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पात्र-परिचय हवा दीदी निक्का, निक्की तथा कुछ और बच्चे व्यापारी वर्द्धमान, उसकी पत्नी, व्यापारी के दो बैल संजीवक और नंदक पिंगलक शेर, दमनक तथा जंगल के अन्य जानवर

पहला दृश्य

(स्थान–गली या मोहल्ले के पास वाला खेल का मैदान, जिसमें एक तरफ बच्चे खड़े-खड़े बातें कर रहे हैं। तभी हवा तेजी से बहती हुई आती है और बच्चों को मजे से बातें करते और खेलते देख, ठिठक जाती है। फिर हवा दीदी बच्चों के पास आकर बड़े उत्साह से बताने लगती है….)

हवा दीदी : अरे भई, निक्का-निक्की और सब बच्चे दौड़कर आओ। जल्दी! सुनो-सुनो, आज का किस्सा।

निक्का : (उत्सुकता से) आज का किस्सा…? आज क्या हुआ हवा दीदी?

निक्की : हाँ-हाँ बताओ ना, हवा दीदी।

हवा दीदी : बताती हूँ…बताती हूँ। अरे, जरा दम तो लेने दो। देखते नहीं हो, कितने हजारों मील से दौड़ती चली आ रही हूँ तुम्हें यह मजेदार किस्सा सुनाने के लिए?

निक्का : (चकित होकर) हजारों मील !

निक्का : हजारों मील…?

हवा दीदी : हाँ-हाँ, हजारों मील दूर। वहीं तो मुझे सुनाई दिया था यह अजब-अनोखा किस्सा। नहीं-नहीं, दिखाई दिया था यह किस्सा एक अजब-अनोखे नाटक की शक्ल में।

निक्का : नाटक…!

निक्का : अजब-अनोखा…?

हवा दीदी : हाँ-हाँ, असल में यह अनोखा किस्सा है पंचतंत्र का। और जंगल में हाथीराज गज्जू दादा इस पर जंगल के जानवरों को इकट्ठा करके एक मजेदार नाटक कर रहे थे।

निक्की : ऐं, सच्ची-मुच्ची…?

हवा दीदी : और क्या झूठ? लो, तुम भी देखो दिल को छूने वाला यह मजेदार रंगारंग नाटक।

दूसरा दृश्य

(स्थान-वर्द्धमान नाम के व्यापारी का घर। उसके पास धन-धान्य सब कुछ था। किसी चीज की कमी नहीं थी। फिर भी उसके मन में आया कि अब अपने व्यापार को और बढ़ाना चाहिए। आखिर उसने व्यापार के सिलसिले में मथुरा नगरी जाने का निर्णय किया। पति को बाहर जाने की तैयारी करते देख, पत्नी को हैरानी हुई।)

पत्नी : आखिर आपको यहाँ किस चीज की कमी है? अपने घर में सब कुछ है। फिर बाहर जाने पर न जाने किस तरह का दुख झेलना पड़े, कौन सी विपत्ति पीछे पड़ जाए? कुछ कहा नहीं जा सकता। मेरी समझ में नहीं आता, आपको घर छोड़कर बाहर जाने की जरूरत ही क्या है?

व्यापारी : (पत्नी को समझाते हुए) सुनो भागवान, जो लोग आगे का नहीं सोचते और जो कुछ आज हासिल है, उसी से संतुष्ट हो जाते हैं, उनका कल कभी अच्छा नहीं हो सकता। आदमी को हमेशा अपने भविष्य के बारे में सोचना चाहिए और उन्नति की कोशिश करते रहना चाहिए।

पत्नी : अब इस पर तो मैं भला क्या कहूँ? आप खुद ही इतने समझदार हैं। अगर जाना जरूरी है, तो मैं बिल्कुल नहीं रोकूँगी।

व्यापारी : (दिलासा देता हुआ) चिंता न करो, मैं जल्दी ही लौटूंगा।

पत्नी : (भावुक होकर) मैं रोजाना ईश्वर से प्रार्थना करती रहूँगी कि आप सकुशल लौटें।

