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कब आओगी?-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब: Nariman ki Kahani
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Nariman ki Kahani: उन्होंने हाथ मिलाए और बिछुड़ गए। उसने शीशे का दरवाजा खोला और कमरे से बाहर निकल आयी। कॉरीडोर से निकल बरामदे का दरवाजा खोला, बाहर लॉन पार कर मेन गेट से होते हुए बाहर सड़क पर आ गई। ऑटो रिक्ज़ा ले बस स्टैंड पहुंची व फिर घर तक आ पहुंची। यह सब कुछ एक अवचेतन में घट गया। मशीन की भांति वह घर में चक्कर काटने लगी। मुलाकात के सभी पलों को वह आपस में जोड़ने लगी। एक श्रृंखला के माध्यम से वह सारी स्थिति के बारे में सोचने लगी। मगर पल थे कि बिखरते ही जा रहे थे। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वह उस इंसान से मिल कर आयी थी, जिसके बारे में वह वर्षों से सोचती रही थी। जिसका नाम टी.वी. स्क्रीन पर पढ़-पढ़ कर वह वर्षों से पता नहीं कैसी-कैसी कल्पना करती रही थी। उसे याद आया, एक कोने में बैठी-बैठी हमेशा उस इंसान का नाम टी.वी. पर देखते हुए मालूम नहीं कब वह उसकी फैन हो गई थी? उस निर्माता निर्देशक की, जिसके जासूसी सीरियल के मोन्टाज के म्यूज़िक की ट्यून सदा जेहन में गूंजती रहती थी। हफ्ते में जिस दिन उसके सीरियल की अगली कड़ी आती थी, वह कहीं भी होती, किसी भी जरूरी काम में फंसी होती, उस दिन और उस समय पर अवश्य घर पहुंच जाती। सीरियल देखते हुए, वह सदा निर्देशन की तारीफ करती। वाह! क्या शॉट था। लॉग शॉट से नज़र आती मुख्य पात्र, फिर मिडशॉट में आकर उसका रुकना, सिर से हैट उतारना, फिर उसके चेहरे का क्लोज-अप, डॉयलॉग डिलेवरी, आवाज़ का उतार-चढ़ाव, आवाज़ पर कंट्रोल और आउटडोर शूटिंग का ध्यान रखते हुए पटकथा की तकनीक विकसित करने का यत्न। रात में दश्यों का फिल्मां. कन का खास अंदाज, मानवीय भावनाओं का और संबंधों का कुशलता से चित्रण और रहस्यमय दृश्यों में संवादों की नाटकीयता, फिर सीरियल का किश्त-दर-किश्त तक फैलता एक रहस्य। एक रोमांच व दिलचस्पी और ऐपीसोड के अंत में वही मोन्टाज़ का म्यूजिक और स्क्रीन पर उभरता निर्देशक का नाम। एक विशिष्ट नाम, जिसका चेहरा आपने कभी न देखा हो, मगर उसके पीछे छिपी काबिलियत देखी हो। अब जब उसका शहर में आना हुआ, उसी बड़े शहर में, जहां निर्देशकों की लंबी कतारें थी, सीरियलों के भंडार थे। फिल्मी दुनिया की चकाचौंध में सबसे पहले उसका मन उसी निर्देशक से मिलने के लिए ललचाने लगा।

उससे भी बड़ी गौरतलब बात यह कि उस पर एक्टिंग का जुनून छा गया। सीरियल देख-देख कर मालूम नहीं कब उसके मन में यह लालसा जाग उठी कि वह भी एक्टिंग करे। उसे उसी शहर में रहना था, जहां एक्टिंग के द्वार खुले थे और एक्टिंग का काफी स्कोप था। क्या हर्ज है कि वह लोगों के साथ मिल कर इस शौक को पूरा कर सके और उसने यही सब करना शुरू कर दिया।

