भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
आंखों में नींद का असर। उसे हटाकर कर्माबाई ने अपनी आंखें खोली। देखा तो सूरज महाराज देवरी में पधार चुके हैं। चारों ओर पानी का सागर हवा में डूब गया क्या? काला-काला आकाश। उसके नीचे पानी की दया पर मानो तैरता हुआ कमनसीब नया। हवा की लहर ने उसे उड़ा दिया और यह तो पानी में से मानो पर तेरी मां प्रगट हो गई क्या?…..
- “कैसा विचित्र सपना! करमाबाई ने अपने सपने को याद करने के लिए फिर से आंखें मूंद ली। लेकिन वह तूफानी सपना तो मानो हवा में गायब हो चुका था। हाय, गंगा जैसी पवित्र कर्माबाई का हृदय आज पागल बने हुए महासागर की तरह उछल-उछल कर छाती पर दबाव डाल रहा था। मानो चूहे को निगलने झपट मार रहे सांप की तरह की मृत्यु। ओह! करमा बाई ने अपनी छाती पर हाथ रखा। मानव उपयोगी हंस अभी ही देव को छोड़कर चला जाएगा। उसकी बाईं आंख फड़फड़ाने लगी और रात के सपने में खौफनाक दृश्य।
उल्लू की अपशुकन वाली बोली अभी भी कानों में मानो गूंज रही थी। मांस की नदी में। झपट मार रहे गिद्ध के चित्कार। वहीं पर मांस की बोटी खींच रही है लोमड़ी। कर्माबाई के कान में कील की तरह अभी भी घुस जाती थी। निस्तेज सूरज मौत का पैगाम लेकर डरा रहा था। हवा में रुदन था। वातावरण में प्रो कम था। पलंग में जम्हाई ले रही कर्माबाई रात के दृश्य को याद कर आंखें बंद कर देते थे, उसी वक्त उसके दिल में बैठा आत्माराम बोला था।
कर्मा तेरा बीस बरस का जवान बेटा मौका जी आज सरगापरी के मार्ग में चला जा रहा है।
- क्या कर्माबाई एकदम से खड़ी हो गई। उसने अपनी आंखें जब मिची। दूसरा सपना तो नहीं? और निंदर देवी तो करमा बाई को छोड़कर एक ओर खड़ी थी और क्या? कर्माबाई का धक-धक करता रहा। करमा बाई के गले में से चीख उठी।
- क्या है, क्या है? करमाबाई की भाभी सक-पकाई दौड़ती हुई आई और पूछने लगी- कर्माबाई भी का भाई भी भैंस को छोड़कर अंदर भाग आया।
- “वीरा जल्दी से सांड को तैयार करो। मुझे सारण को जाना है।” तेजी से सांस लेते हुए कर्माबाई ने कहा तो उसका भाई भौचक्का-सा रहकर बोला- “क्यों बहन ऐसा क्या है?”
- “वीरा! बात करने का वक्त नहीं रहा है। एक-एक पल एक जुग की तरह है। जल्दी से सांड तैयार करो। वरना मेरा हृदय भी उसके साथ ही चला जाएगा!”
- “लेकिन बहनजी कुछ समझ में आये, ऐसा तो बोलो!”
- “भाभी! तू मुझे रोके तो तुझे आई पथुमा की कसम। मुझे जाना होगा। वीरा! मुझे आज एक बेहूदा सपना आया है। मेरे मौका जी को लेने के लिए स्वर्गपुरी से परियां उतर आई है! लाल और नीले वस्त्र पहनकर!” ।
- “लेकिन बहन! सपने सच नहीं होते। इसमें इतनी तकलीफ करने की क्या जरूरत है? मैं सांड भेज कर भांजे को ही यहां बला लेता है। फिर चिंता की क्या बात?”
