hero ek love story
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

कहानी का हीरो बनने का सपना कौन नहीं देखता! हर आदमी को लगता है कि उसकी जिंदगी एक गजब की कहानी है। वह कहानी का हीरो है। यदि उसकी कहानी छप कर आ गई, तो तहलका मच जाएगा। दुनिया अपने दांतों से नाखून कुतरते-कुतरते उंगलियां तक चबा लेगी, वह किसी लेखक को ढूंढता है, कहानी के लेखक को। लेकिन सच तो लिखने वाले जानते हैं।

कहानी लिखना इतना मुश्किल काम है कि दुनिया वाले इसे काम ही नहीं मानते। जबकि ज्यादातर जिंदगियों की कहानियां फ्लॉप होती हैं। कोई पूछता नहीं उन्हें वही दुखड़े, वही रोना, वही घिसे-पिटे दृश्य, वही अंत, ऐसे में एक अच्छी कहानी लिखना! खुदा खैर करे। इन्हीं सारी बातों के बीच मेरे सबसे पक्के दोस्त सैफ के दिल में ‘कभी-कभी’ की तरह ख्याल आया, मेरी कहानी में हीरो बनने का, इस बार वह गंभीर था। उसे जबसे मैंने यह ‘स्टोरी’ बताई थी, वह इसमें हीरो बनने के लिए बावला था। चूंकि हमारी दोस्ती उतनी पुरानी है कि जब हम आपस में चड्डियां बदल लिया करते थे। इसीलिए उसकी इच्छा का मेरे लिए क्या महत्त्व होगा, यह सहज ही समझा जा सकता है। पूरी गंभीरता के साथ जब सैफ का इस कहानी में हीरो बनना तय हो गया तो मैंने उससे कहानी के ‘मुहूर्त’ पर पहुंच जाने को कहा, ठीक समय पर ताकि कहानी ‘हिट’ हो सके। कहानी के हीरो के तौर पर सैफ को ‘साइन’ करने का प्रश्न ही नहीं उठता था। कारण, हमारी दोस्ती और एक-दूसरे पर विश्वास।

आखिर वह समय आ ही गया, जब मुझे इस कहानी को शुरू करना था, लेकिन सैफू गायब! मुहूर्त सरपट घोड़े की तरह भागा जा रहा था। अपने पीछे गर्दो गुबार छोड़ कर। मुहूर्त निकल गया, तो कहानी का सत्यानाश निश्चित है। कोई संपादक-प्रकाशक छुएगा भी नहीं इसे। बिना लिफाफा खोले और पढ़े ही लौटा देगा। यदि किसी गरीब-गुरबे संपादक ने कहानी छाप भी दी, तो पाठक रद्दी न्यूजप्रिंट और दो-चार सौ के सर्कुलेशन वाली पत्रिका में इसे भला पढ़ेंगे भी? इससे पहले कि मुहूर्त का सरपट घोड़ा अपने ही गर्दो गुबार में गुम हो जाए, मैंने फैसला किया खुद ही हीरो बन जाने का। अपनी कहानी का खुद ही हीरो! किसी भी कहानीकार के लिए आग के दरिया में छलांग लगाने समान है यह कहना कि वही अपनी कहानी का हीरो है। लेकिन मेरी मजबूरी है। सैफ आया नहीं और मुहूर्त को मैं हाथ लगे बटेर की तरह निकल जाने देना नहीं चाहता। अतः प्रिय पाठक, आपसे निवेदन है कि कहानी का हीरो मुझे मान कर इसका रसास्वादन करें। भूल जाएं सैफू को। जो आदमी वक्त की कद्र नहीं करता, वक्त उसके साथ कभी वफा नहीं करता। सैफू के हाथ से हीरो बनने का सुनहरा मौका निकल चुका है और देखिएगा एक दिन उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। वह पछताएगा। खैर। उसके साथ दुर्भाग्य से हुई इस तुच्छ दुर्घटना को भूल कर, आइए हम-आप कहानी की रोचक दुनिया में प्रवेश करें।

प्लीज, जस्ट अ मिनट,

कहानी चूंकि एक अकेले शख्स के बस की बात नहीं है, इसीलिए मैं इसकी ‘स्टारकास्ट’ को स्पष्ट कर दूं। मुख्य भूमिका में मैं हूँ और प्रीतो है, जिस इमारत में रहता हूं, वहीं ऊपर रहने वाली। सहयोगी भूमिकाओं में हैं, मेरी मां और पिता जी, त्यागी जी यानी प्रीतो के पिता। गेस्ट एपीयरेंस है मिसेज सहाय का, जिन्हें मैं कभी ‘आंटी’ नहीं कह पाता हूं।

चलें, सीढ़ियां शुरू हो चुकी हैं।

नागिन-सी लहराती हुई जब प्रीतो चढ़ती, तो सीढ़ियां ऊपर को जाती और गिलहरी-सी फुदकती हुई जब वह उतरती, तो सीढ़ियां नीचे को आतीं।

उसे सीढ़ियों पर ऐसे देखना मेरे मन का उतना ही रोमांचक और आकर्षक लगता, जितना अपने चेहरे पर उगती हुई नई-नई मूंछ और दाढ़ी को आईने में गौर से निहारना। जब कभी प्रीतो का स्कर्ट हवा में थोड़ा लहरा जाता, तो उसकी गोरी टांगें घुटनों से ऊपर तक उघड़ जातीं। सपने और सच के दरम्यान अंधकार का एक संक्षिप्त विस्तार आँखों के आगे फैल जाता। उसमें बिजली कौंधती, गुलाबी बिजली! वह बिजली मेरी आँखों मे समा जाती।

