is jungle mein
is jungle mein

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

आज कॉलेज से लौटने के बाद अदिति बहुत अनमनी थी। भोजन की टेबल पर पिताजी ने पूछा था कि ‘अदिति क्या बात है बेटा, उदास क्यों हो…?

‘कुछ नही…।’

“अरे हां, आज तो तुम्हारे कॉलेज में सलमान खान आने वाला था। अखबार में तो छपा था…कोई कार्यक्रम था न…?

‘हां…। अदिति अब भी संवाद के लिए उत्सुक नहीं थी।

उसकी मां ने संवाद में प्रवेश किया, ‘आजकल यह बहुत चुप रहती है… खाना भी ठीक से नहीं खाती…।’

“ठीक है…।” पिताजी ने अदिति की ओर देखा। उन्हें लगा कि अदिति की आंखों में कुछ भीतरी संवाद, उलझन और बेचैनी है। उसकी पीठ पर एक थपकी देते बोले, “कोई बात हो तो बोलो बेटा…।”

उनका ‘बेटा’ कहना इतना स्नेह भरा होता कि वह सारी दुनिया छोड़कर उन पर न्योछावार हो जाती, “पापा, आज कॉलेज में सलमान खान आया था… आपने ठीक कहा, आज जोरदार भाषण दिया उसने…। बिना डायलॉग के …सूट भी बड़ा सोबर रंग का पहन रखा था उसने…।

“हूँ…।” पापा की निगाहें अदिति के पूरे अस्तित्व पर छा गई। पर अदिति ने पलक भी नहीं झपकी। वह कुछ कहना चाहती थी। पापा ने भांप लिया। ‘फिर, कैसा रहा कार्यक्रम?”

हिंदू कॉलेज, इस महानगर का अत्यंत चर्चित कॉलेज। हर बात के लिए, खुलापन और होशियारी, कॉलेज का पूरा रोड लड़के-लड़कियों से सराबोर। कई लड़के-लड़कियां खड़े वाहनों पर बैठे दुनिया-जहान की बातों में मग्न। भीतरी परिसर में लगे पेड़ तो शायद युगलों को ओट देने में ही कृतार्थ हो रहे थे। पर अदिति सीधे अपनी क्लास में जाती है और खाली समय लाइब्रेरी ही उसका ठिकाना होता है। सबसे हाय-हैलो… न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।

कोई अच्छी-सी किताब अपने नाम चढ़वाकर वह लाइब्रेरी से बाहर आ रही थी कि अचानक गोली चलने की आवाज। कोई पटाखा समझकर उसने ध्यान नहीं दिया। पर किसी लड़की को चीखती देख उसका ध्यान सामने गया। एक भगदड़-सी मच गई। कोई कुछ देख पाता, कर पाता इतने में दो गोलियां और चलीं। लड़की पहले ही ढेर हो चुकी थी। दूसरी बार गोली लड़के ने अपने आप पर चलाई थी और वह भी उस लड़की पर ढेर हो चुका था। ये दोनों अदिति के क्लास के तो नहीं थे। पर हिंद कॉलेज के ही थे, उस बड़े नीम की ओट में उन्हें बहुतों ने कई बार देखा था। लड़के के पास पिस्तौल और लड़की के हाथ में कार की चाबी थी। दोनों संपन्न और संभ्रांत… बातें, अफवाहें, एंबुलेंस, पत्रकार, अखबार…समाचार और समाचार…क्या हुआ कल की ‘दोस्ती’ का…भाषण का …तालियों का फर्क सिर्फ इतना था आज की करता एकतरफा नहीं थी। लडके ने स्वयं को भी नहीं बख्शा था।

अदिति की स्प्लैंडर अपनी पूरी गति से घर की ओर भागी थी।

बस मां को इतना ही बता पाई, “एक लड़की को गोली से मारकर खुद भी मर गया एक लड़का।”

शाम को पापा आए। घटना की तह में जाना चाहते थे वे, पर अदिति की आंखों की सूजन में उन्हें रोक दिया। कितनी संवेदनशील है…अदिति।