(वर्द्धमान ने बैलगाड़ियों पर ढेर सारा सामान लदवाया। फिर खुद भी एक अच्छी सी बैलगाड़ी पर बैठकर मथुरा की ओर चल पड़ा। उसकी बैलगाड़ी में दो बड़े ही सुंदर और पुष्ट बैल जुते हुए थे। उनमें एक था संजीवक और दूसरा नंदक। व्यापारी वर्द्धमान बड़े उत्साह से बैलगाड़ियों पर सामान लादे, मथुरा नगरी की ओर बढ़ा जा रहा था। अचानक एक जगह…)

व्यापारी : अरे, यह बैलगाड़ी तो दलदल में फंस गई है। सबसे बुरी हालत तो मेरे सुंदर बैल संजीवक की है, जो किसी भी तरह उस भीषण दलदल से निकल नहीं पा रहा है। चलो, मैं कोशिश करता हूँ।

(वर्द्धमान ने संजीवक को दलदल से निकालने की बहुत कोशिश की, पर निकाल नहीं पाया। उसने सोचा…)

व्यापारी : ओह, यह तो बड़ी भारी मुसीबत हो गई। सेठानी ने ठीक ही कहा था, पर मैंने तो उसकी बात सुनी ही नहीं। अब तो यही हो सकता है कि आसपास कोई पथिक नजर आए तो उसकी मदद ले लूँ। (कुछ देर बाद) पर यह तो सुनसान रास्ता है। कहीं कोई व्यक्ति नजर ही नहीं आ रहा। आज तो लगता है, मैं सचमुच बड़ी मुसीबत में फँस गया।

(कुछ सोचते हुए) अब यहाँ रुके रहने की बजाय आगे चल देना ही अच्छा है। अँधेरा हो जाने पर चोरडाकुओं ने लूट लिया तो और आफत आ जाएगी। इसलिए अब झटपट यहाँ से चल देना चाहिए।

(आखिर व्यापारी वर्द्धमान ने घायल संजीवक को वहीं छोड़ा और नंदक को साथ लेकर किसी तरह आगे की यात्रा पूरी करने लगा। उधर संजीवक बहुत दुखी था। धीरे से बुदबुदाते हुए…)

संजीवक : आह, यही मेरा मालिक है न, जो सुबह-शाम मेरी पीठ पर कितने प्यार से हाथ फेरता था। मुझे खिलाए बगैर कभी कुछ खाता नहीं था और सारे गाँव वालों से कहता था कि देखो, संजीवक से सुंदर बैल पूरे गाँव में कोई दूसरा है क्या? पर आज मैं विपत्ति में पड़ा हूँ तो यही मेरा मालिक कितना निष्ठुर होकर मुझे छोड़कर आगे चला जा रहा है। शायद यही समय का फेर है!

(फिर भी संजीवक ने किसी तरह खुद को धीरज बँधाया।)

संजीवक : इसे समय और भाग्य की लीला समझकर चुप रहना अच्छा है। शायद आगे कुछ अच्छे दिन आएँ।

तीसरा दृश्य

(संजीवक जिस तालाब के गहरे दलदल में फँसा था, वहीं रहते हुए और आसपास की सुंदर, हरीहरी घास खाते हुए धीरे-धीरे मजबूत होता चला गया। उसका शरीर भर गया और जंगल की खुली हवा में रहने के कारण उसमें पहले से कई गुनी ज्यादा ताकत आ गई। वह मजे में खाता और बड़े जोर की गर्जना करता था, जिससे पूरा जंगल काँप उठता था।)

संजीवक : यह इस जंगल की ताजी हवा का असर है कि मैं खुद को पहले भी ज्यादा ताकतवर महसूस कर रहा हूँ। अब तो यह जंगल ही मुझे भा गया है। फिर यहाँ कोई परेशानी भी तो नहीं है। चारों ओर ऐसी प्यारीप्यारी घास है कि खाकर जी खुश हो जाता है। ऐसा बेफिक्र जीवन तो मैंने पहले कभी नहीं जिया।

(उस वन का राजा था पिंगलक। संजीवक की जोर की गर्जना सुनकर सबसे ज्यादा तो उसी का दिल बैठ जाता था। शेर डरकर सोचता था…)

पिंगलक : शायद इस जंगल में कोई ऐसा भीषण जंतु आ गया है जो महा बलशाली है। अब तो मेरा इस जंगल में रहना ही कठिन है। लगता है, मुझे यह जंगल छोड़कर कहीं और जाना होगा। जंगल में सभी तो शेर से डरते हैं, पर मैं शेर होकर भी…! ओह, मेरा क्या हाल है? मैं बुरी तरह घबरा रहा हूँ। सभी कहते हैं कि मेरा चेहरा पीला पड़ गया है, जैसे किसी ने मेरी सारी ताकत निचोड़ ली हो।

