Mulla Nasruddin
Mulla Nasruddin

Mulla Nasruddin ki kahaniya: बाक़ी सारी रात नसरुद्दीन उस काफ़िर, बदमाश नसरुद्दीन को पकड़ने की तरकीबें अमीर को बताता रहा। ये तरकीबें बहुत ही चालाकी भरी थीं। अमीर उन्हें सुनकर बहुत खुश हुए।
सोने के सिक्कों से भरी एक थैली अमीर से ख़र्च के लिए लेकर नसरुद्दीन अंतिम बार मीनार की सीढ़ियाँ चढ़ा। उसने थैली एक पेटी में रखकर चारों ओर देखा । उसके होठों से एक लंबी साँस निकल गई। इस जगह को छोड़ते हुए उसे दुख तो हो रहा था। यहाँ उसने बहुत-सी रातें अकेले, बिना सोये काटी थीं। इन खौफ़नाक दीवारों के पीछे उसकी रूह का एक हिस्सा हमेशा के लिए छूट रहा था।

दरवाज़ा बंद करके दबे पाँव वह नीचे उतर आया। एक बार फिर दुनिया उसके लिए खुल गई थी।

वह फाटक से लगकर खड़ा हो गया।

सिपाहियों की भीड़ से घिरे उसके दोस्तों की एक लंबी कतार फाटक के अंदर आ रही थी। उनके हाथ बँधे हुए थे। सिर झुके हुए थे।

इनमें बूढ़ा नयाज कुम्हार था, कहवाखाने का मालिक अली था, यूसुफ लुहार था। और भी बहुत से लोग थे। जिस किसी ने भी कभी नसरुद्दीन से बात की थी, उसे पानी पिलाया था, या उसके गधे के लिए एक मुट्ठी घास दी थी, वे सभी थे, उन सबके पीछे-पीछे अर्सला बेग चल रहा था ।

जब तक नसरुद्दीन सँभल पाता फाटक बंद हो गया। कैदी जेलखाने में * बंद कर दिए गए। नसरुद्दीन अर्सला बेग की तलाश में लौट आया।

‘अर्सला बेग साहब, क्या हुआ? इन लोगों को किस जुर्म में गिरफ्तार किया गया है?’

अर्सला बेग ने में विजेता की मुद्रा कहा, ‘ये सब लोग नसरुद्दीन के साथी और उसे पनाह देने वाले हैं। मेरे मुखबिरों और जासूसों ने इन लोगों का पता बताया था। इन सबको बेरहमी से सरेआम मौत की सज़ा दी जाएगी। या फिर ये सबूत पेश करेंगे कि उनका नसरुद्दीन के साथ कोई संबंध नहीं है। लेकिन मौलाना हुसैन, आप इतने पीले क्यों पड़ रहे हैं? आप बहुत परेशान दिखाई दे रहे हैं। ‘

नसरुद्दीन चौंक पड़ा, ‘पीला? हाँ-हाँ, क्यों नहीं, इसका मतलब है इनाम मुझे नहीं, आपको मिलेगा।’

नसरुद्दीन महल में रुकने पर मजबूर हो गया । बेगुनाह लोग मौत के मुँह में जा रहे हों तो वह इसके अलावा कर ही क्या सकता था ?
दोपहर को फौज़ ने बाज़ार में मोर्चा जमाया। शाही तख्त के चारों ओर तीन-तीन की क़तार में सिपाही खड़े हो गए। नकीवों ने सजा की घोषणा कर दी थी। भीड़ चुपचाप खड़ी थी ।
महल के फाटक खुले । प्राचीन परंपरा के अनुसार पहले चोबदार, फिर पहरेदार, फिर मीरासी, फिर हाथी और दरबारी निकले। अंत में अमीर की सवारी आई। भीड़ ने ज़मीन पर लेटकर कोर्निश की ।

अमीर तख़्त पर आ बैठे।

अपराधी फाटक के बाहर लाए गए। भीड़ ने फुसफुसाहट से उसका स्वागत किया। अपराधियों के रिश्तेदार और दोस्त सामने वाली कतार में उन पर टकटकी बाँधे खड़े थे।
जल्लाद कुल्हाड़ियाँ तेज़ करने, सूलियाँ गाड़ने और रस्से तैयार करने लगे थे। उन्हें दिन भर के लिए काम मिल गया था। क्योंकि एक के बाद एक साठ. आदमियों को मौत के घाट उतारना था ।
अपराधियों की भीड़ में सबसे आगे था बूढ़ा नयाज। जल्लादों ने उसे बाँहों में जकड़ रखा था। दायीं ओर फाँसी थी और बायीं ओर लकड़ी का कुंदा, जिस पर सिर रखकर कुल्हाड़ी चलाई जाने वाली थी।

