Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “हमारा रिलेशन आख़िर है क्या?” “तुम्हें नामों से वास्ता है?”

“हाँ है। ना कुछ आस रखने देते हो, ना कोई हक़ देते हो। मुझे ‘फ्रेण्ड विथ बेनिफिट’ ही समझते हो ना तुम?”

“ये क्या बकवास है? फ्रेण्ड तो सभी बेनिफिट देते ही हैं।”

“प्लीज़, अब ये मत ही बोलना कि, तुम्हें ‘फ्रेण्ड विथ बेनिफिट’ का मतलब ही नहीं पता। मुझे जानना है, आख़िर मैं हूँ कौन?”

“देखो, अब तुम उन बातों के लिए मुझे इल्ज़ाम नहीं दे सकती, जिनका मैंने कभी इक़रार किया ही नहीं। यह तय है कि,मैं किसी नफ़े की इच्छा से तो नहीं ही हूँ तुम्हारे साथ और नाम दे देने से क्या ‘बेनिफिट’ शब्द के लोड से बच जाओगी? मियाँ-बीबी का रिश्ता क्या बेनेफिट फॉर इच अदर की परिभाषाओं से बाहर है? हमारा रिश्ता ही ऐसा है, जहाँ कोई क़रार नहीं। काहे को रिश्ते-विश्ते के जंजालों में अपने दिमाग को उलझाना। हम जब साथ होते हैं, बहुत अच्छा वक़्त जीते हैं। दुविधाएँ जो हैं ना, कि किसे क्या कहें; यह सब बस हमारे मन के झूठे संतोष के लिए है। क्या फ़र्क पड़ता है अगर हम गर्ल फ्रेण्ड-बॉय फ्रेण्ड कहलाते हैं या जस्ट फ्रेण्ड? या फिर ‘फ्रेण्ड विथ बेनिफिट?’ क्या तुम इसलिए ऐसा चाहती हो कि, उन रिश्तों के नाम के हिसाब से हमारी ज़िम्मेदारीयाँ तय हों सकें?”

“तुमसे मैंने फिलॉसफ़ी का कोई लेसन माँगा क्या? सीधा-सीधा जवाब क्यों नहीं देते?”

“ओके। सीधा जवाब तुमने सुन तो लिया। अब समझना वही चाहो, जो समझना चाहती हो; तो इसमें मेरा कोई क़सूर नहीं। तुम मेरे लिए बहुत इम्पोर्टेन्स रखती हो, तुम्हारे साथ गुज़ारा वक़्त मेरे लिए ख़ज़ाने की तरह है। लेकिन हाँ, मैं यह झूठ नहीं बोल सकता कि, मैं तुम्हारे बिना मर जाऊँगा।”

“कौन मरता है यार, किसी के ज़िंदगी से चले जाने से? लेकिन इंसान अच्छी बातें बोल तो सकता है ना? या उसमें भी तुम्हें बैलेंस शीट देखनी होगी, बनिया इंसान?” आख़िरी बात कहते-कहते उसकी बात लुत्फ़ की ओर बहने लगी।

“अरे वाह! क्या बात कह दी। एक शेर याद आ गया। तुम्हारे लिए ही है और तुम्हारी सब बकवास का जवाब भी। ग़ौर फ़रमाईये मोहतरमा- ‘ये ठीक है नहीं मरता कोई जुदाई में; ख़ुदा किसी को किसी से, मगर जुदा न करे।”

उसकी चुप्पी पर मैंने फिर कहा- “वाह…वाह…मोहतरमा, शेर पसंद आने पर शरीफ़ इंसानों के दरम्यान दाद दिए जाने का चलन है।” मैंने इसी में भलाई समझी कि, बात मसख़री की ही होती रहे।

“देती हूँ दाद! या दाग़ ही दे देती हूँ आज तो…लो…” उसने अपने नाख़ून मेरी गरदन में चुभा दिए।

मुझे लगा प्यार करने लायक़ तमीज़दार इंसान वह मुझे समझे ना समझे, प्यार करने लायक़ गुण्डा तो समझ ही सकती है।