सत्यम् शिवम् सुन्दरम् जीवन की शिखर यात्र के अनुपमे सोपान है। इसी खोज में भगवान महावीर ने तप चरण किया, बुद्ध ने राज्य त्यागा एवं ईसा ने सूली स्वीकार की। फ्रांस के इतिहास में मंसूर नामक साधु के साथ जो घटा, वह मानवता के इतिहास में सदैव-सदैव स्मरणीय रहने योग्य है। कहते है सारे जीवन मंसूर ने प्रेम और वात्सल्य की शिक्षायें दी। प्रेम को परमात्मा प्रतिष्ठा का दर्जा दिया।
मंसूर एक दार्शनिक के रूप में विख्यात हुआ। फ्रांस के परम्परावादी लोगों को कैसे यह ठीक लगता। मंसूर को। मौत के घाट उतारे जाने के लिये फ्रांस के लोग अमादा हो गये। फिर जिस कारूणिक ढंग से मंसूर का जीवन समाप्त किया गया से ढंग से विश्व के इतिहास में किसी और दार्शनिक के जीवन का अन्त नहीं हुआ है। सुकरात को एक बारगी जहर का प्याला दे दिया-मंसूर के सबसे पहले पैर काटे गये और पैर काटकर लोगों ने पूछा- तुम्हें कुछ कहना है। मंसूर ने उल्लास से कहा प्रेम ही जीवन है। फिर हाथ काटे गये और पूछा लोगों ने अब कुछ कहना है? मंसूर ने फिर वह दुहराया प्रेम ही जीवन है। क्रमशः उससे पूछा जाता और मंसूर फिर वही दुहराता कि प्रेम ही जीवन है। अन्त में जीभ काटने के पूर्व पूछा लोगों ने तो मंसूर के मृत्यु से पूर्व अन्तिम शब्द निकले प्रेम।
समष्टि के प्रति करुणा और वात्सल्य भाव से महापुरुषों का जीवन आदर्श का ऐसा ही विद्यालय बन जाता है। जो प्रेम समष्टिगत होते हुए प्रार्थना से जुड़ जाता है और प्रार्थना-स्वानुभूति की साधना रूपान्तरित होकर सत्यम् शिवम् सुन्दरम् को उपलब्ध होती है।
ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं–Anmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)
