‘दीदी, मेरा मन यहाँ ज़रा भी नहीं लगता। सारे समय पापा की और तुम्हारी याद आती रहती है। स्कूलवालों ने भी मुझे आठवीं में ही भरती किया है। उस दिन तुम मेरे हैडमास्टर साहब के पास चली जाती तो कितना अच्छा होता, पूरा एक साल बच जाता। तुमने मेरा इतना-सा काम भी नहीं किया दीदी, पूरा एक साल बिगड़वा दिया…।’

क्या सचमुच ही उसने टुन्नी का साल बिगड़वा दिया? नहीं-नहीं, जो कुछ उसने किया, ठीक ही किया। कोई उसके पास इस तरह की सिफारिश लेकर आए तो? उसका बस चले तो वह उसे स्कूल के फाटक से ही निकाल बाहर करे। वह शुरू से ही इतना कहती थी कि टुन्नी पढ़, मेहनत कर। पर उस समय पापा को टुन्नी बच्चा लगता था। अब फेल हो गया तो जान-पहचान का फायदा उठाओ, सिफ़ारिश करो। उसने जो कुछ किया, ठीक ही किया। स्कूलों में यह सब देखकर उसका मन आक्रोश, दु:ख और ग्लानि से भर जाता है। पर होता है, और वह देखती भी है। लेकिन उससे क्या हुआ, वह स्वयं ऐसा कभी नहीं करेगी। जिस दिन पापा ने उससे यह बात कही थी, वह अवाक्-सी उनका मुँह देखती रह गई थी, जैसे विश्वास न हो रहा हो कि पापा भी कभी ऐसी बात कह सकते हैं, और वह भी कुंती से। आज वह जो कुछ भी है, विचारों से, विश्वास से, पापा की ही तो बनाई हुई है। लेकिन पापा बदल गए हैं, बहुत बदल गए हैं! शायद यह बीमारी ही ऐसी होती है कि आदमी को बदलना पड़ता है। कुंती स्वयं महसूस करती है कि उसके जिस आदर्शवाद और दृढ़ आत्मविश्वास पर पापा कभी गर्व किया करते थे, उसी पर आज वे शायद दुःख करते हैं। उन्हें लगता है जैसे कुंती को बनाने में वे कहीं भूल कर बैठे हैं। वह अपना मन टटोलने लगी, क्या सचमुच ही कुछ ग़लत विश्वास और गलत सिद्धांत वह पाल बैठी है?

सामने वॉयलिन पड़ा था। वह उठी और वॉयलिन लेकर छत पर चली गई। जब उसका मन बहुत खिन्न होता है तो उसे वॉयलिन बजाना बहुत अच्छा लगता है। रात के सन्नाटे में मन का अवसाद जैसे संगीत की स्वर-लहरियों पर उतर-उतरकर चारों ओर बिखरने लगता है। वह आँखें मूंदकर बेसुध-सी वॉयलिन बजाने लगी और उसकी त्रस्त आत्मा, खिन्न मन और शिथिल शरीर धीरे-धीरे सब थिरकने लगे। वह किसी और ही लोक में पहुंच गई।

खों खों, खों… पापा की लगातार खाँसी से उसकी तन्मयता टूटी और एकाएक अँगुलियाँ शिथिल हो गईं और वॉयलिन ठोड़ी के नीचे से सरककर छाती पर आ टिका। वह नीचे आई। पापा को आज तीसरी बार दौरा उठा था। उन्हें दवाई दी और पास बैठकर तब तक पीठ सहलाती रही, जब तक वे शांत होकर लेट नहीं गए।

जब वह अपने कमरे में आकर लेटी तो रात करीब आधी बीत चुकी थी। आज सावित्री के यहाँ उसका पहला दिन था। उसे ख़याल आया, कल जब वह स्कूल जाएगी तो मिसेज़ नाथ उसे देखकर वैसे ही व्यंग्यात्मक ढंग से मुस्कुराएँगी। उनकी इस मुस्कराहट ने हमेशा उसके मन में घृणा पैदा की है। पर उसे लगा, जैसे कल वह इस मुस्कराहट का सामना नहीं कर सकेगी। उसका उपहास करती, उस पर आरोप लगाती-सी मिसेज़ नाथ की मुस्कराहट अँधेरे में एक बार उसके सामने कौंध गई। कुंती ने करवट बदली तो मकान-मालिक के बच्चों के मास्टर का दयनीय, सूखा-सा चेहरा उसके सामने उभर आया। एक यह व्यक्ति है, जिसने उसके मन में हमेशा अपने काम के प्रति अरुचि उत्पन्न की है। ओह! क्या-क्या कल्पनाएँ थीं उसके मन में अध्यापन को लेकर!…लेकिन मिसेज़ नाथ… यह मास्टर…कुंती ने फिर करवट बदल ली।

एक महीने में ही घर का जैसे सब-कुछ बदल गया है। उसे वह दिन याद आया, जब वह डॉक्टर के यहाँ से पापा की एक्स-रे प्लेट के साथ रिपोर्ट लेकर आई थी कि उन्हें क्षय है। रास्ते-भर यही सोचती आई थी कि पापा को रिपोर्ट कैसे देगी? उस पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी? दवाइयों का लंबा नुस्खा और हिदायतों की लंबी सूची समस्या के दूसरे पहलू को भी उभार-उभारकर रख रही थी। कैसे वह सब करेगी? करना तो सब उसी को है। पिछले चार सालों में इस घर के लिए वही तो सब-कुछ करती आई है। वही तो पापा की पहली संतान है और पापा हमेशा कहते थे, वह उनकी लड़की नहीं, लड़का है। शुरू से उसे लड़के की तरह ही पाला… बचपन में वह लड़कों के साथ खेली, लड़कों के साथ पढ़ी और अब लड़कों की तरह ही इस घर को सँभाल रही है। पर अब? ।

घर पहुँची तो पापा पलंग पर लेटे हुए थे। उसने चुपचाप वह लिफ़ाफ़ा उनके हाथ में थमा दिया और नौकर को चाय लाने का आदेश देकर अंदर चली गई। वह प्रतीक्षा कर रही थी कि पापा उसे बुलाएँगे, कुछ कहेंगे, पर उन्होंने नहीं बुलाया। क्या पापा को रिपोर्ट देखकर सदमा लगा? क्या वे पहले से नहीं जानते थे कि उन्हें क्षय है? फिर?