इसके लिए उसने सबसे पहले अपना फोटों सेशन करवाया और फिर लोगों से मिलना शुरू कर दिया। मगर उसका यह अनुभव अत्यन्त अजीबो-गरीब रहा। उसके दिमाग में सबसे पहले बड़े-बड़े निर्माता-निर्देशकों के नाम आए और उसका भी, जिसकी वह फैन थी। वह जितने अपनेपन और आत्म-विश्वास से टेलीफोन डायरेक्टरी से नंबर लेकर घुमाती, उतनी ही उसे निराशा होती। फोन असिस्टेंट उठाते और टाल देते। उससे कहा जाता कि फलां निर्देशक या निर्माता शहर से बाहर है या अभी वे व्यस्त है। अक्सर यह भी कहा जाता कि एक या दो महीने बाद फोन करना। इस प्रकार फोन करते करते वह थक गई, नाकाम हो गई। अब तो किसी बड़े निर्माता-निर्देशक को फोन मिलाते समय उसके हाथ कांपने लगते और एक दिन उसने अपने प्रिय निर्देशक से मिलने का निश्चय कर लिया।

किसी ने उसे सलाह दी, “एक सेक्रेट्री रख लो। फिर यदि फिल्मों, सीरियलों में स्ट्रगल करना है तो शान से करो। सेक्रेट्री बहुत काम की चीज़ होते हैं। कुत्ते की भांति सूंघते फिरते हैं कि कहां क्या हो रहा है? तुम्हें अधिक घूमना नहीं पड़ेगा। फोन पर बड़े आदमियों से मिलने के लिए वक्त के लिए गिड़गिड़ाना नहीं पड़ेगा। यह काम तो सेक्रेट्री करेगा न!”

उसने ऐसा ही किया और अपने लिए एक सेक्रेट्री रख लिया। सेक्रेट्री रोज सवेरे उसे फोन करता, ‘गुडमार्निंग’ कहता और हफ्ते में दो-तीन बार बुलाता भी कि फलां जगह पर आ जाओ। वह किसी डॉयरेक्टर से मिलवा देता। वह बस चली जाती, डॉयरेक्टर के सामने अधिकतर बातें सेक्रेट्री ही करता। वह उसकी तारीफों के पुल बांधता।

“यह बहुत बढ़िया एक्ट्रेस है। तहलका मचा देगी। बढ़िया सा रोल इन्हें दीजिए।” मगर वहां से निकलने के बाद वह नुक्ताचीनी करने लगता। “देखिये! यह झिझक छोड़ दो। यह बहुत फ्री लाइन है। यहां ‘नमस्ते’ या ‘नमस्कार’ कहना छोड़ दे। आगे बढ़ कर सीधे हाथ मिलाया करो और ‘हैलो’ कहो ताकि मालूम हो कमरे में कोई दाखिल हुआ है। परन्तु तुम तो एकदम घुटी-घुटी सी रहती हो….।”

सेक्रेट्री कभी उसके कपड़ों पर व्यंग्य कसता, “यह मुंबई है नीमा जी। आप ये कैसे सूट पहन कर आ जाती है। थोड़ा चेंज करो खुद को। यह मुंबई है मुंबई। ज़िन्दगी काफी फास्ट है यहां। यहां जो समय के साथ नहीं चलता, वह पीछे रह जाता है। आप तो लगता है, हर समय सोचती ही रहती है। यहां तो झटपट फैसला करने से काम चलता है। वक्त आगे निकल जाता है।”

“मालम है, वह प्रोडयसर क्या कह रहा था….कैसे देख रहा था मेरी ओर। कैसे बातों ही बातों में इशारे कर रहा था, गंदे इशारे…।” उसने रूआंसी आवाज़ में कहा।

“ओह हो नीमा जी! आप भी किस सदी की बात कर रही है। यहां कैसे आ गई आप…। वो कैसे देख रहा था। अरे भई यह शो बिजनेस है। अगला आपको सिर से लेकर पांव तक नहीं देखेगा तो क्या आंखें बंद करके बात करेगा।”

“मगर वह कह रहा था, ‘गिव एंड टेक’ की गेम है। कुछ पाना है तो कुछ देना भी पड़ेगा…।”

“तो क्या गलत कह रहा था। मुझे सेक्रेट्री रखा है तो मेरी बात ध्यान से सुनिए। आप सुंदर है, इतनी टेलेंटेड भी है। आगे बढ़ने के लिए थोड़े-बहुत समझौते कर लेंगी तो आपको कोई रोक नहीं सकेगा। नहीं तो सुंदर और टेलैंटेड चेहरे यहां और भी हैं, वे आगे बढ़ जाएंगे।”

“मगर टेलेंटेड हूं तो फिर समझौता क्यों?”

