Hindi Kahani: दूर के ढोल कितने सुहावने भी हो सकते हैं और कानफोड़ू भी, यह निर्भर करता है उनकी दूरियों से जुड़ी सच्चाइयों पर। एक झूठ के ज़रिये सच से पर्दा उठाती है यह कहानी-
नवभारत टाइम्स से मुख्य उप संपादक के रूप में सेवामुक्त, दर्जन-भर उपन्यास, कुछ कहानियां, व्यंग्य, बाल कथाओं सहित लंबे समय तक पत्रकारीय लेखन। संप्रति- फ्रीलांस लेखन और देश-विदेश में भ्रमण। सुचिता और सुप्रिय पिछले चार साल से एक अरब देश में हैं। उनका एक बेटा है संभव। संभव का जन्म होते ही सुचिता ने नौकरी से त्यागपत्र दे दिया था। जब संभव स्कूल जाने लगा, तब सुचिता ने फिर से नौकरी पर जाने का मन बनाया। अब उन्हें ज़रूरत पेश आई एक मेड की, जो दस बजे से पांच बजे तक उनके घर में रह सके। स्कूल से लौटने पर संभव की देख-रेख कर सके और दोपहर का भोजन भी बना सके। इसके लिए शुरू हुआ हिंदुस्तानी मेड खोजो अभियान।
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अरब देशों में अधिकांश कामकाजी महिलाएं, दक्षिण भारतीय हैं, जिनके साथ भाषा और खान-पान की उलझनें पेश आती हैं। विशेषकर उत्तर भारतीयों को। वे उन्हीं को प्राथमिकता देते हैं, जो हिंदी या अंग्रेज़ी बोल और समझ लेती हों। उन्हें भी काम पर रखने से पहले यह पड़ताल की जाती है कि उनके पास टूरिस्ट वीजा, डिपेंडेंट वीजा या वर्क वीजा में से कौन-सा वीजा है। वीजा की मियाद क्या है।मरियम इसी सिलसिले में सुचिता से मिलने आई थी। सांवली-सलोनी मरियम ने आते ही अपने वाक्चातुर्य से सबका मन मोह लिया। उसकी उम्रचोर स्फूर्ति और चपलता मेड खोज अभियान को विराम देने का संकेत देने लगी। सुचिता और सुप्रिय ही नहीं, संभव ने भी घोषणा कर दी कि मरियम ही इस घर की पहली मेड होने जा रही है। सुचिता के चाहने पर मरियम ने अपना परिचय पत्र दिखाया। पासपोर्ट और वीजा के बारे में उसने बताया कि वह किसी के पास गिरवी रखा है। यह सुनते ही सुप्रिय ने पूछा, ‘तो क्या तुम किसी स्पॉन्सर के ज़रिये यहां आई हो? उसकी नौकरानी हो? फिर हम तुम्हें काम पर कैसे रख सकते हैं? मरियम बोली, ‘आप तो जानते ही हैं, हम जैसे लोगों को यहां आने का अवसर देेनेवालों को स्पॉन्सर कहा जाता है। यहां कोई भी विदेशी अपनी मर्जी से काम करने नहीं आ सकता। पहले से पक्के तौर पर काम कर रहे लोग अपने निजी कामों के लिए किसी एक व्यक्ति को स्पॉन्सर कर सकते हैं और स्थानीय लोग एक से अधिक लोगों को। कई स्पॉन्सर काम के नाम पर लोगों को बुलवा तो लेते हैं, पर उनसे कोई काम नहीं लेते। वे वर्क वीजा लगवाने की एवज में मोटी रकम मांगते हैं। वह रकम जाहिर है, कोई भी कामकाजी पुरुष या महिला, काम करने के बाद कमाकर ही लौटा सकती है। इस सूरत में वे हमारा पासपोर्ट और वीजा अपने पास धरोहर के रूप में रख लेते हैं। बिना पासपोर्ट और वीजा के यहां से लौटा नहीं जा सकता, इसलिए हमें उनकी मुंहमांगी रकम चुकाकर अपना पासपोर्ट और वीजा छुड़ाना होता है। यहां वर्क वीजा या डिपेंडेंट वीजा पर आए हुए लोगों का एक आईडी कार्ड और बीमा कार्ड भी बनता है। वही हमारी पहचान का आधार और प्रामाणिक दस्तावेज होता है।
