KANYA PUJAN

कल रात से ही तैयारी जोरों-शोरों से चल रही थी। सामग्री लिस्ट बनाना, समान लाना किसी मेहमान या आगन्तुक के आने की सूचना नहीं थी, बल्कि कल के कन्या पूजन की तैयारी थी। सुबह हल्की सी शीतलता महसूस हुई,सूर्य देव ने आँखें खोलीं और भोर होने का एहसास करा दिया।

गली में चारों—तरफ चेतन ने नजर दौड़ाई तो दूर- दूर तक कोई छोटी कन्या नजर नहीं आ रही थी। हारकर वह अशोक चाचा की पान के दुकान पर पहुँचा और उनसे आग्रह किया, ‘चाचा! तुम्हारी नज़र में इधर कोई कन्या हो पूजन के लिए तो बताना।’

अशोक चाचा ने दिमाग लगाया और कहा ,’अरे! वो है न, नदी पार वाला ब्राह्मण, जिसकी सात बेटियाँ हैं, उसे बोल देना चाचा ने भेजा है और साथ में बेटियों को लेते आना। चेतन की आँखों में चमक थी। क्या सात बेटियाँ? हँसते हुए बोलने लगा, ‘बेटे के चक्कर में उसने सात बेटियाँ पैदा कर ली। अच्छा है, दो तो पड़ोस वाली हैं ही, एक बार में पूजन सम्पन्न हो जाएगा।’

चल पड़ा चेतन गाड़ी से उतरकर नदी पार करने। ब्राह्मण का घर दिखा उसे। हाथ जोड़कर उसने कहा, ‘आपने कन्या पूजन कर लिया हो तो, अपनी पुत्रियों को हमारे साथ भेज दें।’ हँसते हुए ब्राह्मण बोला,’ कैसी पुत्री? मेरी तो शादी भी नहीं हुई है अभी।’ बगीचे में खेलते हुए चारों पुत्री को देखकर चेतन ने कहा,’मैं इनकी बात कर रहा हूं।’ ब्राह्मण के नेत्रों में चिंता रूपी आँसू थे। भाव विभोर होते हुए उसने कहा, ‘ये सब मुझे कोई नाले के किनारे, कोई अस्पताल, कोई सुनसान चौराहे पर तो कोई कूड़ेदान में मिली थीं।’

‘और ये जो दोनों हैं छोटी वाली, पैरों से लाचार। क्या ये चलेगी मेरे साथ?’ ब्राह्मण ने बोला, ‘जिस नदी को पार करके आ रहे हो ये वहीं सुंदर से पैकेट में मिली थीं। मैंने जिज्ञासावश खूबसूरत पैकेट खोला, तो एक सजीले- सँवरे बैग में ये मिली। बैग छोटा था इसके लंबाई के अनुसार, तो उस निर्दयी पिता ने इसे मरोड़ कर डाल दिया था, जिससे ये पैर से लाचार हो गयी। गाड़ी उतरता हुआ नौजवान दिखाई दिया मुझे नदी किनारे, लेकिन दूर से पहचान नहीं पाया। कितनी निर्मम हत्या की होगी उसने इसकी लेकिन मैंने अपने प्यार से सींच कर जीवित रखा इसे।’

चेतन अंदर ही अंदर घुट रहा था, उसकी आँखों के आगे सात साल पहले की कहानी घूम रही थी, चक्कर सा महसूस हो रहा था उसे। कैसे वो सात साल पहले बेटे के लोभ में नदी किनारे बेटी का पैर मरोड़ कर निर्दयता से सजीले बैग में फेंक आया था ताकि किसी को शक न हो कि दो नन्हीं सी कली को उसने खिलने से पहले ही मरोड़ दिया।

किसी तरह उसने दिल पर पत्थर रख, मन को मजबूत किया और सबको घर ले आया। वह और उसकी पत्नी आदर सहित कन्याओं को पूजा के लिए बिठाकर पाँव पखारे, चुनरी ओढ़ाई, महावर लगाया और भोग ग्रहण करने दिया। आखिरी में सभी का पैर छूकर आशीर्वाद लिया। चेतन जब दोनों पैर से लाचार बच्चियों का पैर छू रहा था, तो ऐसा लग रहा था जैसे पैरे तोड़ने के लिए माफी मांग रहा हो।
जिस बेटियों को वो फेंककर आया था, आज उसने ही अपनी कीमत का एहसास करा दिया ।

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