वह बेचैन होने लगी थी।

“देखो, कम्पीटिशन इतना बढ़ गया है। अब वो पहले वाला जमाना नहीं रहा कि गिनी-चुनी लड़कियां ही आती हो, फिल्मी लाइन में। अब हर एक लड़की, जिसका चेहरा ज़रा-सा फोटोजनिक हो, वे सभी तरह-तरह की ट्रेनिंग लेकर यहां आ रही है। मारुति वन थाऊजेंड में बैठ कर तो स्ट्रगल करने आती है ये लड़कियां…और जो ड्रैसेज़ डॉयरेक्टर पर्दे पर पहनने को कहते हैं, वे आम जीवन में पहन कर आती हैं, मिली स्कर्ट, मिनी फ्रॉक, डीप गले के हाई टॉप और निक्करें….।”

“ठीक है। पर्दे पर यह सब पहनना, बिंदास होना मगर पर्दे के पीछे के ये समझौते….आखिर यह सब क्यों?”

वह अभी भी बेचैन थी, उदास थी और बहुत अपसेट हो गयी थी।

“भई आखिर जो आप के लिए इतना करेगा, वह बदले में कुछ तो चाहेगा? और जब दस लड़कियां डॉयरेक्टर-प्रोडयूसर के साथ सोने के लिए तैयार है तो जो न सोना चाहे, वह जाए भाड़ में….।”

“मगर प्रोडयूसर-डॉयरेक्टर को भी तो एक चेहरा चाहिए फिल्म के लिए। एक खास चेहरा, टिपीकल चेहरा, जो स्क्रिप्ट के लिए सूटेबल हो।” वह इस बहस को खत्म करना चाहती थी।

“सूटेबल तो तभी बनता है चेहरा, जब वह स्टार बन जाता है। उससे पहले तो सभी चेहरे एक जैसे ही रहते हैं।”

“मगर इंडस्ट्री तो समुद्र है, समुद्र की भांति ही विस्तृत और विशाल। एक प्रोडयूसर-डॉयरेक्टर समझौते करने को कहता है, जाने दो उसे…किसी दूसरे के पास चले जाओ…कमी नहीं है यहां प्रोडयूसरों-डॉयरेक्टरों की। फिर जिस इंडस्ट्री में हर वर्ष करीब तीन सौ फिल्में बनती हैं, उससे भी ज्यादा सीरियल…काम की कहीं भी कमी नहीं है।”

“हां! यह तो सच है, इतनी तादाद में फिल्में और सीरियल्स बनते हैं, मगर यह भी सच है कि हजारों युवतियां लाइन में लगी हैं।”

“परन्तु मुझे यह समझ में नहीं आता कि शर्ते क्यों? बल्कि मैं तो कहूंगी कि ये सवाल उठते ही क्यों हैं? ये सवाल ही तकलीफ पहुंचाते हैं मुझे।” उसने रुआंसे होकर कहा।

“सौ में से दस फीसदी लोग ऐसे है, यहां जो नहीं चाहते कि कुछ भी बदले, जिन्हें सिर्फ काम से ही मतलब होता है। वे चाहते हैं, आर्टिस्ट आएं मन लगा कर काम करें. पैसे लें और अपने घर जाएं। और भी कई कैटगरीज़ हैं, जैसे सभी लड़कियों को बिस्तर तक नहीं ले जाते। कुछ सिर्फ बातचीत कर, हाथ मिला कर ही खुश हो जाते हैं। कुछ ऐसे होते हैं जो सीधो ही पूछ लेते हैं…”चलोगी, तो काम मिलेगा, नहीं तो बाय…बाय।” उसका सेक्रेट्री इस प्रकार प्रोडयूसर-डॉयरेक्टरों की कैटगरीज़ बता रहा था, जैसे आलू, भिंडी या टमाटरों के भाव बता रहा हो। सुन-सुनकर वह हक्की-बक्की हो रही थी कि आखिर वह यह बकवास सुन क्यों रही है।