आंखें बंद किए मैं देर तक थरथराता रहता। कच्ची टहनी-सा! आंखें खोलने में मुझे डर लगता। मुझे लगता कि मैं पसीने-पसीने हो रहा हूं। लेकिन पसीना नहीं आता। फिर शर्म का हल्का-सा एहसास मन में सिर उठाता। चोर नजरों से मैं देखता कि घर में किसी ने मुझे पकड़ तो नहीं लिया। जब मैं खुद को अकेला पाता, तो आश्वस्त होता। दिल को एक ठंडी राहत मिलती। यद्यपि एक-दो बार प्रीतो मेरे ‘तीरे-नजर’ से आहत हो चुकी थी, लेकिन उसने जाहिर नहीं होने दिया। उसकी यह सहन शक्ति मेरे लिए ‘ग्रीन सिग्नल’ थी।

घर भर की आंख बचा कर मैं उसे सीढ़ियों से उतरते और चढ़ते देख लेता। इसके अलावा वह कभी दिखाई नहीं पड़ती। ‘एजाज एस्टेट्स’ की पांचवीं मंजिल पर रहने के बावजूद वह एक सांस में सीढियों को नाप लेती। एक पल को भी उसके अभ्यस्त और सुडौल पैर नहीं डगमगाते। उसकी रफ्तार मुझे आकर्षित करती। जब वह सीढियों पर दिखाई देती, तो सीढियाँ भी जीवित लगतीं। धडकतीं! सांसें लेती हुई। बाकी सारे समय सीढियां मुर्दे की तरह शांत पड़ी रहतीं और उन पर चढ़ने-उतरने वाले कीड़ों-मकोडों की मानिंद लगते। इतने ढीले, सुस्त और रेंगते हुए कि कभी-कभी तो मुझे उनसे घिन होने लगती।

सीढियों के पार एक शाम को मेरी आँखों के आगे फिर अंधकार का संक्षिप्त विस्तार फैला और पलभर को बिजली चमकी, गुलाबी बिजली जब वह सीढियां चढ़ रही थी, तब ही स्कर्ट लहारायी और उसकी पिंडलियों से भी ऊपर तक का गोरा चिकना अक्स अपनी जगह से आजाद होकर मेरी आँखों में जज्ब हो गया। उसे जैसे इसका पता लग गया। वह एक पल को ठहरी। मुझे देखा… और रफ्तार से गुम हो गई, नरम और थरथराता अक्स. ..मुझे देर तक कंपकंपाता रहा। किताब-कॉपी मेरे सामने खुले पड़े थे, पर मैं उन्हें देख तक नहीं पा रहा था। मरी आँखों के सामने रेशमी-गुलामी पर्दा नाचता रहा। इस पर्दे में वक्त के साथ मेरी लुका-छुपी देर तक चलती रही, उस पार क्या है? यह देखने की मैं कोशिश करता रहा। तभी डोरबेल वाली चिडिया चहचहाई, तो मैंने उठकर दरवाजा खोला… सन्न रह गया। सामने प्रीतो खड़ी थी, फोक प्रिंट वाली कुरती और सलवार पहनी हुई माथे पर बड़ी-सी गोल-लाल टीकी, बालों के बीच निकली मांग के दोनों तरफ उसकी चोटियां लटक रही थी, दाई चोटी से एक गुलाब झांक रहा था। सादे होंठों पर एक फीकी मुस्कान मेरा मुंह खुला का खुला रह गया।

इस बीच रसोई से मां निकल आई, झनझनाती हुई देह को लिए मैं अंदर चला आया, दिल की धडकनें मुझे साफ सुनाई दे रही थीं। अब क्या होगा… दिमाग से टूट कर शब्द दिल पर गिर रहे थे। पल भर में काली आशंका के बादल घुमड़ आए और बरसने भी लगे। शिकायत…! गए आज काम से मार के आगे भूत भागते हैं। फिर मेरी क्या औकात मन ही मन शपथ ली कि आज बच जाऊं, तो स्कूल की प्रार्थना सभा में होने वाली ‘छात्र प्रतिज्ञा’ सही-सही बोलूंगा, ‘भारत हमारा देश है, हम सब भारतवासी आपस में भाई-बहन है…।। इस बात पर पश्चाताप किया कि क्यों आज तक सिर्फ मां जायी बहनों के अलावा किसी को और अभी उम्र भी क्या है? पढ़-लिखकर ‘नवाब’ बन गए, तो फिर उम्र पड़ी है ऐश करने को। अभी से ऐसी ओछी हरकतें। मैंने अपनी आत्मा को धिक्कारा। मां और पिताजी ने बचपन से सिखाया कि बड़ों का आदर करों। हमउम्र लड़कों को भाई और लड़कियों को बहन मानो। उनकी सीख आज कलंकित हो गई। परिणाम के भय से मेरा रोम-रोम कांप उठा। प्रीतो से बातें करके मां सीधे रसोई में चली गई। अनिष्ट की आशंका से मेरी छठी इंद्रिय फड़फड़ाई, किताब मेरे हाथ में थी, मगर मैं अपने मन के पन्ने कभी पीछे, कभी आगे पलट रहा था, कई पुरानी सीखों को दोहराया और भविष्य के लिए नई चेतावनियां दर्ज की। जैसे ही पिताजी ने घर में कदम रखा. शरीर से मन गायब हो गया। अबाबीलों-सी बेचैन कल्पनाएं खोखले दिमाग की दीवारों से रह-रह कर टकरा रही थीं। कहीं पढ़ी हुई पंक्ति याद आई, ‘यातना की कल्पना, कष्ट से ज्यादा यातनादायी होती है’, मैं इसी पंक्ति को जी रहा था। मन तो साथ छोड़ गया ही था, शरीर भी साथ छोड़ने लगा… सुन्न पड़ रहा था।