वज़ीरे-आजम बख्तियार ने संजीदा लेकिन ज़ोरदार आवाज़ में ऐलान किया-

‘बिस्मिल्लाह-उल-रहमान – उल रहीम ! बुखारा के सुल्तान दुनिया के सूरज अमीरे-आज़म ने इन्साफ के तराज़ू में तोलकर अपनी रियाया में से साठ आदमियों के जुर्मों का फ़ैसला किया है। इन लोगों ने अमन में खलल डालने, फूट फैलाने वाले, शरारतपसंद, काफ़िर नसरुद्दीन को पनाह दी थी।

अमीरे-आज़म का हुक्म है कि आवारा नसरुद्दीन को बहुत दिनों बाद अपने घर में पनाह देनेवाले नयाज कुम्हार को सबसे पहले मौत की सज़ा दी जाए। उसका सिर कलम कर दिया जाएगा। जहाँ तक दूसरे मुजरिमों की बात है उनकी पहली सज़ा यह है कि नयाज की मौत देखें ताकि अपने लिए और भी तकलीफदेह मौत का तसव्वर कर सकें। इनमें से हर एक को किस ढंग से मारा जाएगा, इसका ऐलान बाद में किया जाएगा।’

चारों ओर इतनी गहरी ख़ामोशी छाई हुई थी कि बख्तियार का हर लफ़्ज आख़िरी क़तार तक सुनाई दे रहा था।

अपनी आवाज़ को और ऊँचा करते हुए उसने कहा, ‘हर एक को मालूम हो कि आइन्दा नसरुद्दीन को पनाह देनेवाला शख़्स अगर उस काफ़िर बदमाश का पता बता देगा तो न सिर्फ उसकी सजा माफ़ कर दी जाएगी बल्कि उसे इनाम भी मिलेगा। वह औरों की सजा माफ़ कराने का भी हक़दार होगा। नयाज कुम्हार, क्या तुम्हें नसरुद्दीन का पता बताना और अपने-आपको और दूसरों को बचाना मंजूर है?’

नयाज कुछ देर सिर झुकाए ख़ामोश खड़ा रहा। बख़्तियार ने अपना सवाल फिर दोहराया तो उसने जवाब दिया, ‘नहीं, मैं नहीं जानता कि वह कहाँ है?’

जल्लाद उसे खींचकर लकड़ी के कुंदे के पास ले गए। भीड़ में कोई रो उठा। नयाज ने अपना सफ़ेद बालों वाला सिर कुंदे पर रख दिया।

तभी दरबारियों को कोहनी से हटाता हुआ नसरुद्दीन अमीर के सामने आ खड़ा हुआ और इतने ज़ोर से बोलने लगा कि सारी भीड़ सुन ले ।

‘ऐ आका, जल्लादों को हुक्म दें कि सज़ा की तामील रोक दी जाए। मैं नसरुद्दीन को इसी वक्त और यहीं गिरफ्तार करा दूँगा । ‘

अमीर आश्चर्य से उसकी ओर देखने लगे। भीड़ में खलबली मच गई। अमीर के इशारे पर जल्लाद ने कुल्हाड़ी कंधे से उतारकर पैरों के पास रख ली।

नसरुद्दीन ने ऊँची आवाज़ में कहा, ‘शहंशाह, क्या इन नाचीज़ पनाह देनेवालों को सज़ा देना मुनासिब होगा, जबकि वह शख़्स छोड़ दिया जाए, जिसके यहाँ पिछले काफी दिनों से नसरुद्दीन रह रहा है। जिसने उसे खिलाया है, इनाम दिए हैं, और उसकी पूरी देखरेख की है?”

अमीर ने कुछ सोचते हुए कहा, ‘तुम ठीक कहते हो। अगर इस तरह सरदार को मौत की सज़ा नहीं दी और उसे ज़िंदा रहने दिया तो क्या पनाह देनेवाले इन छोटे आदमियों को मौत की सज़ा देना इन्साफ़ होगा ?’

अगर हम पनाह देनेवालों के सरदार को मारना नहीं चाहते तो इन सब लोगों को ज़रूर छोड़ देंगे।’ अमीर ने परेशान होकर कहा, ‘लेकिन हमारी समझ में यह बात नहीं आ रही कि सरदार को मौत की सज़ा देने से हमें रोकने की वजह क्या हो सकती है? वह है कहाँ? हमें उसे दिखा भर दो। हम फ़ौरन उसका सिर धड़ से अलग कर देंगे । ‘

नसरुद्दीन भीड़ की ओर मुड़ा, ‘क्या आप लोगों ने अमीर की बात सुनी ? बुखारा के सुल्तान ने अभी-अभी फर्माया है कि अगर वह पनाह देनेवालों के सरदार को, जिसका नाम मैं अभी कुछ ही मिनटों में बताऊँगा, मौत की सज़ा नहीं देंगे तो पनाह देनेवाले इन छोटे लोगों को माफ़ कर दिया जाएगा। ऐ शहंशाह, मैंने सच कहा है?’