चाय पीने वह बाहर आकर बैठी। शायद अब कोई बात चले! पर फिर मौन। पापा पैर फैलाकर तकिए के सहारे बैठे शून्य नज़रों से आसमान निहार रहे थे। कुंती ने प्याला पकड़ाया तो चाय पीने लगे। ख़ामोशी के ये क्षण कुंती को बहुत बोझिल लगे थे। सामने इतनी बड़ी समस्या है और दोनों यों मौन बैठे हैं। स्थिति की गंभीरता को दोनों ही महसूस कर रहे थे, पर लग रहा था जैसे उसका नाम लेने-भर से वह और विकट हो जाएगी। पापा शायद सोच रहे थे कि दोनों बच्चे कितना असहाय महसूस करने लगेंगे! और कुंती सोच रही थी कि बात करने से ही पापा के मन में जीवन के प्रति कैसी घातक निराशा छा जाएगी! दोनों बच्चों के अनिश्चित भविष्य की चिंता उन्हें कितना व्यथित कर देगी! पर मौन रहने से ही तो यह सब नहीं सुलझ जाएगा। तब?

तब केवल बात करने-भर के लिए ही कुंती ने टुन्नी को इलाहाबाद भेजने की बात कह दी थी। वह जानती थी कि पापा इसका विरोध करेंगे। अपने बच्चों को वह एक दिन के लिए भी अपनी आँखों से दूर नहीं कर सकते। फिर टुन्नी छोटा था, अधिक लाडला। पर वे कुछ नहीं बोले थे। धीरे से इतना ही कहा था : ‘भेज देना’। कुंती को लगा, जैसे पापा विवश होकर कह रहे हों-मैं कौन होता हूँ कुछ कहनेवाला? अब तो तुम्हीं सब-कुछ हो, जो चाहो करो। मैं क्षय का रोगी…

कुंती की आँखें छलछला आई थीं।

थोड़ी देर बाद पापा ने रुकते-रुकते कहा था : ‘एक बार कोशिश करके इसे चढ़वा तो दे, तेरी हैडमास्टर साहब से अच्छी जान-पहचान है… वहाँ भी जाए तो एक साल तो बच जाए।

जहर की तरह कुंती ने चाय का घूँट निगला था और अपने को भरसक संयत करके बोली थी : ‘पापा, कम-से-कम स्कूलों को तो इन सारी बातों से भ्रष्ट न करवाओ। टुन्नी मेरा अपना विद्यार्थी होता तब भी मैं उसे कभी न चढ़ाती।’

पर आज टुन्नी का पत्र जाने क्यों रह-रहकर उसके मन में टीस उठा रहा है! कुंती को लगा, जैसे प्यास से उसका गला सूख रहा है। उसने उठकर पानी पिया। आकर लेटी तो नज़र फिर वॉयलिन पर पहुँच गई। एक बार फिर इच्छा हुई कि वॉयलिन लेकर छत पर चली जाए। पर उसने अपनी आँखें बंद कर लीं।

सावित्री की ट्यूशन वह निभा सकेगी? अब तो जैसे भी हो, निभाना ही होगा। वह स्कूल में छह घंटे काम करती है, तब जाकर उसे दो सौ रुपए मिलते हैं और कहाँ डेढ़ घंटे के ही दो सौ! फिर एक महीने खुशामद की उसकी माँ ने। चार चक्कर तो घर के ही लगाए। पर फिर भी… और उसकी आँखों के सामने मकान मालिक के मास्टरजी फिर घूम गए… वे मास्टरजी हैं, पर कभी रिक्शा में सामान लदवाकर लाते हैं तो, कभी सेठानी का हिसाब लिखते रहते हैं। हुँ वह तो जिस दिन भी देखेगी कि उसके सारे परिश्रम के बावजूद सावित्री नहीं सुधर रही है, कुछ भी नहीं सीख रही है, उसी दिन छोड़ देगी, चाहे कितनी ही मुसीबत क्यों न सहनी पड़े। सावित्री को पढ़ाना कोई सरल काम नहीं है। जो आठवीं के भी लायक नहीं है, उसे नवीं में पास करवाना…

एक महीने में ही बैंक से पापा के हज़ार से अधिक रुपए निकल चुके थे। वह नहीं चाहती कि अब और निकलें। पूँजी के नाम पर उसके पास कुल पंद्रह हज़ार ही तो बचे थे, जिनके प्रति उनका मोह उम्र के साथ-ही-साथ बढ़ता जा रहा था। लगता था, जैसे यह रुपया ही उनका एकमात्र सहारा है। उसे वह कभी कुंती के ब्याह के लिए बताकर एक उत्तरदायी बाप होने का संतोष प्राप्त करते थे, तो कभी टुन्नी की पढ़ाई के लिए बताकर उसके उज्ज्वल भविष्य की कल्पना का सुख लेते थे। उसमें से भी खर्च होने लगा। कुंती भी क्या करती? यों तो पापा की पेंशन, अपनी तनख्वाह और गाँव के मकान के किराए से वह अच्छी तरह काम चलाती आ रही थी, पर बीमारी का यह अतिरिक्त खर्च… और बीमारी थी अनिश्चित अवधि तक की…