थोड़ी देर बाद मां ने आ कर कहा कि तैयार हो जाओ। कपड़े बदल लो, प्रीतो ने अपने जन्मदिन पर बुलाया है। पिता जी ने इजाजत दे दी है।

पहले-पहल तो मेरे कुछ समझ नहीं पड़ा। लेकिन धीरे-धीरे महसूस हुआ कि आकाश के घटाटोप अंधकार को परास्त करते हुए, मैं रश्मिरथी सूर्य की तरह जगत में पुनः प्रवेश कर रहा हूं। दिशाएं मेरी जय-जयकार कर रही हैं। कोर्स में पढ़ाई जा रही कविवर हरिवंशराय बच्चन की कविता आ रही रवि की सवारी मेरे कानों में गूंजने लगी। (इस कविता की गूंज के बीच मेरे साहित्य अनुराग ने पहली किलकारी ली!) मुझे लगा जैसे यह मेरा पुनर्जन्म है, ‘कन्फेशन’ के बाद मन बहुत निर्मल और पावन था। नवजात शिशु-सा कोमल और निर्दोष! नरक की आग में मैंने खुद को जलाया, इसीलिए ईश्वर ने मेरे लिए स्वर्ग के द्वार खोले…!

नहीं, सपना नहीं, मेरी नजरें प्रीतो के चेहरे को छू रही थीं। उसके चेहरे का स्पर्श मखमली महसूस हो रहा था। वह मेरी आंखों में झांक कर दिल और जिगर का जायजा ले रही थी। मेरे घर के दरवाजे पर वह जितनी सादगीपूर्ण और घरेलू लग रही थी सती सावित्री। अपने घर में ठीक उसके विपरीत थी। किसी विज्ञापन की हसीन मॉडल की तरह! उसके काले, घने, सुंदर और लहरदार बाल पीठ पर फैले हुए थे, जिन्हें कंडीशनिंग शैंपू ने दिलकश बना दिया था। होंठों को उसने बड़ी लगन से सजाया संवारा था। कत्थई रंग की अल्ट्राक्रीम लिप्सटिक के चारों ओर लिपलाइनर से सुरेख खींची थी। जिसे आसानी से पकड़ा नहीं जा सकता। कानों में पहने, गनमटल से बने सपकार रिंग कंधों को लगभग छुते हुए झूल रहे थे। संपूर्ण देखभाल करने वाले रिवाइटलाजिंग फेस पैक के इस्तेमाल से उसके चेहरे की त्वचा साफ, निखरी और स्वस्थ लग रही थी। ‘ईगो फॉर वूमन’ बॉडी स्पे से उसकी देह में की शक्ति पैदा हो गई थी। उसकी आंखों में जैसे अनकही चुनौती थी… और इन सबसे बढ़कर वह स्कर्ट से ऊपर ऑफ शोल्डर ब्लाऊज पहने हुए थी, उसकी बाहें नंगी थीं और वक्ष रेखा के प्रथम बिंदु तक सीना खुला हुआ था। किसी भी लडकी को इस तरह अब तक मैंने सिर्फ सिनेमा-टीवी में देखा था।

वह विशाल कमरा मेरे सामने आश्चर्यलोक की तरह खला-पसरा था। झिलमिल रेशमी-अंधेरे में चारों ओर मोमबत्तियां ही मोमबत्तियां….। सेंटर टेबल पर एक बहुत बड़ा और सुंदर केक दिल की तरह धड़क रहा था! उस केक पर क्रीम की गुलाबी परत चढ़ी थी। सुर्ख लाल क्रीम के इक्कीस गुलाब खिले थे! सुनहरी क्रीम से लिखा था ‘लाइफ बिगिन्स एट ट्वेंटिवन’! एक मोमबत्ती केक के बीचोबीच रखी हुई, रोशन थी। रोशनी की स्वर्णिम आभा से दिपदिपा रहे कमरे में सिर्फ हम दोनों थे। वह और मैं। ‘मेड फॉर ईच अदर!’ मुझे लगा कि किसी ख्वाब की ताबीर ऐसी ही होती है। रहस्यमयी और ऐंद्रजालिक! फिर भी सहज और स्वाभाविक!

एक गीत की मद्धिम धुन पृष्ठभूमि में बजने लगी, धीरे-धीरे स्पष्ट हुई। माइ हार्ट इज बीटिंग/कीप्स ऑन रिपीटिंग/आ ‘एम वेटिंग फॉर यू… शब्दों की स्पष्टता के साथ-साथ कमरे का एकांत पल-पल सघन होने लगा। हम करीब आ गए। फिर ठीक सामने! वैसे ही जैसे परस्पर आकर्षण में बंधे नायक-नायिका एक-दूसरे के सामने होते हैं! संगीत लहरियों ने सम्मोहन का अदृश्य जाल फैला दिया। अपने हाथों से मैंने गुलाब उसके बालों में लगाया। वह ‘कातिलाना अंदाज’ में मुस्कराई। कहने-सुनने को कुछ बचा नहीं। ऐसा लगा, जैसे समय इसी एक पल में समा गया है… और पल भी-थमा हुआ। गीत के जाने किस शब्द ने दिल को छुआ। पैरों में अनायास हरकत हुई। हम नाचने लगे-अभिजात, अंग्रेजी अंदाज में। नाचते हुए हम एक घेरे में घूम रहे थे। एक अनखिंची परिधि सहज ही तय हो गई। हम नाच रहे थे। कमरा भी हमारे नाच में शामिल हो गया।