अमीर ने समर्थन किया, ‘तुमने सच कहा है मौलाना हुसैन। हम वायदा करते हैं कि ऐसा ही होगा लेकिन तुम अब जल्दी से उस सरदार की सूरत दिखाओ।

‘ नसरुद्दीन ने भीड़ से पूछा, ‘आप लोग सुन रहे हैं न! अमीर ने वायदा किया है। ‘
उसने लंबी साँस ली। हज़ारों आँखें उसी पर टिकी हुई थीं।
‘पनाह देने वालों का सरदार।’ वह लड़खड़ा गया। तभी अमीर बेताबी से चिल्लाए, ‘जल्दी करो मौलाना हुसैन। जल्दी बताओ।’

नसरुद्दीन ने खनकती हुई आवाज़ में कहा, ‘पनाह देनेवालों के सरदार आप हैं अमीर ।’

और फिर उसने अपनी नकली दाढ़ी और साफ़ा उतारकर फेंक दिया।

भीड़ की साँस जैसे ऊपर की ऊपर रह गई। अमीर की आँखें बाहर को निकल पड़ीं। उसके होंठ हिले लेकिन आवाज़ नहीं निकली। दरबारी इस तरह खड़े रह गए जैसे बुत बन गए हों।

‘नसरुद्दीन! नसरुद्दीन !’ भीड़ खुशी से चिल्ला उठी। ‘नसरुद्दीन !’ दरबारी घबरा उठे ।
‘नसरुद्दीन!’ अर्सला बेग चौंक पड़ा।

अमीर ने सँभलकर धीरे से कहा, ‘नसरुद्दीन ! ‘

‘हाँ नसरुद्दीन ! ऐ अमीर, फौरन जल्लादों को हुक्म दीजिए कि आपका सिर धड़ से जुदा कर दें। क्योंकि मुझे पनाह देनेवालों के सरदार आप हैं। मैं आपके साथ महल में रहा, आपके साथ मैंने खाना खाया। आपसे इनाम पाए। आपके मामलों में सलाह देनेवाला सबसे बड़ा सलाहकार मैं था । नसरुद्दीन को पनाह देनेवाले आप हैं। अभी हुक्म दीजिए जल्लादों को कि आपका सिर कलम कर दें। ‘

पलक झपकते नसरुद्दीन को पकड़ लिया गया। उसने अपने आपको बचाने की कोई कोशिश नहीं की।

अमीर ने वायदा किया है कि मौत की सजा पानेवाले सभी लोग रिहा कर दिए जाएँगे। बुखारा शरीफ़ के बाशिंदो, अमीर की बात आप सबने सुनी है। आपने उन्हें वायदा करते सुना है । ‘

भीड़ में खलबली मच गई। वह आगे बढ़ने लगी। सिपाहियों की कतारें भीड़ को रोकने की पूरी कोशिश कर रही थीं। नारे बुलंद हो रहे थे।

‘कैदियों को रिहा करो।’
‘अमीर ने वायदा किया है। ‘
‘कैदियों को रिहा करो । ‘

नारे बुलंद होते चले गए। सिपाहियों की कतारें तितर-बितर होने लगीं। बख्तियार ने अमीर के कान में झुककर कहा, ‘आका, इन लोगों को रिहा करना होगा। वरना रियाया बगावत कर देगी । ‘

अमीर ने स्वीकृति में सिर हिला दिया ।
बख्तियार चिल्लाया, ‘अमीर अपना वायदा पूरा करते हैं । ‘
सिपाहियों ने रास्ता दे दिया। मौत की सजा पाने वाले भीड़ में समा गए। सिपाही नसरुद्दीन को महल की ओर लेकर चल दिए। भीड़ में बहुत से लोग रो-रोकर चिल्ला उठे-
‘अलविदा नसरुद्दीन!’ नसरुद्दीन सीना ताने, सिर उठाए चल रहा था । चेहरे पर भय की हल्की सी भी रेखा नहीं थी । फाटक पर पहुँचकर उसने मुड़कर भीड़ की ओर देखा ।
भीड़ ज़ोर से चीख उठी-
‘अलविदा!’
अमीर जल्दी से सवारी में जा बैठे। शाही जुलूस तेज़ी से महल में चला गया।

ये कहानी ‘मुल्ला नसरुद्दीन’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Mullah Nasruddin(मुल्ला नसरुद्दीन)