- “छोटे! मेरा रुदिया मुझे कहता है कि मेरा मौकाजी खाने के वक्त तक इस धरती पर नहीं होगा। मुझे जल्दी से जाने दे। देरी हो गई तो फिर दूरी रह जाएंगी। मेरे पास वक्त नहीं है।”
कर्माबाई की आंखें मानो अतीत को देख रही थी। उसी तरह वे दीवारों को ताक रही थीं। दीवार की एक-एक ईंट मानो मट्टी नहीं, विधात्री के काले अक्षर बन गए थे। कर्माबाई का भाई बुघेणु (दूध जिस पात्र में निकाला जाता है वह पात्र) लेने गया तो भैंस ने इस तरह से पैर मारा कि बुघेणुं गोबर में अटक गया। दूध जिस तरफ से ढल गया, यह देखकर कर्माबाई के भाई के दिल में भी शंका मजबूत बनी। सारे काम छोड़ कर वह सांड का प्रबंध करने चला गया।
- “कर्माबाई! थोड़ा बहुत खा तो लो।” इतने में तुम्हारा भाई सांढनी लेकर आ जाएंगे।”
“अरे मेरी भाभज!” तुम भी बड़ी उतावली। निकलते वक्त ऐसे अपशुकन वाले शब्द मत बोल! “अब तो पानी भी सारण के जाकर ही लूंगी। तब तक के लिए कुछ भी। यूं तो मुझे आई थायु की कसम।”
सांतलपर के पास के गांव चारणका में रोइडिया साख के चारण रहते थे। इन चारणों मे कर्माबाई जीती-जागती सती मानी जाती थी। पति की मृत्यु के बाद कर्माबाई ने संसार के सारे सुख छोड़कर मानव जीवित मृत्युवाला जीवन स्वीकार लिया था। दिन-रात भगवान के ध्यान में डूबी रहने वाली कर्माबाई अलख में एकाकार हो जाना चाहती थी। बड़े दिनों के बाद भाई के अति आग्रह के बाद वह पीहर में आई थी। अभी यहां पंद्रह दिन भी पूरे नहीं हुए थे, तब तो भावि ने उसे यकायक चारणका गांव की ओर खींचा।
करमाभाई तुरंत ही सांढनी पर बैठकर नगर पार कर के रेगिस्तान में उतरी। तब सूरज महाराज पूर्व के कुएं में से सलामत बाहर निकलकर आकाश की ओर रवाना हो चुके थे। नगर पार करने का रेगिस्तान आज कर्माबाई को लाखों योजन लंबा दिख रहा था और इतनी तेजी से दौड़ने वाली सांढनी का वेग भी उसे चीटियों का वेग दिखता था। दूर-दूर चारणका के वृक्ष देखने के लिए वह अपनी ठोडी ऊंची-नीची करती थी और सांढनी को निर्दयता से डांट रही थी। हाथ चक्की की आवाजें सुनकर मुर्गे भी सुबह की छड़ी पुकारने लगे। कम अजवास में गाय चराकर मौकाजी बाडे में आ पहुंचा।
“गंगा-जमुना!… रेवतीबाई! चलो, चलो! बहुत चर लिया! अब आपको आपकी जगह पर बांध दूं।” मुंह में से गायों के लिए प्रेम भरे शब्द निकालता हुआ मौका जी ने एक के बाद एक गाय को किले से टांग दी। गायों की पीठ पर दुलार से हाथ पसवार दिया और अपनी गायों को प्यार से देखता रहा। आंखों के भाव से मानो गाय भी मौका जी के चेहरे को भर देना चाहती हो, उस तरह अपने मालिक को देख रही। और मौका जी अपने घर की ओर रवाना हो गया।
मौका जी जब घर पहुंचा तो उसकी घरवाली अमुनाबाई खाने का प्रबंध कर चुकी थी और अपने पति की राह देख रही थी। दूध के साथ बाजरे की रोटी खा रहे मौकाजी ने आंख में से प्रेम का अमृत भरकर अपनी पत्नी की ओर देखकर कहा- “सारणी! आज तो मेरे हृदय में ऐसा हो सरहा है कि मां आई यहां हो तो कैसा?”
- “तो तुम पारकर जाकर मां से मिल लो। उनके दिल को भी कुछ राहत हो जाए और उन्हें लेकर भी आ जाओ!”
“लेकिन मेरे पास वक्त ही कहां है?”
- “तुम तो हर रोज बस ऐसे ही कहते रहते हो। जब तक जिएंगे तब तक वक्त तो मिलेगा ही नहीं। पर सारण, जिस दिन स्वर्गपुरी से विमान आएंगे उस दिन वक्त नहीं है, ऐसा बहाना नहीं चलेगा। अमुनाबाई ने ठहाके मारते हुए कहा।”
- “अरे, स्वर्गापुरी से बुलावा आ जाए तो अभी ही तैयार हूं।”
- “अरे-अरे, क्या बोल रहे हो? अभी तो बहुत सारे सपने बाकी हैं!”
- “तो फिर तुम ऐसा क्यों बोलती हो? हमें तो कई दिन जीना है, लेकिन जिंदगी देने वाले के हाथ में है! किस्मत में जो लिखा है, इतने दिन ही अनाज खा सकेंगे।”
- “सारण! मैं तुझे ऐसे ही सरगापुरी नहीं जाने दूंगी।” अमुनाबाई ने हंसते हुए कहा।
- “तब तो इंदर राजा भी तुम्हें पूछ कर पानी पीते होंगे का?” मौकाजी ने हंसते हुए कहा।
- “इंदर राजा नहीं जमराजा!”