दूसरे दिन अखबारों में पूरी रिपोर्ट। दूसरे अखबार से तीसरे में अधिक ब्यौरा, संपादकीय, पुलिस की आयोजन। कि
सी ने यह भी कहा कि आजकल इकलौती संतानों में एकाधिकार की भावना सब कुछ अपने हाथ में समेट लेना चाहती है। तुम मुझे न चाहो तो …मैं तुम्हें चाहने लायक ही नहीं छोडूंगा…। अब शायद देवदास बनने…गीत लिखने में क्या रखा है। इस पार या उस पार -सब फास्टफूड की तरह…।

अदिति इन सारी घटनाओं को लेकर बेचैन थी। इसी बीच उसे मालूम हुआ कि वह इसी साल से मतदान कर सकेगी। एक अजीब-सा रोमांच था उसके मन में। क्यों? राजनीति में उसकी कोई रुचि नहीं थी … फिर क्यों? शायद जिम्मेदारी का भाव रहा हो… अब वह बड़ी हो गई है। उसका ख्याल, विचार, विचार यानी कि ‘मत’ भी कोई-न-कोई मतलब रखता है। पर वह जो माहौल देखती और अखबारों में नेताओं, मंत्रियों की करतूतें देखती-पढ़ती है, उससे तो उसे दो ही तरह के लोग दिखे। एक क्रूर, छल-कपट लिए हुए और दूसरे मसखरे…इनके छोटे रूप उसने कॉलेज के चुनाव में भी देखे थे… पर उसने हमेशा किसी-न-किसी का पक्ष लिया था- चुपचाप …निरपेक्ष।

अब जब चुनाव आए तो वह अपने पिता जी से नये सिरे से चर्चा करने लगी। अपनी बात भी रखने लगी…।।

“इस बार आप किसे वोट देंगे?” अदिति ने चाय पीते हुए अपने पिता जी का ध्यान अखबार से हटाया जब तक वे प्रश्न फिर से ध्यानपूर्वक सुनने के लिए, ‘अं’ कहकर उसकी ओर निगाह दौड़ाते, अदिति की मां ने अदिति की आंखों में एक नई चमक देखी। सोचने लगी. यह सवाल वह मझसे भी पछ सकती थी, पर अदिति को मालूम है कि मां स्थितियों को बखूबी भांप जाती है। पिताजी की चर्चा से मालूम हो जाता है- इस बार ‘बीजेपी या कांग्रेस’…। उन्होंने आपस में इस बारे में कभी चर्चा नहीं की। पर दोनों ने एक ही पार्टी को वोट दिया। हालांकि वोटिंग के बाद भी इस बारे में बात नहीं करते। परंतु उनकी सामान्य बातों से यह उजागर हो ही जाता है। ये दोनों, इन दोनों पार्टियों से तीसरे पर विचार भी नहीं करते। उसने सोचा इस बार पापा से चर्चा की ही जाए।

“पापा… आपने कुछ नहीं बताया?

उसके पापा ने अखबार रखते हुए कहा, “कुछ पता ही नहीं चलता बेटा… सबकी नीतियां घुल-मिल गई हैं। सब धर्मनिरेक्षता का दावा करते हैं…। सब कभी इधर कभी उधर चले जाते हैं…।।”

“तो किसी तीसरे के बारे में क्यों नहीं सोचते?”

“क्या फायदा, चुनाव आते नहीं। एक वोट बेकार चला जाएगा। अरे हां, बेटा तो इस बार तू भी वोट देगी। तू क्या सोचती है? हम तो बहुत बार दे चुके …कभी संतोष नहीं हुआ। बदलकर भी देख लिया, पर कुछ नहीं बदला…।”

“पापा, नरेंद्र कौशल…?”

“वह तो अपक्ष है…वह कैसे आएगा…और राजनीति में उसका क्या दखल…राजनीति कोई खेल-तमाशा नहीं…।”

“इन नेताओं के व्यवहार से तो यह खेल-तमाशा से भी बदतर लगता है पापा…।” बोलने पर वह कुछ संभली। कुछ ज्यादा ही प्रतिक्रिया दे दी, वह भी दृढ़ता से।

“तू बिलकुलठीक कहती है बेटा… पर नरेंद्र कौशल के पास आदमी कहां हैं प्रचार के लिए…?