(पिंगलक की यह हालत एक सियार दमनक ने भी देखी, तो वह चकराया। उसने अपने बड़े भाई करटक से कहा…)

दमनक : लगता है, हमारा राजा आजकल कुछ परेशान है। हमें उसकी कुछ मदद करनी चाहिए।

करटक : हमें राज-काज के मामलों से क्या लेना? इन चीजों से हम जितना दूर रहें, उतना ही अच्छा है।

दमनक : सुनो भैया, मतलब तो हमें रखना ही होगा। हमारे पिता कभी राजा पिंगलक के मंत्री रहे थे। पिंगलक के दरबार में हम दोनों को भी ऊँचा स्थान हासिल था। लेकिन आजकल हम किस कदर उपेक्षित हैं। इसलिए कि एक जरा सी बात पर नाराज होकर पिंगलक ने हमें दूध में पड़ी मक्खी की तरह बाहर निकाल दिया। इस बात को तुम भले ही भूल जाओ, पर मैं तो कभी नहीं भूल पाऊँगा। अगर अपना सम्मान वापस पाना है, तो हमें राज-काज के कामों में रुचि लेनी ही होगी।

करटक : (प्यार से समझाता हुआ) जो भी हो, पर मैं तो तुम्हें यही सलाह दूंगा कि इस तरह की बातों से दूर ही रहो। नहीं तो, फायदे की बजाय उलटा नुकसान हो सकता है।

दमनक : अब चाहे जो हो, पर मैं तुम्हारी तरह अलग किनारे पर तो नहीं बैठा रह सकता। मुझे अपने आप पर पूरा भरोसा है, तो फिर पिंगलक मेरा क्या बिगाड़ सकता है? मैं अभी पिंगलक से मिलने जाता हूँ।

करटक : (चिढ़कर) अच्छा भई, तुम जो ठीक समझो, करो। पर मुझे बख्शो। मेरी इसमें कोई रुचि नहीं है।

(उसी समय दमनक पिंगलक के पास पहुँचा। सिर झुकाकर बड़ी विनम्रता से बोला…)

दमनक : महाराज, लगता है आप किसी बड़ी चिंता में हैं। अगर आप चाहें तो अपने इस सेवक को भी बताइए। हो सकता है, मैं आपके किसी काम आ सकूँ।

पिंगलक : (घबराकर) बात यह है दमनक, कि इस जंगल में कोई भयंकर प्राणी आ गया है, जिसकी गर्जना से पूरा जंगल दहल उठता है। और सच्ची बात यह है कि खुद मुझे भी बड़ी घबराहट हो रही है। इसलिए कि यह मालूम ही नहीं पड़ रहा है कि वह महाबलशाली प्राणी है कौन सा, जिसकी इतनी भीषण गर्जना सुनाई देती है। लगता है, हमें इस वन को जल्दी ही छोड़ देना चाहिए। मैंने अपने मंत्रियों से भी सलाह की है। सबका यही कहना है कि संकट के समय अपना घर या स्थान छोड़ देने में कोई बुराई नहीं है।

दमनक : (कुछ सोचता हुआ) महाराज, पहले आप मुझे उस भयंकर जीव की एक बार शक्ल तो देख लेने दीजिए। फिर अगर वन को छोड़ना ही ठीक होगा, तो फिर वैसा कर लेंगे।

पिंगलक : (थोड़ी घबराहट के साथ) तो क्या तुम उस भयंकर गर्जना करने वाले जीव को देखने के लिए कछार की ओर जाओगे? यह तो बड़ा खतरनाक है, जरा अपना खयाल रखना।

(दमनक उसी समय दलदल की ओर चल पड़ा, ताकि भयंकर गर्जना करने वाले जीव की शक्ल एक बार देख ले। वह उसके बारे में तरह-तरह की कल्पनाएँ कर रहा था। पर दूर से ही घास खाते हुए संजीवक को देखा तो उसे हँसी आ गई। अपने आप से…)

