कभी बुआ और फूफा जी बेटा से मिलने जाते भी तो बेटा को अपने कामों से फूर्सत नहीं मिलती और बहू को शैर-सपाटे और पार्टियों से । दोनों बच्चे मसूरी के हाॅस्टल में रहते थें । परायों की तरह वह दोनांे घर के एक कोने में पड़े रहतें । एक नौकर उनलोगों के देखभाल के लिए रहता । बच्चे घर पर होते भी तो उन्हें अपने गंवार दादा-दादी से मिलने की इजाजत नहीं थी । अब उस घर में स्मिता के मायके वाले का मान-सम्मन था । वे लोग अक्सर बुआ और फूफा जी की अवहेलना कर सिर्फ केशव का सम्मान करते ।
धीरे-धीरे बुआ का यह हाल हो गया कि बहू के बनाए सीमा रेखा के बाहर बैठी अतृप्त,तृषित मन से बेटा के आशातीत वैभव को निहारती रहती । जिस सुख की कल्पना में जी तोड़ मेहनत की थी, वे सारी इच्छाएॅं पूरी भी हुई, पर उसकी तासीर ही बदल गई । उन्हें ही बेटा की जिंदगी से दूध की मक्ख्ी की तरह निकाल कर फेक दिया गया । फूफा जी के अचानक हार्ट अटैक से मृत्यु के बाद बुआ ने बेटा के पास जाना ही छोड़ दिया । उन्हें खामोश रहना ही सही लगा । बुआ से ही नहीं हमसबों से केशव की दूरी काफी बढ़ बई थी । उसके सारे पुराने दोस्त उससे अलग हो गएं । बरसों बाद वह आज शायद एक बार फिर टुटी कड़ियों को जोड़ने निकला था ।
मैं उसके लिए उसकी पसंद की कचैड़ी और चटनी लेकर आई तो उसकी आॅंखें चमक उठी । मेरे कहने के पहले ही प्लेट उठा कर खाने में जुट गया । खाना समाप्त कर बोला ‘‘ दी आपको अभी भी मेरी पसंद याद हैं । ’’
‘‘ बहन हूँ तुम्हारी, कैसे भूल सकती हॅू ? ’’
वह पहले की तरह खिलखिला कर हॅंस पड़ा । फिर देर तक बैठा इधर-उधर की बातें करता रहा । तभी अचानक ही पूॅंछ बैठा-
‘‘ दी३ नंदिनी कहाॅं है ? उसकी शादी कहाॅं हुई ? मैं उसे नेहा की शादी में बुला लूॅ ’’
मैं उसकी बाते सुन स्तब्ध रह गई । अपने पहले प्यार को वह आज तक भूला नहीं पाया था ।
‘‘ वह तो पटना में ही हैं । यही के एक काॅलेज में पढ़ाती हैं । पर उसने शादी नहीं की हैं । तुम उससे ना मिलो वही अच्छा हैं ’’ ।
मेरी बाते सुन उसका चेहरा काफी निरीह हो आया था । वह निर्वाक चुपचाप बैठा कुछ देर तक मुझे देखता रहा, फिर धीरे से उठकर चला गया । शादी के दिन मैं जरा पहले ही पहुॅंच गई । केशव ने पटना का एक प्रसिद्ध होटल बुक किया था । अंदर घुसते ही स्मिता से सामना हो गया । वह बेहद खुश नजर आ रही थी । मुझे देखते ही गानेवालियों को सुना कर बोली- ‘ बुआ देर से आई हंै ,कुछ चुन-चुन कर गालियाॅं सुनाओं ’’ ।
एक हॅंसी का दौड़ गूंज उठा । मायके के इसी मिठे नोकझोक के लिए ही तो किसी भी लड़की का मन मायके के गंगोत्री में डूबकी लगाने के लए बेचैन रहता है । साथ लाए उपहार को स्मिता को सौप कर मुड़ी तो निशा से नजरे चार हुई । फिर तो उस भीड़-भाड़ में भी एक एकांत कोना ढूंढ़ हम दोनों बातों में मशगूल हो गए थें ।
तभी मुझे याद आया …..