“क्यों अखबार हैं, टी.वी. चैनल है और पढ़े-लिखे लोगों की एक जमात है, वे सब प्रचार करेंगे ऐसे लोगों का। बदलती दुनिया के साथ यह भी बदलना चाहिए…।”

“एकदम सही है, तुम्हारा विचार अच्छा लगा।” फिर पत्नी को संवाद में शामिल करते हुए बोले, ‘देख अब तेरी बेटी सचमुच सयानी हो गई है। इस बार हम इसका विचार सुनेंगे…।’ इतना कहकर वे अखबार में खोने-से लगे। तभी बेल बजी और अंग्रेजी अखबार दरवाजे पर अटका मिला।

पापा का ध्यान तो अभी तक अदिति की बात पर अटका था। नरेंद्र कौशल …आदमी तो लायक है, साफ-सुथरा भी… पर अदिति को कौन समझाए ये अखबार किनके हैं। किनके लिए ये लिखते हैं। टी.वी. चैनल पर समाचार-प्रचार किनके आते हैं और वे पढे-लिखे समझे जाने वाले लोग किस दनिया में रहते हैं, पर यह सब कहकर अदिति की नई ऊर्जा, नये विचारों या उत्साह को आहत नहीं करना चाहते थे…शायद वह सही भी कह रही हो…कई नये लोग ऐसा सोच रहे हो…। उनकी विचार श्रृंखला फिर अदिति की आवाज से टूटी, ‘पापा ये देखिए कितना बड़ा लेख आया है कौशल पर।”

“आई.ए.एस. अफसर था वह। अच्छा वक्ता भी है। आला अफसर होने के कारण मंत्रियों के स्तर की सारी बातें जानता है। नीतिगत मतभेद होने के कारण उसने इस्तीफा दिया और अब चुनाव में खड़ा है…।” अदिति ने अखबार पापा की ओर बढ़ा दिया।

उसके पापा ने सोचा- अदिति ने तो फैसला कर लिया। अपनी पत्नी की ओर देखा और पाया कि उधर भी कुछ बात समझ में आ रही है। स्वयं भी सोचा शायद अदिति सही कर रही है। परिवर्तन कभी-कभी दबे कदमों से भी आ सकता है।

पापा लेख पर नजर घुमाते रहे। उन्हें मुख्यमंत्री के कौशल के मतभेद की समाचार कथा याद आती रही। पर यह सब गौण था। अदिति के विचार अपने हैं, वे और मजबूत हों इसलिए कौशल की अच्छी बातें भी गिनाने लगे, जो इस लेख में नहीं छपी थी। बस मां के लिए अब तीसरा विकल्प एकदम साफ हो गया था। वे मुस्कराकर अदिति के चेहरे से होती हुई किचन की ओर बढ़ गई- नाश्ते की तैयारी के लिए।

फिर अदिति की खुशी का ठिकाना न रहा, जब कई बुद्धिजीवियों ने कौशल के पक्ष में बयान दिया। पोस्टर छपे, सभाएं हुई। उसके प्रिय अभिनेता चंद्रचूड़ ने प्रचार में आना स्वीकार भी कर लिया। अखबारों में रोज कुछ-न-कुछ छपता रहा। अदिति का विश्वास बढ़ता गया। पर वह किसी सभा में नहीं गई। चुनाव का उत्साह केवल मतदान तक था। कौशल के अन्दर सभी को शुभकामनाएं लिखकर भेजने की इच्छा उभरी थी। पर वह वैसा नहीं कर पाई।

आज सुबह जब पापा कुछ देर से उठे तो देखा अदिति अखबार पढ़ चुकी है और अपने कमरे में चली गई है। पत्नी से पूछा, मालूम हुआ कि अखबार ही हेडलाइन देखकर ही अखबार पटक दिया। मुंह से एक ही शब्द फूटा था, ‘यू टू..।”

