Grehlakshmi Story: “ये लो तनख्वाह”,केशव ने अपनी पत्नी कल्पना के हाथ पर नोटों की गड्डी रखते हुए कहा
मगर कल्पना अपना मुँह फुलाए खड़ी रही, उसने हिक़ारत से उन मुट्ठी भर रुपयों को आग्नेय दृष्टि से देखा…
वह घर से बाहर बात टालने को निकल गया और जब लौटा तो गर्म समोसे का लिफ़ाफ़ा था हाथ मे,वो अपने शब्दों को भरसक मुलायम बनाते हुए बोला ये लो….,और एक कड़क चाय पिलाओ।
आज काम बहुत था दफ्तर में ,थक गया हूँ,जो खरीदना चाहो सो ले लेना तुम्हारा त्यौहार भी तो नज़दीक है
कल्पना चाय तो बनाकर ले आई मगर सिर्फ़ उसके लिये ,केशव उसके ख़राब दिमाग को भाँपकर भी मौन रहा।
मगर वह चुप न रही ,उसने तनख्वाह के पैसों को एक कागज़ पर ख़र्च के साथ लिखकर केशव की खिल्ली उड़ाना शुरू कर दिया।
ज़नाब ऐसे खरीदी करने को कह रहे हैं ,जाने कारूँ का खज़ाना धर रहे हैं मेरे हाथ में।
केशव उसका स्वभाव जानकर ही शांत रहते थे,उन्होंने धीरे से कहा,”देखो जो लेना चाहती हो वो ले लो ढ़ाई तीन हज़ार रुपये से ज्यादा न खर्चना।
ओह ….ये सुनकर तो कल्पना चोट खाई नागिन सी फुंकार उठी,और बोली पता नहीं लोग शादी ही क्यों कर लेते हैं अगर उनकी हैसियत ही नहीं होती उसके सपने पूरे करने की …
पता नहीँ क्योँ ऐसा कहते समय उसकी नज़र न तो प्रिया की मासूम आँखों पर पड़ी और न ही केशव के सूने गले पर…
केशव ने धीरे से कहा ,कलपू प्रिया सुन रही है…
तो सुने न उसका भाग्य भी यही है ,अच्छा है उसे आदत रहेगी,हर त्यौहार किलसकर सिसककर करना ही मेरी नियति है।
और औरतों को देखो ,बाज़ार करते करते साँस फूल जाती है त्यौहार तक ,एक मैँ हूँ,जिसे पति के नाम पर मिट्टी का माधो मिला है।
तैयार हो तो बला से न तैयार हो तो बला से …
अरे तुम्हें जितना माँगती हो दे तो देता हूँ ,केशव ने बात सँभालते हुए कहा …..
तो वो रूपल्लियाँ तुम्हारी ही गृहस्थी की भेँट चढ़ जाती हैं।
पहली बार केशव के माथे पर क्रोध को जब्त करने वाला पसीना आया…
वो जोर से बोला….कल्पना कभी मैंने तुम्हारी मेहनत को कम आँका ,जो तुम मेरी कमाई को बढ़ती बच्ची के सामने ज़लील कर रही हो…
तो क्या करूँ तुम्हारा रोटी ही तो खिलाते हो ,बदले में मैँ भी घर मे मेहनत करती हूँ…
हम मध्यमवर्गीय है और हमारी गाड़ी ऐसे ही बचे खुचे अरमानों से चलती है
मगर चकाचौंध की दीवानी कल्पना लड़ते लड़ते यह भूल बैठी कि वह अनजाने में पति के स्वाभिमान को भी बुरी तरह से चोट पहुँचा बैठी थी वह शुरुआत से ही पहनने ओढ़ने की शौक़ीन थी।
और इस सनक में उसे भले किसी का भी दिल दुखाना पड़े उसे सिर्फ़ अपने से ही मतलब होता।
शादी से पहले भी उसकी यही कोशिश रहती कि उसके जैसा कपड़ा किसी और के पास न हो,वरना वह पूरे घर मे कलह मचा देती।
उसकी दादी ने दबी जुबान में उसे कई बार समझाते हुए कहा कि मनुष्य का चोला रख कर अपनी ख़्वाहिश की चादर इतनी भी नहीं बढ़ानी चाहिये।
पर कल्पना ने अपनी दबंगई के चलते हर रिश्ता और उसका सम्मान ताक पर रख दिया,हर त्यौहार से हफ्तों पहले वह घर गृहस्थी के खर्च काटकर ख़ुद की साज सँवार पर अच्छा खासा ख़र्च कर डालती।
और लोगों के अच्छे अच्छे कमेन्ट्स वो चटखारे ले ले के पढ़ती और ख़ुश होती।
शुरुआत में जो केशव उसकी खूबसूरती का दीवाना बना फ़िरता था अब वह उसका सामना करने से कतराने लगा…
कारण था उन दोनोँ की बढ़ती हुई बेटी प्रिया,बड़ी बड़ी आँखों वाली प्रिया ,सामान्य बच्चियों की तरह ही थी,बस पिस जाती कल्पना के अहम और केशव की चुप्पी के बीच..