दूर कहीं मुर्गा बोला। यह क्या सवेरा होने को आया? तो वह आज बिल्कुल नहीं सो पाई? कल सवेरे से ही फिर जुट जाना है… बाजार, स्कूल, सावित्री, पापा की परिचर्या… उसका सिर भारी होने लगा।

अपनी क्लास लेकर कुंती स्टाफ-रूम में पहुँची और चुपचाप कुर्सी पर बैठकर बाहर देखने लगी। बहुत-सी कॉपियाँ देखने को जमा हो गई थीं; पर मन ही नहीं कर रहा था कुछ करने को। सिर बेहद भारी हो रहा था और नींद आँखों में घुल रही थी। तभी मिसेज़ नाथ अपने भारी-भरकम कंधों पर कॉपियों के दो गट्ठर लादे घुसी। उसने देखकर भी नहीं देखा। मिसेज़ नाथ भी कुछ नहीं बोलीं, चुपचाप कॉपियाँ देखने बैठ गईं। कुंती ने सोचा, क्या इन्हें मालूम नहीं हुआ है कि मैंने सावित्री के यहाँ ट्यूशन कर ली है? हो सकता है, आज न हुआ हो, पर कल तो होगा ही। तब…?

फड़फड़ाती हुई एक कॉपी फर्श पर गिरी तो कुंती ने चौंककर पीछे देखा। मिसेज़ नाथ ने गुस्से में आकर किसी लड़की की कॉपी ही उछाल दी थी, बड़बड़ा रही थीं : ‘दिमाग में गोबर भरा है और पढ़ने का शौक़ चर्राया है! अपने घर बैठो, खाओ-पियो और मौज करो। न जाने कहाँ-कहाँ से दिमाग चाटने आ जाती हैं! …’

कुंती फिर बाहर देखने लगी। यों, वह इस एक साल में इन सब बातों की काफी अभ्यस्त हो चुकी थी। फिर भी लड़कियों पर यों झुंझलाना, ऐसे अपशब्द कहना उसे कभी अच्छा नहीं लगता। फिर पढ़ी-लिखी, सभ्य-सुसंस्कृत महिलाओं के मुँह से निकले हुए ऐसे शब्द, जो इतनी छात्राओं की अध्यापिका हैं, उनकी आदर्श हैं।

उसे याद आया, जब पहली बार उसने इन्हीं मिसेज़ नाथ को डाँटते हुए सुना था, तो आश्चर्य और गुस्से के साथ उसे बेहद हँसी भी आई थी। वे गुस्से से काँपती हुई ज़ोर-ज़ोर से स्केल को मेज़ पर पटककर सामने खड़ी थर-थर काँपती किसी लड़की को कह रही थीं : ‘कल यदि पाठ याद करके नहीं आई तो चलते हुए इस पंखे में लटका दूँगी!’ और कुंती को पंखे से लटकी हुई लड़की की कल्पना ने बेहद हँसाया था।

एक वह थी, जो अपनी कमज़ोर छात्राओं को सवेरे जल्दी आकर पढ़ाया करती या देर तक ठहरकर पढ़ाती, स्नेह और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार से उनके खोये आत्मविश्वास को जगाती। पढ़ाई के अतिरिक्त विभिन्न रुचियों के विकास के लिए नई योजनाएँ बनाया करती। इन सबका परिणाम यह हुआ कि थोड़े ही दिनों में वह अपनी सहकर्मिणियों के बीच व्यंग्य और उपहास की पात्रा और छात्राओं की ‘परमप्रिय बहनजी’ बन गई थी। पर साल-भर बीतते-बीतते उसका भी उत्साह बहुत कम हो गया था। कॉपियाँ देखते समय उसने कई बार अपने परिश्रम की व्यर्थता महसूस की थी। फिर भी ऐसे अपशब्द… इस तरह झल्लाना…

‘सुना है, सावित्री की माँ ने उसे किसी दूसरे स्कूल में नवीं कक्षा में भरती करवा दिया है और शायद तुमने उसे घर पर पढ़ाना मंजूर कर लिया है?’

बात कुंती से ही कही गई थी, पर कुंती ने न मुड़कर उधर देखा, न जवाब ही दिया।

‘पैसे के ज़ोर से नवीं कक्षा क्या, मैट्रिक का सर्टिफिकेट भी मिल सकता है और भई, हमने तो पहले ही कहा था कि ऐसी अच्छी ट्यूशन भाग्य से ही मिलती है। जब सामनेवाला खुशामद कर रहा है तो हमें क्या, सीखे न सीखे, हमारी बला से। हम तो जितना समय तय हुआ है, पढ़ाकर आ जाते हैं। अच्छा कुंती, कितना लोगी।’

मिसेज़ नाथ के शब्द कुंती को बुरी तरह बेध रहे थे। बिना मुड़े ही उसने जवाब दिया : ‘मैंने लेन-देन की कोई बात नहीं की। एक महीने में यदि वह कुछ सीखेगी तो पढ़ाऊँगी, नहीं तो छोड़ दूँगी।’ और उसे लगा कि मिसेज़ नाथ के चेहरे पर फिर वही व्यंग्यात्मक मुस्कराहट फैल गई है, मानो कह रही हों-अभी नई-नई हो, इसलिए यह सब कह रही हो, धीरे-धीरे अपने-आप रास्ते पर आ जाओगी।

