भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
अनस तालीम में खूब दिलचस्पी लेता था। दिल लगाकर पढता। वह आम दिनों में तो दिल लगाकर पढ़ता ही था, पर इम्तिहान की तैयारी खूब जी तोड़कर किया करता। इसी वजह से वह हमेशा ही अच्छे नंबरों से पास हुआ करता था। उसका तालीमी रिकार्ड बहुत उम्दा था। इस साल भी हाई स्कूल का इम्तिहान उसने इम्तियाजी (डिस्टिंक्शन) नंबरों से पास किया था। इसी सिलसिले में उसके घर पर एक पार्टी का एहतिमाम (आयोजन) किया गया था। जिसमें उसके अजीज-ओ-अकारिब (रिश्ते-नातेदार) और दोस्तों के साथ ही शहर के कुछ खास इल्मी-व-अदबी (शिक्षित और साहित्यिक) लोगों को दावत दी गई थी। इस मौके पर तमाम लोग बहुत अच्छे, कीमती और उम्दा तोहफों के साथ आए थे। तकरीबन सारे ही लोगों ने अपनी पसंदीदा तोहफों से अनस को नवाजा था। उसका खास दोस्त अरशद भी इस पार्टी में शरीक था। उसके हाथ में भी एक गिफ्ट-पैक था। जो अगरचे (यद्यपि) साइज में तो ज्यादा बड़ा ना था, मगर कदरे-वजनी (भारयुक्त) मालूम होता था।
अरशद उसका बहुत खास दोस्त था। वह दोनों ही एक-दूसरे को दिलो-जान से चाहते थे। अनस की तरह अरशद भी पढ़ने में बड़ा होनहार था। और हमेशा ही अच्छे नंबरों से कामयाब हुआ करता था। हाँ, अरशद में अनस के मुकाबले एक बड़ा अहम और नुमायाँ (स्पष्ट) फर्क था। और वह ये कि अनस सिर्फ अपनी कोर्स की किताबें ही पढ़ा करता, जबकि अरशद निसाबी किताबों (पाठ्य पुस्तकों) के साथ ही दीगर (अन्य) किताबों का मुताला (अध्ययन) भी किया करता। इन किताबों में मजहबी, तारीखी (ऐतिहासिक) और अदबी (साहित्यिक) किताबें हुआ करतीं। अरशद का कहना ये था कि इन किताबों से जहाँ उसकी मालूमात में इजाफा होता है, वहीं ये किताबें अपने पढ़नेवालों की जहनी-ओ-अखलाकी (मानसिक एवं नैतिक) तरबियत (दीक्षा) का फरीजा (कर्तव्य) भी अंजाम दिया करती हैं, और उनके जरिये इंसान अपनी इस्लाह (सुधार) भी कर सकता है। जबकि अनस को ये गलतफहमी थी कि बच्चों को सिर्फ अपने कोर्स की किताबें ही पढ़नी चाहिए। दीगर किताबों के मुताले से पढ़नेवालों को कोई फायदा नहीं हुआ करता है। गरज ये कि इस सिलसिले में दोनों की सोच-ओ-फिक्र ही बिलकुल अलग-अलग थी। मगर अरशद की ख्वाहिश जरूर थी कि अनस चूँकि अच्छे जहन और आला (श्रेष्ठ) याददाश्त का मालिक है इसलिए अगर वह अच्छी किताबों का मुताला करे तो उनसे हासिलशुदा (प्राप्त) मालूमात आइंदा जिंदगी में उसके लिए बहुत ज्यादा मुफीद-ओ-कारगर (उपयोगी और प्रभावी) साबित हो सकती है। इसीलिए वह हर वक्त उसके लिए कोशाँ (प्रयासरत) रहा करता और किसी मुनासिब जरीया-ओ-मौका (साधन एवं अवसर) की तलाश में रहा करता कि किसी ना किसी तरह अनस को किताबों के मुताले की इफादीयत (उपादेयता) का कायल कर लिया जाए। ऐसी ही ख्वाहिश उनके उस्ताद एहतिशाम साहब की भी थी।
अरशद को आखिरकार ये मौका हासिल हो ही गया। इस साल अनस इम्तियाजी नंबरों से पास हुआ था। उसने उसी खुशी में एक पार्टी अरेंज की थी। उसने अनस के पास होने की खुशी में मुनाकिद (आयोजित) होनेवाली इस पार्टी को उसका बेहतरीन मौका समझा। वह अपने दोस्त को उसकी कामयाबी पर पेश करने के लिए जो तोहफा लेकर आया था. वह उस वक्त उसके हाथ में एक पैकेट की शक्ल में मौजूद था।
अरशद और अनस की दोस्ती से तो सभी लोग वाकिफ ही थे। इसलिए उसके पैकेट पर तकरीबन हर एक की नजर थी कि देखें अनस का खास दोस्त उसकी कामयाबी पर क्या तोहफा लेकर आया है?
