Hindi Story: बाबू ….चलो आपको डॉक्टर बुला रहे हैं,ज़ोर से आवाज़ देकर राघव ने अस्पताल की बेंच पर लेटे हुए अपने पिता को सहारा देते हुए उठाया।
इंटरमीडिएट स्कूल से रिटायर्ड और पूर्व प्रिंसिपल उसके पिता ह्र्दयनाथ मिश्र जी बेहद कमजोर हो गए थे और हृदय के ऑपरेशन के बाद और भी शिथिल।
डॉक्टर ने आला लगाते हुए पूंछा,”इन्हें अब क्या परेशानी है?”
जी…कुछ खाते ही दिन में कई बार शौचालय जाते हैं फिर भूख भी लग जाती है दिन में कई बार ऐसे ही करतें है तो सोचा दिखा लूँ आपको ,राघव ने बड़ी विनम्रता से कहा।
“मि•राघव,अब आप पिच्चासी साल की एज में अच्छे डाइजेशन की उम्म्मीद न रखेँ।ये मान लीजिए कि अब ये ऐसे ही रहेँगे ,और ऐसे ही चले भी जाएँगे।”
पिता को घर लाकर , एकांत में अपनी पत्नी दिव्या के गले लगकर फफक पड़ा राघव।
छोटी सी प्राइवेट नौकरी और बाबू की पेंशन से घर उसका घर आराम से चल जाता ।
पहले दिव्या भी स्कूल में पढ़ाती थी ,पर मुन्ने के जन्म और बाबू के ऑपरेशन के चलते नौकरी छूट गयी,अब तो ज़ेवर भी निकल चुके थे।
दिव्या ने पहले भी घर की खुशी को सर्वोपरि रखा था ,उसे भली प्रकार ज्ञात था ,कि बाबू का अस्तित्व राघव की खुशी है।
सभी भाई बहनों में छोटे राघव को माँ के चले जाने के बाद उनकी छाया में हर उलझन की सुलझन मिल जाती थी।
दिव्या को भी बाबू ने ही उसके गुण और विनम्र स्वभाव के कारण पसन्द किया था।
उसने लम्बा खर्च जान अपने सारे ज़ेवर की पोटली राघव के हाथ सौंप दी यह कहकर कि ज़ेवर फिर बन जायेंगे।
दिव्या ख़ुशी से ,दिन भर घर के साथ बाबू का भी सारा काम करती।
बच्चा भी छोटा था तो कभी थोड़ा सा झुँझला जाती थी ,पर अपनी दोनों जेठानियों से सरल ह्रदय की थी,
वह भी बाबू की इच्छानुसार तमाम प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करती रहती।
बाबू अपने पूर्व छात्रों से बहुत सारी किताबें उसके लिये मंगवाया करते ,उस कमरे में उनकी सबसे बड़ी धरोहर कहें या खुशी किताबें ही थीं।
अध्यापक की जीवन भर की पूँजी,जिसे सब घरवाले कबाड़ी को बेचकर पैसे कमाने की बात कर रहे थे।
राघव ही उनसे भिड़कर ले आया था,इस तरह उसके हिस्से में सम्पत्ति के नाम पर उनकी किताबेँ ,अलमारी और उनकी गरीब पर बड़ी मेधावी पूर्व छात्रा दिव्या ही आई थी।
और इस मुश्किल सफर में कृतज्ञ राघव उसका साथ भरपूर देता।जब तक वह घर पर रहता वह भी उनका ध्यान रखता।
सभी भाईयोँ की उच्च शिक्षा पर खर्च करते बाबू राघव के समय खाली हो चले थे,और पँख निकलते ही सभी बड़े बेटे जहाँ अपनी नीड़ अलग बनाने में जुट गए तो बेटी अपनी घर की हो गई।
अम्मा के जाने के बाद रिक्त हस्त बाबू ही बचे राघव के हाथ।
इस सबसे हताश होकर दिव्या भी मानवोचित स्वभाववश चिड़चिड़ी हो गयी।