क्या सचमुच कुंती भी कभी एक दिन मिसेज़ नाथ जैसी हो जाएगी?… घर जाकर कुंती ने चाय पी और सावित्री के यहाँ चलने की तैयारी करने लगी। चाय वह हमेशा पापा के साथ बैठकर ही पीती थी और उनकी तबीयत का हाल भी जान लेती थी। यों नौकर अच्छा है, फिर भी उसने रमा बुआ को लिख दिया है कि वे गाँव से आ जाएँ। उसका तो बहुत-सा समय बाहर निकल जाता है। घर का कोई आदमी पापा के पास होना ही चाहिए। वह उठने लगी तो पापा ने कहाः ‘अभी तो स्कूल से आई है, थोड़ी देर तो आराम कर ले।’

वह बैठ गई। वह जानती है कि देर कर देने से ट्राम-बस में ऑफिस की भीड़ हो जाती है, घुसना असंभव हो जाता है, फिर भी पापा की बात टालना नहीं चाहती। उसके इस दोहरे परिश्रम से पापा यों ही काफी दु:खी हैं। इस सबके लिए वे अपने को ही दोषी समझते हैं। कुंती उनके दु:ख को किसी प्रकार भी नहीं बढ़ाना चाहती। इस बीमारी ने कितना विवश, कितना निरीह बना दिया है पापा को!

एक महीना पढ़ाकर कुंती को लगा कि सावित्री को वह अब न पढ़ा सकेगी। डेढ़ घंटा पढ़ाने के लिए पूरा डेढ़ घंटा और उसे बस में बिगाड़न पड़ता है। और इस प्रकार स्कूल के बाद पूरे तीन घंटे सावित्री के नाम अर्पण हो जाते हैं। उसके बाद वह इतनी थक जाती है कि किसी पत्रिका की दो पंक्तियाँ भी उससे नहीं पढ़ी जातीं। कल जब वह लेटी थी तो उसने देखा था कि वॉयलिन पर धूल की हलकी-सी परत जम गई है। उसका मन टीस उठा था। उसने धूल पोंछी, पर चाहकर भी बजाने के लिए वह ऊपर न जा सकी थी। बस, एकटक उसे देखती रह गई थी और उसे लग रहा था कि यदि जिंदगी का यही रवैया रहा तो वह शायद फिर कभी वॉयलिन न बजा सकेगी। इस कल्पना से उसकी आँखें छलछला आई थीं। नहीं-नहीं, जो भी होगा वह सहन कर लेगी, पर कल ही सावित्री की माँ से कह देगी कि वह अब पढ़ा न सकेगी। और सचमुच दूसरे दिन कुंती ने जाकर सावित्री की माँ से कहा: ‘देखिए, मैंने अपनी ओर से भरसक प्रयत्न किया, पर लगता है, सावित्री को पढ़ाना मेरे लिए संभव न होगा!’ सारे रास्ते वह संकल्प-विकल्प करती रही थी, एक महीने के मिले हुए दो सौ रुपयों से घर की आर्थिक स्थिति कितनी सँभल जाएगी, यह भी उसके सामने था, पर फिर भी उसने कह ही दिया।

‘यह क्या बहनजी? आपके भरोसे तो हमने नया स्कूल शुरू करवाया। आपके पास पढ़कर इसका मन कुछ-कुछ लगने लगा था… ऐसा तो मत करिए। एक बार बस किसी तरह दसवीं में पहुँचा दीजिए।’

‘मैं बेहद थक जाती हूँ। दूर भी तो बहुत जाना पड़ता है। फिर पापा बीमार हैं, उनकी देख-भाल, दवा-दारू करने के लिए भी तो मैं ही हूँ।’ पर कुंती को स्वयं लगा कि बात के अंत तक आते-आते उसके स्वर की दृढ़ता जाती रही है।

‘दूर तो है,’ कलाई में हीरे की चूड़ी नचाती हुई सावित्री की माँ बोली : ‘पर एक साल तो अब आप निभा ही दीजिए!’ फिर कुछ रुकते-रुकते बोली : ‘न हो, मैं गाड़ी का प्रबंध कर दूँगी; और क्या कर सकती हूँ?’

कुंती अवाक्-सी उनका चेहरा देख रही थी… दो सौ रुपए और गाड़ी!

‘बात यह है बहनजी कि सावित्री की बात एक बहुत बड़े घर में चल रही है। उन लोगों की एक ही ज़िद है कि लड़की दसवीं हो जाएगी तो शादी करेंगे। आप किसी-न-किसी तरह दसवीं में पहुँचवा दीजिए, फिर तो सँभाल लेंगे। अब आजकल के लड़कों को भी क्या कहें, यह सावित्री भी है कि आपके सिवाय किसी से पढ़ने को राजी नहीं होती। आप आइए? गाड़ी का प्रबंध मैं कर दूँगी।’

उस दिन कुंती गाड़ी में बैठकर घर लौटी। जैसे ही गाड़ी कोठी के फाटक में घुसी, उसने देखा, मकान मालिक के यहाँ वाले मास्टर साहब रिक्शे में सामान लदवाए चले आ रहे हैं। अपने को गाड़ी में पाकर उसका मन गर्व और आत्मसंतोष से भर गया। उसने ट्यूशन भी की तो आत्मसम्मान के साथ की। बड़ी कोठी को पार करके वह अपने घर के सामने उतरी। पापा ने सुना तो वे भी प्रसन्न हुए।

दूसरे दिन संध्या को जब वह गाड़ी में बैठकर सावित्री के यहाँ जा रही थी, तो उसने पहली बार देखा कि वह रास्ता कितना सुंदर है। ठसाठस भरी हुई बस में धक्के खाते समय शायद अपने को सँभालने की चिंता ही अधिक रहती थी और काम से लौटे हुए, सट-सटाकर खड़े प्राणियों के पसीने की दुर्गंध से सिर भन्नाता रहता था। उन सबको पार करके रास्ते का सौंदर्य देख पाना क्या कोई सरल काम था? थोड़े दिनों में तो उसे लगने लगा-काश, वह स्कूल भी गाड़ी में ही जा पाती!

