एक राजा ने अपने मंत्री से कहा-‘महामंत्री बहुत दिनों से मेरा विचार बन रहा है कि राज्य के कुछ योग्य प्रजाजनों को सम्मानित करके उन्हें कुछ बड़ा उपहार दिया जाये। आप मुझे बताइये और सुझाइये कि ऐसे अधिकारी व्यक्ति कहां से और किस प्रकार ढूँढे जायें?”
इस पर सूझबूझ वाले मंत्री ने तनिक सोचकर कहा- “महाराज! सत्पात्रें की तो आपके राज्य में कोई कमी नहीं है, परन्तु आज सभी वर्गों के लोगों में एक भारी कमी है। वे परस्पर सहयोग करने की अपेक्षा एक दूसरे की टांग पकड़कर खींचते हैं। न तो खुद पाते हैं न ही दूसरे हाथ कुछ लगने देते है। यह लोगों की प्रवृत्ति बन गयी है। एक दूसरे के प्रति ईर्ष्या, द्वेष और बैर लोगों में कूट-कूट कर भर गयी है। जो स्वयं निकम्मे और जाहिल हैं, वे भी दूसरों की प्रगति से जलते और रोड़ा अटकाते हैं। ऐसी दशा में मुझे तो लगता है कि आपकी उदारता को फलित होने का अवसर नहीं मिलेगा।”
राजा को अपने महामंत्री की बात कुछ अटपटी सी लगी। वे बोले- “महामंत्री जी! तुम्हारी यह मान्यता सर्वथा सही और सच है। इस बात को मैं कैसे मान लूं? इस विषय में यदि तुम्हारे पास कुछ ठोस प्रमाण हैं तो प्रस्तुत कीजिये।”
महामंत्री ने राजा की बात स्वीकार कर ली और उन्होंने अपने कथन को प्रत्यक्ष कर दिखाने की एक योजना बनायी। राजा ने महामंत्री की योजना को स्वीकृति प्रदान कर दी।
योजना के अनुसार एक आठ फुट गहरा गड्डा इतनी चौड़ाई के साथ खुदवाया गया कि उसमें एक साथ कम से कम बीस पच्चीस व्यक्ति खड़े हो सकें।
ऐसे बीस पात्रें को चुनकर, जो सम्मान के योग्य समझे गये, गड्डे में छोड़ दिया गया और साथ ही घोषणा कर दी गयी कि जो भी इस गड्डे से निकलकर ऊपर आ जायेगा, उसे महाराज अपने राज्य का एक चौथाई हिस्सा पुरस्कार में देंगे।
बस, फिर क्या था, बीसों व्यक्ति जी-जान से सबसे पहले गड्डे के ऊपर चढ़ने का प्रयत्न करने लगे। जो भी सफल होता दिखता, पुरस्कार हाथ से जाने के भय से दूसरे उन्नीस उसकी टांगें पकड़ कर घसीट लेते और वह औंधे मुँह फिर से गड्डे में जा गिरता। इस टांग खिंचाई के कारण सवेरे से आरम्भ की गयी प्रतियोगिता शाम के अनिर्णीत समाप्त हो गयी। बीसों को असफल घोषित किया गया। पुरस्कार किसी को भी नहीं मिल सका। राजा को अपने महामंत्री के कथन की शत-प्रतिशत सच्चाई महामंत्री ने राजा से अपना मत प्रकट करते हुए महाराज! यदि इन लोगों में एकता होती, तो सहारा देकर किसी एक को ऊपर चढ़ा सकते थे। परन्तु वे ईर्ष्या और लालच वश वैसा कर नहीं सके। एक दूसरे की टांग ही खींचते रहे और अन्त में किसी ने कुछ भी नहीं पाया। आज भी तो यही हो रहा है।
ये कहानी ‘इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं– Indradhanushi Prerak Prasang (इंद्रधनुषी प्रेरक प्रसंग)
