Margashirsha Purnima 2024 muhurat
Margashirsha Purnima 2024 muhurat

Hindi kahani:लक्ष्मी की उत्पत्ति और उसके आवास के स्थलों तथा वास के योग्य स्थानों का निरूपण करते हुए सूत जी ने बताया कि प्रभु नारायण अनादि, श्रीमान तथा सबके धाता हैं। उन्होंने ही मोहन के लिए इस जगत् को दो रूप दिए। ब्राह्मण वेद और सनातन वेद के हाथों का तथा श्रेष्ठ पद्मा श्री का एक भाग किया और ज्येष्ठ अशुका अलक्ष्मी तथा वेद बाह्य अधम नर और अधर्म का एक अलग भाग कल्पित किया।

पहले उन्होंने अलक्ष्मी का ही सृजन किया फिर पद्मा का सृजन किया। ज्येष्ठा अमृत की उत्पत्ति के समय में विष के उल्वण से वह अशुभा उत्पन्न हुई। इसके बाद पद्मा श्री का जन्म हुआ।बहुत पूर्व समय में विप्रषि मुनि थे। उन्होंने ज्येष्ठा को मन से अधिष्ठित देखकर उसके साथ विवाह किया और लोक में विचरण करने लगे। वह ज्येष्ठा यज्ञ से विमुख थी, हरि नाम से भागती थी। उसमें विमोहित ऋषि बन में विचरण करने लगे, किन्तु उनकी भार्या उनकी प्रवृत्ति के बिल्कुल प्रतिकूल थीं। एक बार इसी प्रकार भ्रमण करते हुए उन विप्रषि मुनि को मार्कण्डेयजी के दर्शन हुए। उन्होंने मुनि के सामने अपनी समस्या रखी तो मार्कण्डेयजी ने उनसे कहा हे मुनि-प्रवर! आप सदैव ही विष्णुमय, रुद्रमय, अग्निहोत्र यज्ञ यागादिमय पुण्य-स्थलों का त्याग करते हुए ऐसे स्थानों पर रहें जहां पति-पली में राग-द्वेष हो, रुद्र तथा हरि विष्णु की निन्दा हो, जप-होम आदि की जहां विमुखता हो, जहां दुष्टात्माओं की संगति रहती हो, हे विप्रवर! आप अपनी भार्या के अथ इन्हीं स्थानों पर वास करें। जहां मानव पाप में आरूढ़, क्रूर, स्वभाव वाले अतिथि का निरादर करने वाले परिवार में तुम प्रवेश कर सकते हो। ऐसा कहकर मुनि अन्तर्धान हो गए। दुःसह ने ऐसा ही किया और अपनी पत्नी को पीपल के वृक्ष के किनारे छोड्कर रसातल में जाने लगे।

मुनि ने अलक्ष्मी को आश्वस्त किया कि वहां दोनों के लिए उपयुक्त स्थान देखकर लौट आएंगे। इस पर भार्या ने चिंता प्रकट की कि मैं यहां क्या भोजन करूंगी तो मुनि ने कहा जो स्त्रियां तुम्हारा यजन करेंगी वे सभी धूप और बलि आदि प्रदान करेंगी। तुम उनके घरों में प्रवेश मत करना और मुनि चले गए। आज तक वह मुनि उसी जलसंस्तर में विनिर्मग्न हैं और वह अलक्ष्मी असभा ग्राम पर्वत आदि बाह्य भागों में स्थित रहती हैं।
एक बार बहुत समय पश्चात् भगवान् जनार्दन के उस अलक्ष्मी ने उन्हें देखा तो कहा, हे प्रभु! मेरा स्वामी मुझे छोड्कर इस बिल में प्रवेश कर गया है। हे नाथ!मैं बिल्कुल अनाथ हूं कृपा करके मुझे वृत्ति प्रदान करें । इस पर भगवान् ने पूर्ण पुरुष अनद्य, रुद्र, शर्व, शंकर, हेमवती, जगत् जननी जगदम्बा के भक्तों का सारा धन तेरा हो जावे, जो महादेव की निन्दा और मेरा यजन करते हैं, उनका सब धन तेरा हो जावे। ऐसा कहकर उस अलक्ष्मी का त्याग कर भगवान् जनार्दन ने लक्ष्मी के साथ जाप किया था। भगवान् ने उस अलक्ष्मी के क्षय के लिए रुद्र का जाप किया। इसलिए है मुनीश्वरो! उस अलक्ष्मी के लिए नित्यप्रति ही बलि देनी चाहिए। विष्णु के भक्तों को सब प्रकार से प्रसन्न होकर उसे बलि अवश्य ही देनी चाहिए। सूतजी ने बताया कि हे द्विजगणो! अंगनाओं को उसका सदा ही विविध भांति की बलि के द्वारा पूजन करना चाहिए। जो कोई भी इस वृत को पड़ता या सुनता है या श्रेष्ठ जनों को श्रवण कराता है वह निष्पाप होकर लक्ष्मी वाला हो जाता है तथा शुभगति को पाता है।