उसके पापा उसके सामने थे। पापा ने देखा, अदिति के हाथ में ‘फाउंटन हेड’ उपन्यास है। दो महीने पहले उसके जन्मदिन पर उन्होंने ही दिया था।

अदिति की आंखें बुझी हुई थीं। उत्साह धूमिल हो गया था, स्वर बोझिल था, “पापा अब बताइए… आज नरेंद्र कौशल ने अपना नाम वापस ले लिया… ये कौन-सी राजनीति है। हमारे कॉलेज के अधिकांश लोग कौशल का प्रचार भी करने लग गए थे…बेकार है सब…।” और वह रुआंसी हो गई।

“नहीं बेटा … इतनी जल्दी निराश नहीं होते हैं। अब अखबारों में आएगा सब। पढ़ों, फिर तय करो।” पापा उसे संवारने लगे। बात भी इतनी कोई व्यक्तिगत रूप से गंभीर नहीं थी। लेकिन वे अदिति के किसी भी विचार, सपने को टटता नहीं देख सकते थे। वे एक कंपनी में ऊंचे पद पर हैं। उन्हें कल शाम को ही मालम हो गया था कि कौशल नाम वापस ले रहे हैं। अफवाह यह भी सनी थी उन्होंने कि नाम वापस लेने के लिए कौशल को एक बड़ी पार्टी ने तीस लाख रुपये दिए हैं। पर कहने वाला हमेशा अफवाह में विश्वास रखता है। इसीलिए उन्होंने इस बात पर भरोसा नहीं किया। यह सब अदिति को बताने का कोई मतलब भी नहीं था।

पर एक परिवर्तन उन्होंने देखा। अदिति ने इस विषय पर पापा से चर्चा करनी छोड़ दी थी। पापा ही यदा-कदा इस विषय पर उसे खींच लेते थे। मतदान के दो दिन पहले शाम को अचानक ही पापा ने पूछा था, “मतदान की तैयारी कर ली बेटा…।”

“तैयारी क्या करनी है? जिसको वोट देना था वह भाग गया… रणछोडदास… पर हां पापा, एक डॉक्टर हैं। उसका बायोडाटा अखबार में पढ़ा था। पढ़ी-लिखी हैं. यवा हैं। गमनाम हैं तो क्या हआ. पर वह कछ ठीक काम कर सकती हैं…।” कहते-कहते उसका उत्साह अचानक ठंडा पड गया।

“सही कहा बेटे। नये लोगों को भी मौका मिलना चाहिए।” पापा रुक गए। अदिति महसूस करती रही कि केवल मन रखने के लिए ये ऐसा की रहे हैं।

मतदान के दिन सात बजे ही अदिति तैयार हो गई। पापा से कहा, “मैं जा रही हूं, मतदान के बाद मानसी के साथ खंडाला जाने का कार्यक्रम है। शाम तक लौट आऊंगी।”

मां कुछ कहना चाहती थी, पापा ने रोक दिया। वे कहना चाहते थे, मतदान करने साथ-साथ जाएंगे। फिर तुम आगे चली जाना। पर उन्होंने इतना ही कहां, “नाशता तो कर लो।”

“नहीं, मैंने चाय पी ली हैं। मानसी के घर और दो सहेलियां आएंगी। वहीं नाश्ता कर हम आगे जाएंगी। पांच बजे से पहले लौट आएंगी।”

मां ने फिर अपने आपको रोका। केवल अदिति को देखती रहीं। अपनी ही बच्ची का छरहरा बदन उसे बडा मोहक लगा। रोक नहीं पाई। “अदिति बेटी, संभल कर …फोन करती रहना।”

स्थिति संभालते हुए पापा ने कहां, “चिंता की कोई बात नहीं हैं। पुणे से खंडाला तक रास्ता किसी शहर-सा ही लगता है। एक मिनट के लिए रास्ता खाली नहीं रहता।”

अदिति ने पापा की आखों में झांका। विश्वास तो था बहुत गहरा। साथ ही चिंता भी थी, पर शब्दों में उन्होंने झलकने नहीं दिया।