वह मुझसे ज्यादा कुशल थी। उसका अभ्यास मुझसे अधिक था। मेरी रफ्तार कुछ तेज थी। भावनाओं का ज्वार मेरे भीतर लहरा रहा था।

उसके खुले हुए गोरे कंधे बार-बार ध्यान आकर्षित कर रहे थे। वक्ष रेखा का प्रथम बिंदु अपना आकार विस्तृत कर चुका था। मेरी इच्छा हुई कि उसके चिकने-गोरे कंधों को चूम लूं। तभी मेरे ज्ञान कोश में सुरक्षित एक पुस्तक का पृष्ठ खुला। लाल स्याही से ‘मार्क’ किया हुआ एक वाक्य सबसे अलग चमक रहा था; ‘किसेज व श्र मेंट फॉर लिप्स, इट इज सिली टु वेस्ट देम ऑन शोल्डर्स।’ मैंने नादानी छोड़ कर अपने चुंबनों का सही स्थल पर प्रयोग किया। पहले-पहल वह कुछ हिचकिचाई, फिर सहज हो गई। नाचते हुए हमने जाने कितनी बार एक-दूसरे के होंठों को चूमा, चुंबनों ने नाच में प्राण फूंक दिए, नाच की गति और एकाग्रता बढ़ गई। नाच से तेज मेरे दिल की धड़कनें थीं। एक दीर्घ चुंबन के दौरान मेरा दिल धमाके के साथ फट जाने के कगार पर पहुंच गया। पर ऐसा हुआ नहीं। हम नाचते रहे… कमरा भी हमारे साथ साथ नाचता रहा… चंबनों के बीच संगीत और नाच की गति पल-पल तेज होती चली गई, तेज… और तेज… इतनी तेज कि जैसे प्रकाश की गति…। चारों तरफ फिर प्रकाश था… संगीत…नाच…और प्रकाश.. सब अपने चरमोत्कर्ष पर।

एकाएक सारी मोमबत्तियां थक कर पस्त हो गई, जो जहां मुस्तैद थीं, वहीं अपना आखिरी निशान छोड़ कर निढाल हो गई। संगीत, दिल की धड़कनों-सा किसी चुंबकीय सन्नाटे में डूब गया। नाचती हुई देह गुम हो गई। कमरे में अंधेरा छा गया। उसके अलावा कुछ बाकी नहीं रहा। सिर्फ कुछ झीने-झीने गुलाबी अक्स रह-रह कर तैर रहे थे… अंधेरे में गुलाबी अक्स!

ये वक्त की हेरा-फेरी है

कैलेंडर की तारीखें समय से बदल रही थीं। प्रीतो सीढ़ियों से उतरती, तो मुझे विश्वास होता कि सुबह हो गई। प्रीतो सीढ़ियों पर चढ़ती तो मेरे यकीन की सांझ तसल्ली से ढलती। बिना अवकाश वह सीढ़ियों पर दिखाई पड़ती। कभी-कभार उसका स्कर्ट…। एक दिन वह दिखी नहीं! न सीढ़ियों से उतरते हुए, न सीढ़ियों पर चढ़ते हुए, दिन भर मैं बेचैन रहा। रात भर मुझे नींद न आई। मुझे लगा कि मेरे जीवन से कोई बहुत जरूरी चीज खो गई है। दिल में रक्त का संचार करने वाली कोई धमनी गुम मालूम पड़ी! वह कई दिनों के लिए गायब हो गई। सीढ़ियां अब मुर्दे की तरह शांत पड़ी रहतीं। उनमें कभी कोई हलचल नहीं होती। मेरा दिल भी अब स्पंदनहीन हो कर, देह में अपनी जगह पर लटका रहता। मुझे लगता कि सीढ़ियों की सांसें लौटेंगी तो मेरा दिल धड़केगा। हालत दिन-ब-दिन विचित्र होती जा रही थी। विचारों में तार्किक संगति का अभाव बढ़ता जा रहा था। अब मेरी आंखें हमेशा खुली रहतीं, मुदतीं नहीं। मैं खुली आंखों से जैसे सपने देखता… वह रफ्तार… वह स्कर्ट… सपने और सच के दरम्यान अंधकार का संक्षिप्त विस्तार… उसमें कौंधती गुलाबी बिजली…! मैं कांप जाता।

जीवन गुलाबी जैसे किसी जकड़बंदी का शिकार हो गया। इसी अबूझ कैद में लगभग एक पखवाड़ा बीत गया… वह नहीं दिखी। मैं सूनी सीढ़ियों को निहारता रहा।

एक रात को लघुशंका ने दबाव बनाया तो मेरी नींद टूटी। पास के कमरे से मां-पिता जी की बातें करने की आवाजें आ रही थीं। मैंने ध्यान नहीं दिया। टॉयलेट से लौट कर मैं बिस्तर पर लेट गया। मां की आवाज साफ सनाई पड़ रही थी। मैं करवट बदल कर फिर सोने की कोशिश करने लगा। नींद आंखों में थी। तभी कुछ ऐसे शब्द कानों में पड़े कि नींद में झुरझुरी दौड़ गई। एक सौ तीन नंबर वाली मिसेज सहाय ने दिन में जो बातें मां को बताई थीं, मां वे बातें पिता जी से कह रही थीं। मैं ध्यान से सुनने लगा-

“त्यागी जी की लड़की आज लौट कर आई है। बंबई में मिली। जब घर से भागी थी, तब पेट से थी। उसके कॉलेज का कोई लड़का है, वही ले गया था। रोज कॉलेज जाने के बहाने उसके साथ गुलछर्रे उड़ाती थी। त्यागी जी को एक तो अपनी बीवी की मौत का गम और उस पर लड़की की ये काली करतूत! कुलटा कहीं की… बेचारे करते भी तो क्या? पानी जैसा पैसा बहाया और पुलिस की जेब गरम की। तब जा कर मामला रफा-दफा हुआ।”