जिस मन्त्र के द्वारा जप करने से जन्तु समस्त लोक में भय आदि से मुक्त हो जाता है और पापों से मुका होकर परम गति को प्राप्त किया करता है। उसका विस्तार से उल्लेख करते हुए सूत जी ने बताया कि इस मन्त्र के जाप से मनुष्य अलक्ष्मी का त्याग करके लक्ष्मी के निवास वाला बन जाता है। एक बार ब्रह्मा ने वशिष्ठ मुनि से कहा था कि भगवान् विष्णु देवों के भी देव, अजन्मा,अच्युत साक्षात् श्रीकृष्ण हैं। सम्पूर्ण पापों का हरण करने वाले, मोक्ष प्रदाता तथा ब्रह्मवादी हैं । परम पुण्यात्मा विद्वान इनका ही जाप किया करते हैं। नमो नारायणाय प्राप्त करता है। दुःसह की पत्नी अलक्ष्मी नारायण पद को श्रवण करते ही चली जाती है और ऐसे ग्रहों में महालक्ष्मी आवास करती हैं। इसलिए समस्त कालों में इसी एकमात्र मंत्र का जाप करते रहना चाहिए। देवाधिदेव वासुदेव के जपयोग अन्य मंत्र का विचार करते हुए सूतजी ने कहा कि मेरे अभ्यास में आया हुआ एक मंत्र है। यह सम्पूर्ण वेदों के अर्थ का साधन करने वाला है।मंत्र के माहात्म्य का वर्णन करते हुए सूत जी ने कहा कि एक बार एक महान तपस्वी ब्रह्मानंद ने तपस्या के फलस्वरूप एक पुत्र प्राप्ति की। उसके नियमानुसार सारे संस्कार कराए। समय आने पर उपनयन संस्कार भी करा दिया। इसके पश्चात् वह बालक अध्ययन के लिए भेजा गया। लेकिन उसकी जिह्वा में स्पन्दन ही नहीं था। वह बिलकुल बोल ही नहीं पाता था। यह जानकर ब्राह्मण को परम दुःख हुआ। बालक की माता भी अत्यन्त दुःखी होकर कहती थी कि सम्पन्न और वेद-वेदांगों के परगामी मेरे पुत्र ब्राह्मणों के द्वारा पूज्य होते हुए मुझे आनंदित करते हैं। तू कहां मेरे भाग्यहीना के यहां उत्पन्न हो गया। इस दुःख से तो मेरी मृत्यु ही हो जाए तो अच्छा। मां से ऐसा सुनकर वह पुत्र यज्ञ करने चला गया। वहां पहुंचने पर सभी विप्र मोहित हो गए। वहां वासुदेव के कीर्तन से ऐतरेय की वाणी समृद्भुत हो गई। सभी ब्राह्मणों ने उसे प्रणाम किया। यज्ञ स्वयमेव वहां उपस्थित हो गया और ऐतरेय को धनादि से विभूषित किया। सभी ने उसका स्तवन किया और पश्चात् माता का अर्चन करके वह विष्णु लोक को चला गया।

इस द्वादश अक्षर मंत्र की यही महिमा है जो इसका जप कीर्तन करता है वह निश्चय ही परम पद प्राप्त करता है। ‘ओम नमो भगवते वासुदेवाय’ परमात्मा विष्णु का श्रेष्ठतम मंत्र है। ‘ओम नमो शिवाय’ यह शिव का षडक्षर मंत्र भी सर्व वेदों के अर्थ का संचयकर्त्ता तथा समस्त अर्थों का साधक होता है। ‘शिवतराय’ पांच अक्षर का मंत्र तथा मपस्कराय नमस्ते शंकराय यह सप्ताक्षर मंत्र प्रधान पुरुष रुद्र देव का होता है। जिससे विप्र समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं।पुराने समय में त्रेतायुग में धुंधमूक नाम का समर्थ द्विज हुआ। इस पर मुनि का शाप था। इसके यहां बड़ा ही दुरात्मा पुत्र उत्पन्न हुआ। यह धुंधमूक प्रारम्भ में अपनी भार्या के साथ बहुत ही आसक्त और मोहित था। उसके इसी कामासक्ति की वजह से वह भार्या गर्भवती हो गई थी। उस विशल्य भार्या ने बड़े यत्न से पुत्र का प्रसव किया। यह पुत्र अपने माता-पिता के लिए अनिष्टकारी सिद्ध हुआ। पिता यह जानकर बड़ा दुःखी हुआ। उसने अपने उस दुरात्मा पुत्र का विधिपूर्वक जात कर्म संस्कार किया और वह अध्ययन के लिए चला गया । पुत्र ने न्याय का अध्ययन किया । समय आने पर उसका विवाह हो गया । दुर्मद होने के कारण इसने एक बार एक अन्य नारी को देखकर रात-दिन उसके साथ भार्या के समान उपभोग करने की प्रवृत्ति बना ली । वह उसके साथ एक ही शैया पर स्थित होकर आचरण करने लगा और एक बार उसने उसका वध कर दिया। उसके भाइयों ने उसकी माता-पिता, पत्नी सभी को मार दिया। यह धुन्धुमूक का पुत्र किसी प्रकार से बचता हुआ बृहस्पति मुनि के पास पहुंचा। वहां महादेव के पंचाक्षर और षडक्षर मन्त्रों का अलग-अलग लक्ष जाप करके कलप के काल को प्राप्त हुआ । यह यम के द्वारा पूजित हुआ । इसके पश्चात् इसने माता-पिता और पत्नी आदि सभी का उद्धार किया । रुद्र के इस पंचाक्षर मन्त्र का अथवा षडक्षर मन्त्र का विष्णु के द्वादश अक्षर मन्त्र से करोड़ा गुना अधिक पुण्य होता है । इस मन्त्र का जाप करने वाला पुरुष परम गति को प्राप्त होता है और पठन या श्रवण करने वाला अथवा द्विजोत्तम को श्रवण कराने वाला ब्रह्मलोकवासी होता है ।

