Panchtantra ki kahani कहानी नीलदेव की
Panchtantra ki kahani

किसी वन में एक सियार रहता था, जिसका नाम था चंडरव । एक दिन की बात, चंडरव सियार भटकते हुए एक गाँव में चला गया । गाँव के कुत्तों ने उसे देखा, तो उसके पीछे पड़कर बुरी तरह भौंकने लगे । चंडरव सियार कुत्तों से बचने के लिए तेजी से भागा । भागते-भागते वह एक धोबी के घर जा पहुँचा । धोबी के घर एक कुंड में नील घुला पड़ा था, जिसे कपड़े पर लगाया जाना था ।

भागते-भागते सियार धोबी के घर आया तो उसी कुंड में जा गिरा । वह उस कुंड से बाहर आया तो एकदम नीला हो चुका था । बाहर आकर सियार ने फिर भागने का रास्ता देखा । पर उसे यह देखकर अचरज हुआ कि वे कुत्ते जो उसके पीछे पड़े हुए थे, अब उसे देखते ही भाग गए ।

भला ये कुत्ते मुझे देखते ही क्यों भाग खड़े हुए? सियार की कुछ समझ में नहीं आ रहा था । वह सीधा जंगल की ओर भाग खड़ा हुआ । रास्ते में एक सरोवर था । सियार उस सरोवर में पानी पी रहा था, पर तभी अपनी शक्ल देखकर वह चौंक गया । उसे लगा कि “अरे, मैं तो एक निराला ही जीव बन गया । ‘’ अब उसे समझ में आया कि कुत्ते क्यों उसे देखते ही भाग गए थे?

जब चंडरव सियार जंगल में घूम रहा था तो उसके अद्भुत रूप को देखकर जंगल के सभी जानवर हैरान थे । खुद शेर की हालत खराब थी । शेर ने जंगल के जानवरों से कहा, “यह नीले रंग का अजीब सा प्राणी पता नहीं कौन है? कहा गया है कि अजनबी प्राणी से न मित्रता अच्छी है, न दुश्मनी । इसलिए हमें इससे दूर-दूर ही रहना चाहिए ।”

लिहाजा अब तो शेर ही नहीं, जंगल के सब जानवर उससे दूर-दूर ही रहते थे ।

चंडरव सियार ने यह देखा तो उसे लगा अपने इस नए-निराले रूप का फायदा उठाना चाहिए । उसने जंगल के जानवरों को पास बुलाया और बड़ी होशियारी से बात बनाते हुए कहा, “सुनो भई, सुनो! मैं सीधे ब्रह्मा जी के पास से आ रहा हूँ । उन्होंने मुझे जंगल के जीवों का राजा बनाकर धरती पर भेजा है । साथ ही आदेश दिया है कि तुम इस जंगल में जाकर राज-काज संभालो । मेरा नाम ककुद्रुम है । दूर-दूर तक मेरी ख्याति है । आज से मैं ही तुम्हारा राजा हूँ ।”

अब तो सभी ने आतंकित होकर उसे अपना राजा मान लिया । और जब जंगल के सारे जानवर उसकी शरण में आ गए तो शेर ने भी उसे राजा मानने में ही समझदारी समझी ।

बस, अब तो ककुद्रुम की मौज थी । उसने सभी काम दूसरों को बाँट किए । शेर, चीता, भेड़िया अब सभी उसके दरबारी थे । किसी को उसने मंत्री बनाया, किसी को द्वारपाल और किसी को पान लगाने का जिम्मा सौंप और खुद मस्ती से रहने लगा । उसके सहायक जो शिकार करते, उसका सबसे बढ़िया हिस्सा उसे खाने को मिलता । खाकर वह सियार खूब मोटा-ताजा और हृष्ट-पुष्ट हो गया ।

पर सियार के मन में डर तो था ही । उसने सोचा, ‘कहीं दूसरे सियार यह भेद न खोल दें कि मैं भी एक सियार ही हूं । तब तो मेरी सारी पोल खुल जाएगी ।’

लिहाजा उसने भेड़ियों से कहकर सभी सियारों को जंगल से बाहर निकलवा दिया ।

अब तो जंगल के सियार बहुत दुखी थे । सोच रहे थे, ‘अरे, हमारे साथ कितना बड़ा अन्याय हुआ हैं । भला जंगल से सियारों को ही क्यों निकाला गया, किसी और को क्यों नहीं?’

एक बूढ़े सियार ने कहा, “मुझे अच्छी तरह पता है, यह जो प्राणी राजा बना है, यह सियार ही है ।

“लेकिन इस बात को सही-सही पता कैसे चले कि यह सियार ही है, कोई और नहीं?” एक सियार ने कहा ।

इस पर उस बूढ़े सियार ने कहा, “तुम सब मिलकर हुआँ-हुआँ करो । जब राजा बना ककुद्रुम यह सुनेगा तो वह भी तुम्हारे स्वर में स्वर मिलाकर हुआँ-हुआं करेगा । बस, उसकी पहचान हो जाएगी ।”

बस, उसी समय सब सियारों ने मिलकर हुआँ-हुआँ करके अपने राग अलापना शुरू किया । राजा बना सियार भी भला कैसे रह पाता? उसने भी उसी समय मगन होकर हुआँ-हुआँ राग अलापना शुरू किया ।

सुनते ही शेर, बाघ, चीता सब एक-दूसरे की ओर हैरान होकर देखने लगे । वे समझ गए कि अरे, यह तो सियार है, हमसे चालाकी कर रहा है ।

‘ओह, इतना बड़ा धोखा!’ गुस्से में आकर उसी समय सिंह ने एक ही छलाँग में राजा बने सियार को दबोच लिया । बाकी जानवरों ने मिलकर उसका काम तमाम कर दिया ।

यों छल और पाखंड के सहारे शक्तिशाली बना सियार आखिर मारा गया । ढोंगी आदमी की कभी न कभी तो कलई खुलती ही है । तब उसकी बड़ी बुरी हालत होती है, जैसे नीलदेव बने सियार की!