Hindi Story: सावित्री के यहाँ से लौटी तो कुंती यों ही बहुत थका हुई महसूस कर रही थी। उस पर टुन्नी के पत्र ने उसके मन को और भी बुरी तरह मथ दिया। पापा को भी दो बार खाँसी का दौरा उठ चुका था। वह जानती थी कि वे बोलेंगे कुछ नहीं, पर उनका मन कर रहा होगा कि टुन्नी को वापस बुला लें। रात में लेटी तो फिर उसी पत्र को खोलकर पढ़ने लगी।
‘दीदी, मेरा मन यहाँ ज़रा भी नहीं लगता। सारे समय पापा की और तुम्हारी याद आती रहती है। स्कूलवालों ने भी मुझे आठवीं में ही भरती किया है। उस दिन तुम मेरे हैडमास्टर साहब के पास चली जाती तो कितना अच्छा होता, पूरा एक साल बच जाता। तुमने मेरा इतना-सा काम भी नहीं किया दीदी, पूरा एक साल बिगड़वा दिया…।’क्या सचमुच ही उसने टुन्नी का साल बिगड़वा दिया? नहीं-नहीं, जो कुछ उसने किया, ठीक ही किया। कोई उसके पास इस तरह की सिफारिश लेकर आए तो? उसका बस चले तो वह उसे स्कूल के फाटक से ही निकाल बाहर करे। वह शुरू से ही इतना कहती थी कि टुन्नी पढ़, मेहनत कर। पर उस समय पापा को टुन्नी बच्चा लगता था। अब फेल हो गया तो जान-पहचान का फायदा उठाओ, सिफ़ारिश करो। उसने जो कुछ किया, ठीक ही किया। स्कूलों में यह सब देखकर उसका मन आक्रोश, दु:ख और ग्लानि से भर जाता है। पर होता है, और वह देखती भी है। लेकिन उससे क्या हुआ, वह स्वयं ऐसा कभी नहीं करेगी। जिस दिन पापा ने उससे यह बात कही थी, वह अवाक्-सी उनका मुँह देखती रह गई थी, जैसे विश्वास न हो रहा हो कि पापा भी कभी ऐसी बात कह सकते हैं, और वह भी कुंती से। आज वह जो कुछ भी है, विचारों से, विश्वास से, पापा की ही तो बनाई हुई है। लेकिन पापा बदल गए हैं, बहुत बदल गए हैं! शायद यह बीमारी ही ऐसी होती है कि आदमी को बदलना पड़ता है। कुंती स्वयं महसूस करती है कि उसके जिस आदर्शवाद और दृढ़ आत्मविश्वास पर पापा कभी गर्व किया करते थे, उसी पर आज वे शायद दुःख करते हैं। उन्हें लगता है जैसे कुंती को बनाने में वे कहीं भूल कर बैठे हैं। वह अपना मन टटोलने लगी, क्या सचमुच ही कुछ ग़लत विश्वास और गलत सिद्धांत वह पाल बैठी है?