“सैक्स, अब इतनी दूर की चीज नहीं रह गया कि सौ पर्दो में लुका-छिपा रहे। जो मुश्किल से प्राप्त होता है, यह तो अब आम बात हो गई है। टी.वी. चैनलों और सेटेलाईट ने इसे एकदम आम कर दिया है, इसे और रि यह तो शहर ही ऐसा है, बिल्कुल वेस्ट ईज….क्या कमी है यहां?” सेक्रेटी लगता था आज मानो परी हिस्टी ही सनाने का मन बना कर आया था।

“जब यह इतना ही आम है तो ये लोग लड़कियों के आगे इतना गिड़गिड़ाते ही क्यों हैं?” वह तिलमिलायी। शायद यही हथियार ही बचा था उसके पास।

“कौन कहता है कि वे गिड़गिड़ाते हैं? वे तो सीधो-सीधो अपनी जरूरत बताते हैं। मंजूर, तो ठीक है नहीं तो कौन रोकता है, जाओ, जाकर घर बैठो।”

उसे लगा, अब इस टॉपिक पर बात करते रहना फिजूल है। परन्तु यह तो जाहिर है कि वह अभी भी असहमत थी। वह किसी भी कीमत पर सेक्रेट्री की बातों से प्रभावित नहीं हुई थी। बहुत देर तक दोनों खामोश रहे। दोनों अपनी-अपनी सोच में गुम, अपनी-अपनी बात मनवाने के लिए शब्द और दलीलें ढूंढते रहे। जब दोनों बिछुड़ने लगे तो नीमा ने उदासी से सेक्रेट्री को अपने पंसदीदा डॉयरेक्टर से मिलने की इच्छा जतलायी। वह डॉयरेक्टर, जि. सकी वह बरसों से फैन थी। शायद वहीं उसके बनते-बिगड़ते कैरियर को कोई सहारा दे सके।

“हां-हां, जरूर मिलवा दूंगा। वह तो अपना यार है। ले लूंगा उससे अगले हफ्ते का अपाइंटमेंट।”

सेक्रेट्री चला गया। उसका मन कड़वाहट से भर गया। बड़ी-बड़ी महान् एक्ट्रेसों के चेहरे एक-एक करके उसकी आंखों के सामने से गुज़र गएं। क्या सचमुच प्रत्येक महान् एक्ट्रेस ने पहले समझौता किया होगा ?

वह भी किसी उस व्यक्ति के साथ, जिसे वह पसंद भी न करती हो और उसकी आंखों के आगे बहतु सारे प्रोडयूसर-डॉयरेक्टर तथा कास्टिंग डॉयरेक्टरों के चेहरे निकले, जिन्होंने उसे इतनी आफॅर्स दी। साथ घूमने की, ड्राईव पर जाने की बात की, फिर साथ सोने की। उनमें से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं था, जिसे छूने की भी इच्छा होती। उसके साथ अगली स्टेज तक जाने की बात तो बहुत दूर की है। बढ़ी हुई तोंद, पान खा-खाकर गंदे हुए होंठ, होंठों से निकलती झाग, बदबूदार और बेडौल जिस्म…। हरेक आदमी यदि खूबसूरत औरत या लड़की के संग सोना चाहता है तो क्या लड़की या औरत भी ऐसा नहीं चाह सकती कि उसके साथ सोने वाला मर्द खूबसूरत हो। उसका बदन गठा हुआ हो, दांत साफ हो, उसके शरीर से खुशबू आती हो…। बस में बैठी वह कुछ ऐसी ही बेसिर-पैर की बातें सोच रही थी।

