ही से निर्बल था। जो कुछ बल था, वह इसी बही-खाते का था। अब तो सबूत भी हाथ से गए। दावे में कुछ जान ही न रही, मगर भानुकुंवरि ने कहा – ‘बला से हार जायेंगे। हमारी चीज कोई छिन ले, तो हमारा धर्म है कि उससे यथाशक्ति लड़ें, हारकर बैठ रहना कायरों का काम है। सेठजी (वकील) को इस दुर्घटना का समाचार मिला, तो उन्होंने भी यही कहा कि अब दावे में जरा भी जान नहीं है। केवल अनुमान और तर्क का भरोसा है। अदालत ने माना तो माना, नहीं तो हार माननी पड़ेगी।’ पर भानुकुंवरि ने एक न मानी। लखनऊ और इलाहाबाद से दो होशियार बैरिस्टर बुलाए। मुकदमा शुरू हो गया।

सारे शहर में इस मुकदमा शुरू होने के समय हजारों आदमियों की भीड़ हो जाती थी। लोगों के इस खिंचाव का मुख्य कारण यह था कि भानुकुंवरि एक पर्दे की आड़ में बैठी हुई अदालत में कार्रवाई देखा करती थी, क्योंकि उसे अब अपने नौकरों पर जरा भी विश्वास न था।

वादी बैरिस्टर ने एक बड़ी मार्मिक वक्तृता दी। उसने सत्यनारायण की पूर्वावस्था का खूब अच्छा चित्र खींचा। उसने दिखलाया कि वे कैसे स्वामिभक्त, कैसे कार्यकुशल, कैसे कर्मशील थे और स्वर्गवासी पंडित भृगुदत्त का उन पर पूर्ण विश्वास हो जाना किस तरह स्वाभाविक था। इसके बाद उसने सिद्ध किया कि मुंशी सत्यनारायण की आर्थिक व्यवस्था कभी ऐसी न थी कि वे इतना धन-संचय करते। अंत में उसने मुंशीजी की स्वार्थपरता, कूटनीति, निर्दयता और विश्वास-घात का ऐसा घृणोत्पादक चित्र खींचा कि लोग मुंशीजी को गालियां देने लगे। इसके साथ ही उसने पंडित के अनाथ बालकों की दशा का बड़ा ही करुणोत्पादक वर्णन किया – कैसे शोक और लज्जा की बात है कि ऐसा चरित्रवान, ऐसा नीतिकुशल मनुष्य इतना गिर जाय कि अपने स्वामी के अनाथ बालकों की गर्दन पर छुरी चलाने में संकोच न करे। मानव-पतन का ऐसा करुण, ऐसा हृदयविदारक उदाहरण मिलना कठिन है। इस कुटिल कार्य के परिणाम की दृष्टि से इस मनुष्य के पूर्व परिचित सद्गुणों का गौरव लुप्त हो जाता है। क्योंकि वे असली मोती नहीं, नकली कांच के दाने थे, जो केवल विश्वास जमाने के निमित्त दर्शाए गए थे। वह केवल सुन्दर जाल था, जो एक सरल हृदय और छल-छंद से दूर रहने वाले रईस को फंसाने के लिए फैलाया गया था। इस नर-पशु का अंतःकरण कितना अंधकारमय, कितना कपटपूर्ण, कितना कठोर है, और इसकी पृथ्वी कितनी घोर और कितनी अपावन है। अपने शत्रु के साथ दया करना एक बार तो क्षम्य है, मगर इस मलिन हृदय मनुष्य ने उन बेकसूर के साथ दगा किया है, जिन पर मानव-स्वभाव के अनुसार दया करना उचित है। यदि आज हमारे पास बही-खाते मौजूद होते, अदालत पर सत्यनारायण पर सत्यता स्पष्ट रूप से प्रकट हो जाती, पर मुंशी के बरखास्त होते ही दफ्तर से उनका लुप्त हो जाना भी अदालत के लिए एक बड़ा सबूत है।