बाल्कनी से मां-पापा ने देखा, अदिति कितने विश्वास के साथ ‘स्प्लैंडर’ पर सवार, दूर नजर गड़ाए, तनकर तेज गति से आगे बढ़ गई।

मां-पापा अदिति के बारे में ही बातें करते रहे। बड़ी दृढनिश्चयी है और संतुलित भी। बड़ी सक्रियता से वह अपनी बातों के साथ जुड़ी रहती हैं। इंवाल्वमेंट हर काम में, पूरी पहल के साथ।

अदिति के बारे में बातें खत्म ही न होती उन दोनों की। उन्होंने मतदान किया और पैदल ही घर की ओर चल पड़े। इस बार का मतदान भी कैसा सूना-सूना रहा। लौटने पर भी उन्होंने इस विषय पर बात नहीं की। ऐसा पहली बार हुआ था।

घर लौटने के बाद दोनों ने तय कर लिया कि आज बाहर कहीं नहीं जाएंगे। केवल टी.वी. पर समाचार सुनते रहेंगे। एक नयी किताब अदिति लाई थी। उसी में आज का समय देना तय था।

लगभग दस बज रहे होंगे सुबह की बेल बजी, अदिति तो नहीं हो सकती?

अदिति के घर पर न रहते हुए बेल बजते ही उनके भीतर अदिति साकार हो जाती है। पर अभे कौन होगा? वे उठे, दरवाजा खोला तो सचमुच अदिति और साथ ही मानसी थी।

अदिति के चेहरे पर किसी दुर्घटना के निशान स्पष्ट झलक रहे थे। पापा के कुछ पूछने से पहले ही वह बोल पड़ी, ‘क्या पापा, सत्ता के लिए लोग जानवर होते जा रहे हैं। उन्हें किसी की परवाह नहीं है। शहर से बाहर निकलते ही एक भीड़ हमने देखी इसलिए रुक गए। जीप पर तीन-चार लोग सवार थे। कुछ पंद्रह-बीस लोगों की भीड़ में से एक आदमी बाहर आया और उसने जीप पर सवार एक आदमी का सीना छलनी कर दिया। बाकी लोग जान हथेली पर लेकर भाग गए। केवल ड्राइवर जख्मी है। पर बता नहीं सकते…।’

‘हमने सुना है कि पिस्तौल चलाने वाला मंत्री था। उसने विरोधी पार्टी के आदमी से कुछ पूछा और गुस्से से अचानक गोली चला दी…। हम जल्दी से पीछे लौट आए…अदिति बहुत संवेदनशील है, इसलिए मैं घर तक आई. ..।’ मानसी ने कहा।

पापा ने आहत अदिति की ओर देखा। वह कुछ नहीं बोल पा रही थी।

पापा ने जिज्ञासा जताई। पर एक दहशतभरी चुप्पी छाई रही। थोड़ी देर में मानसी अपने घर चली गई।

तरह-तरह के विचार अदिति के चेहरे से झलक रहे थे। उनसे और भी कई बातें बताई कि भीड़ कितनी क्रूर, हिंसक और निर्दयी थी। शायद उन लोगों ने योजनाबद्ध ढंग से उस जीप को घेरा था। पापा के लोकतंत्र के बारे में समझाए सारे सूत्र अदिति के सामने उलझे पड़े थे।

दो घंटे बाद ही टी.वी. पर विस्तार से समाचार आ गए थे। वह दृश्य टी.वी. पर देखकर अदिति अब भी असमान्य हो जाती है। मंत्री को गिरफ्तार कर लिया गया था।

अदिति का खंडाला बीच में खंड-खंड़ हो गया था। पापा ने बहुत कोशिश की कि अदिति के मन पर इस घटना का विपरीत परिणाम न हो। वह उतनी ही निर्विघ्न, अकेली घूमती रहे। उसके उत्साह में यह घटना रुकावट न बने। अदिति वैसे इतनी कच्चे दिल की नहीं थी। पापा ने उसे और मजबूत बनाया था।