टुन्नी का मन अब लग गया था। मामा ने खबर दी कि वह पढ़ाई में अच्छा चल रहा है। पापा की तबीयत कभी ठीक, कभी खराब, यों ही चलती। बोलना उन्होंने एक प्रकार से बंद ही कर दिया था। उनकी देखभाल के लिए रमा बुआ आ गईं थीं। कुंती के लिए वही स्कूल, घर, सावित्री… सारा घर जैसे एक ढर्रे पर चल रहा था। जब मन बहुत ऊबता तो रात में ऊपर जाकर घंटों वॉयलिन बजाती, यही तो उसके नीरस जीवन का एक आधार था।

उस दिन कुंती सावित्री को पढ़ाकर घर के लिए काम दे रही थी कि माँ ने एक बच्चे के साथ प्रवेश किया : ‘बहनजी, यह सावित्री का भानजा है। अब से मेरे पास ही रहेगा। इसे कल ही स्कूल में डाला है। सावित्री के बाद थोड़ी देर इसे भी देख लिया करिए।’ कुंती को बोलने का अवसर दिए बिना ही वह बोले चली जा रही थी : ‘बड़ा प्यारा बच्चा है, मीठी-मीठी बातें करके आपका मन मोह लेगा। नमस्ते करो, मुन्नू!’ और उस बच्चे ने अपने छोटे-छोटे हाथ जोड़ दिए।

कुंती न हाँ कह सकी, न ना। अब सावित्री के बाद आधे घंटे के करीब वह बच्चे को भी पढ़ाने लगी। संतोष और तसल्ली यही थी कि उसके बाद उसे गाड़ी घर तक छोड़ने आती थी। गाड़ी में बैठकर ठंडी हवा का झोंका उसके बदन को सहलाता और इस अतिरिक्त काम के बोझ को अपने साथ बहा ले जाता।

धीरे-धीरे यह सिलसिला बढ़ता गया। सावित्री के छोटे भाई-बहन में से कोई-न-कोई अब आता ही रहता। कभी किसी को घर का काम पूछना रहता था, तो किसी को टैस्ट की तैयारी करनी थी। माँ बस इसी बात का ध्यान रखती थी कि सावित्री जब तक पढ़े, कोई बच्चा कमरे में न जा पाए। कभी-कभी तो माँ स्वयं उसके पास आकर बैठती, सावित्री की पढ़ाई की बात पूछती, पापा की तबीयत के बारे में पूछती, घर की और बातें पूछती और फिर कुंती के धैर्य की, उसके साहस की तारीफ़ करती हुई चली जाती। शुरू-शुरू में कुंती को यह सब बहुत अटपटा लगता था, फिर धीरे-धीरे वह इन सबकी अभ्यस्त हो गई।

रात को जब वह लेटी तो उसे टुन्नी की बड़ी याद आ रही थी। आज स्टाफ-रूम में देखे हुए एक सिनेमा पर बड़ी बातें होती रही थीं। टुन्नी के जाने के बाद कितना नीरस हो गया है उसका जीवन! बिस्तर पर लेटे हुए पापा और काम में व्यस्त बुआजी। उसके बराबर की और लड़कियाँ कितनी मौज करती हैं! घूमना-फिरना, सैर-सपाटे, हँसी-मज़ाक… उसके जीवन में तो यह सब दूर-दूर तक भी नहीं है।…क्या कभी भी नहीं होगा? क्या उसका सारा जीवन यों ही निकल जाएगा? जितना रुपया वह कमाती है, उसमें कितने ठाठ से वह रह सकती है! पर वह तो जानती ही नहीं कि ठाठ क्या होता है, मौज क्या होती है। पापा क्या अब कभी अच्छे नहीं होंगे?… कितने दिन तक वे इस तरह पड़े रहेंगे?..टुन्नी होता तो वह कल ही उसके साथ सिनेमा जाती। कब टुन्नी बड़ा होगा और उसके कंधों का भार भी हलका करेगा? सच, अब तो वह ऊब गई है।

सामने वॉयलिन लटका हुआ था। अब वह बजा नहीं पाती, उसे देखती रहती है। उसे एकटक देखते रहना भी सांत्वना देता है। कितना कम हो गया है उसका वॉयलिन बजाना! जब-तब समय मिलता है तो उसकी धूल पोंछ देती है। कभी-कभी तो उसका मन करता है कि स्कूल, घर-सब छोड़कर, अपना वॉयलिन लेकर कहीं चली जाए और इतना बजाए, इतना बजाए कि उसका अस्तित्व ही मिट जाए। वह कुंती न रहे, बस संगीत की एक स्वर-लहरी बन जाए, उसी में मिल जाए!

दिसंबर की छुट्टियों में टुन्नी आया। उसके आने से ही जैसे घर चहक उठा। पापा प्रसन्न, कुंती प्रसन्न। घर की एकरसता टूट गई। आते ही उसने फरमाइश की कि क्रिकेट का टैस्ट मैच देखेंगे। अभी भी क्रिकेट के लिए उसका पागलपन जैसे-का-तैसा बना हुआ था। पिछले साल सारे दिन क्रिकेट खेल-खेलकर ही तो फेल हुआ था। पर इस बार कुंती ने टिकट का प्रबंध करने के लिए ज़मीन-आसमान एक कर डाला। उसकी बड़ी इच्छा थी कि जैसे भी हो, टुन्नी को वह मैच देखने के लिए भेज दे। इसी बहाने वह अपने परिचितों के घर भी हो आई, वरना आजकल तो मिलना-जुलना भी छूट गया था।