केशव को लिहाज़ लगता कि कहीँ प्रिया उसे एक कमज़ोर पिता न समझे,एक पुरुष होने
वह उसे ख़ुश रखने का जितना जतन करता उसकी ख्वाहिशें उतनी ही उछाल मारने लगतीं।
धीरे धीरे उसे भी समझ मे आने लगा उसका रवैय्या।अब जो समय वह उसके साथ प्रेम से गुजारता था ,वह बाहर गुजरने लगा,
हाँ समय काटने की गरज़ से वह बाज़ार में ही नौकरी के बाद एकाउन्ट का काम देखने लगा,घर जाता तो बस खाने और सोने के लिए।
धीरे धीरे उसने अपना कमरा अलग किया और खाने सोने से ही वास्ता रखने लगा घर में …मगर शाम को आया।
तो एक खूबसूरत महँगी साड़ी हाथ मे लेकर और प्रिया को आवाज़ दी माँ को दे आओ,प्रिया लेकर गयी तो उसके अन्दर एक मंगलसूत्र भी था ,जिसे देखकर कल्पना तो निहाल ही हो गयी….
उसने केशव की मनपंसद खीर प्रिया के हाथ से भिजवाने की कोशिश की मगर उसने ठंडेपन से मना कर दिया….
खैर उसे न कोई अंतर पड़ना था औऱ न पड़ा वह अपनी धुन में मस्त रही,उसकी सारी तैयारियाँ पूरी थीं त्यौहार में भी ज्यादा समय न बचा था।
मगर तीन दिनों से केशव की उसे शक़्ल भी देखने को न मिली थी,उसे कुछ बेचैनी तो हुई फिर सोचा सब कुछ ठीक तो हैं नहीं बोल रहे न बोलें …
अपनी मर्ज़ी की सभी तैयारियों से सन्तुष्ट हो कर वह पूजा कर चुकी थी।,पर आज केशव को तो देर भी हो गयी थी घर लौटने में अब उसे बुरी तरह घबराहट होने लगी रात के बारह बजे थे ,
उसने त्यौहार की सब तैयारियां कर लीं थीं,पूजा भी अकेले ही करनी पड़ी,सब कुछ तो उसके मन का था ,मगर अब उसे केशव के बिना कुछ सुहा नहीं रहा था।
,उसने प्रिया से कुछ पूछने की कोशिश की मगर वो चुप लगाकर चली गयी।
घरवालों ने भी उसे कुछ न कहा बस उसे कुछ ऐसा लगा की सब उससे कुछ छुपा रहे हैं ।
थोड़ी देर बाद उसने रिक्शे पर केशव को उसके सहकर्मी के साथ बैठे देखा…वो सहम कर उधर दौड़ी तो उसने इशारे से उसे मना कर प्रिया को बुलाया और दवा देते हुए कहा।
इन्हें परेशानी थी आँखों मे और सड़क पार करते समय एक्सिडेंट हुआ था और बेहोश हो गए ,पर भाभी को बताने को मना किया था
ड्रिप चढ़ी है और कोशिश करना कि तनाव न हो ।
केशव कल्पना की तरफ़ मुँह फेरकर सीधे अपनी माँ के कमरे में जाकर लेट गया….