दमनक : अरे, हमारे राजा पिंगलक क्या इसी बैल से डर रहे हैं ? हःहःहः, यह तो बड़ी अजीब बात है। मुझे अभी राजा के पास जाकर असलियत बतानी होगी। (रहस्यपूर्ण स्वर में बुदबुदाते हुए) पर नहीं, न-नन! इस तरह तो उन पर मेरा कोई अहसान ही नहीं होगा। तो फिर…? अरे हाँ, बात को थोड़ा घुमाफिराकर कहता हूँ। यही ठीक रहेगा।

(थोड़ी देर बाद दमनक राजा पिंगलक के पास पहुँचा, तो उसने बड़ी चतुराई से बताया…)

दमनक : महाराज, मैंने उस जीव की शक्ल देख ली है। वह वाकई बलवान है और शिव का भक्त है। लेकिन अगर आप चाहें, तो मैं उसे आपके चरणों में लाकर बैठा सकता हूँ।

पिंगलक : (हैरानी और अविश्वास से) अच्छा! तुम ऐसा कर सकते हो? यह तो बड़ी अच्छी बात है। मैं तुम्हें वचन देता हूँ कि अगर तुम इस काम में सफल हो गए तो मैं तुम्हें अपना मंत्री बना लूँगा।

दमनक : (मुसकराता हुआ) ठीक है महाराज। पर अपना वचन याद रखिएगा।

पिंगलक : (खुशी से आश्वासन देते हुए) क्यों नहीं, क्यों नहीं? बिल्कुल याद रहेगा।

(दमनक उसी समय तेजी से संजीवक से मिलने चल दिया। वह चल नहीं रहा था, मानो हवा में उड़ रहा था।)

चौथा दृश्य

(दमनक जल्दी ही घास चरते संजीवक के पास जा पहुँचा। थोड़ी फटकारती हुई कठोर आवाज में…)

सूत्रधार : चल, चल रे ओ बैल! तुझे हमारे राजा पिंगलक ने बुलाया है। तूने पूरे जंगल की शांति खत्म कर दी है। लगता है, तेरा दिमाग कुछ ज्यादा ही खराब हो गया है। आज तुझे मजा चखाया जाएगा।

संजीवक : (हक्का-बक्का होकर) भाई, यह पिंगलक कौन है, तुम मुझे जिसके पास ले जाना चाहते हो?

दमनक : (डाँटते हुए) अच्छा, तो तुझे पिंगलक के बारे में ही नहीं पता? पिंगलक हैं हमारे राजा! इस जंगल के राजा। उनकी आज्ञा के बगैर इस जंगल में पत्ता तक नहीं हिलता और तूने बेवजह शोर मचा-मचा करके इस सारे जंगल को परेशान कर रखा है। अब राजा पिंगलक तेरी अच्छी खबर लेंगे।

(सुनकर संजीवक के तो होश उड़ गए, सारी मस्ती गायब हो गई। गिड़गिड़ाते हुए दमनक से…)

संजीवक : देखो मित्र, जैसा तुम कहते हो, मैं पिंगलक के पास चलने को तैयार हूँ। पर तुम्हें भी मेरी प्राण-रक्षा का वचन देना होगा, ताकि पिंगलक किसी तरह मुझे नुकसान न पहुँचाए।

दमनक : (दिखावा करता हुआ) ठीक है भाई। जब तुम ऐसी करुण प्रार्थना कर रहे हो, तो मुझे भी कुछ सोचना होगा।

(संजीवक को साथ लेकर दमनक उसे राजा पिंगलक से मिलवाने चल दिया। कुछ दूर जाकर…)

दमनक : तुम यहीं ठहरो। राजा पिंगलक तुमसे बहुत नाराज हैं। मैं जरा उनका गुस्सा ठंडा करके आता हूँ। तब तुम मेरे साथ चलना। वरना हो सकता है, जाते ही वे तुम पर टूट पड़ें।

संजीवक : हाँ-हाँ भई, जाओ। पर हाँ, कुछ ऐसा ऐसा करना कि मुझ पर कोई मुसीबत न आए। अब तुमसे क्या छिपाना, मैं बड़ा सीधा-सादा सा हूँ। मुझे तो यह भी नहीं पता कि बात कैसे करनी है। तुम जरा सँभाल लेना।