फिर एक वक्त ऐसा भी आया जब अरशद ने अपना गिफ्ट-पैक अनस को दे दिया। सभी इस मौके के मुंतजिर (प्रतीक्षारत) थे ही, लिहाजा सब लोगों ने अनस के पैकेट को सभी के सामने खोल देने की फरमाइश की। ऐसी कोई बात थी भी नहीं कि अनस लोगों की इस फरमाइश पर अमल ना करता। लिहाजा उसने अरशद का तोहफे का पैकेट सभी के सामने खोल दिया। सभी लोगों की निगाहें तो उसी तरफ थीं। जैसे ही पैकेट खोला गया, तो सबने देखा कि इस पैकेट के अंदर से कुछ किताबें निकलीं, जो अरशद ने अपने प्यारे दोस्त अनस को तोहफे के तौर पर पेश की थीं। उनमें कुछ किताबें मजहबी थीं तो कुछ तारीखी और चंद किताबें अखलाकीयात (शिष्टाचार) पर मबनी (आधारित) भी थीं।
यह देखकर उसके उस्ताद मास्टर एहतिशाम साहब बहुत खुश हुए। वह खुद भी किताबों के बहुत शौकीन थे और अपने शागिर्दो को भी किताबें पढ़ने का मशवरा दिया करते थे। वह सबक (पाठ) के दौरान भी बच्चों को किताबों के मुताले की हिदायात देते रहते थे। अनस और अरशद के ताल्लुक से भी सब बातें उन्हें अच्छी तरह मालूम थीं और उनकी भी दिली ख्वाहिश थी कि अनस अपने निसाब के साथ ही दीगर अच्छी किताबों का भी मुताला करे। ये बातें दीगर बच्चों के साथ ही वह अनस से भी कहा करते थे। इस वक्त जो अरशद ने किताबों का तोहफा दिया था, इसमें एहतिशाम साहब का मशवरा भी शामिल था, क्योंकि उनकी यही कोशिश थी कि किसी मुनासिब मौके पर अनस को किताबों के मुताले के ताल्लुक से समझाया जाए और उसको किताबों की अहमियत बताई जाए। उनके मंसूबे के मुताबिक ये बहुत ही उम्दा मौका था। जब अनस के वालदैन और दीगर मुताल्लिकीन मौजूद थे। एहतिशाम साहब ने उसको मौका गनीमत (अच्छा अवसर) जाना और सभी लोगों के सामने अनस को मुखातिब (संबोधित) करते हुए कहना शुरू किया, “अनस बेटा, तुम पढ़ने में बहुत ही होशियार हो। अपने कोर्स की तमाम किताबें बड़े जौक-ओ-शौक से (रुचिपूर्वक) पढ़ते हो। खूब मेहनत भी करते हो। इसलिए माशा अल्लाह हर साल अच्छे नंबरों से पास भी हो जाते हो। मगर ये भी सोचो कि जिंदगी सिर्फ यही नहीं है। बल्कि समाज में रहते हुए इंसान की और भी कुछ जिम्मेदारियाँ होती हैं, जिनका ताल्लुक मजहब, अखलाक, तारीख और साइंस व तकनॉलोजी वगैरह से हुआ करता है। खुशी की बात है कि हमारे यहाँ तमाम ही मौजूआत (विषयों) पर बेहतरीन किताबें मौजूद हैं, जिन्हें पढ़कर हम बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं और जिंदगी को कामयाब बना सकते हैं। और फिर आज ही की बात नहीं, बल्कि किताबों की अहमियत तो हमेशा ही तस्लीम (स्वीकार) की जाती रही है। और दुनिया के हर खित्ते (भूखंड) और जमाने में इंसान ने किताबों से बहुत कुछ सीखा है। बल्कि हम अपनी तालीम भी किताबों के जरिये ही हासिल करते हैं। और बेटा अनस, जरा तुम खुद अपने ऊपर ही गौर कर लो तो मालूम होगा कि तुम जो हर साल अच्छे नंबरों से पास होते हो, उसमें भी तो किताबों का ही दखल है। इस तरह भी किताबों की अहमियत साबित होती है।”
एहतिशाम साहब ने ये बातें अनस से तो खासतौर पर कहीं मगर उनकी तवज्जो (ध्यान) सभी की तरफ रही। इसलिए वहाँ मौजूद तकरीबन तमाम लोगों पर उनकी बातों का असर हुआ, और उन्होंने किताबों की अहमियत को समझा।