पर किसी तरह भी टिकट का प्रबंध नहीं हो सका। वह समझ नहीं पा रही थी कि लोगों पर ऐसा पागलपन कैसे सवार हो जाता है इस खेल को लेकर! किसी चीज़ का नशा भी होता है, यह सब वह जैसे धीरे-धीरे भूलती जा रही थी। उसने टुन्नी को समझा दिया कि कमेंट्री सुनकर ही संतोष कर लेना।

सावित्री के यहाँ पढ़ाने गई तो सावित्री ने डरते-डरते कहा : ‘बहनजी, कल मत आइए, हम मैच देखने जाएँगे।’

‘अच्छा, तुम लोगों को टिकट मिल गए? मेरा छोटा भाई भी आया हुआ है इलाहाबाद से, पागल हो रहा है, पर किसी तरह टिकट का इंतजाम नहीं हो सका।’

‘माँ से पूछूँ, शायद एकाध ज़्यादा हो।’ और सावित्री दौड़ गई।

कुंती सोच रही थी, उसे इन लोगों का ख्याल क्यों नहीं आया अभी तक?

माँ आईं, टेलीफोन किया और कहा : ‘आप उसे तैयार रखिए नौ बजे। बच्चे गाड़ी में उधर से ही उसे लेते जाएँगे।’

कुंती प्रसन्न हो गई। टुन्नी सुनेगा तो कितना प्रसन्न होगा! वह ज़बरदस्ती इन लोगों से खिंची-खिंची रहती है। कितना अपनापन रखती है बेचारी! पापा के बारे में भी हमेशा पूछती रहती हैं, कहती रहती हैं, किसी भी तरह की ज़रूरत हो कहिएगा। वह व्यवहार में क्यों ज़रूरत से ज़्यादा रूखी रहती है?

टुन्नी इलाहाबाद लौट गया। उसी सप्ताह दो बार पापा की तबीयत बहुत खराब हुई। कई दवाइयाँ बदलीं, विशेषज्ञ को भी बुलाना पड़ा और न चाहकर भी कुंती को फिर बैंक से पाँच सौ रुपए निकालने पड़े। आखिर वह क्या करे?….अब बचे ही कितने हैं, वे भी समाप्त हो जाएँगे, तब? कुंती को कुछ नहीं सूझता कि तब वह क्या करेगी!

सावित्री के छमाही इम्तिहान का रिजल्ट निकलनेवाला है। वह पहले से कुछ सुधरी है, पर नवीं में वह पास नहीं हो सकती, यह कुंती जानती है। उसने तो पहले भी कहा था, पर माँ को एक ही ज़िद है कि जैसे भी हो, उसे दसवीं में भेजना है। तो वह क्या करे? वह पूरा परिश्रम करती है, जी-जान लगाकर पढ़ाती है। परीक्षाफल अच्छा नहीं निकला तो माँ क्या कहेगी?

वह पहुँची तो पहले माँ से ही मुलाकात हुई : ‘लीजिए, आपकी ही बात कर रही थी। इस बार मेरा एक काम आपको करना होगा।’

कुंती की जिज्ञासु आँखें माँ के चेहरे पर टिक गईं। मेज़ की दराज में से एक थैला निकालकर वह बोली : ‘उस दिन आपका भाई जैसा स्वेटर पहने था, वैसा एक मेरे लिए भी बना दीजिए। मैं तो यह काम जानती नहीं। उसका स्वेटर मुझे बहुत ही पसंद आया।’ बाहर से किसी के बुलाने पर माँ थैला मेज़ पर छोड़कर चली गईं और फिर लौटकर आई ही नहीं।

कुंती लौटी तो उसके हाथ में ऊन का थैला था। घर आते ही बुआ ने बताया : ‘डॉक्टर साहब आए थे, एक नुस्खा दे गए हैं।’ उसने बिना देखे ही नुस्खा पर्स में पटक दिया। पापा के पास पहुँची तो वे आँखें बंद किए सो रहे थे। एक क्षण वह उनके मुरझाए ज़र्द चेहरे को देखती रही, फिर भारी मन से लौट आईं। उस रात उसने खाना भी नहीं खाया। चुपचाप पड़ी-पड़ी वॉयलिन को ही देखती रही। फिर आँखें मूँदी तो कोरों से आँसू ढुलक पड़े।

आख़िर जिस बात का डर था, वही हुआ। सावित्री छमाही इम्तिहान में फेल हो गई। कुंती पहुँची तो देखा, सावित्री रो रही थी और माँ का पारा चढ़ा हुआ था। कुंती को देखते ही बोली : ‘यह देखिए, यह निकला रिजल्ट! आप तो कहती थीं कि अब सुधर रही है, निकल जाएगी। सभी में तो फेल है! नहीं बहनजी, अब तो यह पढ़ाई छुड़ानी ही पड़ेगी… पढ़ना-लिखना इसके बस का नहीं! फिर वह सगाई की बात भी ख़तम हुई, अब कौन पानी की तरह रुपया बहाए!’

‘देखूँ’ कुंती ने रिपोर्ट हाथ में लेते हुए कहा : ‘पेपर्स इतने खराब तो नहीं किए थे कि सभी में फेल हो जाती।’ पर उसे रिपोर्ट में लाल धब्बों के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। सावित्री को रिपोर्ट के लाल धब्बे, पापा के कफ़ में खून के लाल धब्बे… सब जगह बस लाल…लाल…

‘मैं तो अभी भी कहती हूँ कि आप एक बार इसके स्कूल जाइए, इसकी टीचरों से मिलिए। स्कूल जाने से बात ही दूसरी हो जाती है। कुछ उम्मीद हो तो पढ़ाई जारी रखें, नहीं तो किस्सा ख़तम करें।’

और कुंती सोच रही थी, उसके घर आकर उसकी खुशामद करनेवाली माँ और यह माँ क्या एक ही हैं?

