अब घर में आएगी एक नन्ही परी
stories of grihalakshmi

गृहलक्ष्मी की कहानियां –एक बेटी प्रज्ञा पहले से थी इसलिए एक बेटे की ख्वाईश रखना कोई असंगत या अस्वाभाविक नहीं था। इस हेतु विराट ने बाकायदा पूरी तरह प्लानिंग की। वह भी तब जब प्रज्ञा पहली कक्षा में पहुंच गई। यद्यपि सब कुछ पूरी तरह उनके हाथ में नहीं था, इसके बावजूद पूरी तरह ख्याल रखा गया था कि बच्चा किस महीने में पैदा हो, ताकि दोनों को परेशानी ना हो। आखिर स्तुति भी नौकरी में थी अतः उसकी छुट्टी का ध्यान रखना भी लाजिमी था।

यह जानते हुए भी कि गर्भस्थ शिशु का लिंग परीक्षण कानूनन जुर्म है, विराट ने वह गुस्ताखी चुपके से कर दिखाई । जो रिपोर्ट आई वह प्रतिफल थी और निराशा जनक थी। डाॅक्टर ने बताया कि सब कुछ ठीक है। बच्चे का गर्भ में समुचित विकास हो रहा है लेकिन वह बेटी है। क्या खाक ठीक है। कन्या के आगमन की खबर से विराट का मन बुझ गया।

रात को विराट ने स्तुति को सूचित किया तो वह सुनकर निस्पृह बनी रही, जैसे इससे उसे कोई फर्क ना पड़ता हो। मगर विराट को ठीक नहीं लग रहा था, इसलिए झिझकते हुए सलाह दे डाली। तुम गर्भपात करा लो। स्तुति की भृकुटि तन गई- ‘‘मगर क्यों? ‘‘क्यों क्या, एक लड़की पहले से है। हमें अब लड़का चाहिए, क्योंकि आगे हम और जोखिम उठा नहीं सकते। दो से ज्यादा बच्चों की परवारिश हम नहीं कर पाएंगे विराट ने कारण स्पष्ट किया। 

लेकिन जब वह गर्भ में आ गई है तो आ जाने दो। इसमें उसका क्या कसूर। भ्रूण हत्या का पाप हम अपने सिर क्यों लें? एक जननी के रूप में उसने असहमति जताई। ‘‘तुम समझने की कोशिश क्यों नही करती? अब दो से ज्यादा बच्चे तो होते नहीं। सोचो अगर दोनों बेटियां हो गई तो बुढापे में हमारा सहारा कौन बनेगा।

दोनों लड़कियां तो अपने ससुराल चली जाएगीं। विराट ने परंपरागत तर्क के साथ चिंता व्यक्त की। ‘‘क्या जरूरी है कि बेटा हमारी देखभाल करेगा। बदकिस्मति से वह कपूत निकल गया तो? ” स्तुति ने सवाल खड़ा किया। ‘‘यह तो भविष्य की बात है फिर भी उम्मीद तो कर सकते हैं। लेकिन बेटियों से तो पूरी गुंजाइश ही खत्म हो जाएगी। विराट ने समझाने का प्रयास किया।

‘‘अपने मोहल्ले के श्रीवास्तवजी को देख लो, दोनों बेटे हैं, अच्छी नौकरी में है एक दुबई में बैठा है, दूसरा बंगलौर में, मगर अपने बूढ़े माता-पिता को रखने कोई तैयार नहीं। स्तुति ने अपने वक्तव्य के पक्ष में एक हकीकत बताई। ‘‘श्रीवास्तव खुद यह शहर अपना पुश्तैनी मकान छोड़कर जाना नहीं चाहते। इसमें बेटों का क्या कसूर”, विराट ने बचाव किया। ‘‘जो भी हो, वही मैं कहना चाह रही हूं कि बेटे होने का मतलब कोई गारंटी नहीं हो जाता कि वह भविष्य में बुढ़ापे की लाठी बनेगा या हम उसके साथ रहना पसंद करेंगे ही। फिर आजकल तो लड़कियां शादी के उपरांत भी अपने माता-पिता की सेवा- देखभाल कर रही हैं, स्तुति ने तर्क का खंडन किया। 