- “हैं- जो भी हो” मौका जी ने हाथ धोते हुए कहा और अपनी पगड़ी से हाथ पूछ भी लिए और घर से बाहर निकला।
चौराहे पर जमा हुए लोगों के साथ बातों के तडाके मारकर मौकाजी जब घर आया तब उसके पेट में भयानक दर्द हो उठा और उसके मुंह से एक भयानक चीख भी उठी।
- “क्या हुआ? क्या है?” कहती हुई अमीना बाई दौड़ती हुई आई। मौका जी के पेट में बल पड गये थे। अमुनाबाई ने पलंग तैयार किया और मौका जी को सुला दिया।
-“क्या पेट पर हाथ फिराना है?” अमुनाबाई ने पूछा लेकिन वह जवाब दें, इससे पहले तो मौका जी के पेट में से काली चीख उठी। एक भयानक चित्कार के साथ वह खाट में ढह गया। खटिया के साथ टकराए सिर की आवाज भी उठी और मौका जी की आत्मा उसे छोड़कर सरगापरी की ओर आगे बढ़ गई। मौका जी के मुंह पर सफेद रंग के झाग उठे।।
- “हां-हां करती हुई अमुनाबाई उठी। दौड़ कर मौका जी के मृत शरीर से लिपट गई। किसी भी प्रतिकार के बिना हाडपिंजर हिल उठा। मौका जी की फटी हुई आंखों में जीवन खोजने के लिया अमुनाबाई ने अपनी आंखें भी खंता दी। कत्ते ने हाड-पिंजर को हिलाया। रगों के धबकार को भी देखने की कोशिश की। चेहरे की रेखाओं में अटक गई जीवन रेखा को खोजा लेकिन वह व्यर्थ था। जमुना बाई एक चित्कार के साथ गिर गई।
आसपास से दौड़ आए लोगों ने दो शव एक साथ देखें। सारस और सारसी को शायद वियोग होता होगा लेकिन अमुनाबाई और मौका जी को तो मौत की दीवारें को भी रोक न सकी। प्रेम का एक अद्भुत मिलन था।
चारणों का समूह उमड़ पड़ा। गांव के लोगों से सारा घर भर गया। चारों ओर रुन्दन था। लोगों के रुन्दन से मानो हवा भी ठहर गई थी। मौका जी के सगे-संबंधी की आंखों में से सावन-भादो बरस रहे थे। पत्थर दिल इनसान भी रो रहा था एक और चेह तैयार हो रही थी। लकड़ी भरकर बैलगाड़ियां मसान की ओर आगे बढ़ने लगी थी। चारण के गांव में मानो शोक ने अपना राज जमाया था। मौका जी की पार्थिव देह को नहला कर नए कपड़े पहना कर चेह में रखा गया था और ऊपर अभी कपड़े बांधने लगे थे कि सांढणी के गांगरने के साथ ही हांफते हुए गले से एक आवाज ऊठी“सबूर! मौका जी को बांधिए मत!” शव को बांधने लगे थे वे चारण, मानो पत्थर की तरह जड़ हो गए।
खप्पर जोगनी जैसी कर्मा बाई पैर पटकती हुई चेह की ओर धंस रही थी।
सबकी आंखों में एक ही सवाल था कि कर्माबाई यहां कैसे यकायक? अपनी आंसू भरी आंखों से सब लोग कर्माबाई को ताकते ही रह गए। उनके गले में से निकलती हुई सिसकियां गले में ही अटक गई। छाती पीटने उठ रहे हाथ भी जैसे के तैसे रह गए। मानव-मेहरामण मानो बर्फ-सा बन गया। करमाबाई ने नजदीक आकर मौका जी के शव पर से कपडा हटा दिया और फटते गले से बोली- “मौका जी! मेरी राह तो देखनी थी बेटे! मैं भी तेरे साथ ही चली आती बेटे। ऐसे ही कैसे जाया जाता है? एक बार तुझे जीते जी देखने की ख्वाहिश थी।”
कर्माबाई मानो बेहोशी में बोल रही थी। उसकी आंखें बंद हो गई। धीरे-धीरे उसका शरीर झुक गया। वह घुटने के बल बैठ गई। उसके होठों में से कुछ अनाप-सनाप शब्द निकल रहे थे और एक धब्ब जैसी आवाज हुई और उसकी देह मौका जी के ऊपर ढह गई।
चारणका के पादर से आज से 200 बरस पहले तीन चेह एक साथ जल रही थी। आज भी चारणका में कर्माबाई का तालाब है। तालाब के पास ही मौका जी, अमुनाबाई और करमाबाई के स्मारक हैं। जो इस कलयुग में भी इस सत्य की दास्तान कहते रहते हैं। हां, यह तो जिन्हें कान होते हैं उन्हें ही….
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
