दूसरे दिन नौ बजते-बजते खाने का काम समाप्त कर डाला। अपनी रँगी हुई साड़ी देखी तो कुछ जँची नहीं। फिर ऊपर राधा के पास पहुँची–‘क्यों राधा, तू तो रँगी साड़ी पहिनती है तो बड़ी आब रहती है, चमक रहती है, इसमें तो चमक आई नहीं?’
‘तुमने कलफ जो नहीं लगाया अम्मा, थोड़ा-सा मांड दे देतीं तो अच्छा रहता। अभी दे लो, ठीक हो जाएगी। बुलावा कबका है?’
‘अरे नए फैशलवालों की मत पूछो, ऐन मौकों पर बुलावा आता है। पाँच बजे का मुहरत है, दिन में कभी भी आ जावेगा।’
राधा भाभी मन-ही-मन मुस्करा उठी।
बुआ ने साड़ी में माँड़ लगाकर सुखा दिया। फिर एक नई थाली निकाली, अपनी जवानी के दिनों में बीना हुआ क्रोशिए का एक छोटा-सा मेज़पोश निकाला। थाली में साड़ी, सिंदूरदानी, एक नारियल और थोड़े-से बताशे सजाए, फिर जाकर राधा को दिखाया। संन्यासी महाराज सवेरे से इस आयोजन को देख रहे थे। उन्होंने कल से लेकर आज तक कोई पच्चीस बार चेतावनी दे दी थी कि यदि कोई बुलाने न आए तो चली मत जाना, नहीं तो ठीक नहीं होगा। हर बार बुआ ने बड़े ही विश्वास के साथ कहा-‘मुझे क्या बावली ही समझ रखा है जो बिना बुलाए चली जाऊँगी? अरे वह पड़ोसवालों की नंदा अपनी आँखों से बुलावे की लिस्ट में नाम देखकर आई है, और बुलावेंगे क्यों नहीं? शहरवालों को बुलावेंगे और समधियों को नहीं बुलावेंगे क्या?’
तीन बजे के करीब बुआ को अनमने भाव से छत पर इधर-उधर घूमते देख राधा भाभी ने आवाज़ लगाई–‘गईं नहीं बुआ?’
एकाएक चौंकते हुए बुआ ने पूछा-‘कितने बज गए राधा?-क्या कहा, तीन? सरदी में तो दिन का पता ही नहीं लगता है। बजे तीन ही हैं और धूप सारी छत पर से ऐसे सिमट गई मानो शाम हो गई हो।’ फिर एकाएक जैसे ख़याल आया कि यह तो भाभी के प्रश्न का उत्तर नहीं हुआ तो ज़रा ठंडे स्वर में बोली-‘मुहरत तो पाँच बजे का है, जाऊँगी तो चार तक जाऊँगी, अभी तो तीन ही बजे हैं।’ बड़ी सावधानी से उन्होंने स्वर में लापरवाही का पुट दिया। बुआ छत पर से गली में नज़र फैलाए खड़ी थीं, उसके पीछे ही रस्सी पर धोती फैली हुई थी, जिसमें कलफ लगा था और अबरक छिड़का हुआ था। अबरक के बिखरे हुए कण रह-रहकर धूप में चमक जाते थे, ठीक वैसे ही जैसे किसी को भी गली में घुसता देख बुआ का चेहरा चमक उठता था?
सात बजे के धुँधलके में राधा ने ऊपर से देखा तो छत की दीवार से सटी, गली की ओर मुँह किए एक छाया मूर्ति दिखाई दी। उसका मन भर आया। बिना कुछ पूछे इतना ही कहा, ‘बुआ! सर्दी में खड़ी-खड़ी यहाँ क्या कर रही हो? आज खाना नहीं बनेगा क्या, सात तो बज गए?’
जैसे एकाएक नींद में से जागते हुए बुआ ने पूछा-‘क्या कहा, सात बज गए?’ फिर जैसे अपने से ही बोलते हुए पूछा, ‘पर सात कैसे बज सकते हैं, मुहरत तो पाँच बजे का था।’ और फिर एकाएक सारी स्थिति को समझते हुए, स्वर को भरसक संयत बनाकर बोलीं-‘अरे खाने का क्या है अभी बना लूँगी। दो जनों का तो खाना है, क्या खाना है और क्या पकाना।’
फिर उन्होंने सूखी साड़ी को उतारा। नीचे जाकर अच्छी तरह उसकी तह की, धीरे-धीरे हाथों से चूड़ियाँ खोली, थाली में सजाया हुआ सारा सामान उठाया और सारी चीजें बड़े जतन से अपने एकमात्र संदूक में रख दीं।
और फिर बड़े ही बुझे हुए दिल से अँगीठी जलाने बैठीं।
Pages: 1 2