‘मैं स्कूल जाकर पता लगाऊँगी, बात करूँगी। वार्षिक परीक्षा में तो इसे पास करवाना ही है।’

‘अब आप जिम्मा लें, तभी पढ़ाऊँगी! जैसे भी हो, पास करवा दीजिए।’

कुंती जानती है कि ऐसा जिम्मा कोई नहीं ले सकता, और ले तो निभा नहीं सकता। फिर भी उसने कहा कि वह पूरी कोशिश करेगी।

और सचमुच कुंती सावित्री के स्कूल गई। सौभाग्य से वहाँ की अध्यापिकाओं में एक पुरानी परिचिता मिल गईं। पर वहाँ वह पूछताछ के अतिरिक्त कर ही क्या सकती थी?

गर्मियाँ आईं तो कुंती के नीरस, बोझिल, उदास दिन और भी लंबे हो गए। अब उसे न पापा की बीमारी की चिंता थी, न स्कूल के काम में कोई दिलचस्पी थी, और न ही सावित्री की माँ की कोई बात अब उसे बुरी लगती। लौटते समय कभी कोई बच्चा साथ हो जाता और माँ आजकल के ज़िद्दी बच्चों को कोसती हुई कह देती : ‘बहनजी, ज़रा दो मिनट को उतरकर इसे जूता दिलवा दीजिएगा। ये ड्राइवर लोग तो ठगा लाते हैं। …बच्चे भी क्या हैं, बात मुँह से पीछे निकलती है, चीज़ पहले चाहिए!’

कुंती दिलवा देती।

अब टुन्नी आ जाएगा। वह बेसब्री से टुन्नी की प्रतीक्षा कर रही थी। उसके आने से स्थिति में किसी तरह का भी अंतर पड़ने वाला नहीं था, फिर भी वह उसकी प्रतीक्षा कर रही थी। कितनी ही बार उसने पड़े-पड़े सोचा कि टुन्नी के आते ही वह कहेगी : ‘टुन्नी, ले, अब तू सँभाल। मैं नहीं जानती, तू छोटा है या बड़ा…जो तेरी समझ में आए, कर। मैं कहीं जाती हूँ। पापा का ठेका मैंने अकेले तो नहीं लिया। जब तक मुझमें दम रहा, मैंने सँभाला…अब एक दिन भी मुझसे नहीं सँभलता…’ और जब-जब उसने ऐसा सोचा, वह घंटों रोई। पापा से वह क्या ऊब गई थी?…क्यों जाने-अनजाने मनाने लगी थी कि या तो पापा अच्छे हो जाएँ या फिर…

सावित्री को पास कराने के लिए उसने रात में देर-देर तक जगकर प्रश्नों के उत्तर लिखे और उसे रटवाए। इम्तिहान के दिनों में वह सवेरे-शाम, दोनों समय पढ़ाने गई। इतना सब करने पर भी पता नहीं वह पास होगी या नहीं?

अचानक एक दिन पापा को जोर की कै हुई और सारा फर्श खून से भर गया। कुंती सकते में आ गई। बुआ जी ने रो-रोकर घर भर दिया। डॉक्टर, दवाई, इंजेक्शन, भाग-दौड़…पागलों की तरह कुंती ने ये सब किया। वह खुद नहीं जानती, उसमें इतनी शक्ति कहाँ से आ गई।

विशेषज्ञ के कहने पर पापा अस्पताल में भरती करवा दिए गए। कुंती अस्पताल से लौटी तो बुआ ने सारा घर धो रखा था। घर में पैर रखते ही उसे एक विचित्र-सी अनुभूति हुई। लगा, जैसे वह उन्हें कुछ दिनों के लिए अस्पताल में नहीं छोड़कर आई है, वरन् हमेशा-हमेशा के लिए कहीं छोड़कर आई है, जैसे वे अब कभी नहीं लौटेंगे…वह सिहर गई।

टुन्नी को तार देकर बुला ले? नहीं…दो दिन बाद उसकी परीक्षा समाप्त होगी, तभी बुलाएगी। कहीं बीच में ही आ गया तो यह साल फिर ख़राब हो जाएगा। एक साल तो पहले ही खराब हो चुका है।

उसके दो दिन बाद ही कुंती को सावित्री की माँ से जाकर पाँच सौ रुपए माँगने पड़े। माँ ने रुपए दिए। उसने जल्दी से उन्हें लौटाने का आश्वासन दिया। इम्तिहान हो चुके थे, सो पढ़ाने का काम इतना नहीं था, यों ही इधर-उधर का कुछ करवाकर कुंती लौटी, तो माँ ने कहा : ‘बहिन जी, अब तो सावित्री का रिजल्ट निकलनेवाला है। आप एक बार ज़रा स्कूल में देख आइए न! ऊँच-नीच हो तो अभी कुछ करवा डालिए, रिजल्ट निकलने के बाद बड़ी मुश्किल हो जाती है। अभी जाना चाहें तो गाड़ी नीचे खड़ी है।’

‘जी, इस समय तो अस्पताल जाना है। फिर मैं सोचती हूँ, इस बार वह वैसे ही पास हो जाएगी।

कोई भरोसा नहीं बहिनजी, कल आप स्कूल के समय आकर चली जाइए। यह सब करवाने का जिम्मा अब तो आपका ही है। कुछ देने-लेने की बात भी हो तो कोई चिंता नहीं। उस स्कूल में सब चलता है, बस, जरा बात करने का ढंग चाहिए।’