कभी भी, कहीं भी अपनी पहचान बताने के लिए वही दिखाना होता है, इसलिए यहां रहने के दौरान पासपोर्ट और वीजा की ज़रूरत पेश ही नहीं आती। वे हमारे पास रहें या किसी और के पास, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता।सुचिता और सुप्रिय के लिए ये सूचनाएं नई नहीं थीं। इस तरह की बातें और ऐसे लोगों की मजबूरियों के कई किस्से इस देश में रहते हुए वे कई बार सुन चुके थे। अलबत्ता किसी भुक्तभोगी के मुख से अवश्य पहली बार सुन रहे थे।यकायक सुचिता को कुछ खयाल आया। उसने मरियम से अपना परिचय पत्र फिर से दिखाने को कहा। मरियम ने एक बार फिर अपना परिचय पत्र सुचिता के सामने रख दिया। सुचिता ने उसे ध्यान से देखा। जब यह सुनिश्चित हो गया कि मन में उठा संदेह सही है, तब उसने उजागर रूप में मरियम से कहा, ‘यह तो किसी आईडी कार्ड की फोटोकॉपी लगती है! क्या ऐसा ही है! या यह ऑरिजनल ही है!मरियम के चेहरे पर एक क्षण को हवाइयां-सी उड़ीं। अगले ही पल वह सुचिता के कदमों से आ लिपटी। फिर रोते हुए बताने लगी, ‘हां मैडम, यह ऑरिजनल नहीं है, फोटोकॉपी है। दरअसल, एक बार जब मैं अपने स्पॉन्सर को लगातार तीन महीने तक किश्त नहीं दे पाई, तब उसने धमकी दी कि वह पुलिस को यह सूचना देने जा रहा है कि वह मेरी स्पॉन्सरशिप से हाथ खींच रहा है। अब मैं उसकी जिम्मेदारी नहीं रही। यदि वह ऐसा करता तो मुझे तुरंत यह देश छोड़कर जाना पड़ता। अव्वल तो मैं जाना नहीं चाहती थी। यदि मजबूरी में जाना भी चाहती तो जा नहीं सकती थी, क्योंकि मेरे पास न तो अपना पासपोर्ट था और न वीजा। वह तो यह बात कुबूल करता नहीं कि वे दोनों उसके पास हैं। उस सूरत में मुझे जेल की हवा खानी पड़ती।मैं उसके सामने बहुत रोई-गिड़गिड़ाई। उसे अपनी मजबूरी बताई कि मेरे पास एक भी रुपया नहीं है।
मैं जिसके घर काम करती हूं, वह मुझसे काम तो जमकर लेते हैं, पर खाने को खाना तो दूर की बात, नाश्ता भी ढंग से नहीं देते। मजबूरी में मुझे बाज़ार से खाना खरीदकर पेट भरना पड़ता है। सो सारी कमाई उसी में स्वाहा हो जाती है। तब उसने मुझ पर दया करते हुए मुझे सलाह दी कि अपना ऑरिजनल आईडी भी मेरे पास गिरवी रखो। मरता क्या न करता, मैंने वही किया। सो तब से मेरा ऑरिजनल आईडी भी उसी के पास है। उसी ने मुझे यह फोटोकॉपी तैयार करके दी है। अव्वल तो घरेलू नौकरानी से कोई पूछता नहीं, फिर मैं तो दिन-दिन भर किसी एक घर में बंद रहती हूं, इसलिए मुझे यह कहीं दिखाना नहीं पड़ता। कहीं भी आने-जाने के लिए बस का पास है। सो एक तरह से वही आईडी का काम कर रहा है।मरियम की आपबीती ने दोनों को द्रवित कर दिया। हमवतनों की दुर्दशा पर दोनों को रोना आ गया। दोनों मन ही मन खूब रोए भी, मरियम के बहाने ऐसे लोगों की हरसंभव मदद करने का इरादा भी बनाया, पर चाहकर भी इस नतीजे पर नहीं पहुंच सके कि मरियम को मेड के रूप में काम पर रखा जाए।सुप्रिय ने मरियम को समझाया, ‘हमें तुम्हारे साथ पूरी सहानुभूति है। तुम हमारे बच्चे के लिए एक अच्छी मेड हो सकती हो, यह हम इस पहली मुलाकात में ही जान चुके हैं। फिर भी हम तुम्हें काम पर रखने का जोखिम नहीं ले सकते।