दूसरे दिन अखबारों में इस घटना के साथ और कई हादसों का ब्यौरा था।

अदिति पापा के साथ भी उतनी मुखर नहीं रही। घर में किताबें और कॉलेज में लाइब्रेरी या मानसी के साथ सामने के कैफेटेरिया में नयी पुस्तकों पर, घटनाओं पर चर्चा। वह अपने वर्तमान से उतनी ही सक्रियता से जुड़ी रही।

सुबह उसने अखबार में पढ़ा कि उसकी प्रिय लेखिका आज शहर की किताबों की मशहूर दुकान ‘इंटरनेशनल बुक शॉप’ में आ रही है। लेखिका के साथ इंटरव्यू है। आज उसे लगा कि वह सब कुछ पूछेगी, ‘जो-जो गुबार उसके भीतर उठते रहे हैं। पापा को उसके साथ आना ही था। उस लेखिका की पुस्तक पहले ही उसने खरीद ली है। उस पर लेखिका के हस्ताक्षर भी ले लेगी।’

उसे यह देखकर अच्छा लगा कि टी.वी. पर फिल्म और छुट्टी का दिन होने के बावजूद काफी लोग लेखिका को सुनने आए हैं। अदिति अपने पापा के पास सामने की कुर्सी पर बैठी थी। उसके व्यक्तित्व ने कई लोगों का ध्यान खींच लिया था- खासकर युवकों का। अधेड़ भी उसे नजरअंदाज नहीं कर पाए। कैमरे में वह लेखिका की विभिन्न भाव-मुद्राओं को संजो रही थी। तभी एक बुजुर्ग के सवाल ने उसे चौंका दिया। लेखिका ने उसका सवाल ठीक ढंग से सुना नहीं, फिर दुहराने का अनुरोध किया।

उस बुजुर्ग ने दुहराया, ‘मैंने आपकी सभी किताबें पढ़ी हैं। पुस्तकों में जो भी लिखा गया है, उस पर कइयों ने सवाल पूछा। अभी आपने बताया कि आप बच्चों और किशोरों पर पुस्तक लिखने की तैयारी कर रही हैं…।।’

‘बिलकुलठीक सुना आपने…आपको नहीं लगता कि बच्चों के लिए अच्छी किताबों की कमी है…।”

“है…।”

“तो…।”

“मेरा सवाल कुछ और है…।”

“बताइए…।”

“कुछ व्यक्तिगत भी है… अनुमति हो…?”

“पूछिए…।”

“आपने एक इंटरव्यू में कहा कि आपने मशहूर पत्रकार से शादी की है… आपकी मुलाकात विदेश में हुई और आपने वहीं शादी का निर्णय लिया…।”

“आपने आगे कहा है कि दुनिया की बढ़ती विद्रूपता को देखते हुए आप दोनों ने संतान न होने देने का निर्णय लिया है…।”

“बिलकुलसही पढ़ा आपने…।”

“फिर आप बच्चों पर कैसे और क्यों पुस्तक लिखने की सोच रही हैं?”

लेखिका ने कंधे उचकाए। कुछ ऐसे भाव चेहरे पर उभरे कि यह भी क्या सवाल है? इसका रचनात्मकता से क्या संबंध है।

अदिति भी सोच रही थी लेखिका के काम, लेखन के इस निजी निर्णय का क्या संबंध होना चाहिए। लेखिका ने किसी अन्य प्रश्न के लिए इधर-उधर नजर दौड़ाई और आयोजकों की ओर मुड़ी।

आयोजक तैयार ही था। उसके कुछ घोषित करने से पहले अदिति खड़ी हो गई थी। इसलिए आयोजक ने कहा, अब केवल अंतिम सवाल की अनुमति होगी। और कुछ पूछना हो तो शॉप के भीतरी हिस्से में विस्तार से चर्चा की जा सकेगी।