‘जी, कल जाकर देखूँगी। मैं तो सोचती हूँ कि वह यों ही पास हो जाएगी।’

‘सोचिए-वोचिए मत, आप चली ही जाइए!’ उतरते-उतरते कुंती ने सुना।

रात में सोई तो सोच रही थी कि ये पाँच सौ रुपए कैसे चुकाएगी? मामा को लिख दे कि गाँव का मकान बेच दें?…मामा को एक बार कम-से-कम आकर देखना तो चाहिए था।…आज कितना असहाय वह अपने को महसूस कर रही थी! इतनी बड़ी दुनिया में क्या कोई भी ऐसा नहीं है, जो उसकी पीठ पर आश्वासन-भरा हाथ रखकर दो शब्द सांत्वना के ही कह दे? रोते-रोते उसकी हिचकियां बँध गईं। अचानक उसके मुंह से निकला : ‘हे भगवान्! अब तो तू पापा को उठा ले! मुझसे बर्दाश्त नहीं होता! मैं टूट चुकी हूँ।…’ और फिर उसने दोनों हाथ कसकर मुँह पर रख लिए, मानो मुँह से निकली हुई इस बात को वापस धकेल देना चाहती हो।

सामने वॉयलिन लटका था, उस पर धूल की मोटी-सी परत जम गई थी। वॉयलिन बजाना तो उसका कभी का छूट गया। कितने दिनों से उसने धूल नहीं पोंछी। आज भी उससे नहीं उठा जा रहा है। क्या होगा केवल धूल पोंछकर? अब क्या वह कभी वॉयलिन बजा पाएगी?

टेलीफोन करके, इधर-उधर से कोशिश करके सावित्री की माँ ने पता लगा लिया कि सावित्री दो विषयों में फेल है। एक विषय में फेल होती तो उसे चढ़ा दिया जाता, पर अब उसे नहीं चढ़ाया जाएगा। एक विषय में जैसे भी हो उसे पास करवाना ही है। कुंती जब पहुँची तो माँ ने उसे बैठने भी नहीं दिया : ‘बहिनजी, यह मैंने पता लगा लिया, वरना सावित्री तो फेल हो ही जाती। आपने तो कह दिया, पास हो जाएगी। अब आप तुरंत ही गाड़ी लेकर जाइए, अपनी पहचानवाली बहिनजी से, बड़ी बहिनजी से बात करिए, इधर-उधर कोशिश करके पास करवाकर आइए: नहीं तो हमारे इतने रुपयों पर पानी फिर जाएगा, साल खराब हुआ सो अलग।’

‘किन दो विषयों में फेल हो गई?’

‘वहाँ जाकर पता लगाइए। फेल हुई है, यह तय बात है। आपने जिम्मा लिया था, अब तो पूरा करना ही पड़ेगा। आखिर…’

कुंती से कोशिश करके भी कुछ नहीं बोला गया।

‘गाड़ी नीचे ही खड़ी है। देर करने से अब काम नहीं चलेगा। दो दिन बाद तो रिजल्ट ही निकल जाएगा। फिर कितनी मुश्किल होगी कुछ करवाने में! और हाँ, न हो तो कुछ रुपए ले जाइए, ढंग से बात करने से सब-कुछ हो जाता है इस स्कूल में…हमने नवीं में भरती करवा ही दिया था, आप अब चढ़वा दीजिए।’

कुंती बिना बोले चुपचाप नीचे उतर गई। सबसे पहले वह अपनी परिचित के पास गई। पर वह समझ नहीं पा रही थी, वह क्या कहे, कैसे कहे? उसकी मित्र काम करते हुए भी इधर-उधर की बातें कर रही थी : ‘तुम बहुत दुबली दिखाई दे रही हो…पापा कैसे हैं…’ आदि-आदि।

कुंती स्वयं नहीं जानती, उसने क्या कहा, कैसे कहाँ बस, इतना ही उसे याद है कि वह एक अध्यापिका से और मिली थी, प्रधानाध्यापिका से भी मिली थी। उनसे मिलने के लिए काफी देर तक उसे बाहर प्रतीक्षा करनी पड़ी थी। वह बैठी भी रही थी। उसे याद नहीं कि उसे उनसे कुछ आश्वासन भी मिला या नहीं। उसे यह भी पता नहीं था कि लौटकर माँ से वह क्या कहेगी।

नीचे उतरी तो प्यास से उसका गला बुरी तरह सूख रहा था। मई की गर्मी भी कितनी भंयकर होती है! उसने चपरासी से पानी माँगा। उधर से एक भारी-भरकम महिला हँसती हुई पेपर्स का बंडल लिए गुजरी। कुंती को लगा, यह महिला मिसेज़ नाथ से कितनी मिलती-जुलती है!

चपरासी ने पानी लाकर दिया तो एक साँस में ही वह सारा गिलास खाली कर गई। पता नहीं, जल्दी पीने के कारण या क्यों उसे बड़े जोर की खाँसी आई। वह खाँसती ही चली गई-खों-खों-खों…यहाँ तक कि उसका मुँह लाल हो गया और आँखों से पानी निकलने लगा। एक हाथ से छाती दबाए और दूसरे से रूमाल मुँह पर रखे वह गाड़ी की ओर बढ़ी। खाँसी बंद हुई, फिर भी उसके कानों में जैसे वही आवाज़ गूंजती रही खों-खों-खों…

एकाएक कुंती को लगा कि उसकी यह खाँसी, यह खोखली-खोखली आवाज़ पापा की खाँसी से कितनी मिलती-जुलती है…हूबहू वैसी ही तो है। सहमकर उसने गाड़ी के शीशे में देखा, कहीं उसके चेहरे पर भी वैसे ही मुर्दनी तो नहीं, जो उसके पापा के चेहरे पर है?

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