भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
रात का समय था आकाश में तारे छिटक आये थे चाँद भी अपनी पूरी सुन्दरता को बिखेरते हुए मुस्कुरा रहा था। तभी खलिहान से एक बूढ़े की आवाज आती है। बेटी पूर्णिमा बाहर ठिठुरन है अंदर आ जा अलाव की गर्मी से ठण्ड थोड़ी दूर हो जाएगी। पूर्णिमा न जाने किसकी यादों को लिये हुए सपने संजोये हुए बुदबुदाते आसमान के चाँद को एकटक देख रही थी। उसकी भावना उसकी आँखों से टपक रही था। लग रहा था कि, वही भाव चाँदनी बनकर छिटक गया है। पूर्णिमा ने बचपन से गरीबी देखी भीखु ने भी जैसे गरीबी का दामन थामे अपनी जवानी खो दी थी। पूर्णिमा की माँ भी अपने अन्दर सपने संजोये कभी उसका नाम लक्ष्मी सार्थक हो समय बिताती रही। लेकिन भाग्य को क्या मंजूर है? यह बात तो वही जानता है जो ‘भाग्य विधाता है।’ लक्ष्मी की एक बेटी के अलावा एक बेटा भी था। नाम था उसका दीपक। जैसे-तैसे उसने स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी और उसे छोटी-सी नौकरी भी मिल गयी। फिर क्या था उसे कलयुगी माया ने जकड़ लिया उसे जैसे घमण्ड आ गया। जीवन जीने और निर्वाह करने के लिए वह पैसे कमा लेता था। लेकिन वह तो भूल बैठा कि, उसके घर में माँ एवं पिता जी के अतिरिक्त जवान बहन भी है जिसके हाथ पीले करने हैं।
अपने मद मे चूर दीपक को अंततः जीवन संगिनी मिल गयी दीपा जो उसी सिंचाई विभाग के लिपिक पद पर कार्यरत है। दोनों ऐसे मिले जैसे सोने में सुहागा। चूने में कत्था। अब क्या कहना! दीपक के पैर तो अब जमीन पर टिकते ही नहीं समय व्यतीत होता रहा! भला समय ने किसका इंतजार किया है? अब दीपक के चुन्नू और मुन्नू दो बेटे भी हैं। दोनों पहली और कक्षा चार के छात्र है। इधर माता लक्ष्मी को चिन्ता सता रही थी। क्या? मैंने करमजले को इसी दिन के लिए पाल पोसकर बड़ा किया, अरे! अगर थोड़ा-थोड़ा दोनों बच्चों को पढ़ा-लिखा देती तो आज मुझे पूर्णिमा के भविष्य का दुःख नहीं होता। पूर्णिमा यद्यपि मेहनती है लेकिन पाँचवी कक्षा पढ़ा होने के कारण भला वह किसे कहे कुछ काम ढूँढ़ दे। सिंचाई विभाग के बाबू की बहन को भला शोभा देगा कि, वह कहीं आस-पड़ोस में झाडू, पोछा, बर्तन कर आये। ऐसी सहमी पूर्णिमा ने तो भविष्य के सपने भी रात के अंधेरे में देखने शुरू कर दिये। उसे डर है कि, उसकी बीमार माँ को यह तपेदिक की बीमारी जल्दी न चर दे। क्या करें वह किसी युवक से प्रेम भी तो नहीं कर सकती क्योंकि उसके ऊपर बूढ़े पिता और बीमार माँ की जिम्मेदारी है। उसे भला कौन स्वीकारेगा। वह खुद भी तो कुछ कमा नहीं रही जिसका लाभ भी वह किसी को दे। समय बीतता गया। लक्ष्मी की खाँसी उसे खोखली करती चली गई। कुछ पैसे भी तो नहीं कि, बीमारी का सही ईलाज कराया जा सके। लक्ष्मी की आँखों में पूर्णिमा के आगे का जीवन सोचकर भी आँसू ढल जाते थे।
पूर्णिमा! पूर्णिमा! अरे ओ पूर्णिमा बेटी तुमने यह नहीं बताया की तेरा भाई दीपक कब आयेगा पूर्णिमा कहती है- माँ तुम भाई को इतना याद करती हो लेकिन वह है कि, तेरी सुध लेता ही नहीं फिर क्यों? याद करती है। माँ! लक्ष्मी ने कहा याद कैसे नहीं करूँगी। पूर्णिमा- “बस माँ अब चुप हो जा नहीं तो तेरी खाँसी सर चढ़कर बोलती है।” लक्ष्मी- कैसे! नहीं बोलू मेरा जीवन तो खटारा नाँव की तरह जोड़-तोड़कर खेने में बीता जा रहा है मैं नहीं चाहती की मेरे जाने के बाद तू अकेली रह जाये तेरे साथ बोलने बताने के लिए कोई न रहे। बेटी मैं चाहती हूँ तेरा भी घर हो खुशियाँ से तेरा दामन भर जाये नन्ने मन्ने की किलकारी से घर आँगन गँजें। पर्णिमा – माँ तू इतनी दु:खी मत हो वो तो देख रहा है जिसकी तू पूजा करती है बांसुरी बजाते तुझे चिढ़ा रहा है! क्यों घबरा रही है? लक्ष्मी इसका भाग्य लिख चुका है जो होगा अच्छा होगा।