‘‘ अरे३निशा शाम होने वाली हैं, कितने ही शादी केे विधि बाकी होगंे । चल-चलकर हमलोग मिलकर उसे पूरा करवाते हैं । ’’
‘‘ बैठो न दी३ कैसा विधि विधान यहाॅं कुछ नहीं हो रहा है । एक बार शादी के समय ही पंडित जी को जो विधि करवाना होगा, करवा देगें । ’’
‘‘ अभी तक बुआ की आवाज सुनाई नहीं देे रही हैं । सभी की शादी में तो सारी रश्में वही पूरा करवाती थी । पर आज कहाॅं हैं ?
‘‘ अम्मा आई कहाॅं है जो रश्में निभायेगी । उसे तो भैया-भाभी मंुबई में ही छोड़ आए है । भाभी का कहना है, वह काफी कमजोर हो गई है, विवाह में आती तो भीड़ भाड़ में कौन उन्हें सभालता । ’’ बोलते-बोलते निशा की आंखें भर आई थीं।
थोड़ी देर तक हमदोनों बहनो के बीच गहरा सन्नाटा पसरा रहा । एक अनकही घनीभूत पीड़ा का एहसास हमदोनों के बीच पसरने लगा था ।
तभी वहाॅं स्मिता आ गई थी । ‘‘अरे३दी आप तो आज बहुत सुंदर लग रही हैं पर गहने आपके वही आउटडेटेड डिजाईन वाले है । समय बहुत बदल गया है, कुछ नये गहने बनवाईये । ’’
वह हॅंसते हुए चली गई और निशा भुनभुनाते लगी ।
‘‘ दी३आपने भाभी को देखा । जरा सा मौका मिलते ही हमारे उपर गंवार होने का लेबल लगा कर चली गई । तभी जाने कहाॅं से घूमता-फिरता केशव आकर बैठ गया । ‘‘ मेरी व्यवस्था कैसी लगी दी…. । ’’
‘‘ बहुत सुंदर । तुम तो शुरू से ही हर काम व्यवस्थित ढंग से करते हो । कही कभी कोई गलती नहीं करते । ’’
‘‘ जीवन का सबसे महत्वपूर्ण फैसला ही तो गलत हो गया दी । काश । उस दिन मां के गलत मांग को नहीं मानता, तो आज मेरे सारे रिश्ते खोखले नहीं होते, न ही इतनी जिंदगियाॅं बर्बाद होती ।अब तो बस यही विनती है कि अगर इस घर में तुम्हारे मान-सम्मान में कोई कमी रह गई हो तो तुझे माफ कर देना, कही न कही मैं मजबूर हूॅं । ’’
‘‘ मेरे मान सम्मान की चिंता तो तू मत ही कर, बरातियोंके स्वागत की चिंता कर । बहन हँू तेरी तेरे, दिल की सारी बाते समझती हॅू । हमदानों के रिश्ते परिस्थिति वस उलझ जरूर गए है पर टूटे नहीं हैं ’’ ।
थोड़ी देर में कई लोग केशव को ढूंढ़तेहुए,उसे लेने आ गए और वह अपनी भरी हुई आॅंखे पोछता वहाॅं से चला गया । उस दिन देर रात जब मैं शादी से लौट रही थी, मुझे यही लग रहा था कि जीवन में लिया गया एक गलत फैसला सब कुछ उलट-पलट कर रख देता है । सब कुछ पाकर बुआ का दामन खाली ही रहा । किसी ने ठीक ही कहा है ‘‘ जीवन की वर्तनी गलत हो जाय तो नंबर नहीं कटते, खुशियां ही कट जाती हैं ।