वह उस कैरियर की मंजिल पर पहुंचेगी…अवश्य पहुंचेगी। मगर उन दस फीसदी लोगों के जरिये जिनकी शर्त सिर्फ यह होती है कि मन लगा कर काम करो, पैसे लो और घर जाओ। कोई फालतू बात नहीं, कोई ऐसी शर्त नहीं, जिससे सुन कर मन खिक हो जाए और आदमी सोचों की दलदल में गर्क हो जाए।

फिर उस डॉयरेक्टर से मिलना तय हो गया, जिसे वह पसंद करती थी। वह उससे मिलने गई। फोन पर सेक्रेट्री ने उसे नियत दिन और समय बता दिया था।

उस सुबह, डॉयरेक्टर से मिलने जाने से पहले उसने काफी तैयारी की। कपड़ों और बालों के बारे में सोचती रही। घर से कितने बजे निकलेगी। वहां पहुंच कर क्या-क्या बातें करेगी। कैसे करेगी? सोच-सोच कर उसका गला सूखता जा रहा था। वह तो सबसे अलग होगा। उसे कितनी ही प्रसिद्ध और स्थापित एक्ट्रेसों के इंटरव्यू याद आए, जिनमें उन्होंने उसी डॉयरेक्टर द्वारा उन्हें ब्रेक देने और उनका गॉडफादर होना आदि बताया था। एक दिन वह भी स्थापित होकर अपने इंटरव्यू में उसका नाम लेगी। सोच कर वह मुस्करा दी। कितनी सुखद सोच थी यह।

सुबह अपना सबसे बढ़िया सूट पहन कर वह घर से निकली। उसे लगा, आज जैसे वह दुनिया का सबसे महत्त्वपूर्ण काम करने जा रही थी। खुशी के मारे दिल बार-बार उछल रहा था। आखिरकार वह उस डॉयरेक्टर के ऑफिस में जा पहुंची। मन में ऐसी भावना थी जैसे वह मंदिर में अपने देवता के दर्शन करने जा रही हो। अपना दुख-दर्द भुला कर समर्पण करने की भावना। रिसेप्शन रूम में रिस्पेशिनस्ट के कुछ सवालों का जवाब देने के बाद उसे उस कमरे में जाने की इजाज़त मिल गई।

शीशे का दरवाजा खोल कर वहां कमरे में दाखिल हुई। बहुत बड़ा खूबसूरत कमरा, दोनों ओर बढ़िया गद्दों से सजे दीवान, एक ओर सोफा, टी.वी., वी.सी.आर. और बहुत सारी कैसेटों और किताबों से सजी शेफ। दीवारों पर क्लासिक कलाकृतियां। कमरे के बीचों-बीच शीशे का बड़ा टेबल और ऐन बीच में फूलदान। पास में खूबसूरत ऐश-ट्रे।

एक दीवान पर वह अधालेटा-सा था, गोल तकिये का सहारा लिए। मानो किसी रियासत का राजा हो। वह एकदम उसके सामने जा खड़ी हुई। कंधो पर झूलता बैग और पर्स लेकर। फिर सिर झुका कर, दोनों हाथ जोड़ कर उसने अत्यन्त अपनत्व से उसका अभिवादन किया। वह मुस्कराया। ऊंचा-लंबा, सांवला रंग, दौलत और शौहरत की शानो-शौकत से लबरेज़, घने काले बाल जो बेतरतीबी से उड़ भी रहे थे। कुछ सोचती और थकी-सी नशीली आंखें…।

“बैठो!” दिलकश और भारी आवाज़।

वह उसके सामने ही बैठ गई। कुछ बेआराम सी, डरी-सहमी सी। अपलक उस निर्माता-निर्देशक को निहारते हुए।

“हूं…तो यह है वह शख्स, जो इतने सालों से राज कर रहा है सॉफ्टवेयर मीडिया में। इसकी उपज हैं, वे सभी हिट प्रोडक्टस, जो सभी का दिल मोह लेती हैं।”