अब कल्पना से ये बेरूख़ी भी सहन नहीं हो रही थी ,वो व्यग्रता से उनकी ओर लपकी।
मगर केशव ने अपनी जेब से एक पुड़िया निकालकर कमज़ोर आवाज़ में कहा,प्रिया इसे अपनी माँ को दे दो।
नहीँ चाहिये मुझे वो जोर से रोने लगी, ये क्या हो गया है आपको, पहले भी मैंने बहुत मनमानी की मगर आपने कभी ऐसे दिल पर न लिया…
क्या करता कल्पना जब तुम कुछ सुनने को राजी ही न थीं तो क्या कहता और क्या सुनता ,तुम्हारी आँखों पर चढ़ी चकाचौंध और बाज़ारवाद की पट्टी ने ही तुम्हें बुरा बनाया है मैंने नहीं…
तुम्हें ख़ुश रखने की कोशिश में मैँ अपनी ज़रूरत तो पीछे ही करता गया,मगर तुम अपने गुस्से के आगे कुछ देख ही कहाँ पाई।
देखा जी,मगर बहुत देर में नज़र पड़ी मेरी …डॉक्टर के पर्चे में लिखा था कि आपकी आँखों का ऑपरेशन ज़रूरी है,कोई और होती तो शायद अपनी गृहस्थी बचाती।
मुझ मतलबी ने न आपके आँसू देखे,और न आपका मौन,बस भगवान से यही मनाती रही कि सब ठीक हो ।
जो बात आप मुझे कहकर न समझा पाये वो सब बातें मुझे आपकी बेरुखी ने समझा दीं।
“दुलहिन! दाम्पत्य की असली सुंदरता एक दूसरे का साथ देने में है,ये सिन्दूर का नाता तुम दोनों के मध्य एक दूसरे की सुरक्षा हैं”,केशव की माँ ने कहा
तुम घर मे हो तो ये बेफ़िक्र है,और ये ठीक है तो तुम सुरक्षित हो,ये लाल रँग न हो तो सब फ़ीका है,देख तो रही हो मुझे…और कल्पना ने सहम कर कहा…
अम्मा जी और प्रिया के पापा ,मुझे मेरी नादानी के लिये माफ़ कर दीजिये ।
सच्चे दिल से शर्मिंदा हूँ,और मुझे हो सके तो तू भी माफ कर दे प्रिया।
क्योंकि एक माँ सब बर्दाश्त कर सकती है अपनी सन्तान की नज़र में गिरना नहीं..
मम्मी मुझे पता था कि आप दिल की बुरी नहीं हो वो धीरे से बोली….
तब तक उसकी दादी ने कहा अरी लाड़ो,जाकर एक प्लेट में मिठाई ला तेरी मॉं के लिये,कुछ अच्छा हो तो मीठा खा लेना चाहिये
और प्लेट मेज पर रखकर दोनोँ बाहर निकल गयी
अब कमरे में केशव और कल्पना अकेले थे, उसने हाथ जोड़कर कहा,सुनिये जी ,माफ़ कर दीजिये मुझे….
समझ मे आ गया है कि मेरा असली गहना ,सिर्फ़ आप हो मेरा सिन्दूर,पता है अकेले पूजा करते समय सब था मेरे पास और सब बेकार लग रहा था …आपके बिना,लग रहा था बस किसी तरह आपको देखूँ तो सुकून पाऊँ….
मन में बड़े बुरे ख्याल आ रहे थे कि आप सकुशल हो सब ,अब कभी जिद नहीं करूँगी
कोई बात नहीं..जब जागो तभी सवेरा मुझे पता था कि देरसवेर तुम भी समझोगी ही..
लज्जित कल्पना की समझ मे नहीं आ रहा था कि प्रिया अपनी बेटी से ही वो किस तरह आँखे मिलाये।
केशव.”कल्पना जिद करना गलत नहीं,मगर परिस्थितियों को समझ कर काम करने के परिणाम बुरे होते है।तुम्हें ख़ुश रखना हमारा फ़र्ज़ है।
हाँ जी , सबकुछ वैसा ही आपके घर सकुशल आते ही सिन्दूर की लाली पूरे घर में दौड़ गयी है सुरक्षाचक्र की तरह।
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