अदिति ने कहा, “आपने अपनी नवीनतम पुस्तक में समाज-राजनीति की विद्रूप और भयावह स्थितियों का चित्रण किया है। ‘सत्या’, ‘अर्धसत्य’, ‘बांबे’ और ‘माचिस’ जैसी फिल्मों में हमने भयानक हिंसा, मारकाट और डरावने दृश्य देखे हैं। ऐसे ही रोंगटे खड़े कर देने वाले दृश्य मैंने अपनी छोटी-सी उम्र में पिछले केवल दो महीने से देखे-सुने हैं…।”

लेखिका गंभीरता से अदिति को देख और सुन रही थी। अदिति की तेज-तर्रार आवाज में परादर्शी आंखों से असलियत झरती अनुभव कर रही थी। केवल कहने के लिए खड़ी नहीं थी अदिति, उसकी भीतरी संवेदनाएं ठोस रूप ले चुकी थीं। लेखिका मुस्कराते हुए अपनी आँखों से डरते आगे बढ़ने की इजाजत दे रही थी।

“…मेरा कहना केवल इतना है कि हम रोज देख रहे हैं, उसे अखबारों में पढ़ते हैं, आपकी पुस्तकों में भी वही है। फिल्म भी उसी को और गाढ़ा घोल-मिलाकर दिखा रहे हैं…। तो मेरा कहना है कि हम जैसे लोग क्या करें? हम किसके पीछे जाएं, किसे अपना आदर्श मानें? कहीं कुछ ऐसा दिखाई नहीं दे रहा…।”

अदिति अपनी बात कहते हुए लेखिका को गौर से निहार रही थी। जब वह नीचे बैठी तो पापा ने कान में धीरे से कहा, “गुड।”

लेखिका ने कुछ क्षण नीचे निहारा। फिर श्रोताओं के बीच नजर घमाई और अदिति के चेहरे पर उसकी निगाहें टिक गई…। बोली, “क्या नाम बताया…?”

“अदिति।”

“अदिति, ऐसा है… हमने जो देखा… लिखा, स्थितियां बयान की। किसको क्या लेना है. यह बताना आवश्यक नहीं लगता मझे। बस एक ही बात लगती है कि हर आदमी को अपना आदर्श और अपनी दुनिया खुद तलाश करनी पड़ती है…।”

अपने वक्तव्य के बाद लेखिका ने अदिति पर एक नजर घुमाई। तभी आयोजक ने फिर कहा, “कोई बात और करनी है तो शॉप में की जा सकती है…समय की कमी के कारण हमें वहां रूकना होगा…।”

लेखिका उठी। अदिति भी उठी। दोनों ने एक साथ एक-दूसरे को देखा और अनौपचारिक मुस्कालें एकाकार हो गई, शब्दातीत। लेखिका के मन में अदिति के लिए गर्व और उम्मीद के भाव थे। अपने से आधी उम्र की लड़की में अपने जीवन की तलाश को लेकर वह प्रभावित भी हुई थी। अदिति ने गौर से देखा तो लेखिका की आँखों में बहुत गहरे उसकी अपनी मां के भाव उसे दुलार रहे थे।

कार्यक्रम के बाद लोगों ने ऑटोग्राफ के लिए लेखिका को घेर लिया। कुछ संपन्न लगने वाले पालक अपने बच्चों के साथ आए थे। पुस्तकें खरीदकर बच्चों को ऑटोग्राफ के लिए आगे धकेल रहे थे…। अदिति के हाथ में पहले से पुस्तक थी। उसने पढ़ा भी था उसे। कई प्रसंगों पर पापा से चर्चा भी की थी। ऑटोग्राफ देते हुए लेखिका ने इधर-उधर नजर दौड़ाई। पापा को लगा कि वह अदिति को ढूंढ रही हैं। बोले, “बेटा, आगे बढ़कर तू भी ऑटोग्राफ ले ले।”

पापा ने देखा- अदिति नयी पुस्तकों के स्टैंड को घुमा-घुमाकर पुस्तकें देख रही है। पर उसका ध्यान पापा के शब्दों पर था। इसलिए जब उसे हाथ से थपथपाकर आँखों से संकेत किया तो अदिति बोली, “ऑटोग्राफ बहत हो गए पापा, आज मैं कोई नयी किताब ले लू…?”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’