वह सोच रही थी। दिल धड़क रहा था। हवा खामोश थी। सांस रोके खड़ी थी। मगर अधिक देर तक नहीं। सवालों की तरतीब शुरू हुई। ठीक उसी प्रकार, जैसे सभी आफिसों में होती है। नाम क्या है? उम्र क्या है, कितनी हाइट है? मैरिज़ हुई है या नहीं? हुई है तो कितने बच्चे हैं? पति, मकान, किराये और मुंबई में रिहायशी संबंधी? ऐक्टिंग संबंधी? क्या ऐक्टिंग में एक्सपोज़ करेंगी? करेंगी तो किस हद तक।

पच्चीस मिनटों में ये सभी सवाल-जवाब खत्म हो गये। इस दौरान चपरासी पहले पानी, फिर बढ़िया टी-सेट में चाय रख गया। बीच में कई फोन सुने और सिगरेट उसने फूके। नीमा ने बातों-बातों में उसे बता दिया कि वह कई वर्षों से उसकी जर्बदस्त फैन है और उसके निर्देशन में काम करने को तत्पर है। सुनकर वह मुस्कराया। वही सीरियल जैसी रहस्यमयी मुस्कराहट।

“काम से पहले घूमने चलेंगी?”

वह कुछ देर खामोश रहा, फिर हाथ में पकड़ी सिगरेट उसे देते हुए बोला, “ऐश-ट्रे में बुझा दो।” उसकी मुस्कराहट और भी गहरी हो गयी। नीमा का दिल ज़ोर से धड़का। इतने ज़ोर से कि वह अपने दिल की धड़कन सुन सकती थी।

“चलोगी? हूं?”

गहरी, मोटी, सैक्सी ‘हूं’ और एक सवाल।

“क्यों?”

आवाज़ उसके गले में फंस गई। उसे कुछ सूझा ही नहीं कि क्या कहें?

“खाना खायेंगे एक साथ?”

“फिर?”

“फिर? जो तुम कहोगी?”

वह मुस्कराया। मुस्कराने से उसकी आंखें और भी नशीली हो गई।

“रात रहना, सुबह चली जाना।”

उसने अपने घने बालों को दाहिने हाथ से झटका दिया। नयी सिगरेट सुलगाकर होंठों पे रखी। उसकी मुस्कराहट फैलती जा रही थी। वह शख्स जिसकी वह बरसों से फैन रही थी। वही डॉयरेक्टर उससे कुछ ही दूरी पर बैठा, उससे उसी प्रकार के बेहूदा और घटिया सवाल पूछ रहा था, जैसे अन्य पूछते रहते थे।

मगर मालूम नहीं, क्यों उसे गुस्सा नहीं आया और न ही घिन आयी। कड़वाहट से भी मन नहीं भरा। जैसे हमेशा होता रहा था, अन्य लोगों से बेतुके सवाल सुनते हुए। एक बार तो मन किया, कह दे, “अच्छा ठीक है। हां चलो, कहां जाना है?” उसका मन नहीं किया, मगर वह उठ खड़ी हुई। अब वह भी अधलेटा नहीं रहा। उठ कर तन कर बैठ गया। नीमा को कुछ सूझा ही नहीं कि क्या करे?

“चलती हूं” कह कर वह चलने लगी। उसे हाथ आगे बढ़ाया। बरबस ही नीमा ने भी हाथ आगे बढ़ा दिया। दोनों ने हाथ मिलाएं और बिछुड़ गएं।

“कब आओगी?”

नीमा ने शीशे का दरवाज़ा खोला। पूछा गया सवाल कमरे से निकल, उसके साथ-साथ बाहर आ गया। कॉरीडोर से होकर लॉन पार कर, फिर मेन गेट से बाहर आ….बस स्टॉप और घर पहुंचने तक। यह क्या हो गया? वह उससे मिल कर आयी थी…? अभी भी भौंचक्की-सी वह घर में घूम रही थी और उसके साथ घूम रहा था वह सवाल….

“कब आओगी?”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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