‘‘ मैं नहीं मानता-विराट ने असहमति व्यक्त की। अगले प्रयास में भी बेटी निकली तो? ‘‘स्तुति समझ गई बात करने से कोई फायदा नहीं होगा। यद्यपि बिना प्रतिवाद के बात स्वीकार लेना उसके जमीर को गंवारा नहीं हो रहा था। 

अगले दिन स्तुति अपेक्षाकृत प्रसन्न थी। विराट ने अनुमान लगाया शायद वह गर्भपात के लिए स्वयं को राजी कर चुकी है। ‘‘कब चलें डाक्टर के पास ” – विराट ने सीधा पूछ लिया। ‘‘नहीं उसकी कोई जरूरत नहीं। देवर-देवरानी हमारी बेटी को गोद लेने के लिए तैयार हो गए हैं। स्तुति ने बताया। विराट को कोई हैरानी नहीं हुई, क्योंकि छोटे भाई चिराग की शादी हुए तीन साल बीत चुके थे और पद्मा की गोद सूनी थी।

‘‘चलो यह संतान तुम चिराग को दे दोगी, लेकिन हमारी अगली संतान भी लड़की हुई तो क्या करोगी? विराट ने व्यंग्यात्मक लहजे में प्रश्न किया। कैसा अजीब सवाल था। स्तुति कुछ पल के लिए विचलित दिखी फिर संभलते हुए बोली ‘‘मेरे रतन भैया को दे दूंगी, उनकी भी कोई संतान नहीं है” ‘‘यह कैसा समाधान है। यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा? इतने सारे बच्चे अपनी कोख से पैदा करोगी तो तुम्हारे स्वास्थ्य का क्या होगा? दफ्तर से कब तक छुट्टियां लेते रहोगी? दूसरों के लिए कब तक अपने आप को शहीद करती रहोगी। नहीं स्तुति हम ऐसा नहीं कर सकते‘‘विराट ने झुझंलाते हुए अनेक सवाल खड़े कर दिए।

‘‘आप यह कैसी बातें कर रहे हैं?‘‘ स्तुति ने हिम्मत नहीं हारी। ‘‘नहीं स्तुति कल तुम्हें मेरे साथ हाॅस्पिटल चलना पड़ेगा। यह कन्या इस दुनिया में नहीं आएगी मैंने कह दिया तो कह दिया। विराट बोला जैसे जिद पर आ गया हो। स्तुति स्तब्ध रह गई। हमेशा प्रजातांत्रिक तरीके से उसकी राय का सम्मान करने वाला विराट आज इतना कठोर कैसे हो गया? बात को तूल ना देते हुए वह खामोश रह गई।बहरहाल दंपत्ति के लिए आज की रात कयामत वाली साबित होना थी। दोनों बेहद तनाव में थे। कल क्या होगा। 

अगली सुबह ही विराट ने बताया -स्तुति तुम नन्हीं परी को जन्म दोगी और हम उसे किसी को नहीं सौपेंगे, खुद पालेंगे। प्रज्ञा की बहन संज्ञा होगी, विराट ने उसका अग्रिम नामकरण भी कर दिया। इस सुखद नाटकीय परिवर्तन से स्तुति हतप्रभ रह गई। विराट में इतना बड़ा परिवर्तन कैसे आया। वह जानने को उत्सुक हो उठी, यद्यपि मन को बेहद सब सुकुन मिला था। स्तुति बार बार उसे निहारे जा रही थी। वह इस बदलाव का कारण बताए।

अंततः मुस्कराते हुए रहस्य से पर्दा उठाते हुए विराट ने बताया- ‘‘कल रात मैंने एक अजीबोगरीब सपना देखा। श्याम और पीले रंग के धुएं के बादल वातावरण में उमड़ घुमड़ रहे हैं। उन घने बादलों के मध्य एक नन्हीं सुकोमल परी। यही कोई बित्ते भर की। उसके हाथ-पैर बिल्कुल मखमल की मांनिद मुलायम…..अनायात वह मेरी तरफ देखते हुए दोनों हाथ आगे बढाती है……..