दमनक : (हँसता हुआ) अरे भई, तुम तो बहुत डर रहे हो। चिंता मत करो। तुमने मुझे मित्र कहा है, तो मुझे वचन तो निभाना होगा न।

दमनक : (कुछ देर में पिंगलक के पास जाकर) महाराज, भयानक गर्जना करने वाला वह जंतु आ गया है। वह आपसे मित्रता चाहता है। पर उसने प्राण-रक्षा का वचन माँगा है। आप उसे कोई नुकसान न पहुँचाएँ।

पिंगलक : (हैरान होकर) अच्छा ! तो तुम जल्दी से उसे यहाँ ले आओ। (अपने आप से) ओह, मैं तो कितना घबरा रहा था, पर यह प्राणी तो उलटा मुझसे डर रहा है।

(दमनक झटपट संजीवक को साथ लेकर पिंगलक के पास गया। दोनों ने दूर से ही एक-दूसरे को देखकर पहचान लिया कि उनमें काफी बल है। संजीवक और पिंगलक दोनों खुशी-खुशी एक-दूसरे से मिले और दोस्ती का वादा किया।)

पिंगलक : बड़ी खुशी हुई तुमसे मिलकर। आओ भई, आओ, आज से हम दोनों अच्छे दोस्तों की तरह रहेंगे।

संजीवक : (जोश में आकर) हाँ-हाँ, मुझे मंजूर है यह बात। मैं भी कहूँगा कि हमारी दोस्ती जिंदाबाद। (कुछ देर बाद) बडा बडा अच्छा रहा कि दमनक ने मझे आपसे मिलवा दिया। मेरे लिए भी यह बड़ी खुशी का दिन है।

पिंगलक : हम दोनों ही शक्तिशाली है। मिलकर रहेंगे तो इस जंगल में भी हर ओर खुशहाली आएगी। फिर आप तो मुझे बड़े ज्ञानवान भी मालूम पड़ते हैं। फिर तो मिलकर हम खूब बातें भी किया करेंगे। वैसे भी मैं बड़ा अकेला महसूस करता हूँ। कोई मन की बात करने वाला ही नहीं है।

संजीवक : (हँसते हुए) मैं आपका मन समझ गया। इस जंगल के राजा होकर भी आप बड़े सरल हैं।

पिंगलक : और तुम भी तो भाई कम शक्तिशाली नहीं जान पड़ते। फिर भी बातें ऐसी करते हो, जैसे कोई सच्चा ज्ञानी बोल रहा हो।

संजीवक : (बड़ी मीठी मुसकान के साथ) सचमुच हम एक जैसे हैं। इसी लिए तो मैं कह रहा हूँ, हमारी दोस्ती जिंदाबाद।

(पिंगलक और संजीवक अब अकसर साथ दिखाई देते। पिंगलक अपने मन की हर बात संजीवक को बताता और संजीवक था ज्ञानी। वह पिंगलक को ऐसी ज्ञानपूर्ण कहानियाँ सुनाता कि उसका मन खुश हो जाता। दोनों लंबे समय तक ज्ञान-चर्चा करते रहते। जंगल में बड़ा शांति का माहौल था। पिंगलक का स्वभाव भी अब काफी बदल गया था।)

पाँचवाँ दृश्य

(स्थान – जंगल का दृश्य। दमनक कुछ परेशान नजर आ रहा है। असल में उसे दमनक और संजीवक की दोस्ती से अब चिढ़ होने लगी थी। उसने संजीवक और पिंगलक को एक-दूसरे से मिला तो दिया था, पर वे दोनों रात-दिन जिस तरह की ज्ञान-चर्चा में लगे रहते थे, उससे दमनक को बड़ी परेशानी होती थी। वह अपने आप से कहता था…)

दमनक : अरे, यह तो मैंने बड़ी आफत मोल ले ली। बेकार संजीवक को राजा पिंगलक से मिलवा दिया। खुद तो यह ज्ञानी-ध्यानी है ही, लगता है, हमारे राजा पिंगलक को भी पूरा वैरागी बनाकर छोड़ेगा। तब राज-काज कैसे होगा? किसी तरह संजीवक को रास्ते से हटाना चाहिए। चलो, मैं ही कुछ करता हूँ। (थोड़ी देर बाद सिर खुजाते हुए) ओहो, यह चाल तो ठीक रहेगी।

(एक दिन कुछ सोचकर दमनक राजा पिंगलक के पास गया।)