मुनासिब मौका समझते हुए एहतिशाम साहब ने फिर कहना शुरू किया, “अनस देखो, तुम्हारे दोस्त अरशद ने तुम्हें तोहफे में किताबें देकर जो उम्दा मिसाल कायम की है, वह दूसरों के लिए भी एक अच्छा नमूना हो सकता है। हमें चाहिए कि हम हर खुशी के मौके पर एक-दूसरे को किताबों के तोहफे देने का सिलसिला शुरू करें। इससे जहाँ एक तरफ किताबों की तरक्की-ओ-पजीराई (उन्नति और स्वीकृति) होगी, वहीं बच्चों को उन्हें पढ़ने और उनसे बहुत कुछ हासिल करने का मौका भी मिलेगा। हाँ, ये जरूर है कि सभी किताबें अच्छी और मुफीद (उपयोगी) नहीं हो सकतीं। उनके इंतिखाब (चयन) करने में भी बड़ी सूझ-बूझ की जरूरत हुआ करती है। अब देखो, इस वक्त अरशद ने अनस को जो किताबें दी हैं, वह अपने-अपने मौजू (विषय) पर बड़ी अहम (महत्त्वपूर्ण) हैं। उनमें कुछ मजहब-ओ-अखलाक की हैं कुछ तारीख की हैं, कुछ अदबी नौईयत (विशेषता) की हैं, और कुछ दीगर चंद और मुफीद-ओ-कार-आमद (उपयोगी और सार्थक) मौजूआत पर भी हैं। इस तरह ये तमाम ही मालूमात का बेहतरीन माखज (स्रोत) हैं। इनका मुताला करके बेहतरीन मालूमात हासिल की जा सकती है।”
एहतिशाम साहब ने किताबों के ताल्लुक से और भी बहुत-सी बातें कीं। अनस के चेहरे के तास्सुरात (मनोभावों) से अंदाजा हो रहा था कि वह अपने उस्ताद की बातें निहायत गौर से सुन रहा है और उन बातों का इस पर खातिर-ख्वाह (मनोवांछित) असर भी हो रहा है। गरज ये कि वह अपने मकसद में कामयाब हो रहे थे। एहतिशाम साहब के साथ ही अरशद भी खुश था। जिसका इजहार उसके होंठों पर रक्स (नृत्य) कर रही मुस्कराहट से हो रहा था।
एहतिशाम साहब की बात पूरी होने के बाद अनस उनके सामने आया और निहायत अदब-ओ-आजिजी (सभ्यता और विनम्रता) से बोला, “सर, आज आपने मुझे किताबों के ताल्लुक से जो कुछ भी बताया। उसने मेरी आँखें खोल दीं। अब मैं उनकी अहमियत से अच्छी तरह वाकिफ हो गया हूँ। भाई अरशद की तो शुरू से ही कोशिश रही है कि मैं कोर्स के साथ ही दीगर अच्छी किताबों का भी मुताला करूँ। मगर मैंने उसको कभी संजीदगी (गंभीरता) से नहीं लिया। मगर अब आपके समझाने के बाद आपसे वादा करता हूँ कि आइंदा कोर्स के साथ ही दीगर और मौजूआत पर भी अच्छी-अच्छी किताबें जरूर पढूँगा।” अनस ये कहकर खामोश हो गया।
महफिल तो खशी की थी ही. अरशद की कोशिशें और एहतिशाम साहब की तकरीर से ये एक तरह से इल्मी मजलिस (शैक्षिक सभा) में बदल गई। अनस की पार्टी उस वक्त किसी अदबी तकरीब (साहित्यिक गोष्ठी) से कम ना थी जहाँ इल्मी बातें बड़े ही शऊर-ओ-सलाहियत (शिष्टता और विशेषज्ञता) के साथ पेश की गई थीं। जिनसे इंसानी जिंदगी के लिए किताबों की अहमियत साबित हो रही थी। इसी वजह से वहाँ मौजूद हर एक शख्स ने ही उस वक्त किताबों की अहमियत को समझते हुए उनके मुताले का पुख्ता इरादा कर लिया था और अपने माहौल में उनको मकबूल (स्वीकार) करने के लिए किताबों का तोहफा आम करने का भी मसम्मम इरादा (दढ निश्चय) कर लिया था। वहाँ मौजद तमाम अफराद (व्यक्तियों) की चमकती हुई आँखों और मुस्कराते हुए होंठों से ब-आसानी अंदाजा लगाया जा सकता था कि अरशद और एहतिशाम साहब अपने मंसूबे में मुकम्मल तौर से कामयाब रहे हैं।
महफिल खत्म हुई और फिर सभी लोग अपने-अपने घरों की तरफ चल दिए–अपने दिल में नई उमंगें और किताबों से मुहब्बत की खुशबुएँ समाए हुए।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