प्रीतो के आने की बात सुन कर मुझे अपना दिल सीढियों की तरह धड़कता मालूम पड़ा लगा कि हमेशा की तरह वह रफ्तार से उतर रही है… पूरी बिल्डिंग में मिसेज सहाय की विश्वसनीयता संदिग्ध है, यह मैं जानता हूं। सर्वविदित है कि जब वे ‘पड़ोसी पुराण’ का वाचन करती हैं, तो उनकी जबान पर त्रेतायुगीन धोबी आ कर विराजमान हो जाता है। वे अच्छे-अच्छों को डिगा देती हैं। मैंने प्रण किया कि मैं इन बातों पर विश्वास नहीं करूंगा। निर्णय में जल्दबाजी मेरी आदत नहीं है। लड़कियों के मामले में तो सावधानी और भी जरूरी है क्योंकि मनीषियों ने उनकी लाज ‘टूटे से फिर ना जुड़े’ की तर्ज पर मिट्टी के सकोरे से लेकर कांच के खिलौने तक, जाने कितने संकेतों द्वारा समझाई है।

मां की आवाज अब भी आ रही थी, सहाय जी की मिसेज बता रही थीं कि प्रीतो ने बंबई में अपना पेट साफ करा लिया। बच्चा पेट में ही मर कर- ‘पायजन’ बन गया था। लड़की सूख कर बिलकुलकांटा हो गई है। ढंग से चला भी नहीं जाता। मिसेज सहाय ने उसे खुद अपनी आंखों से देखा। भगवान का शुक्र है कि बच गई। नहीं तो त्यागी जी को उसकी लाश ही मिलती। यह कहते हुए मां का स्वर उदास हो गया। यह उदासी लड़की के भरी जवानी में मर जाने की आशंका से उपजी थी या उस कुलटा के बच जाने का दुख मां को था- समझ नहीं आया।

इसके बाद पिता जी का स्वर उभरा, “लड़के का पता चला! कौन था?”

मां बोली, “हां कोई है। सैफू…” सुनते ही मुझे लगा कि किसी पहाड़ी की चोटी से संतुलन खो कर गिर पड़ा हूं। लुढ़क रहा हूं तेजी से। एक भारी-भरकम चट्टान मेरे पीछे चली आ रही है… पूरी रफ्तार के साथ उसकी गति मुझसे कहीं तेज है। वह किसी भी पल मुझे कुचल कर मिट्टी में मिला सकती है। लेकिन कृपा उस ईश्वर की, जिसकी आंखें सदा खुली रहती हैं। चट्टान के रास्ते में एक पत्थर आ गया, जिसने उसकी दिशा बदल दी और मुझे एक घनी-हरी मुलायम झाड़ी ने अपनी गोद में समा लिया। मैं उस चट्टान को गिरते हुए देखता रहा। नीचे सिर्फ अंधेरा था। सघन अंधेरा।

क्या बोलूं, क्या बात करूं।

प्रिय पाठक, आपने कभी अपने लंगोटिया यार से धोखा खाया हो, तो आप जरूर समझ सकेंगे मेरे दर्द को। कहानी में सैफू के इस तरह सेंध लगा लेने से मैं सदमे में हूं। ठगा हुआ महसूस कर रहा हूं। मैंने तो पहले ही सैफू से इस कहानी का हीरो बन जाने को कहा था। फिर उसने ऐसा क्यों किया? यह ठीक है कि उसका दिमाग तेज है, वह स्मार्ट है और मैं कक्षा बारह तक आते-आते तीन बार फेल हो चुका हूं। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है। प्रीतो उसकी क्लास में पढ़ती जरूर है लेकिन प्यार वह मुझसे करती है।

चौंकिए मत…!! यह बात मैं इस तरह खुलेआम कहना नहीं चाहता था। मैं नहीं चाहता था कि प्रीतो मेरे प्यार में बदनाम हो। इसीलिए मैंने उसके जन्मदिन पर हुई बातों को छिपा लिया था। परंतु मेरे दिल में चोर नहीं था। आगे बताता ही। क्या कहानियां प्रेमी-प्रेमिका के मिलन के साथ समाप्त नहीं होती! विश्वास कीजिए, उस दिन तप्त चुंबनों वाले नृत्य के बीच प्रीतो ने मेरे बाएं कान में फुसफुसा कर कहा था, आइ लव यू चंदू… एक बार नहीं, पूरे तीन बार, “लव यू..लव यू..लव यू… चंदू, चंदू, चंदू…”

मुझे मेरे प्यार की सौगंध। झूठ बोलूं, तो कौवा काट ले। मैं आपके हाथों में एक सुंदर प्रेम कहानी देना चाहता था। लेकिन बदनीयत सैफू ने चोरी से घुस कर कहानी को खराब कर दिया है। इसके लिए मैं आपसे बेहद शर्मिदा हूं। अब जबकि बात बिगड़ ही गई है, तो इसे अधूरी छोड़ कर आपका गुनहगार नहीं बनना चाहता। मां-पिता जी की उस रात वाली बातों के बाद में जो कुछ भी हुआ, वह आपके सामने ईमानदारी से रख रहा हूं। अब जो है, वह कहानी नहीं हकीकत है।