शहर के कई बड़े रईसों ने गवाही दी, पर सुनी-सुनाई बातें जिरह में उखड़ गई।

दूसरे दिन फिर मुकदमा पेश हुआ।

प्रतिवादी के वकील ने अपनी वक्तृता शुरू की। उसमें गम्भीर विचारों की अपेक्षा हास्य का आधिक्य था – ‘यह एक विलक्षण न्याय-सिद्धांत है कि किसी धनाढ्य मनुष्य का नौकर जो कुछ खरीदे, वह उसके स्वामी की चीज समझी जाय। इस सिद्धांत के अनुसार हमारी गवर्नमेंट को अपने कर्मचारियों की सारी सम्पत्ति पर कब्जा कर लेना चाहिए। यह स्वीकार करने में हमें कोई आपत्ति नहीं कि हम इतने रुपयों का प्रबंध न कर सकते थे और यह धन हमने स्वामी ही से ऋण लिया, पर हमसे ऋण चुकाने का कोई तुलना न करके वह जायदाद ही मांगी जाती है। यदि हिसाब के कागजात दिखाए जाय, तो वे साफ बता देंगे कि मैं सारा ऋण दे चुका। हमारे मित्र ने कहा कि ऐसी अवस्था में बहियों का गुम हो जाना भी अदालत के लिए एक सबूत होना चाहिए। मैं भी उनकी युक्ति का समर्थन करता हूं। यदि मैं ऋण लेकर अपना विवाह करूं तो क्या आप मुझसे मेरी नव-विवाहित वधू को छीन लेंगे?’

हमारे सुयोग्य मित्र ने हमारे ऊपर अनाथों के साथ दगा करने का दोष लगाया है। अगर मुंशी सत्यनारायण की नीयत खराब होती, तो उनके लिए सबसे अच्छा अवसर वह था, जब पंडित भृगुदत्त का स्वर्गवास हुआ था। इतने विलम्ब की क्या जरूरत थी? यदि आप शेर को फंसाकर उसके बच्चे को उसी वक्त नहीं पकड़ लेते, उसे बढ़ने और सबल होने का अवसर देते हैं, तो मैं आपको बुद्धिमान न कहूंगा। यथार्थ बात यह है कि मुंशी सत्यनारायण ने नमक का जो कुछ हक था, वह पूरा कर दिया। आठ वर्ष तक तन-मन से स्वामी की संतान की सेवा की। आज उन्हें अपनी साधुता का जो फल मिल रहा है, वह बहुत ही दुःखकारक और हृदय-विदारक है। इसमें भानुकुंवरि का दोष नहीं। वे एक गुण-सम्पन्न महिला हैं, मगर अपनी जाति के अवगुण उनमें भी विद्यमान हैं। ईमानदार मनुष्य स्वभावतः स्पष्टवादी होता है। उसे अपनी बातों में नमक-मिर्च लगाने की जरूरत नहीं होती। यही कारण है कि मुंशीजी के मितभाषी मातहतों को उन पर आक्षेप करने का मौका मिल गया। इस दावे की जड़ केवल इतनी ही है, और कुछ नहीं। भानुकुंवरि यहां उपस्थित हैं। क्यों वे कह सकती है कि इन आठ वर्षों की मुद्दत में कभी इस गांव का जिक्र उनके सामने आया? कभी उसकी हानि-लाभ, आय-व्यय, लेन-देन की चर्चा उनसे की गई? मान लीजिए कि मैं गवर्नमेंट का मुलाजिम हूं। यदि मैं आज दफ्तर में आकर अपनी पत्नी के आय-व्यय और अपने टहलुओं के बक्सों का पचड़ा गाने लगूं तो शायद मुझे शीघ्र ही अपने पद से पृथक होना पड़े, और सम्भव है, कुछ दिनों तक बरेली की विशाल, अतिथिशाला में भी रखा जाऊं। जिस गांव से भानुकुंवरि का सरोकार न था, उसकी चर्चा उनसे क्यों की जाती?’

इसके बाद बहुत-से गवाह पेश हुए, जिनमें अधिकांश आस-पास के देहातों के जमींदार थे। उन्होंने बयान किया कि हमने मुंशी सत्यनारायण को असामियों को अपनी दस्तखती रसीद देते हुए अपने नाम से खजाने में रुपया दाखिल करते देखा है।

इतने में संध्या हो गई। अदालत ने एक सप्ताह में फैसला सुनाने का हुक्म दिया।