दमनक : (बड़े रहस्यपूर्ण स्वर में) महाराज, मैं कहना तो नहीं चाहता था, पर बात कुछ ऐसी है कि कहे बगैर रहा भी नहीं जाता। संजीवक को आप अपना सबसे अच्छा मित्र समझते हैं, पर वह मित्र होने लायक नहीं है। उलटे वह तो आपको मारकर आपके राज्य को हड़पने की योजना बना रहा है।

पिंगलक : (भौचक्का होकर) हाय संजीवक, यह तुमने क्या किया? तुम कहते तो यह पूरा राज्य मैं तुम्हें ऐसे ही दे देता। पर मित्रता की आड़ में इतना बड़ा धोखा? मैं तो ऐसा सपने में भी नहीं सोच सकता था। तुम तो इतने ज्ञानी हो, फिर भी यह ओछा काम…?

दमनक : महाराज, राजा को हमेशा सतर्क रहना चाहिए। पर आपने तो संजीवक पर जरूरत से ज्यादा भरोसा कर लिया। इसी से तो उसका दिमाग खराब हो गया।

(कुछ समय बाद दमनक संजीवक के पास गया। वहाँ भी झूठी बात बनाते हुए…)

दमनक : भाई, राजा पिंगलक का विश्वास आप पर से उठ गया है। उसने मुझे खुद कहा है कि मैं संजीवक को मारकर खा जाऊँगा। मुझे राजा की गुप्त बातें कहनी तो नहीं चाहिए, पर तुम मेरे भाई सरीखे हो तो कैसे न कहूँ? अब जैसे भी हो, अपने को बचाओ।

(संजीवक के लिए यह बात कलेजा चीर देने वाली थी। वह जोर से आर्तनाद कर उठा।)

संजीवक : हाय पिंगलक, मैंने तुम्हें मित्र समझा था, पर तुमने साबित कर दिया कि राजा के सत्ता-मोह और घमंड के आगे दोस्ती का कोई मोल नहीं। हाय, अब मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ? मुझे तो अपना जीवन ही व्यर्थ लग रहा है।

दमनक : (बड़ी चतुराई से बात बनाते हुए) मैं आपके दुख को समझ सकता हूँ भाई। पर यह समय दुख में डूबने का नहीं, खुद को बचाने का है। जल्दी से सोच लो कि तुम कैसे अपने प्राण बचा सकते हो?

संजीवक : (दुखी होकर) हाँ भाई, अब तो जो बला सिर पर पड़ गई, उससे निबटना ही होगा, चाहे जान भले ही चली जाए।

छठा दृश्य

(अगले दिन संजीवक पिंगलक से मिलने गया, तो पिंगलक ने भीषण गर्जना की। जवाब में संजीवक ने भी माथा तानकर लाल-लाल आँखों से उसे देखा, जैसे अपनी ताकत जता देना चाहता हो…)

संजीवक : तुम मुझ पर आक्रमण करोगे तो मैं भी कोई ऐसागयाबीता नहीं हूँ कि तुम्हारा जवाब न दे सकूँ।

(उसी समय राजा पिंगलक ने गुस्से में आकर संजीवक पर छलाँग लगा दी। अब क्या था! दोनों में भीषण युद्ध होने लगा। दोनों ही बलवान थे, इसलिए देर तक एक-दूसरे से जूझते रहे। फिर आखिर पिंगलक ने संजीवक को मार ही डाला।)

पिंगलक : (कुछ देर बाद दुखी होकर विलाप करते हुए) ओह संजीवक, तुम्हारी मित्रता की बातें अब भी मुझे याद आ रही हैं। कुछ भी हो, तुम अच्छे दोस्त थे, बहुत अच्छे दोस्त। मुझे यह मानना ही होगा। और सच्ची बात तो यह है कि मैं मरते दम तक तुम्हें नहीं भूल पाऊँगा। पर…मेरी समझ में नहीं आ रहा कि फिर यह हुआ कैसे? तुम तो इतने अच्छे थे। जरूर तुम्हें किसी महादुष्ट ने बहका दिया होगा। अगर मुझे उसका पता चव जाए तो उसे जिंदा नहीं छोडूंगा।

(कुछ देर बाद पिंगलक फूट-फूटकर रोता हुआ संजीवक की बातों को याद करने लगा…)

पिंगलक : हाय, मित्र!…हाय, मित्र। यह मैंने क्या किया? क्यों किया? तुम मेरे सबसे प्यारे मित्र थे। और मैंने खुद तुम्हें मार जाला। मैं पापी हूँ, सचमुच पापी।

(चालाक दमनक नाटकीय मुद्रा में ऊपरी ज्ञान बघारते हुए..)