दुनिया एक कड़वी दवा है

मिसेज सहाय सही थीं! यह मेरे लिए जोर का झटका था। मैं प्रीतो के कमरे में बैठा था। सुबह मेरे कंधे पर उसका सिर था। मेरी कमीज की बांहें उसके आंसुओं से तर थीं। पश्चाताप में डूबी प्रीतो मुझसे नजरें मिलाने का साहस नहीं जुटा पा रही थी। लेकिन मैं भी अपने सपनों के टूटने-बिखरने से स्तब्ध था। क्या कहं प्रीतो से? अब कहने को बाकी भी क्या रहा था? मेरे मन में भीषण द्वंद्व था। परंतु मन प्रीतो के आंसुओं में न पिघलता, यह कैसे संभव था? वह टूट चुकी थी। दुनिया की तमाम भाषाओं में ऐसा कोई शब्द नहीं था, जो उसके जख्म पर मरहम का काम करता, उसे ढाढस बंधाता, तसल्ली देता। जीवन सिर्फ एक दुर्घटना से खत्म नहीं हो जाता। वह भी ऐसी दुर्घटना से, जो सावधानी हटने से नहीं घटी हो। धोखे से जिसे अंजाम दिया गया हो। जी हां, धोखे से!

अपनी दरकती हुई आवाज में प्रीतो ने मुझे बताया कि सैफू ने उसे धोखा दिया। जब प्रीतो को कॉलेज में पता चला कि उसने अपने जन्मदिन पर किसी को नहीं बुलाया। सिर्फ सैफ के दोस्त चंद्र को छोड़ कर, तो क्लास के लड़कों और लड़कियों ने सैफू का खूब मजाक बनाया। उसे ‘जोकर’ तक कहा! तब सैफू ने शर्त बदी कि महीने भर में वह कॉलेज की सबसे खूबसूरत लड़की, प्रीतो को अपने जाल में फंसा कर दिखाएगा। शर्त भी ‘ट्रीट’ लेने-देने की। इसके बाद उसने कभी अपनी तेज रफ्तार बाइक पर बंदरों की तरह उछल कूद कर के सांस रोक देने वाले करतब प्रीतो के सामने शुरू किए, तो कभी वह प्रीतो को दोस्ती की आड़ में छोटे-छोटे गिफ्ट देने लगा। जिससे उपहार देख कर प्रीतो को घर में भी उसकी याद आती रहे।

पढ़ाई की टेबल पर रखने वाला फ्लावर पॉट, महंगी विदेशी कलम, शोकेस में रखने के लिए हमेशा सिर हिलाता छोटा-सा गुड्डा। इन सबसे बढ़ कर एक डियोडरेंट, जिसकी सुगंध से अगले स्नान तक आजाद होना नामुमकिन था। ऐसा कोई हथकंडा नहीं था, जिसे सैफू ने नहीं आजमाया। लेकिन जब देखा कि प्रीतो दोस्ती की दहलीज से पैर बाहर नहीं निकाल रही और समय बीत रहा है। तो उसने आखिरी दांव चला। धमकी! प्यार में जान देने की ध मकी! जहर की बोतल ले कर वह कॉलेज आया। उसने प्रीतो से कहा कि यदि उसे सच्चे प्यार में विश्वास नहीं है, तो वह सबके सामने जहर पी कर जान दे देगा। काफी हंगामे के बाद आखिर में जब सैफू ने बोतल मुंह से लगा ली, तो प्रीतो हार गई। सबके सामने उसने सैफ के प्यार को कबूल कर लिया। सैफू ने प्रीतो को गले लगा कर सामने खड़े दोस्तों को आंख मारी और अंगूठा दिखाया, थम्स अप! वह शर्त जीत गया। उसने शानदार ट्रीट ली और सबके सामने जहर वाली बोतल खोल कर गटक गया। उसके जहर पीने पर हैरान दोस्तों को उसने बताया कि कोल्ड ड्रिंक था! उसकी चालाकी पर सब और हैरान हुए। हो सकता था कि सैफू और उसके दोस्तों के इस जश्न में प्रीतो पीछे के दरवाजे से पहंच जाती। उसे सच्चाई का पता लग जाता। लेकिन भाग्य सैफू के साथ था। प्रीतो के साथ नहीं। हां! प्रारब्ध…

प्रीतो प्रेम की कच्ची डोर से बंधी सैफू की ओर खिंचती चली गई। अंततः सैफ ने अपने दिए सारे उपहारों के बदले प्रीतो से सबसे मूल्यवान ‘तोहफा’ हासिल कर लिया।

इस बारे में प्रीतो का कहना है कि सैफू उससे सचमुच प्यार करने लगा था। तभी वह इतना आगे बढ़ी। सुन कर एक बार मेरा मन हुआ कि कहूं, ‘मूर्ख…’ लेकिन प्रीतो की मानसिक हालत को देख कर चुप रह गया। प्रीतो का कहना है कि जब सैफू को उसने ‘मम्मी-पापा बनने वाली बात’ बताई, तो मारे खुशी के वह उछल पडा। लेकिन वह अपने घर में यह खशखबरी देने को राजी नहीं हुआ। उसने कहा कि यह सुन कर उसकी मां को हार्ट अटैक आ जाएगा। एक बार पहले आ चुका है। फिर उसने योजना बनाई कि मुंबई भाग चलें। वहां उसका दोस्त है। वहीं शादी करेंगे और कुछ महीनों बाद ‘बेबी’ को ले कर वापस लौट आएंगे। ‘बेबी’ को देख कर घर वाले नाराज नहीं होंगे। थोड़े-बहुत विरोध और आंसू बहाने के बाद प्रीतो तैयार हो गई। बकौल प्रीतो मरती क्या न करती…..