एक दिन ,”इन्हें दलिया खिला दो मैं फैक्ट्री जा रहा हूँ “कहकर राघव चला गया।
खिसियानी सी जब वह आई और बोली ,बाबू मुँह खोलो ,जैसे ही उन्होंने मुँह खोला ,दिव्या थोड़ा सहम गयी ।आज उसे बाबू और मुन्ने के पोपले मुँह में कोई अंतर नहीँ दिख रहा था।
उसका क्षोभ अब तिरोहित हो गया,वह मुन्ना की तरह ही बाबू की बिना गुस्सा किये सेवा करने लगी,इधर बाबू ने अब अपनी पेंशन निकालना बंद कर दिया और कभी कभी ये हाल होने लगा की बिस्तर पर ही शौच हो जाती।
घर में इलाज और खर्च भी बढ़ा था और जेठानियाँ ताने भी देतीं कि ये तो ससुर की पेंशन पे ऐश कर रही है।
आज दिव्या थोड़ा दुःखी हो गयी ,राघव कब तक अकेले संभालू मुन्ना भी परेशान करता है और बाबू भी कभी कभी चिढ़ा देते हैं।क्या मुझे खुश रहने का कोई अधिकार नहीं।
शाम को राघव बड़ों के डायपर ले आया ,और समझाते हुए बोला,”होगा दिव्या हम समझ लेंगे कि हम एक और बच्चे के माता पिता हैं।मेरा जी दहल जाता है कि बाबू को कुछ हो गया तो मैं जियूँगा कैसे?
अब बाबू आये दिन कुछ न कुछ खाने की चीज़ बनवाते रहते ,अतिरिक्त खर्च से घर का बजट भी डगमगाया रहता।
परेशान दिव्या को बाबू तसल्ली देते हुए कहते “धीरज रक्खो दिव्या… की गयी मेहनत कभी भी व्यर्थ नही जाती।”
उस दिन दिव्या को उनकी बातें बड़ी अटपटी सी लग रहीं थीं,मेरे पास बैठ जा बहू,”फिर खाँसते हुए बोले …
“तुम याद रखना कि जिसकी तुम सेवा कर रही हो वह स्वयं तो तुम्हारी सेवा नहीं कर सकता,पर ईश्वर किसी न किसी रूप में आकर अवश्य उसका प्रतिफल देते है।
उस दिन थोड़ी बाद फिर बोले ,”बहू आज बड़े खिला दो और सब को मेरे पास बुला लाओ आज कुछ जी घबरा रहा है।”
दिव्या ने कहा,”बाबू सब ठीक हो जायेगा आप परेशान मत हो ।”
कहकर दिव्या बाबू के लिए बड़े लेकर आई उन्होंने बड़े चाव से खाये और कहा कि तेरे हाथ में मेरी माँ जैसा स्वाद है।
“दोज आल्सो सर्व हू स्टैंड एंड वेट,
धीरज का फल जरूर मिलता है बेटी”
बड़े खाने के थोड़ी देर बाद ही बाबू को फिर बिस्तर पर शौच हो गयी आज तो डायपर भी खत्म थे और पैसे भी ।
बाबू जी की साफ सफाई कर बिस्तर बदलने के बाद,बीमार दिव्या थोड़ी रोआँसी हो गयी।जाड़े की रात थी नींद और थकान से चिढ़ कर राघव से बोली जाओ हवेली में हिस्सा तो सब लेंगे पर इस सबमें पिसूं अकेले मैं।
राघव रुँधे गले से बोला,”दिव्या हम जो भी कर रहे हैं,उससे हमारे मुन्ना को सीख मिलेगी।
तुम इतना सब कुछ बड़ी सरलता से कर गयीं न,
कुछ दिनों की बात है,हम मनुष्य कितने अभागे हैं,पिता हमें बढ़ते हुए देखते हैं और हम उन्हें खत्म होते हुए…
लेकिन राघव मैँ उनकी सेवा से नहीं घबराती, बाबू से बहुत राहत भी है कोई तकलीफ़ हो तो झट से ऐसे समझाते हैं कभी कभी डर भी लगता है कि इन्हें कुछ हो गया तो?