उसके कई कारण हैं। एक तो यह कि तुम्हारे पास एक भी ऑरिजनल डॉक्यूमेंट नहीं है। जैसे ही हम स्थानीय पुलिस को तुम्हें काम पर रखने की सूचना देंगे, वह तुम्हें नकली कागजात पेश करने के अपराध में गिरफ्तार कर लेगी। हम तुम्हें गुपचुप रूप से रख भी लें तो तुम्हारा अपने स्पॉन्सर से मिलना-जुलना बंद हो जाएगा। जब तुम उससेे नहीं मिलोगी, तब वह तुम्हारे खिलाफ शिकायत दर्ज करवाएगा। हमारे पास इतनी रकम तो है नहीं कि हम एकमुश्त उतनी रकम देकर उससे तुम्हें मुक्त करवा सकें। उस सूरत में तुम उसी दिन यहां से चलती बनोगी, तब हमारे बच्चे का क्या होगा? हम दोनों में से किसी एक को नौकरी से छुट्टी लेनी पड़ेगी और पुलिस के झंझट में पड़ना पड़ेगा सो अलग। वैसे हम तुम्हारा कहा हुआ सब कुछ सच क्यों मान लें? तुमने आते ही हमें अपनी सच्चाई तो बताई नहीं थी।
तुम तो हमें अंधेरे में रखने का इरादा रखती थीं।मरियम ने अब सुचिता की ओर आस भरी निगाह से निहारा। अपने शरीर पर क्रॉस का निशान बनाते हुए बोली, ‘मैडम, गॉड प्रॉमिस, मैं झूठ नहीं बोलती। मैं ऐसी-वैसी औरत नहीं हूं। हार्डवर्कर हूं। ऑनेस्ट हूं। नीडी हूं।सुचिता ने उसकी भावनाओं को समझते हुए पीठ थपथपाकर उसे हिम्मत बंधाई, ‘देखो मरियम, हमें तुम्हारे साथ पूरी-पूरी सहानुभूति है। हम यह नहीं कह रहे कि तुमने जो कुछ हमें बताया वह झूठ ही है, पर हम अपनी सहुलियत के लिए मेड खोज रहे हैं, एक और उलझन खड़ी करने के लिए नहीं। हम भी इस देश के कायदे-कानून से बंधे हैं। मेरी सलाह है कि तुम कोई काम खोजने की जगह किसी तरह स्वदेश लौटो। हां, मैं एक गारंटी दे सकती हूं। यदि तुम हिंदुस्तान लौटने के बाद भी यहीं आना चाहोगी तो हम तुम्हें अपनी स्पॉन्सरशिप पर बुलाने को तैयार हैं। हमें एक व्यक्ति को स्पॉन्सर करने का हक है ही। तुम्हारे वीजा की फीस का और आने का खर्च हम उठाएंगे। अपने घर में रखेंगे। सरकारी दर पर वेतन और सुविधाएं देंगे। चूंकि हम जानते हैं कि तुम हमारे बच्चे के लिए अच्छी मेड साबित होओगी और हमें छोड़कर कहीं और जाना पसंद नहीं करोगी।
मरियम विदा लेने को उठी। फिर जाते-जाते रुककर बोली, ‘मैडम, आप जो कह रही हैं, वह सही है, पर वैसा हो नहीं सकता। हमारे घरवालों के पास इतनी रकम हुई होती तो हम यहां आते ही नहीं। घर के लोग हमसे सहायता तो पाना चाहते हैं, पर जरूरत पड़ने पर हमारी सहायता नहीं करना चाहते। वे तो यह मानकर चलते हैं कि यहां हमारे ठाठ ही ठाठ हैं। वे सपने में भी यह नहीं मानना चाहते कि हम अपना पेट काटकर उन्हें रकम भेजते हैं। हमारे जाननेवाले हमारे साथ सहानुभूति तो नहीं रखते, ईर्ष्या भले ही रखते हों। इसके लिए भी दोषी हम ही हैं। हम वहां पहुंचकर उनके सामने जानबूझकर रइसों जैसा व्यवहार जो करके दिखाते हैं। आप दोनों ने मेरी बात सुनी और बिना लागलपेट के अपने मन की बात कही, उसके लिए आपका शुक्रिया। आप मुझे बैरंग लौटा रहे हैं, फिर भी यदि ऐसे हालात बने कि मैं सही सलामत हिंदुस्तान लौट सकी तो मैं यकीनन अगली बार आपके पास ही लौटना चाहूंगी। मेरा पासपोर्ट और वीजा भी ऐसे ही एक व्यक्ति के पास गिरवी रखा है, जिसने मुझे स्पॉन्सर किया था। मुझे अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उसे देना होता है, ताकि मैं अगले दो साल में उतनी रकम चुका सकूं और अपना पासपोर्ट और वीजा वापस लेकर हिंदुस्तान लौट सकूं।