प्रीतो को ले कर सैफू मुंबई भाग गया। दोनों उसके दोस्त के घर पहुंचे। कुछ घंटों बाद सैफ शादी का इंतजाम करने के लिए जाने की बात कह कर दोस्त के साथ निकला और फिर वे वापस नहीं लौटे। घबराई हुई प्रीतो ने तीन दिन तक इंतजार करने के बाद फांसी लगा लेने का निश्चय कर लिया, तभी उसे ढूंढते हुए त्यागी जी पुलिस को ले कर वहां पहुंच गए, आगे क्या हुआ, मिसेज सहाय से बेहतर कौन बयान कर सकता था!

जमाना खराब है ।

कैलेंडर की जाने कितनी तारीखें प्रीतो के आंसुओं से धुलती चली गईं। लेकिन आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। प्रीतो से पूरी सहानुभूति रखने पर भी मैं कर क्या सकता था! मैं जानता था कि वह यंत्रणा के कितने भयानक दौर से गुजर रही है। मैं पूरी तरह से उसके साथ था। यह कहने की बात नहीं कि सच्चा प्यार किसी टुच्ची दुर्घटना से टूट नहीं सकता। जो टूट जाए वह प्यार ही क्या! सच्चा प्यार तो दो आत्माओं का मिलन होता है। देह का थोड़े! मेरे दिल में प्रीतो के लिए प्रीत बरकरार थी। प्यार, इश्क और मोहब्बत… चाहे जो कह लें। ऊपर वाला ऐसों-वैसों को यह नेमत नहीं बख्शता। किसी-किसी को देता है। लेकिन ऐसे कड़े वक्त में ये बातें प्रीतो से कहना कैसे संभव होता? यह मुझसे छिपा नहीं था कि प्रीतो का मन उससे रह-रह कर एक ही सवाल कर रहा है- अब कौन अपनाएगा तुझे? यह सब जान कर।

दुनिया ‘बदचलन’

कहेगी। थू-थू करेगी। सोच कर प्रीतो रो-रो पड़ रही थी, मैं उसे हर तरह से समझा-बुझा कर मायूस हो चुका था। मैं भगवान से प्रार्थना कर रहा था कि प्रीतो एक बार मेरी आंखों में आंखें डाल कर देखे, उसे वही निश्छल प्यार दिखाई पड़ेगा। हीरे-सा चमकता हुआ।

हीरा, जो सदा के लिए होता है।

…और दैवी प्रेरणा से प्रीतो ने मेरी आंखों में झांका। वही हुआ जो मैं सोच रहा था।

“चंदू…ऊ…” कहते हुए प्रीतो जोरों से फूट-फूट कर रो पड़ी, मेरे सीने से लग कर। उसके दिल का गुबार आखिरी बार आंखों के रास्ते निकल रहा था। अंततः हमने तय किया कि जो हुआ उसे हमेशा के लिए भूल जाएंगे। सब कुछ नए सिरे से शुरू होगा। नया जीवन…नया प्रेम… संयोग से यह पिछली सदी की आखिरी तारीख थी। अगला दिन नई सदी ला रहा था…।

सचमुच हम भूल गए जो कुछ भी हुआ था। जीवन नया आकार ले रहा था। मुझे अब सीढ़ियों पर उतरती-चढ़ती प्रीतो को देख कर दिल को तसल्ली नहीं देती पड़ती थी। शहर के तमाम रेस्तरां और बाग-बगीचे हमारे प्रेम के गवाह बनते रहे। मैं स्कूल की क्लास ‘गोल’ करता, वह कॉलेज की। शाम को हम कॉलोनी की पहली सड़क तक साथ आते और फिर वह आगे निकल जाती। मैं पीछे से घर पहुंचता।

एक दिन जब हम लौट रहे थे, तभी सैफ सामने से आता दिखा। प्रीतो ने मेरा हाथ पकड़ लिया, कस कर सैफू हमारे पास आ कर खड़ा हो गया। उसने प्रीतो से बात करने की इच्छा जाहिर की। लेकिन प्रीतो ने मुंह फेर लिया। उसने तरह-तरह से प्रीतो से निवेदन किए, साथ चलने के। प्रीतो टस से मस नहीं हुई। आखिर में उसने बताया कि वह अपने दोस्त के साथ ‘लोकल ट्रेन’ में धर लिया गया था, बिना टिकट। कोई जमानत लेने वाला नहीं था, इसीलिए दोनों को तीन महीने की जेल काटनी पड़ी। सैफ की बातें सुनकर मेरा दिल घबरा रहा था। कहीं प्रीतो… लेकिन अपनी जलती हुई निगाहें सैफू पर डालते हुए प्रीतो ने उसके चेहरे पर थूक दिया! बोली, “अब कोई चालाकी काम नहीं आएगी… तुम्हारा खेल मुझे पता लग चुका है सैफू… तुमने शर्त लगाई थी…।

प्रीतो की प्रतिक्रिया से मेरे दिल को बहुत राहत मिली। मैं आशंका से निवृत्त हो गया। सैफू का चेहरा देखने लायक था। बेहद लाचार, कमजोर और कुंठित चेहरा, लेकिन उसने एक कुटिल मुस्कान मेरी तरफ फेंकी। उसके चेहरे पर अपने किए का पछतावा नहीं था। गले में पड़े मफलर से उसने चेहरे पर पड़े थूक को पोंछा और प्रीतो से “फिर-मिलूंगा…” कह बाइक पर फर्राटे से निकल गया। उसके आखिरी शब्दों से घबरा कर प्रीतो ने मेरा हाथ और कस कर जकड़ लिया। उसकी हथेली पर आए पसीने को मैंने महसूस किया। वह बोली, “सैफू कुछ भी कर सकता है चंदू…”