तब तक बाबू ने फिर बुलाया राघव सबको बुला लाओ, सबको देखने की इच्छा हो रही है और उनकी खाँसी का दौरा शुरू हो गया।
थोड़ी देर में दोनों बड़ी बहुएँ बाबूजी के कमरे में आ गईं ।
और अगले दिन तक बेटी दामाद भी।सभी उनके कमरे में बैठे थे और दिव्या सबके खाने पीने की व्यवस्था कर रही थी।
दिव्या बहू यहाँ आओ ,और तिजोरी खोलियो ,और लाल पोटली देओ।
पोटली खोलकर बाबू ने पाँच सोने की पुश्तैनी मोहरें और सासू माँ का जड़ाऊ पुश्तैनी हार दिव्या के हाथ में दे दिया।
यह मेरी माँ की निशानी है इसने मेरी माँ की तरह मेरी सेवा की तो माँ की धरोहर भी उसी की जिसने मेरी माँ न होते हुए भी माँ का फ़र्ज़ पूरा किया।
ये मेरी पेंशन की ए.फ़ डी.तेरे लिए ही बनवाई थी, तेरे ज़ेवर बिक गये थे तो बोझ था मन में, अब चैन से आँख मूँद पाऊँगा।
अब तो सबके मन में ईर्ष्या भर गई कि बाबू आप न्याय नहीं कर रहे बराबरी तो सब बच्चों में होनी चाहिए।
बिलकुल बेटा… लेकिन तुम्हारे पास मेरे लिए पैसे तो क्या समय भी नहीं था …
न तुम्हारी पत्नियों के पास खाना ,उन्हें मुझसे घिन आती थी।तब तो बराबरी न की?
मैं बोझ था ,लक्ष्मी कोई को बोझ न लग रही,कभी सुख दुख पूछ लेते कि बाबू क्या खाओगे दो क्षण पास बैठ जाते।
कौआ बन के खाने नहीं आऊँगा ज़िंदा तो पानी पूछते नहीं तुम लोग ,जब मैं तब राघव और बहू से सेवा कराने को अकेला था तो अब देने के लिये भी अकेला हूँ ।
यह बचत मैंने अपने बुरे समय के लिये की थी जो मैं अपनी खुशी से किसी को भी देने का अधिकारी हूँ।
तुम सबको बहुत कुछ दे चुका , कड़वी सच्चाई सुनकर गुस्से से भरकर सब अपनी अपनी जगह वापस चले गए।
दो महीने बाद बाबूजी भी परमधाम चले गये, उनके सँस्कार के लिये भाइयों ने राघव को अपना हिस्सा लेकर भी अकेला छोड़ दिया।
हाँ तेरहवीं के भोज और दान इत्यादि को अच्छे स्तर पर न कर पाने के लिए ताने ज़रूर दिए आज छोटी बहन ने ही सबका मुँह बन्द कर दिया।
बड़े भैया… राघव और दिव्या ने जैसा भी कर पाया हो ।
लेकिन मुझे एक सब्र है कि अगर उसने बाबू को एक चम्मच भी घी खिलाया तो बाबू ने खाया कौए ने नहीं। इन्हें अम्मा बाबू कम पैसे होते हुए भी बोझ न लगे।
यही सच्ची सेवा है वो जिस लायक हैं उतना ही तो करेंगे ,उन्होंने जो भी किया दिल से किया सब तुम्हारी तरह मैनेजर तो है नही बैंक के।
अब उन्हें अगर बाबू कुछ दे गये अपने हाथ से तो सबके सामने दे गये इसमें तकलीफ कैसी?
तबतक दरवाज़े पर दस्तक हुई
कौन? जी … दिव्या राघव मिश्रा आपकी रजिस्टर्ड डाक है।
लिफाफा खोलते ही दिव्या ख़ुशी से चहक उठी उसका सरकारी नौकरी का नियुक्ति पत्र था उसमें।
तस्वीर में बाबू मुस्कुरा रहे थे,
“दोज आल्सो सर्व हू स्टैंड एंड वेट आज सच हो गया था।”
कौए को भोजन देना हमारी संस्कृति है पर मातापिता का आदर और अशक्त होने पर भी उनका पूरा ध्यान कर्तव्य और सँस्कार।
नियुक्ति पत्र हाथ मे पकड़े दिव्या आज अचंभित सी बाबू की किताबें निहार रही थी,जिनकी जगमगाहट आज सब देख रहे थे।