सामने वॉयलिन पड़ा था। वह उठी और वॉयलिन लेकर छत पर चली गई। जब उसका मन बहुत खिन्न होता है तो उसे वॉयलिन बजाना बहुत अच्छा लगता है। रात के सन्नाटे में मन का अवसाद जैसे संगीत की स्वर-लहरियों पर उतर-उतरकर चारों ओर बिखरने लगता है। वह आँखें मूंदकर बेसुध-सी वॉयलिन बजाने लगी और उसकी त्रस्त आत्मा, खिन्न मन और शिथिल शरीर धीरे-धीरे सब थिरकने लगे। वह किसी और ही लोक में पहुंच गई।
खों खों, खों… पापा की लगातार खाँसी से उसकी तन्मयता टूटी और एकाएक अँगुलियाँ शिथिल हो गईं और वॉयलिन ठोड़ी के नीचे से सरककर छाती पर आ टिका। वह नीचे आई। पापा को आज तीसरी बार दौरा उठा था। उन्हें दवाई दी और पास बैठकर तब तक पीठ सहलाती रही, जब तक वे शांत होकर लेट नहीं गए।
जब वह अपने कमरे में आकर लेटी तो रात करीब आधी बीत चुकी थी। आज सावित्री के यहाँ उसका पहला दिन था। उसे ख़याल आया, कल जब वह स्कूल जाएगी तो मिसेज़ नाथ उसे देखकर वैसे ही व्यंग्यात्मक ढंग से मुस्कुराएँगी। उनकी इस मुस्कराहट ने हमेशा उसके मन में घृणा पैदा की है। पर उसे लगा, जैसे कल वह इस मुस्कराहट का सामना नहीं कर सकेगी। उसका उपहास करती, उस पर आरोप लगाती-सी मिसेज़ नाथ की मुस्कराहट अँधेरे में एक बार उसके सामने कौंध गई। कुंती ने करवट बदली तो मकान-मालिक के बच्चों के मास्टर का दयनीय, सूखा-सा चेहरा उसके सामने उभर आया। एक यह व्यक्ति है, जिसने उसके मन में हमेशा अपने काम के प्रति अरुचि उत्पन्न की है। ओह! क्या-क्या कल्पनाएँ थीं उसके मन में अध्यापन को लेकर!…लेकिन मिसेज़ नाथ… यह मास्टर…कुंती ने फिर करवट बदल ली।
एक महीने में ही घर का जैसे सब-कुछ बदल गया है। उसे वह दिन याद आया, जब वह डॉक्टर के यहाँ से पापा की एक्स-रे प्लेट के साथ रिपोर्ट लेकर आई थी कि उन्हें क्षय है। रास्ते-भर यही सोचती आई थी कि पापा को रिपोर्ट कैसे देगी? उस पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी? दवाइयों का लंबा नुस्खा और हिदायतों की लंबी सूची समस्या के दूसरे पहलू को भी उभार-उभारकर रख रही थी। कैसे वह सब करेगी? करना तो सब उसी को है। पिछले चार सालों में इस घर के लिए वही तो सब-कुछ करती आई है। वही तो पापा की पहली संतान है और पापा हमेशा कहते थे, वह उनकी लड़की नहीं, लड़का है। शुरू से उसे लड़के की तरह ही पाला… बचपन में वह लड़कों के साथ खेली, लड़कों के साथ पढ़ी और अब लड़कों की तरह ही इस घर को सँभाल रही है। पर अब? ।
घर पहुँची तो पापा पलंग पर लेटे हुए थे। उसने चुपचाप वह लिफ़ाफ़ा उनके हाथ में थमा दिया और नौकर को चाय लाने का आदेश देकर अंदर चली गई। वह प्रतीक्षा कर रही थी कि पापा उसे बुलाएँगे, कुछ कहेंगे, पर उन्होंने नहीं बुलाया। क्या पापा को रिपोर्ट देखकर सदमा लगा? क्या वे पहले से नहीं जानते थे कि उन्हें क्षय है? फिर? चाय पीने वह बाहर आकर बैठी। शायद अब कोई बात चले! पर फिर मौन। पापा पैर फैलाकर तकिए के सहारे बैठे शून्य नज़रों से आसमान निहार रहे थे। कुंती ने प्याला पकड़ाया तो चाय पीने लगे। ख़ामोशी के ये क्षण कुंती को बहुत बोझिल लगे थे। सामने इतनी बड़ी समस्या है और दोनों यों मौन बैठे हैं। स्थिति की गंभीरता को दोनों ही महसूस कर रहे थे, पर लग रहा था जैसे उसका नाम लेने-भर से वह और विकट हो जाएगी। पापा शायद सोच रहे थे कि दोनों बच्चे कितना असहाय महसूस करने लगेंगे! और कुंती सोच रही थी कि बात करने से ही पापा के मन में जीवन के प्रति कैसी घातक निराशा छा जाएगी! दोनों बच्चों के अनिश्चित भविष्य की चिंता उन्हें कितना व्यथित कर देगी! पर मौन रहने से ही तो यह सब नहीं सुलझ जाएगा। तब?
क्षय: मन्नू भंडारी की कहानी