शिव के पशु और पाश के बारे में पूछते हुए मुनियों ने सूतजी से कहा कि कृपया हमारे इस कौतूहल को शान्त करें । तो सूतजी ने बताया कि महान यशशाली ब्रह्मा-पुत्र श्री सनकुमार भी एक बार शाप ग्रसित हो गए थे और रुद्र के प्रसाद से ही देह त्यागकर वे मरुदेश में ब्रह्मा की आज्ञा से शिलाद के पुत्र पास प्राप्त हुए। भगवान् नन्दी को प्रणाम करके उन्होंने यही जिज्ञासा प्रगट की कि महादेव पशुपति कैसे हुए और पशु कौन हैं । इस पर शैलादि ने उनसे कहा कि ब्रह्मा आदि से लेकर यथावर पर्यन्त सब संसार में वर्तन वाले पशु कहे जाते हैं । भगवान् रुद्र उन सबके पति हैं , इसीलिए वे पशुपति कहे गए । अविद्या के पार्श से बद्ध पुरुषों का अन्य कोई मोचक नहीं होता और भगवान् विष्णु परमेश्वर ही माया के पार्श की भाति बांधते है । ये चौबीस तत्त्व पार्श कहलाते है और एक भगवान् शिव ही उनका मोचन करते हैं । दस कर्मेन्द्रियां और ज्ञानेन्द्रियां, पंचभूत पंच-तन्मात्राएं, ये सभी पार्श हैं। इसलिए बुद्ध लोगों में भक्ति शब्द के द्वारा ब्रह्मा आदि से लेकर स्तम्भ पर्यन्त महेश्वर जीवों का मोच करते हैं । इसमें वाक् मन और शरीर द्वारा जो भजन है, वही भक्ति है । स्वरूप और उपादानों का चिन्तन मानस भजन, प्रणव आदि जाप, वाचिक भजन, प्राणायाम, काइक भजन के रूप हैं । पार्श के रूप में ये सभी चौबीस तत्त्व माया के कर्म-गुण हैं । ये ही विषय कहे जाते हैं और शिव भक्ति से ही समस्त देहधारी इनसे मुक्ति पाते हैं । तम, मोह, महामोह, तमिस्र और अन्ध तमिस्र पांच प्रकार की अविद्या हैं । जिसका अकेले शिव ही मोच करते हैं । देह में अनात्म स्वरूप, आत्माभिमान तम रूप ही अविद्या है ।
यही अस्मिता का मोह भी कहलाता है । योग परायण लोग राग को महामोह कहते हैं तथा द्वेष को तमिस्र और अन्ध तमिस्र कहते हैं। मोह आठ प्रकार का होता है, महामोह दस प्रकार का तथा अठारह प्रकार के तमिस्र और अन्ध तमिस्र होते हैं । तीनों कालों में द्वेष और राग से मुक्ति शिव स्वरूप परमात्मा द्वारा ही सम्भव है । भगवान् परमेश्वर चेतन, अचेतन से युका सम्पूर्ण प्रपंच से परे होते हैं, ये ही सर्वेश्वर हैं प्रणव परमात्मा शिव का वाचक है और इसके द्वारा वाच्य शिव की भावना उसके जाप से ही की जाती है। भक्त को प्रणव के अतिरिक्त अन्य से सिद्धियां प्राप्त होती हैं । सबके ऊपर अनुकम्पा से देवों के देव आदित्य रूप शिव ने परम पाशुपत ज्ञान तत्त्व यत्न से याज्ञवल्क्य के परम तप से कहा है । इस परमोत्तम पाशुगत योग से जिस पुरुष की अवस्था एवं प्रयोजन हो । वह इसका ज्ञान प्राप्त करके अन्त समय में प्रभु के ही सान्निध्य में पहुंचकर उसी में प्रवेश कर जाता है । ओंकार प्रदोष बनाकर, परम सूक्ष्म का अन्वेषण करते हुए इन्द्रियों के द्वार पर निवास करने वाले मन को वश में करके ही उसे स्थापित किया जा सकता है।