उसके डर को समझते हुए मैंने कहा, “मैं हूं ना…!” लेकिन इस कहने का क्या मतलब था, मैं खुद भी नहीं समझ सका। उस दिन हम साथ-साथ लौटे। घर तक किसी ने हमें देखा नहीं। सैफ के डर से प्रीतो ने कॉलेज जाना, यहां तक कि घर से निकलना तक बंद कर दिया। हम मौका देख कर कभी-कभी छत पर मिल लिया करते।

लव मैरिज यानी प्यार आखिर प्यार होता है

अपनी जिंदगी के हालात को देखते हुए मैं शादी की कल्पना भी नहीं कर सकता था। तभी एक शाम प्रीतो ने मुझे चौंका दिया। यह कह कर कि क्या हम जल्दी शादी नहीं कर सकते! मुझे हंसी आ गई। वह गंभीर थी। जो कुछ हुआ, वह प्रीतो को घुन की तरह खाए-जा रहा था। वह भुला नहीं पा रही थी। लेकिन उसकी बात ने मेरे भीतर रोमांच पैदा कर दिया। मैंने कोहनी से उसे टल्ला मारा और कहा, “हम दो, हमारे नौ दो ग्यारह…” वह शरमाती हुई हंस पडी, अगले ही पल फिर गंभीर हो गई। मैंने उसे अपनी स्थिति समझाई। घर में, समाज में मेरी हैसियत है कितनी! इस पर हमारे घर में प्यार की बात पर ही आग भड़क जाएगी… और लव मैरिज…!! लेकिन प्रीतो को इससे कम पर कुछ भी मंजूर न था। जबकि घर में कुछ कहने का साहस मुझमें नहीं था। चोरी-छिपे जो चल रहा था, उसमें क्या कसर बाकी रह रही थी? प्रीतो नाराज हो गई। बड़ी मुश्किल से उसे मनाया। उसने एक और प्रस्ताव रखा। यदि वह अपने पिता जी से बात करे और फिर वे मेरे घर में, तो कैसा रहे!

मैंने ईश्वर को याद किया। सोचा. हो सकता है उसकी यही मर्जी हो। पर क्या यह सब इतना असान है, जितना लग रहा है! जब प्रीतो साथ है. तो उतना कठिन भी नहीं होगा! बहुत विचार किया। प्रीतो ने कहा कि मूड देख कर वह अपने पिता जी से बात करेगी।। जितनी जल्दी हो सके, उतनी कम-से-कम एक बार बात जरूर कर लेना। दो ही दिन बीते रविवार था। पिता जी घर में थे। प्रीतो अपने पिता के साथ हमारे दरवाजे पर खड़ी थी! मुझे इतना मौका भी नहीं मिला कि किसी बहाने बाहर निकल जाऊं। मैं अपने कमरे में बंद हो गया। स्टडी टेबल पर सिर पटक कर पत्थर बन गया।

इतनी जल्दी क्या पड़ी थी प्रीतो को! मैं भागा तो नहीं जा रहा था। कम-से-कम एक बार बात…पर अब सब बेकार, घर से निकाला जाना निश्चित है। कहां ठौर मिलेगा…! दर-दर की ठोकरें खानी पड़ेंगी। प्यार में बरबादी के सिवा और कुछ हासिल नहीं होने वाला, खत्म हो गई जिंदगी चंदू …। मैं लगभग सन्निपात की स्थिति में बड़बड़ा रहा था। जाने क्या-क्या …।

तभी मां की आवाज आई, “चंदू दरवाजा खोल… मेरे पैर इस तरह जड़ हो गए मानो अपना ही जनाजा उठाने के लिए बुलाया गया। हूं। दरवाजा खोल कर निकला, तो देखा कि पिता जी त्यागी जी से हंस-हंस कर बातें कर रहे हैं। प्रीतो सिर झुकाए, लजाते हुए बैठी है। मां आशीर्वाद की मुद्रा में उसके सिर पर हाथ रखे हुए है। दोनों बहनें मां के पास खड़ी हैं। टेबल पर रखा है मिठाई का डिब्बा! हाथ पकड़ कर मुझे खींचते हुए मां बोली, “बधाई दो प्रीतो को… उसका ब्याह पक्का हो गया है… मेरे दिल में कटार भुंक गई…। खच्च…! मां ने हाथ नहीं पकड़ा होता, तो अध-कटे पेड़ की तरह चरमरा कर वहीं गिर पड़ता। ‘बधाई… प्रीतो…’

अब क्या कहना…

रात के सन्नाटे में मां-पिता जी के कमरे में जीरो वाट का बल्ब टिमटिमा रहा था। मां की आवाज आ रही थी, “बड़ा भला लड़का है… शरीफ खानदान से है…सहाय जी की मिसेज बता रही थीं कि कल ही अपनी मां के साथ आया था। जो हो गया, उस पर बहुत पछता रहा था। त्यागी जी के पैरों में गिर कर उसने माफी मांगी… प्रीतो के भी पांव छूने को तैयार था! बेचारा…! खाना-पीना सब छोड़ बैठा था, प्रीतो के प्यार मे…। बाप है नही…। घर का इकलौता चिराग है। कैसे बुझने देगी मां…? थोड़ी नाराज थी। लेकिन प्रीतो को देख कर उसकी रही-सही शिकायतें दूर हो गईं। सोने के चार कंगन पहना कर गई है! बच्चों का भी मन रखना पड़ता है। समय देखो, कैसा आ पड़ा है… और ये उमर भी तो निगोड़ी! कैसे, कब, कहां पांव फिसल जाएं नादानी में…? अब क्या कहना, उस लड़के की जगह अपना चंदू ही होता तो…!!”

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’