कुक्कू की नानी का गाँव था भवानीपुर। वह अपनी नानी के साथ भवानीपुर में रहता था। पास में ही एक और गाँव था भीमपुर, जो नदी के बिल्कुल किनारे पर था।
एक बार की बात, भीमपुर के पास बहने वाली भूली नदी में बाढ़ आ गई। उससे लोगों का काफी नुकसान हो गया।
नानी अकसर कुक्कू को बताया करती थी, ”भीमपुर में नदी की बाढ़ के कारण इस साल बहुत तबाही हुई है। लोगों की तैयार फसलें बर्बाद हो गई। एक ही परिवार में कई-कई लोग बीमारी की चपेट में आ गए।”
सुनकर कुक्कू को बड़ा दुख होता। सोचता, ‘क्या मैं लोगों का दुख दूर करने के लिए कुछ नहीं कर सकता?’
थोड़े दिन बाद दीवाली थी। कुक्कू के दोस्त पटाखे लेकर आए, पर कुक्कू ने एक भी पटाखा नहीं चलाया। बोला, ”मेरी नानी बताती है, भीमपुर में लोग बहुत दुखी हैं। जब पड़ोस में लोग इतने दुखी हों, तो क्या पटाखे चलाना अच्छा लगता है?’
कहते-कहते कुक्कू उदास हो गया।
पहले तो कुक्कू के दोस्त उसका खूब मजाक उड़ाते रहे, पर फिर धीरे-धीरे कुक्कू की बात का उन पर असर हुआ। बोले, ”अच्छा कुक्कू, तू ही बता, क्या किया जाए?”
तब कुक्कू ने सुझाया, ”इस बार हम पटाखे नहीं जलाएँगे। वह पैसा इकट्ठा करके भीमपुर के लोगों की मदद करेंगे।”
अगले दिन कुक्कू और उसके दोस्तों ने एक छोटी सी संदूकची ली। घर-घर जाकर कहा, ”आप लोग पटाखे न चलाएँ। वह पैसा इसमें डाल दें।”
तीन दिनों में ही कुक्कू और उसके दोस्तों ने काफी रुपए इकट्ठे कर लिए। वह संदूकची उन्होंने मुखिया जी को यह कहकर दी कि हमारी ओर से आप भीमपुर के लोगों तक पहुँचा दें।
बच्चों का त्याग देखकर मुखिया रामचंद्रन की भी आँखें भर आईं। उसने गाँव वालों से कपड़े और अनाज इकट्ठा किया। फिर सब कुछ बैलगाड़ी पर रखकर बच्चों की टोली के साथ भीमपुर की ओर चल दिया। वहाँ जाकर मुखिया रामचंद्रन ने कहा, ”यह कुक्कू और उसके दोस्तों की ओर से दीवाली की छोटी सी सौगात है।”
भीमपुर के लोगों ने खुश होकर कुक्कू और उसके दोस्तों को खूब प्यार किया।
उस दिन भवानीपुर के लोगों ने सिर्फ एक दीया जलाया—प्यार का दीया। उसमें पड़ोस के गाँव के लिए संदेश था कि हम एक हैं। हर मुसीबत में एक-दूसरे के काम आते रहेंगे।