भीखु की आवाज आती है क्या खुसुर-फुसुर में लगे हो भूख लगी है खाना लगा दो। लक्ष्मी कहती है कब ये खाँसी पीछा छोड़ेगी। मैं तो जीते जी मर गई हूँ। बिटिया का ब्याह नहीं किया; जैसे घर में नौकरानी बना ली। भीखु कहता है- भाग्यवान! करम का खेल किसी ने नहीं देखा कहीं हमारी पूर्णिमा की सुंदरता को देखकर कोई राजकुमार हाथ माँगने आ जाये। लक्ष्मी कहती है मनगढंत बातें करना छोड़ दो वो दीनानाथ की लड़की को देखा तुमने! घर भर की सेवा करते उम्र बीत गई। आज उसको कोई पूछने वाला नहीं। सभी गंगा नहाके चले गये माँ बाप तो चल दिये सारे पाप की गठरी बेटी के सिर मढ़ गये।
तभी पड़ोसन की आवाज आती है अरी पूर्णिमा! पूर्णिमा कहाँ है री देख तो मेरे समधियाने से कौन आया है? कौन है मौसी? मेरे दामाद का भाई! अरी देख तो भला। पूर्णिमा घर बुला चाय नास्ता करवाती है- मनोज पूछता हैआप कहाँ तक पढ़ी हैं? पूर्णिमा की आँखों से झर-झर आँसू टपकने लगते है। मनोज समझ जाता है कहने लगता है- अरे! क्या हुआ उम्र अभी नहीं निकली है। पाँचवी कक्षा तो उत्तीर्ण की है। पूर्णिमा हाँ लेकिन यह अशिक्षा है! अब आप आठवीं की प्राइवेट परीक्षा दीजिए। पर्णिमा ने सिर हिलाकर हामी भर दी अपने सपने को संजोये पढ़ने लगी आठवीं अब हाईस्कूल भी वक्त के साथ पूर्णिमा ने पास कर लिया है। मनोज से चिट्ठी पत्री से पूर्णिमा की बात होती थी और आगे की पढ़ाई का रास्ता खोजने लगती हैं। अब धीरे-धीरे पूर्णिमा स्नातक की पढ़ाई पूरी कर लेती हैं।
अपने काम में व्यस्त भविष्य का सपना बुनते माँ पिता की सेवा करते पूर्णिमा अपने पैरों पर खड़ा होने का सपना बुनने लगती है। साथ ही अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती हैं। दीपक तो जैसे माता-पिता को भूला अपने घर की सुध न लेता हुआ अपने खुशियों की तलाश में लगा रहता है। लेकिन यह भूलने वाली बात नहीं कि जिस बहन के कंधों पर इतना भार छोड़ गया था वह आज इतनी सबल हो जायेगी। इसका अंदेशा नहीं था। प्रकृति भी जैसे खशियों में शामिल हो गई है चारों ओर ठण्डी हवा चल रही है। शीत दाँत कैंपकपा रही है। लेकिन पूर्णिमा खुश है नौकरी जो मिल गई है। मास्टरनी जी जो ठहरी आठ तक के बच्चों को पढ़ाने वाली। डाकिया-आवाज देता है पोस्टमेन मनोज का पत्र देख खुशी से जैसे मन मोर हो जाता है। अब तो पूर्णिमा सपनों के ताने-बाने बुनते सपनों का राजकुमार मनोज को मन ही मन जैसे अपना चुकी है। मनोज का पत्र खोलते ही खशी का ठिकाना नहीं है? मनोज पत्र में पूर्णिमा से विवाह की इच्छा जाहिर करता है। तब क्या था पूर्णिमा मनोज को अपना सब कुछ मान चुकी थी।
लक्ष्मी और भीखु दोनों एक साथ आवाज लगाते हैं क्या हुआ बेटी? पत्र पिता के हाथ में थमाते हुए मनोज की बात पूर्णिमा माता-पिता को कह सुनाती है। आज लक्ष्मी और भीखु दोनों खुश हैं। पूर्णिमा के हाथ मनोज के हाथ में देकर आज पूर्णिमा खुश है। मनोज जो सपनों का राजकुमार ठहरा।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