‘‘वह नन्हीं सी लड़की हाथ बढ़ाती है?-‘‘स्तुति ने आश्चर्य प्रकट करते टोका। ‘‘हां भाई हां बीच में मत टोको। सपने में सब कुछ संभव है। वह मुझसे बोलती है। ऐसा लग रहा था जैसे आवाज उसके अंदर से- आत्मा से आ रही हो। उसके मुंह से निकला-पापा…….‘‘उसने आपको पापा कहा?”..स्तुति ने फिर बीच में टोक दिया। ‘‘हां भाई उसने पिघलती हुई दर्दीली आवाज में कहा- पापा आपको मेरी बेटी होने की खबर मिल गई है और मुझे इस दुनिया में आने से पहले आप मेरी हत्या करा देना चाहते हैं।” सचमुच स्तुति मुझे लगा जैसे आसमान से धरती पर आ गिरा है…..उस छटाक भर की छोकरी को कैसे मालूम?” मैं बताऊं मुझे मालूम है। गर्भस्थ शिशु ईश्वर के ज्यादा निकट होते हैं ।-स्तुति बोली। 

विराट ने जैसे सुना ना हो। वह अपनी धुन में कहे जा रहा था-ऐसा लग रहा था जैसे वह नन्हीं परी अंतर्यामी हो। वह कह रही थी- मुझे सब मालूम है पापा…..आपको बताऊं, आज हर बचपन चौतरफा मुसीबतों के तूफान से घिरा नजर आ रहा है। पहले तो मां के गर्भ में हमारे नाम की सुपारी दी जा रही है और ये देने वाले कोई बाहर के नहीं, हमारे सगे मां-बाप हैं। कातिल भी वे हैं जिन्हें खुदा के बाद दूसरा दर्जा प्राप्त है यानि सफेदपोश डाॅक्टर। सैंकड गाॅड। वहां से किसी तरह बचें तो लाॅलीपाप का लालच दिखाते निठारी के अपराधी सुरेंद्र हर मोड़ पर खड़े हैं। स्कूल पहुंचे तो वहां भी पूरा प्रबंध है। बड़े हुए तो आसाराम-नारायण धर्म के नाम पर जगह-जगह जाल बिछाए हुए हैं। यानी कोई स्थान हम मासूमों के लिए महफूज नहीं…कैसे बचेगा हमारा अस्तित्व? कहकर एक पल के लिए विराट थमा।

‘‘इतनी बड़ी बात कह डाली उस अधखिली कली ने ?‘‘स्तुति ने प्रश्न किया। ‘‘फिर मैंने पूछा। यह कैसा बेतुका इल्जाम लगा रही हो? जानती हो उसने क्या कहा- यह इल्जाम नहीं कड़वी सच्चाई है। जब ईश्वर हमें इस जहान में भेजने का इच्छुक है तो आप लोग कौन होते हैं हमें रोकने वाले? इसका मतलब तो यही हुआ कि आप ईश्वर और प्रकृति से भी बड़े हो गए और उन्हें ही चुनौती देने लगे? मैं निरूत्तर था। मुंह से आवाज नहीं  निकल पा रही थी। बमुश्किल कहा- ‘‘नहीं बेटी ऐसी बात नहीं है..‘‘पापाजी बेटियां घर को घर बनाती हैं। इंसानी मन को भावनाओं संवेदनाओं से जुड़ना सिखाती हैं। अपनी मधुर मुस्कान और निश्छल हंसी से घर को स्वर्ग बना सकती हैं । एक बात बताइए- अगर आप स्वर्ग-नर्क को मानते हैं तब भी इस तरह का घृणित कार्य अंजाम देने पर आपके मन में यह सवाल नहीं डराता होगा कि….पहले ही गला घोंट दी गई अनगिनत कन्याएं उन लोगों को बद्दुआएं दे रही होंगी? क्या यह वीभत्स कार्य करवाते समय पल भर के लिए भी आपका दिल कांपता नहीं होगा?