दमनक : महाराज, आप तो महान राजा हैं। संजीवक आपके सामने एक पिद्दी से ज्यादा क्या था? आपने ही उसे सिर चढ़ाया और उसका दिमाग खराब किया। फिर अगर आपने उसे मार डाला तो इसमें रोने और पश्चात्ताप करने की क्या बात है?

पिंगलक : तुम चाहे कुछ भी कहो दमनक, पर संजीवक में कुछ तो ऐसा था कि मेरा मन उसे याद करके बुरी तरह तड़प रहा है। खैर, तुम्हारी बात मानकर किसी तरह खुद को शांत करता हूँ।

(पिंगलक ने किसी तरह खुद को समझाया और फिर से राजकाज में रुचि लेने लगा। दमनक की खुशी का ठिकाना न था।)

दमनक : अरे वाह, मेरी तो अब पौ बारह है। राजा शेर के बाद राज्य में अब सबसे ज्यादा मेरी ही तूती बोलती है। यहाँ तक कि बड़े से बड़े बलवान जानवर भी अब मुझसे आँख मिलाने का साहस नहीं कर पाते। आखिर कोई चतुराई से काम ले, तो क्या नहीं हो सकता? इस दुनिया को चतुर प्राणी ही अपने ढंग से चलाते हैं। वाह रे वाह, मैं। मैंने वह कर दिखाया जो कोई सोच भी नहीं सकता था। अब तो राजा शेर भी मेरे काबू में रहेगा और मैं जो चाहूँगा, वह करूँगा।

सातवाँ दृश्य

(स्थान-गली या मोहल्ले के पास वाला खेल का मैदान जहाँ निक्का, निक्की अपने बहुत सारे दोस्तों के साथ हवा दीदी से बातें कर रहे हैं।)

हवा दीदी : हाँ, तो बच्चो, देखा यह नाटक? कैसा लगा?

निक्का : अच्छा था, हवा दीदी, बहुत अच्छा।

निक्की : अच्छा, हवा दीदी, जंगल में ऐसे मजेदार नाटक भी होते हैं क्या?

हवा दीदी : क्यों नहीं, क्यों नहीं? अगर ध्यान से देखो, तो तुम्हें अपने आसपास हर जगह ऐसे नाटक नजर आएंगे। बस, आँखें खोलकर उन्हें देखने और उनसे सीख लेने की जरूरत है।

निक्का : हवा दीदी, मैंने तो इस नाटक से बहुत बड़ी सीख ली है। और वह यह कि अगर किसी से दोस्ती करो, तो मन में मैल न रहने दो। ऐसे ही अगर किसी से कोई बात सुनो, तो उस पर एकदम यकीन न करो।

निक्की : और फिर लाख टके की एक बात यह है कि मन में कभी कोई गलतफहमी पैदा हो, तो अच्छे दोस्तों को आपस में मिल-बैठकर सारी बात सुलझा लेनी चाहिए। तभी दोस्ती लंबे समय तक चल सकती है।

हवा दीदी : (हँसते हुए) काश, पिंगलक और संजीवक ने भी सीख ली होती यह बात । तो न बेचारा संजीवक मारा जाता और न पिंगलक इतना दुखी होता।

निक्का : (सिर हिलाते हुए) बिल्कुल ठीक बात है हवा दीदी।

निक्का : बिल्कुल ठीक।

हवा दीदी : (दाएँ हाथ से विदा का संकेत करते हुए) तो अब चलती हूँ मैं। अभी तो दूर जाना है, मीलों दूर…!

निक्का : बाय-बाय, हवा दीदी।

निक्का : हवा दीदी, बाय-बाय।

(हाथ हिलाती हुई हवा दीदी विदा लेती है। बच्चे हाथ हिलाकर विदा कर रहे हैं। निक्का और निक्की के चेहरे सबसे अलग नजर आ रहे हैं।)

(परदा गिरता है।)

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