मेरी सहनशीलता की हद समाप्त हो रही थी। मैंने दोनों हाथों से आंखें बंद करना चाही तो वह चहक उठी- अच्छे इंसान तो ऐसा घटिया कर्म कर ही नहीं सकते। यहां तक कि राक्षसों और पशुओं में भी ऐसी परंपरा या पक्षपात की बात पढ़ने-सुनने को नहीं मिलती। तब क्या आज के इंसान मशीन से भी गए- गुजरे हो गए हैं? अगर ऐसा है तो इनसे दूसरे इंसान को जन्म देने क अधिकार ही छिन जाना चाहिए….तब क्या होगा?

कहकर विराट खामोश हो गया और एक गहरी श्वांस खींचकर स्तुति के पेट के उभार को देखने लगा…..इसी के अंदर वह नन्हीं परी होगी। स्तुति ने पूछ लिया -‘‘फिर ?” ‘‘पता नहीं उसकी बातों में क्या सम्मोहन था कि मैं अपने आपको उसका सामना नहीं कर पा रहा था। मैंने कहा भी……अब बस करो….पर वह कहां रुकनेवाली थी। सयानों के अंदाज में सीख परोसने लगी-‘‘चलिए कुछ पल के लिए कल्पना कर लें कि सारी दुनिया बेटियों से शून्य हो गई है। यहां सिर्फ बेटे ही बेटे आबाद नाबाद हैं…क्या आप सहन कर पाएंगे, कोलाहल और चंचलता से भरी नन्हें कदमों से दौड़ती उस सोनपरी की कमी। जीवन का हर पर्व। हर उल्लास आपको अधूरा-सा नहीं लगेगा? कैसे सीखोगे बेटे की जिंदगी का फलसफा क्या है? कौन आपको प्रेम में भरकर अपने हाथों से खाना पकाकर खिलाएगा? क्या आधा अधूरा नहीं रह जाएगा हमारा वजूद…गर बेटियां इस संसार में नहीं होंगी? और सबसे ज्यादा आप, पापा आप प्रभावित होंगे, क्योंकि बेटियां सबसे ज्यादा पिता के नजदीक होती हैं और सबसे ज्यादा उन्हीं का ख्याल रखती हैं……..इतना कहकर विराट ने फिर चुप्पी साध ली। स्तुति ने पानी भरा गिलास उसे पकड़ा दिया जिसे वह गटागट पी गया। ‘‘अब ”- स्तुति ने प्रश्नवाचक दृष्टि से घूरते हुए पूछा। ‘‘अब क्या……वह नन्हीं मासूम परी इस घर में उतरेगी और अपनी-अपनी कलाओं से इस घर को जगमग करेगी”-विराट ने अपना इरादा दोहरा दिया। 

यह भी पढ़ें –उधार वाले खिस्को – गृहलक्ष्मी कहानियां

-आपको यह कहानी कैसी लगी? अपनी प्रतिक्रियाएं जरुर भेजें। प्रतिक्रियाओं के साथ ही आप अपनी कहानियां भी हमें ई-मेल कर सकते हैं-Editor@grehlakshmi.com

-डायमंड पॉकेट बुक्स की अन्य रोचक कहानियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों की रचनाओं को खरीदने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-https://bit.ly/39Vn1ji